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Full text of "Soor Sahitya Nav Mulyankan"

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सूर साहित्य ; नद मूल्यांकन 


डा० चच्द्रसान रावत, एम्‌> ए०, पी- छच ० डी ० » डी० लिट० 
रोडर : हिन्दी विभाग 


श्री वेंकटेश्वर विश्व विद्यालय, तिरुपति. (आ०» प्र०) 


अकाशक : 


जो व्थाह्दिक्यथ स्ऑथचियत्तवल्सथआल्क्लच्लय , 


सथुरा 


भकाशक जवाहर पुस्तकालय, सदर, वाजार, मथध् रा, 
लेखक छा ढा० चन्द्रभान रावत, 
द्वितीय संस्करण सर पंचशती १६७७ 
सर्वाधिकार छ् प्रकाशकाधीन 
मूल्य क पचास रुपये 
विद्यार्थी संस्करण छा तीस रुपये 


मुद्रक हर पचारी प्रिंटिंग प्रेस, मथुरा,-२८१००२ 


कुछ कहना है, इसलिए--- 


में कुछ उतना भावुक नहीं हूँ । न जाने क्‍यों 'सूर' पर सोचते समय 
कुछ भावुकता भा जाती है  बोदछ्धिकता के परों के नीचे से ठोस धरती 
खिसकने लगती है और एक तरलता का अनुभव होता है । 


'सूर पर सोचना मेरे लिए सरल और सुहावना रहता है। न जाने 
क्या-क्या सोचने लगता हूँ : ब्रज, राधा, कृष्ण, गोपियाँ, श्रीदामा, यशोदा, 
न जाने कब, इनमें से कौन आकर विरमा लेता है ! 'सूर पर सोचने के क्षण 
मेरे लिए सृजन के क्षण होते हैं या समीक्षा के--कहना कठिन है । जब इस 
विपय पर बोलना पड़ता है, तो इतनी तरलता तो नहीं रह पाती, फिर भी 
शली पूरी तरह में गद्य के अनुशासन में भी नहीं रहती । लिखते समय बात 
बदल जाती है । परम्परा-शोवबन, यथ्याकलन, प्रामाण्य, आदि न जाने कितनी 
शोबपरक्र औपचारिकताएं आकर घेर लेती हैं। आश्चयं यह देखकर होता है 
कि मानव-मन का यह पारदर्शक कवि कितनी लम्बी परम्परा रखता है। भाव 
और मूल्यों की कितनी जटिल ऊहापोह सूर-साहित्य में व्याप्त है ? इस प्रकार 
वुद्धि को भी एक वहाना मिल जाता है। वौद्धिक प्रक्रियाओं को सूर' पर 
समर्पित हो जाने का अवसर मिल जाता है। सूर की भावधारा का बौद्धिक 
मूल्यांकन भी अपने आप में एक उपलब्धि वन जाता है । 


हे 


पुस्तक का नाम सोचते समय नया मूल्यांकन शीषक भी ध्यान में 
आया था नया के स्थान पर ' नव आ जाने का एक कारण है । नया 
शब्द चाहे वाद न बना पाया हो, पर एक पारिभाकिता इसके साथ अवश्य 
संलग्न हो गई हैं । इसमें परम्परा को नकारने का भी एक भाव है| सूर का 
मूल्यांकन अधिक से अधिक परम्परा का नवीन बोध कहा जा सकता है । 
नव लेखन शब्द भी ध्यान में आया : मैं डर गया : कहीं नव भी 
पारिभाषिक न हो गया हो ! फिर भी साहस करके “नव-मूल्यांकन' को मैंने 
स्वीकार कर लिया । इस पुस्तक में नव-नूल्यांकन की ही प्रक्रिया मिलेगी । 


ऐसा अनुभव होता है कि सूर-साहित्य नव-मूल्यांकच की संभावना से 
युक्त है । मानव-मन के इतने सहज और सरल स्पन्दन मध्यकालीन साहित्य में 


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यह ह्वितीय संस्करण ! 


सर पंचशती का महापर्व और 'सूर साहित्य: नव मृल्यांकन' 
का यह द्वितीय संस्करण ! दोनों के बीच एक संवन्ध स्थापित हो, यह 
मेरी भी कामना है ओर प्रकाशक की भी । अच्छा होता यदि कोई 
नवीन चितन और तत्पेरित कोई नवीन व्यक्तित्व इस संबंध का 
आधार बनता | इस द्वितीय संस्करण की पीठिका में पाठकों की सूर 
के नव-मूल्यांकन के प्रति अभिरुचि और विद्वान पाठकों के द्वारा 
प्रस्तुत पुस्तक का स्वागत है। यही तत्त्व सूर पंच शती और प्रस्तुत 
पुस्तक के संवन्ध का आधार है। यह वस्तुत: एक सघन सन्‍्तोप 
की वात है। 


इस द्वितीय स स्करण में जहाँ-नहाँ सशोधन तो किया गया 
है किन्तु परिवर्तत-परिवरद्धन विशेष नहीं किया गया । यह भी उचित 
प्रतीत हुआ कि इस पुस्तक में सन्निविष्ट सामग्री को ज्यों का त्यों ही 
रहने दिया जाये। जो नवीन उद्भावनाएं ओर प्रतिक्रियाएं सूर- 
साहित्य के प्रति उगी हैं उनको किसी भावी क्षण में प्रति फलित 
होने के लिए छोड़ दिया गया है। यदि प्रस्तुत लेखक और प्रकाशक 
का परस्पर कुछ कम व्यावसायिक्र सहयोग रहा, तो वह भावी क्षण 
जल्दी ही वर्तमान बन सकता है । 


प्रस्तुत पुस्तक का प्रथम संस्करण १६६७ में प्रकाशित हुआ 
था | लगभग ९१० वर्ष हो गये । इसके द्वितीय संस्करण की आव- 
इश्कता का अनुभव ४-५ वर्ष पहले ही होने लगा था। परिस्थितियाँ 
इस कार्य में आड़े आती रहीं और द्वितीय संस्करण का सकलप इस 
वर्ष ही क्रियान्वित हो सका । सभवत्त: सूर पंचशत्ती के सदर्भ में ही 
यह सब होना था। 


जब इस ससस्‍्क्ररण में विशेष परिवतेन-परिवद्धन नहीं ही 
किया गया है तव इसके सम्बन्ध में विशेष कुछ कहना भी नहीं है । 
केवल उन सुधी पाठकों और ग्राहकों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना 
शेप रह जाता है, जिनके कारण प्रथम संस्करण को नव कलेवर के 
साथ प्रस्तुत करता सम्भव और अनिवार्य हुआ | लेखक पाठक और 


( ८ ) 


प्रकाशक की भ्यी में पाठक्र का आयाम कितना प्रेरक और महत्वपूर्ण 
होता है, यह इससे सिद्ध होता है ! 


मुझे विश्वास है कि प्रथम सस्‍्क्रण की ही भाँति इस द्वितीय 
स॒स्‍्करण को भी सहदय पाठकों के द्वारा ग्रहण किया जायेगा। में 
यह भी विश्वास दिलाता हूँ कि लेखक कुछ नवीन देने को साथचा में 


निरत रहेगा । (9७) 


हस्त नक्षत्र, १६७७ | ““चरन्‍्द्रभान रावत 


प्रकाशकीय-. 





'मूर-साहित्य : नव-मुल्यांकन प्रकाशित करते हुए हमें उल्लास तो हो 
ही रहा है, कर्तव्य के निर्वाह का भी सुख मिल रहा हैं। ब्रज के प्रकाशकों 


का ब्रज की साहित्यिक विभूतियों के प्रति एक कतंव्य भी है । भाश्या है सूर 
के मूल्यांकन के साहित्यिक अनुष्ठान में इस प्रधास को स्थान मिलेगा । 





डा० चन्द्रमान रावत ने अपने सतत बव्यवसाव के इस फल को हमें 
प्रकाशित करने का अवसर दिया, इसके लिए उनके हम बामभारी हैँ। प्रस्तुत 


प्रयास पर हमें गव है : डा० रावत बधाई के पात्र हूँ । 


डा० रावत ब्रज के सांस्कृतिक संदर्मों से सुपरिचित हैं। सूर-साहित्य 
के नव-मूल्याँकन से इन संदर्नमों की निजी बनुभूति का संस्पर्श है । यही इस 
मूल्यांकन का वंशिप्ट्य है। जितनी निष्ठा और सुरुचि का परिचय उनके 
लेखन से मिलता है, संभमवतः उतनी सुरुचि हम मुद्रण आदि में नहीं ला सके 
हैं। यह हमारी निजी सीमा है। फिर भी भरसक प्रयत्न हमने इसके मुद्रण 
ओर इसकी सज्जा को उचित स्तर प्रदान करने का किया हैं । 


इन दब्दों के साथ पुस्तक सूर स्मृति में समपित हैं। विज्ञ पाठकों 
प्राप्त प्रोत्साहन ही प्रकाशक की भावी प्रेरणा है । 


--कु जबिहारीलाल पचोरी 


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पष्टाधार 


ज्यक्ति आन्दोलन न समस्त नभाक्त साहित्य पृ लिए ए्क्त मावभूमि 
प्रस्तुत की । जीवन के मूल्या का सक्ननण ज्त्यन्त द्वत गति 


झा । निम्म-घारा में पहले कर्मकांडीय मूल्यों को मान्यता थी । उपनिषदों 


“ 00| 


कृमकांड के स्थान पर ज्ञानकांड की क्वापता को और इस प्रकार प्रथम 
मल्यगंत सक्रमण हुआ। गाता न उपनिषपद्‌ के जावन-समृल्यपों को एक भावात्मक 
मोड दिया | आगम-धारा इतनी ही प्रवल थी 

झाड़ दिया | आममन्धार भी इतनों ही ल था उसके विविध स्तर 





विष हक घरुद्ध अब जकनके ््चा रन कमकमनत पक, लय धर निज बल कक जनक र् दे 
चंद-वरुझ स्वर ऊचीोा करत च्ठ । क्रमशः उनका ट्यूंगत सक्रमण समा 
का 


454 
नावात्मक रूप धारण करने लगे वाद्ध आर जन धमा न भी वेद को स्वीकार 


ः 


नहीं किया । एक ओर तो करण और अहिंसा के डूल्या ने स्थान पाया, दूसरा 
ओर देवालय, चर्या आदि में क्रियात्मक साधना का विधान हंआ १ यह साधना 


47! 


योग मूलक सावना से भिन्‍न थी । इस प्रकार सारे देश में ज्ञानमीय तथा अच्य 
वेद विरोधी संप्रदायों क्र एक जाल सा बिछ गया। जंन-मादस दैंदिक या 
वेदान्तों के मूल्यों से कट सा गया । जंकर ने प्रस्थानत्रयी (--उपनिपद्‌, ब्रह्म 
सूत्र एवं गीता) की ज्ञानात्मक व्याख्या करके, बौद्धिक घरातल पर विगत 
मल्या का पुनस्थापना की । यों गकराचाये जी के व्यच्तिन्द क्त्त्वरमेंमी कहीं-व- 
कहीं मादात्मक मूल्यों की स्वीकृति थी, पर आगमीय कुंहासे को चौरने के 
लिए उन्हें ज्ञाववादी जीवन मूल्यों की किरणें आवश्यक प्रतीत हुई | इसी 
रूप में उनका व्यक्तित्व समग्र तेजल्विता से मंडित होकर प्रकट हुआ । 'गीता' 
की मावात्मक क्रान्ति को भी उन्होंने ज्ञानग्त्मक बना द्विया। इस बाघात 
से चेद विरोधी स्वर कुछ ननन्‍द हुआ--चाह समाप्त न हुआ हो । एक तीद् 
प्रवाह मे पड़ी हुई जनता कुछ रुका - चाह ज्ञान वादी धत्यं क॑ साथ तादात्म्य 
। 


प्रस्थाद इस: ैकएननकमनकाम “मु धाधारित सनम पतन आ पका. वन डा क्- छा. 
स्थानश्नषया पर बाधारत जांवन-मूल्य नवीन उंस्कारों से 


१० सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


प्रोदभासित हो उठे--चाहे अभी उनका जनानुकूल भावात्मक संस्कार होना 
शेष हों । आगमीय या बौद्ध भावात्मक क्रियाओं और चर्याओं की स्थिति 
अछूती रही । भक्ति के आचार्यो और संप्रदायों ने प्रस्थानत्रयी को भावमूलक 
व्याख्या करके एक ओर शंकर द्वारा प्रचारित अद्वतवादी मूल्यों को विशिष्ट 
या 'शुद्ध किया । दूसरी ओर आममाश्रित, तंत्राश्चित या बौद्ध भावात्मक 
मूल्यों के स्थान पर निगमाश्रयी भावात्मक संस्कारों की स्थापना को। 
प्रस्थानश्रयी के अतिरिक्त इस प्रकिया में बैखानस, पांचरात्र संहिताओं, 
विविध पुराणों और विशेष रूप से भागवत और लोकभाषागत भावाकुल 
साहित्य को प्रामाण्य प्रदान किया गया । इस प्रकार एक महान्र्‌ सांस्कृतिक 
आन्दोलन हो उठा । 
जाने-अनजाने तंत्रागमों, सहज साधना, रहस्यात्मक श्यगार ने भी 
इस भावात्मक क्रान्ति को कुछ तत्त्व प्रदान किये : एक तीजत्र उत्ते जना दी । 
धीरे-धीरे भावात्मक मूल्य इतने तीव्र हो गये कि दाशंनिक पीठिका शिथिल 
पड़ने लगी। भावों की सारणियों से संबंधित नवीन शास्त्र विकसित होने 
लगा | प्रस्थानश्रयी की छाया से एकदिन यह भावज्ञास्त्र मुक्त हो गया। 
इस शास्त्र की भूमिका में तंत्रात्मक रस, काव्यश्ास्त्र, कामशास्त्र तथा लोक- 
साहित्य की प्रेरणाए' स्वीकृत की जाती है। इन सबने मिलकर एक-एक 
भाव-पद्धति और एक ऐसा माध्यम प्रस्तुत किया कि आन्दोलन जनव्यापी 
हो गया । लोकसाहित्य में नवोदित भावात्मक मृल्य गूजने लगे । जनजीवन 
को ज॑से एक खोया हुआ उत्साह वापस मिल गया हो। विभिन्‍न अवतारों 
की लीलाएँ उसे अपनी निजी प्रतीत होने लगी। लौकिक और शिष्ट कलाए 
नवीन अभिप्राय पाकर घन्य हो उठी । जीवन की विगृश्रमित धारा को 
नवीन दिशा मिली । 
इसी समय देवालयों का संगठन हुआ । सेवा-चर्या इन देवलायों में 
मूतिमान हो उठीं । ऐसा प्रतीत होने लगा कि पांचों ललित-कलाओं का सह- 
योग देवालय के संगठनों को प्राप्त हो गया। जीवन और धमं, कला 
ओर अध्यात्म, बुद्धिवादी और भाववादी मुल्य ज॑से नवीन संबंधों में 
बंध गये : समन्वय और सामंजस्य की शक्तियां जैसे इतिहास में दीघ॑ंकाल के 
पश्चात्‌ संघर्ष ओर इन्द्व की शक्तियों पर विजय प्राप्त कर सकी हों । इतिहास 
के पृष्ठों पर इस उल्लास-समारोह की झंकृतियाँ अकित है । 
सबसे वड़ी बात यह कि यह सब कुछ भारतव्यापी हुआ । भारत के 
तर में प्रवाहित सभी ज्ञात-अज्ञात भाव घाराओं ने इस आन्दोलन को 


पृष्ठाधार १६ 


योगदान दिया । इस आन्दोलन की सुजनात्मक शक्तियों ने अनेकों को प्रातिम 
साधना की प्रेरणा दी | सर्वत्र विपुल साहित्य रचा गया। भनन्‍्ततः यह हुआ 
कि वेद-विधि, शास्त्र मर्यादा आदि के मूल्यों की एक बार फिर उपेक्षा हुई 
और शुद्ध प्रेम का मूल्य जीवन में सर्वे मान्य हुआभा । यही भावात्मक संक्रमणता 
सभी भक्त कवियों को प्राप्त हुई । मक्ति साहित्य में विधि! और राग में 
क्रिया-प्रतिक्रिया बनी रही । इन सूत्रों को कुछ और विस्तार से देख लेना 
उपयुक्त होगा । 
१-वेदिक मूल्यों का ह्वास 

मध्यकाल में एक विशेष मनोवृत्ति मिलती है। एक वर्ग अपने से 
विरोध रखने वाले मतों को 'अवंदिक' कहकर तिरस्कृत करता था। अवंदिक 
कहे जाने वाले मत बेदिक मत का खंडन करते थे । इन दोनों मत-धाराओं की 
परम्परा नवीन नहीं एक दीघं समय से चली आ रही थी । निगम और 
आगम' विचार धारायें क्रिया-प्रतिक्तिया के रूप में इतिहास का एक सत्य बन 
चुकी थीं । 

स्वयं उपनिषद्‌ वेदान्त' बन गये । ब्रह्मथि मेधा के प्रति राजधि मेधा 
की एक हलकी सी विकास-मूलक प्रतिक्रिया उपनिषदों में परिलक्षित है। 
वेदोक्त स्थुल एवं शुष्क कर्मकांड के स्थान पर ब्रह्मांड व्यापक, सूक्ष्म, चिन्तन 
परक यज्ञ की स्थापना की गई। मूल शक्ति के अन्वेषण की प्राकृतिक शक्तियों 
के माध्यम वाली पद्धति का निराकरण करके एक शुद्ध ज्ञानात्मक पद्धति का 
आविष्कार किया गया। एक ऐसा महान्‌ दर्शनः जन्म लेने लगा, जिस पर 
आज भी भारत गवे कर सकता है। पर, इनमें वेद का स्पष्ट और तीब्र विरोध 
भी नहीं था और न उसका खंडन ही किया गया । एक प्रकार से वेद का पूरक 
साहित्य प्रकाञ् में आया : वेदिक पद्धति जैसे आत्मोन्मुख होकर सूक्ष्म से सूक्ष्मतर 
चिन्तन-साधना से परमात्य तत्त्व का संघान और निरूपण करने लगी हो । 
कर्मकांड मूलक ब्रह्म ज्ञान या ब्रह्म विद्या. शुद्ध ज्ञान का परिवेश प्राप्त करने 
लगी । इस प्रकार ब्रह्म-ज्ञान का विकसित रूप प्रकट हुआ । इस प्रकार वेदान्त 
दर्शन किसी न किसी रूप में श्रति को आधार रूप में ग्रहण किए रहे । 

उपनिषद्‌-साहित्य के नवनीत को ग्रहण करते हुए “गीता” का अवतार 
हुआ । इसमें वेद को त्रगुण्यमय घोषित कर दिया गया : अजु न से “निसत्रैगुण्य' 
होने के लिए कहा गया । इस प्रकार वेद की हृष्टि से गीता का सामंजस्य 
नहीं था । वास्तव में ज्ञानात्मक उपनिषद्‌ का भावात्मक अवतार ही गीता है। 
गीता का प्रमुख प्रतिपाद्य 'मक्ति' है। ज्ञामय भक्ति या निष्काय-मक्ति के 


कर 


१२ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


सूत्र ही आगे विकसित हुए । इसी की प्रेरणा से आगे के भावमूलक भविति 
संप्रदायों में वेद! का खंडन चाहे नहीं मिलता हो, पर उसे अनावश्यक अवश्य 
बतलाया गया है । | 

जिस प्रस्थानत्रयी को शुद्ध ज्ञानात्मक घरातल पर शंकराचार्य जी ने 
उतार दिया था, उसी की शुद्ध भावात्मक व्याख्या भक्ति के आचार्यो ने की । 
इसी व्याख्या ने भक्ति को सर्वोच्च मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया और 
वेद” के मूल्य और यज्ञ-यागादि से युक्त साधना को उपेक्षित कर दिया। यज्ञ 
का स्थान पूजा ने ले लिया । पूजा-कर्म '“पत्र-पुष्पं फल तोय॑” से सम्पन्त हो 
सकता था। 


वेदिक साहित्य में ही कुछ वेद-विरोधी जातियों और गणों की सूचना 
मिलती है। जिस आंगिरस परम्परा से कृष्ण का संबंध जोड़ा गया है वह भी 
वेदिक नहीं थी। अथवंबेद में एक ऐसी शासन व्यवस्था की -चर्चा है, जिसके 
निवासी बेद और ब्राह्मण का विरोध करते थे: दोनों का उच्छेद ही उन्हें 
अभीष्सित था । इस प्रकार के 'वितह॒व्य' के १००० निवासियों का उल्लेख है ।" 
आगे के इतिहास काल में यह स्थिति अंधिक स्पष्ट हो जाती है । इन गणों में 
शासन व्यवस्था ही भिन्‍न नहीं थी, इनके निवासी वेदिक संस्कृति ओर आचार 
के भी कट्टर विरोधी थे । महाभारत के समय भी ऐसा विरोध मिलता है। 
कृष्ण दोनों में मैत्री भी चाहते थे । आभीर एवं यादवों में भी ऐसे आचार थे, 
जिनका समर्थन वैदिक परम्परा नहीं करती थी। इस प्रकार कृष्ण में ये 
संस्कार आये । एक ओर तो उनका संबंध आंगिरस परम्परा से हुआ । दूसरी 
ओर आभीर और यादव गणों से । है 


वेद-विरोधी स्वर की एक और परम्परा है। यह वौद्ध और जैन धर्म 
के रूप में प्रकट हुई । कालांतर में बौद्ध धर्म के विंकसित रूपों के साथ समस्त 
आगम परम्परा संबद्ध होती गई । तत्कालीन बौद्ध संप्रदायों के संबंध में देशी- 
विदेशी स्रोतों से प्रचुर साहित्य प्रकाश में आया है। वैदिक परम्परा वौद्ध 
संप्रदायों में अभाववाद या शुन्यवाद की स्थिति मानकर उनका खंडन करती 
रही । बौद्ध संप्रदाय वैदिक-मत के विरोधी बने रहे । बौद्ध-बर्म के ऐसे ही 


संप्रदायों के अतिवाद को देखकर - ही एक घोर प्रक्रिया हुई। शंकराचार्यजी 


९. ये सहज्मराजन्नासन दश शता डत ते ब्राह्मणस्थ गां जम्घा वेतहब्या 
पराभवन । 


[ अथवे, ५५१८।१० ] 


पृष्ठाधार १३ 


ने शन्‍्यवाद को 'सर्वप्रमाण विप्रनिपिद्धा कहा । उसके उच्छेद का इन' आचार्य॑ 
प्रवर ने संकल्प लिया | कुमारियल भट्ट बुद्ध जी के आदर्श सिद्धान्तों को भी 
अग्राह्म वतलाया । बौद्ध धर्म का प्रकट रूप तो इन थपेड़ों को न सह सका, पर 
उसके प्रच्छन्‍्न रूप अवशिष्ट हो गए । स्थविरवाद, वज्रयान, सहजयान आदि 
रूपान्तरण प्रस्तुत हो गये । इनका पोषण ज्ञाक्त, शव, तंत्र, रसायन भादि के 
तत्वों से होता रहा | पुराने साहित्य में वौद्धों के माध्यमिक, योगाचार, 
सीच्रान्तिक और वैभाषिक संप्रदायों का भी उल्लेख मिलता है । जैनमत और 
चार्वाक दर्शन को जोड़कर उन संप्रदायों की संख्या छः करदी गई है, जो वेद 
का विरोध करते थे | इनको 'नास्तिक' कहा जाता था । इनके अतिरिक्त अन्य 
अनेक छोटे संप्रदाय भी रहे होंगे, जिनमें वेंद-विरोबी स्वर ग्रजता रहा 
होगा । 

पौराणिक साक्ष के अनुसार कापाल, लाकुल वाम, भैरव, पाँचरात्र, 
पाशुपत आदि को अवैदिक घोषित किया गया | शद्धूराचार्यजी ने वाशुपतों 
और माहेण्वरों को वेद-बाह्य बतलाया ।" प्रवृत्ति शव, द्वाक्त और तांत्रिक 
मतों को अवंदिक कहने की प्रतीत होती है | यदि यह कहा गया कि विष्णु ने 
ही कापाल, मरव आदि संप्रदायों से संवन्धित मोह शास्त्रों को उत्पन्त किया, 
तो विरोधी स्व॒र ने यह बोजना की : शिवजी ने कहा कि मायावाद एक 
श्रामक दर्गन है । इससे अधिक असत्य दर्शन नहीं मिल सकता । वेद-विरोधी 
मतों ने वेद-विरोधी स्वर को और ऊंचा ओर स्पष्ट किया । 

आगे चलकर तांत्रिक साधना और योगमार्ग ने प्रवल रूप धारण 
किया । तन्त्र के सम्बन्ध में साहित्य भी विकसित होंता रहा । जहाँ वैष्णव 
सहिताएं जन्म ले रही थीं, वहां शवागरमों और शजाकक्‍त तंत्रों का विकास भी साथ 
साथ हो रहा था | आगम' साहित्य का संवन्ध भी दोव परम्परा से है। पर, 
कुछ आगमों को वैदिक कहा गया । इन आममों के प्रामाण्य को स्वीकार करने 
वाले कई गव और थाक्‍्त संप्रदाय चले । शाक्‍तों के चार संप्रदाय केरल, 
काश्मीर, गोड़ और विलास माने जाते हैं । वंगाल और आसाम इनके मुख्य 
केन्द्र हो गये । एक प्रकार से इन दोनों की अखिल भारतीय स्थिति हो गई । 
पर आगममों में ऐसे सूत्रों का सन्निवेश है, जिनस समन्वय की भूमि तैयार हो 
सके । दार्शनिक दृष्टि से कुछ समान सूत्र ये हैं : उपास्यदेव परम तत्व है | यह 





१. शारीरिक भाष्य, २।२।३७ 
२. कमंपुराण, अध्याय १६ 


१४ सूरसाहित्य : नव मुल्याकन 


प्रकृति से परे है। परम तत्व में इच्छा, क्रिया आदि शक्षितयों का निवास हैं । 
जगत्‌ परमतत्त्व का परिणाम है। सृष्ठि क्रम में प्रकृति भी स्वीकृत हैं। त्रिगुण 
को भी स्वीकार किया गया है। भक्ति पर सभी बल देते हैं । भवित के क्षेत्र में 
सभी वर्ण, स्त्री, पुएष समान अधिकार रखते हैं। चर्या (धार्मिक) और क्रिया 
(मन्दिर आदि का निर्माण) को भी सभी ने स्वीकार किया ।' पारिभाषिकर 
दब्दों में मी साम्य है। बीज, मन्त्र, मुद्रा, न्यास आदि मी हैं। योग को सभी 
में चर्चा हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि भक्ति-संप्रदायों के दर्शन में भी ये 
तत्त्व या इनके संस्कृत रूप स्वीकृत रहे । 
शवागमों पर आधारित अनेक संप्रदाय थे। शंकराचार्य जी ने इनका 

भी खंडन किया । लिंगपुराण में पाशुपतों की एक वेदिक शाखा का भी उल्लेख 
है : ये लिंग, रुद्राक्ष और मस्म धारण करते थे। यहीं मिश्र पाशुपातों की भी 
चर्चा मिलती है, जो पंचदेवोपासक थे । साधना और प्रतीकों की दृष्टि से 
तांत्रिकों की शाखा इन दोनों से भिन्‍त्र थी । इनके अतिरिक्त भी अनेक पाशुपत 
शाखाएँ थीं जो देश भर में फंली थीं। दशिण में शव-भक्त भी प्रमुख थे। 
इनमें से कुछ महाभारत और पुराणों से भी प्रभावित थे । कश्मीर में शेव मत्त 
ओर पूर्वी भारत में शाक्त मत का विशेष प्रचार था । यों भारत के प्रत्येक 
गाँव में शिव और शक्ति के छोटे-बड़े मन्दिर अनिवाये रूप से मिल जाते हैं । 
२-वेदों को प्रमाण मानने वाले संप्रदाय और वैदिक मूल्य 

जिस प्रकार वेद-विरोधी नास्तिक संप्रदायों की वृद्धि हो रही थी, उसी 
प्रकार आस्तिक संप्रदायों की संख्या भी बढ़ रही थी। वेद को प्रमाण मानने 
वाले सिद्धान्तों में चाहे परस्पर मतेक्य न हो उनमें वेद-प्रामाण्य समान रूप से 
स्वीकृत था । समस्त मक्ति संप्रदायों की भी यही स्थिति है । अनेक शैव, घाक्त, 
पाशुपत, गणपत्य, सौर आदि नामधारी संप्रदाय अपनी प्रतिष्ठा के लिए अपने 
को श्र ति-सम्मत कहने लये । 

दार्शनिक दृष्टि से वेद-वेदान्त के अनेक माष्य प्रस्तुत किय्रे गये । इनके 
द्वारा मूल दर्शन का प्रचार मी होता था और मूल दर्शन विकसित भी होता 
था । अनेक नवीन तत्त्वों का समावेश भाध्यों के द्वारा मूल दर्शन में हो जाता 
था । साथ ही परिस्थितियों के अनुकूल कुछ विशिष्ट तत्त्वों का पुनराख्यान भी 
हो जाता था | इससे दर्शन जीवन्त बना रहता था। “पुराण” एक दूसरी ही 
पद्धति से वेद-वेदान्त-सूत्र-धर्मशास्त्र को प्रस्तुत करते थे । वे सूक्ष्म को स्थल 





१. सर जान उडरफ, शक्ति एण्ड शावत, पृु० २३। 


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१. डा० हत्ा 


१्द सूरताहित्य : नव मूल्यांकन 


तक विवाद चलता रहा | अन्ततः पांचरात्र उपासक ही मागवत् कहे गए। 
पांचरात्र संहिताओं की परम्परा प्राचीन है । इनकी रचना उत्तर में भी हुई 


और दक्षिण में भी | आइचर्य की वात यह है कि शंवागर्मों से इनका विशेष 


साम्य हैं। इनका विषय-विमाग इस प्रकार है :* ज्ञान-ब्रह्म, जीव, जगत 
का निरूपण; योग-मोक्ष के लिए योग प्रक्रियाएँ; चर्चा-नित्य नेमित्तिक इत्य, 
मूर्ति, यंत्र और इनकी पूजा विधि; क्रिया देवालय-निर्माण, मूर्ति स्थापना, 
पूजा आदि । आगे के विकेसिक मर्क्ति संप्रदायों में मी दशंव का विपय- 
विभाजन इसी प्रकार रहा | सुर क्रे संप्रदाय को भी अपवाद नहीं कहा जा 
सकता । इन विपयों में से चर्या और क्रियाएं अधिक लोकप्रिय होती गई,। 
तत्वदर्शन क्रमशः न्यून से न्यूनतर होता गया | संहिताओं में भी चर्या क्रिया 
निरूपण में ही विजेप रुचि ली गई है। 

पंचरात्रां-मत में चतुब्यू ह-कल्पना प्रमुख हैं : विकास-क्रम इस प्रकार 
है : वासुदेव [परमतत्त्व] से संकपंण [जीव |; संकर्पंण से प्रद्य म्व [मन]; और 
प्रद् म्न से अनिरुद्ध [अहंकार | | इस प्रकार एक पौराणिक इतिवृत्ति के क्रम में 
तत्व-विकास को रखने का उपक्रम है । 

ऐसा प्रतीत होता है कि आरम्म में पांचरात्र पूजा-विधान वदिक 
परम्परा के मन्दिरों में प्रचलित नहीं था: वहां वंखानस संहिताएँ ही मान्य 
थीं। रामानुजाचायंजी ने वेखानस संहिताओं के पूजा-विधान का विरोध करके 
दक्षिण के अधिकांश मन्दिरों में पांचरात्र विधि को स्थापना की | इस प्रकार 
जिस पांचरात्र परम्परा को अवंदिक कहा जाता था, वह भक्ति-संप्रदायों में 
स्वीकृत हुई । एक प्रकार से वेद-विरोव का यह एक मृद् और व्यावहारिक 
रूप था | वेद-प्रामाण्य सिद्धान्त रूप में स्वीक्ृत रहा । इनमें भक्ति पर वल 
दिया गया है । इनके अनुसार जीवोद्धार का मार्ग भगवान का अनुग्रह है ।+* 
इस भवजाल से यदि मुक्ति पानी है तो मगवान की शरण में जाना (न्यास) 
ही एक मात्र उपाय है। सभी मक्ति संप्रदायों के ये प्रमुख सूत्र रहे। वल्लम 
संप्रदाय का तो नाम ही पुष्टि मार्ग! [अनुग्रह-मार्ग | है । तमिल प्रान्त में कई 
पांचरात्र संहिताएँ प्राप्त हुई हैं | दक्षिण के आल्वार भक्त पांचरात्र संहिताओं 
के भिद्धान्तों से बहुत अधिक प्रमावित थे | वेसे रामायण, महाभारत और 

पुराणों का प्रमाव मी अत्यधिक है। आल्वारों की दृष्टि से अस्पृश्य-स्पृदय का 

१. बलदेव उपाध्याय, भारतीय दर्शन, पु० ४६० 


२. जोवे दुःखाकुले विष्णो: कृपा काप्युपजायते । [अहिन्ु घुन्य संहिता १४।२६ | 


पृष्ठाधार १७ 


भेद नहीं था । पुराण और संहिता दोनों ही मिली-जुली पद्धति पर आधारित 
आल्वार-साहित्य को श्री संप्रदाय में प्रामाण्य प्राप्त हुआ : इनके साहित्य को 
परम प्रमाण माना गया : इस साहित्य का गायन होता था ! आल्वार भक्तों 
की भी पूजा देव-मन्दिरों के पूजा-विधान का अज्भ बन गई | आल्वारों को 
वेष्णव संत्रदाय का आदि नुरू माना गया । पीछे वष्णव संत्रदाय में प्रस्थान- 
त्रयी और भाल्वार साहित्य के प्रामाण्य और सापिक्षिक महत्व को लेकर कुछ 
विवाद भी हुआ : मत-विमाजन भी हुआ । एक वर्ग प्रथम को, दूसरा वर्ग 
द्ृतीय को अधिक महत्व देने लगा | वेदांत देशिकाचाय॑ प्रस्थानत्रयी को विशेष 

हत्त्व देने के पक्ष में थे। नारायण या विष्णु के अन्य रूपों की प्रतिष्ठा हुई । 
नृसिह, वराह, राम आदि की पूजा भी प्रचलित हुई | दक्षिण के व्यक्तिवाचक 
नामों और मन्दिरों की दृष्टि से इनकी पूजा का सह अस्तित्व मिलता है। सूर्य 
और गणेज्ञ की पुजा भी प्रचलित थी । 


पुराण-परम्परा में आने वाले ग्रन्थ 'भागवत' ने आगे के विकसित भक्ति 
संप्रदायों को अत्यधिक प्रमावित किया । प्रस्थानत्रयी में भागवत को जोड़कर 
वल्लमाचार्य जी ने प्रस्थान-चनुष्ट की स्थापना की | चैतन्य संप्रदाय में भागवत 
को सर्वाधिक महत्व दिया गया। “...पांचरात्र संहिताओं, विष्णु पुराण, 
और “श्रीमाष्य' का आश्रय लेकर एक वेध मार्गी वैष्णव साधना विकसित हुई 
ओर दूसरी रामानुजा मार्गी या आवेश और उल्लासमंग्र भ्रकति मार्गी साधना 
भागवत का आश्रय लेकर विकसित हुई । उत्तरकाल के वल्‍लभ और चंतनन्‍्य 
संप्रदाय भागवत को परम प्रमाण के र्‌प में स्वीकार करते है। मागवत पुराण 
श्रीकृष्ण के प्रेम मूलक भक्ति धर्म का प्रतिपादक है ।*” श्रीक्ृष्ण को पूर्ण 
ओर साक्षात्‌ अवतार कहा गया और शेष अवतार अंशावतार है। इस प्रकार 
नारायण, राम, आदि अवतारों के स्थान पर एन संप्र दायों में कृष्ण का सर्वा- 
धिक महत्व हुआ । आगे चलकर भागवत और सहिताओं के उत्सों से प्रप्तिद्ध 
चार संप्रदाय उत्पन्न हुए ।* चेतन्यमत को मध्व-मत्त के साथ संबद्ध करके 
देखा जाता है, पर उसका अस्तित्व भी स्वतन्त्र है। भमध्यकाल के उत्तराद्ध में 
समस्त धामिक और दाशेनिक चितन की परम्पराएँ इन संप्रदायों के र्‌प में 





१. डा० हजारोंप्रसाद द्विवेदी, सध्यकालीन घर्मं साधना, परृ० ४७ | 
२. श्रीं वेष्णव 55 रामानुजाचार्य ( विशिष्टाहत ). ब्रह्मज-सथ्ब (दंत). 


रुद्र -5 विष्णु स्वामी. वल्लभ ( शुद्धाइंत) तथा सनक -- निम्बाक 
(दव॑ ताइ त) । 


१्८ सरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


ढल गई । योगमार्ग भी इस काल में साथ-साथ चलता रहा। धीरे-धीरे 
वैष्णव तत्त्वों से उत्तर मारत का योगमार्ग भी प्रभावित होने लगा और तांत्रिक 


भाव और रस के प्रतीक 'माधुय' के अनुयायी भक्ति-संप्रदायों को प्रभावित 
करने लगे । 


साहित्य की एक और प्रवृत्ति की ओर यहाँ संकेत कर देना आवश्यक 
है । हिन्दू धर्म के आचार और व्यवहार को नियंत्रित और सुरक्षित करने के 
लिये स्मृतियां लिखी गई थीं । स्मृतियों की मध्य युग में टीकाएं लिखी गई 
निवन्धों की रचना हुई | पुराणों को इनके साथ संबद्ध करके धरम शास्त्र नाम 
से इस समुच्चय को द्योतित किया जाता था। धर्म शास्त्र सामाजिक जीवन के 
भाचारों और संबंधों को नियंत्रित करता है। वर्णाश्रम-व्यवस्था का नियमन 
भी इसी से होता है । इसी प्रकार कुछ साहित्य धर्म साधना के नियमों का भी 
अनुकथन करने वाला था। 'स्मार्त' शब्द स्मृति से उत्पन्न है। स्पार्तों में 
आचार-व्यवहार और देवोपासना, धर्मशास्त्र और धर्म-साधना परक साहित्य 
माना जाता था । पंचदेवोपासना की स्वीकृति के द्वारा इनके द्वारा समन्वय की 
भी एक भूमिका प्रस्तुत हुई। साधना मुख्यतः 'सूर' से पूर्व योगमूलक और 
भक्ति-मूलक थीं | 


भक्तिमूलक साधना को उक्त धर्म-शास्त्र, धर्मे-साधना-साहित्य के आधार 
पर दो भेदों में विभकत किया जा सकता है। पहला मत धर्म शास्त्रीय आचार- 
व्यवहार, नीति-विधि को स्वीकार करके चलता था। दूसरे मांगे में वेदादि 
प्रामाण्पय की अस्वीकृति तो नहीं है, पर सघन रागात्मक साधना में इस लोक, 
वेद, स्मृति आदि के नियंत्रण को अनावश्यक अवश्य कहा गया । भगवत्प्रेम के 
घनीभूत क्षणों में धमंशास्त्रीय आचार को वाधक भी समझा जाता था । इस 
प्रकार रागात्मक साधना में वेदों की उपेक्षा का स्वर जाने-अनजाने आ गया । 
योगी और संतों में वेद, लोक, या पुस्तकीय विधान का खंडन बौद्धिक आधार 
पर था। भक्ति के रसाश्रयी रूपों में मक्ति और प्रेम का मूल्य ही सर्वोच्च था । 
अतः भावना के आधार पर अन्य बौद्धिक या ज्ञानात्मक, अथवा कमंकाण्डीय 
मूल्यों के लिए कोई स्थान, नहीं रहा | कुछ भक्ति संप्रदायों की दाश्॑निक 
पीठिका में प्रस्थान-त्रयी और घर्मशास्त्र अथवा उनका विशेष रूप से किया गया 
माष्य व्याप्त था पर कुछ संप्रदायों ने इस पीठिक्रा को भी छोड़ सा ही दिया 
आर भक्तिमूलक भावोन्नयन की साधना को दूसरी ही भूमिका में देखा गया । 
जिन संप्रदायों में यह पीठिका मान्य भी थी, उनमें भी पीछे प्रेम भक्ति का 
मूल्य ही प्रवल होता गया और वेद-विधि, स्मृति-आचार शिथिल | जहाँ इन 


पृष्ठाधार १६ 


संप्रदायों में मावात्मक सेवा का विधान किया गया है। वहाँ वेद की उपेक्षा के 
स्वर मी स्पष्ट है । इस पक्ष पर गोपी भाव और माघुय भाव पर विचार करते 
समय और मी स्पष्टीकरण क्रिया गया है । 
गोपी भाव को पृष्ठ और मांसल करने में, और गुर्जर जाति के भाव- 
प्रवण लोकसाहित्य और विश्वासों का भी महत्त्वपृर्ण हाथ माना. गया है ।* 
इस भावना को लेकर जो श्वद्धार-मुक्तक साहित्य के शझ्लेत्र में प्रचलित हुए, 
उनका श्रेय भी इस जाति को दिया जा सकता है ।* इस जाति की भाव 
साधना ने भी वंदिक रीति को ठेस पहुँचाई । इस 'मागवत' परम्परा की णक, 
यवन, पल्हव आदि जातियों ने भी स्वीकार किया । इन्होंने अपने को भागवत 
कहा भी है । इनके लिए बेद-प्रामाण्य का महत्व नहीं था। भागवत मूल्यों 
का ही विस्तार और ग्रहण -इनके द्वारा हुआ । संक्षेप में कहा जा सकता हैं कि 
चाहे वेद को अमान्य न ठद्दराया गया हो, पर अन्य मावात्मक जीवन मसूल्यां के 
प्रदल हो जाने पर बंदिक मूल्यों का छास स्वाभाविक था। तरल भावना से 
ओत प्रोत लीला साहित्य विकसित होने लगा । इसके प्रमाण ये हूँ “ल्षेमेन्द्र का 
द्यावतार चरित' जयदेव का गीत गोविद' चंद का दसम । इनमें शास्त्रीय 
मर्बादा, वेद की अनुना, तथा लोकमर्यादा विच्रलित सी खड़ी हैं। मूर की 
गोपियाँ अनेक स्थानों पर प्रेम के सामने वेद या लोक की मर्यादा की अबना 
करती मिलती हैं । जब गोपियाँ रास में सम्मिलित होने गई, तब कृष्ण ने 
इहि विधि वेद मारंग सुनी ।7 कह कर बेद की मर्यादाओं का संकेत किया | 
इस पर गोपियों ने गीता के स्वर में उत्तर दिया-- 
हम जानें केवल तुम्हीं कों, और बया संसार ।7 


या 


इस प्रकार गोपीमाव वदिक मूल्यों का खंडन चाहे न करें, पर इस 


वंदिक मूल्यों की अपेक्षा भावात्मक जीवन मूल्य ही मान्य हैं। 
३-अवता र-कल्पना 


अवतार कल्पना मनुप्य की अमूर्त के मूतिकरण की सावना का ही 
एक अंग है। यह साबना साहित्य के क्षेत्र में मी चलती है और दर्जन के श्षेत्र 





१. भंडारकर, वंष्णविज्म, शेविज्म, एण्ड अदर माइनर रिलिजन्स आफ 
इन्डिया, पृ० ५३ 
२. डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिन्दी साहित्य की भूमिका, पृ० ११३, ११४ 


है 


« सू० सा० १६३४ 
बही, १६३६ 


(९ 


२० सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


में मी । कभी साहित्य-क्षेत्रीय मूर्तीकरण संबंधी रूपक दाशेनिक चिन्तन की 
मूर्त गाथा प्रस्तुत करते हैं, कभी दाशंनिक क्षेत्र का रूपक-परकर्नचतन साहित्य 
में उतर आता है। लोकोत्तर धरातल पर यह प्रक्रिया दुहरी रहती है। पहले 
प्राकृतिक शक्तियों में दिव्यत्व का आरोप करके उनको लोकोत्तर किया जाता 
है । फिर मनुष्य अपने ही माव-विचार, रूप-आकार और. क्रिया-व्यापार का 
आरोप करके अलौकिक प्रस्तुत को लौकिक अप्रस्तुत के माध्यम से मूर्त कर 
दिया जाता है। उसकी उच्चतर कल्पना इस प्रकार की शरक्तियाँ अनेकत्व में 
एकत्व के संधान के लिए विकल हो उठती है : अन्ततः दृश्य शक्तियों के पीछे 
भन्तनिहित एक अहृश्य मूल शक्ति का आमास मिलने लगता है। चिन्तन ओर 
कल्पना की यह क्रिया-प्रतिक्रिया वेदिक वेदवाद में मिलती है । इस कल्पना को 
प्रक्रिया को पूर्ण न समझने के कारण ही विद्वानों ने वेदों में अद्व तवाद, 
ऐकेश्वरवाद, या बहुदेववाद का अनुसंधान किया है । वास्तव में ये तीनों ही 
कल्पना के एक प्रक्रिया की विकास की स्थितियाँ उसके परस्पर पूरक पक्ष है । 
वेदिक देववाद की कल्पना में बहुदेववाद के स्थल अधिक हैं। पर, इसके चरम 
विकास को प्रकट करने वाले स्थल भी है जहां कहा गया है कि एक ही महा 
देवता को विभिन्‍न नामों और रूपों से कहा गया है ।' हिरण्यगर्भ समस्त भूतों 
का अधिपति है। उसी ने द््‌ लोक और भूलोक को धारण किया है। उसी को 
हविस्‌ अपित करनी है ।* यह कल्पना का उच्चतम स्वरूप है । 

इस महद्देवता को मूलशक्ति स्वीकार कर लेने के पश्चात्‌ कल्पना का 
स्थान चितन ने लिया । इस मूल सत्ता से जीव, जगत आदि के विकास और 
इन तत्त्वों के परस्पर सम्बन्ध को स्पष्ट करने के लिये औपनिपदिक-जटिल 
चितन की ऊहापोह सामने आई | मूर्तं कल्पनाओं का आधार भी छूट गया 
और उस अनन्त के साथ कल्पित संबंध भी शिथिल होने लगे। उपनिषदों ने 
निषेघात्मक विशेषणों और अनिवर्चतीयता के आधार पर ब्रह्म-निरूपण का 
प्रयत्त किया पर, 'नेति' के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला | वसे कहीं-कहीं कुछ 
रूपक और भावात्मक क्षण मिल जाते हैं| उनमें मावी मावात्मक विकास की 
सम्भावनाओं का निवास माना जा सकता है। 


आगे नाम” और रूप के आधार पर अमूर्त ब्रह्म-चितन को फिर से 
मूर्त बनाने का दाशंनिक उपक्रम हुआ । नाम' स्वरूप-विधायक या गरुणात्मक 


१. ऋगू० १॥१६४।४६ 
२. ऋगू० १०१२१ 


पृष्ठाधार २१ 


वने । मानव के उदाच गुणों की मूल-सत्ता में एक साव स्थापना की गई। 
कुछ अलोकिक गुणों की कल्पना भी मानवीय जीवन क्ले आधार पर करके 
उनसे परक्कक्त को विभूषित कर दिया गया। पौराणिक प्रवृत्ति ने अवतार 
कल्पना को बौर आये बढ़ाया 4 कुछ दंदिक रूपकों को याथा का रूप प्रदान 
किया गया | इन बंदिक रूपकों में “विप्पु दीज रूप में विद्यमान मिलता है । 
द्विप्णु सम्बन्धी रचनाएं चाहे दंदिक साहित्य में संख्या की दृष्टि से कम हों, 
परन्तु उन ऋचाओं में ऐसी ऋचाणएं अवश्य हैं जिनमें विष्णु को इन्द्र से या 
अन्य देदताओं से श्रेप्ठ कद्ठा गया है ।* विष्णु का वशिष्ट्य इस वात में है कि 
इन पर मानवीय गुणों का आरोप सर्वाधिक है। पीछे के ब्राह्मण साहित्य, 
उपनियद्‌ साहित्य * आदि में विष्णु के ग्रुणों कौर रूपों का विकास हुआ । 
पोराणिक साहित्य तो जैसे विष्णु और उसके बवतारों की प्रशस्ति को ही मूल 
रूप से लेकर चले । पुराणों में ब्रह्म के सगुण रूप का ही विदिव प्रकार से 
निरूपण और गादन हुआ है / 


इस प्रकार पुराणों ने विप्णुपरक रूपकों के आवार पर जवतारों की 
कल्पना और भावना की । इन रूपकों की नराक्नार कल्पना हुई । अभिष्ााय तो 
मानदीय रहे, पर माहात्म्य का संयोग सधिक रहा । इंद॑ विष्णुविचक़मे बेधा 
निदवे पर्दे के आवार पर वामन' का रूप घटित हुआ | वेद में अनेकत्व विष्णु 
को त्रिविक्रम कहा गया है । विण्यु की कल्पना यज्ञ-पुरुष के भी रूप में मिलती 
हैँ 7 वँखानस सहिताओं में यन्-वराह का उल्लेख है। इस प्रकार वामन, 
वराह, नृस्तिह आदि के मूल वंदिक उत्स कुछ विष्णु परक रूपकों में मिल जाते 
। कृष्ण के सूचक उपकरण भी अस्फुट रूप से प्राप्त होते हैं। पुराणों ने 
विविव गुणों, विष्यु के प्रति दृष्टि, सृष्टि के क्रम, त्तथा अनेक जीवन मुल्यों के 
झआवार पर विख्णयु की कल्पना की । कल्पता और उसकी बदतार भावना को 
पुप्ट छिया । 





0 ) /0॥|१ 


अवतासेों की संल्या में भी विकास हुआ और नामों में नी विकास 
हुआ । कुछ स्थानों पर इनकी संल्या छः: है ॥* अविक प्रचलित संख्या १० 


२. आऋग०ण १॥१५४।१२-६ 

२. ऐतरेय, १११ 

३. मंत्रेयी उपनिषद ६१३, ४३०-३।॥७ 

४. विष्णु पुराण १७५१५; महाभारत-शान्तिपवं, ३३६।६-१० 
ए. सहाभारत, वारावणीयोपारध्यात; हरिवंश; भादि । 


२२ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


है ।'" दस अवतारों की सर्वेमान्य सूची यह है। मत्स्य, कूझे, वराह, नृसिह, 
वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि । भागवत में संख्या बाईस 
तेईस * और चौबीस तक विकसित हुई है। वेसे अबतारों की सख्या असंख्य 
भो बतलाई गई है । इसका तात्पर्य है कि किसी में एक विशेष गुण, प्रतिमा 
या अलौकिक विकास को देखकर यह कल्पना करली जाती थी कि विष्णु का 
एक अंश इस रूप में अवतरित हुआ है 7 यह अंशाक्तार की भावना अनेक 
रूपों में विकसित हुईै। इसी आधार पर नारद | वेष्कर्म्म आधार पर 
सात्वत मार्ग के उपदेष्टा | कपिल [ सांख्याचार्य ), दत्तात्रेय [ आन्वीक्षिकी 
विद्या के प्रवतेक ), ऋषभ ज॑से ऋषियों-मुनियों को अकतारों में सम्मिलित 
कर लिया गया 'शंकर' की भी अवतार के रूप में कल्पना मिलती है। भागे 
चलकर भक्ति के संस्थापक आचार्यो या प्रवतकों को भी अवतार कहा गयः 
इस प्रकार अवतारों की संख्या असंख्य भी हो जाती है । 


दश अवतारों की कल्पना में एक बात और दृष्टियत होती है : पशुरूप 
में कल्पना | मत्स्य, कूर्म और वराह ], नरपशु रूप में कल्यता [ नृस्सिह | 
लघ्चु मानव [ वामन |, तथा महापुरुषों के रूप में कल्पना [ राम, कृष्ण, 
बुद्ध, कल्कि [ मिलती है। ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य के जीवन संबनन्‍्धी 
मूल्यों का ही रूप में विकास हुआ । आरंभ में शुद्ध उपण्गेगितावादी जीवन- 
मूल्यों से अवतार कल्पना अनुप्राणित थी। पीछे इनका प्रतीक 'छिवत्व' हो 
गया । इसके पश्चात्‌ सत्य-शिव की कल्पना का उदय हुआ और सौन्दर्य 
यांत्रिक रूप से इस संयोग से इस उत्पन्त होने लगा | राम |। अन्तत. सत्य 
शिव सौन्दर्य कल्पना की पूर्ति हुई। इस कल्पना में सौन्दर्यंगत मुल्य सर्वोच्च 
होगया और णेष मूल्य उसमें अन्तहित हुए | इस - प्रकार -कृष्ण-कल्पना जीवन 
मूल्यों की दृष्टि से पूर्ण है । बुद्ध में 'शिवत्वः करुणा भाव के रूप में अवत्तरित 
हुआ; इस प्रकार जीवन-मूल्य एक सामाजिक भावना का मृदुल रूप लेने लगा। 

यही अवतारों के विकास को भो देखा जा सकता है | सबसे पहले धर्म 
संस्थापना साधुओं के उद्धार और दुप्कृत्यों के विनाश के लिए भगवान का 


महाभारत, प्राय: सभी पुराणों में संख्या १० मिलती है । 
« भागवत प्रथम स्कंघ तृतीय अध्याय । 

« भागवत द्वितीय स्क्रध, अध्याय ७। 

* भागवत के अनुसार इन्हें आवेशावतार कहना चाहिये । 


० 0 0 “० 


पृष्ठाधार २३ 


अवतार माना गया ।*एक प्रकार से ईंस घोषणा में उपयोगिताबाद या शिवत्व- 
मुलक मूल्यों को स्वीकृति है। यदि बवतारों की मूल इकाई विष्णु कोन 
मानकर परब्रह्म को माना जाय, तो सृष्टि के मूल उपादानों के समूतिकरण का 
कारण मिलता है । अर्थात्‌ सृष्टि के विधान में व्याप्त तीन गुण ही त्रिदेव के 
रूप में मवतरित हुए : सत्व--विष्णु, रज--बत्रह्मा तथा तम--शिव | आगे 
विष्णु के भअवतारों की कल्पना में शिवत्व कारण भूत माना गया | फिर 
लीलाग़त कारणों का विकास हुआ । र४ अवततारों की कल्पना में 'लीला' 
का तत्व विद्यमान है । लीलाओं का भी विभाजन किया गया : कुछ लीलाएँ 
शिव परक हैं और कुछ अनुग्रह एवं माव परक। इन दोनों ही कारणों से 
मगवान स्वेच्छा पूर्णषक लीला-वपु धारण करते हैं ।* इस प्रकार कारण भी 
अन्त: भावात्मक या सौन्दर्ये-मूलक होते गये । किसी भक्त ने कामता कौ-- 
भगवान को जन्म देने का श्रेय मिले, किसी को भावना थी--भगवान मेरे 
वात्सल्य का आलंवन बने, किसी ने पतिरूप में चाहा, किसी ने प्र॑मी के रूप 
में । इस प्रकार की मावनाओं की पूर्ति के लिए त्तपस्या की गई : भगवान को 
तथास्तु' कहना पड़ा । इन सभी की पूर्ति के लिए भगवान ने अवतार लिया । 
स्वयं भी अपने समग्र रूप का स्वयं आस्वादन करने को इच्छा भगवान की हुई । 
इसी कारण अपने नित्य लोक, नित्य अक्तियों और परिवेश के साथ अवतरित 
होकर भगवान ने स्वयं अपनी ही भावात्मक लीलाओं का आस्वादन किया। 
इस प्रकार के भावात्मक कारण ही प्रमुख होते गये + कारण-कल्पना यहीं नहीं 
रुकी । भगवान के प्रति मक्त के मनमें उठते हुए भाव अवतार-अल्पना के दूसरे 
पक्ष को पुप्ट करने लगे | अन्तस्थ, अमू्त भावों के अवतार की भावना भी 
मिलती है। राधा 'महामाव! का अवतरित रूप है। गोपी, सखी सहचरी 
आदि सभी अन्य भावों के अवतरित रूप है । 'जाकी रही भावना ज॑ंसी' की 
उक्ति अनेक रूपों में चरितार्थ होने लगी। “भावों का प्राधान्य ज्यों-ज्यों होता 
गया, कृष्ण, राधा गोपियों का प्राधान्य भी भक्ति साधना में होता गया । 
इसी कारण से राम को आलंवन मानकर प्रवल रसिक-संप्रदायों का उदय 
हुआ । इन संप्रदायों ने तुलसी के द्वारा स्थापित शिव, मर्यादा, आचार आदि 
मूल्यों के स्थान पर शुद्ध मावात्मक मूल्यों की स्थापना कर दी । समस्त क्रम 





१. परित्राणाय साधुूनां, विनाज्ञाय चदुष्कृताम्‌ ॥ [गीता] 


२. स्वलीला कीति विस्ताराद भक्‍्तेष्वनुजिघक्षया । 
अत्य जन्मादिलोलानां प्राकट्ये हेतुरुत्तमः ॥ [ लघुभागवताम्ृत | 


श्ड सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


कृष्णाश्रयी रसिक-संप्रदाय से लिया गया । भक्तिकाल तक भाते आते अवतार- 
वाद का मूल विकास इसी क्रम से होता गया । इसी क्रम में दुष्ट-दलन भगवाद 
के अवतार का कारण नहीं रह गया । भक्तों पर अनुग्रह करके भगवान अपनी 
लीला का विस्तार करते हैं । 


अवतारों के भावनानुसार प्रकार भी निश्चित किए गये । भावना की 
स्थिति तीन रूपों में मानी गई : स्वयं रूप, तदेकात्म रूप, और आवेश रूप | 
इस विधान में स्वयं रूप तो कृष्ण हैं। दूसरे प्रकार में मत्स्य, वराहादि 
लीलावतार भाते हैं जो तत्त्वतः तो मगवद्र प' हैं, पर आकार में भिन्‍न हैं । इसी 
प्रकार भगवान कुछ महत्तम जीवों में आविष्ट भी रहते हैं। नारद, सनक, 
सनंदन आदि आवेशावतार कहे जा सकते हैं । इसी आधार पर संमवततः भक्ति 
के परवर्ती आचार्यों में भी मगवान के आवेश का अवतरण माना गया। 
'स्वाभिनी' रूप वल्‍लभाचाये जी में एक आवेश का अवतार ही है । इसी प्रकार 
चेतन्य महाप्रभु के रूप में कल्पना की गई । 


पांचरात्र दर्शन में चतुव्यु हु कल्पता भी एक प्रकार से अवतारबाद का 
ही एक रूप है । इसके अनुसार निगुणात्मक ही वासदेव हैं | जब वे जीव रूप 
में अवतार लेते हैँ तो संकंण का अवतार प्रद्य॒म्न के रूप में होता है जो 
वास्तव में 'मन' का प्रतीक है । प्रद्य स्‍्त से अनिरुद्ध का अवतार होता है, णो 
अहंकार है : श्री मदभागवत में इस अनुक्रम का कुछ सामंजस्य क्रिया गया 
प्रतीत होता है : मागवत पुराण के अनुसार भगवान के अवतार तीन प्रकार के 
होते हैं : पुरुषावतार, ग्रुणावतार और लीलावतार | पुरुषावतार थे हैं: 
महत्त्व के सृष्टिकर्ता संकर्षण (प्रथम पुरुष).निखिल ब्रह्मांड के अन्तर्यामी,प्रद्य मत 
(द्वितीय पुरुष)एवं व्यष्ठि जगत के अंतर्यामी अनिरुद्ध (अहंकार. तृतीय पुरुष) । 
वासुदेव स्वयं र॒प है । गुणावत्तार ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं ही । लीलावतार चौबीस 
है । सूर ने 'पुरुष अवतार' का उल्लेख किया हैं: "अपने आप करि प्रत्न॒ट क्रियरौ 
है हरि : पुरुष अवतार ।” गुणावतारों के लिए “सूर' के उल्लेख ये हैं--- 


१. हरि सौ ठाकुर और न जन कों । 
>५ 2५ 2५ 
ब्रह्मा 'राजस' को अधिकारी. सिव 'ताम्स' अधिकारी । 
२. विष्णु-विधि-रुद्र मम रूप एतीनि हू. 
दक्ष सो बचन यह काह सुनियोौ । 
३. बिष्णु रुद्र ब्रहमा हरि सब प्रेरक अतरजामी सोई | 


पृष्ठाघार दर 


महत्त-त्व, मन, अहंकार आदि के संबंध में मी सूर ने जो कथन किये 
है, उनमें चतुव्यु हु कल्पना का आभास मिलता है-- 
आदि निरंजन निराकार कोउ हती न दूसर। 
रचों सृष्ठि विस्तार भई इच्छा इह भओसर ॥॥ 
नियुण तत्त्व तें 'महत्त-त्त', महत्तत्व ते (अहंकार ।' 
मन ईन्द्रिय शब्दादि पंची तातें क्षियों विस्तार ॥ 
इस प्रकार पांचरात्र और भागवत पुराण की चतुब्यू ह कल्पना, सृष्टि 
विस्तार, ठथा अन्य लीलावतारों की गाथाए सूर' साहित्य में मिल जाती हैं । 
४. देव-मन्दिर-- 


यज-यागादिकों के स्वान पर देव-मन्दिरों की भी स्थापना होती मिलती 
है । कुछसंप्रदायों में मठ और गुहाए संगठन के केन्द्रों के रूप में मिलते हैं। देवा- 
लयों की कल्पना भी दिव्य रूप में की गई । दक्षिण में देवालयों के निर्माण में 
वैकुण्ठ, स्वर्ग आदि के प्रतीकों की योजना होने लगी। देवालय' भगवान के 
नित्यथाम के प्रतीक माने गए : इसमें मगवान का विग्रद्ठ विराजमान है । इसी 
में भगवान की लीलानं का क्रम चलता है । पुराणों में यह भी कल्पना मिलती 
है कि मन्दिर भगवान का दरीर है। वास्तव में स्त्रय॑ मगवान ही मन्दिर 
रूप में अवस्थित हैं | देव, सौर, वैष्णव मन्दिरों का प्रतीक विद्वान अलग 
अलग भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता था । मन्दिर की विश्व झूपता का 
परिचय इस उद्धरण से प्राप्त हो सकता है: “इस विश्वात्मक प्रासाद में 
जगती आधार चत्वर से लेकर आमलक' के ऊपर स्थित चक्र, त्रिशुल, आदि 
प्रतीकों तक जीवन का उत्तरोत्तर विकास-क्रम प्रदर्भित होता है। इसकी तीन 
भूमिकाए हैं, जिनकी यूचना के लिए तीन आवरण रहते हैं। सबसे नीचे के 
आवरण में भगवान तथा उनके पाइवे देवों की भोग भमूतियाँ अंकित रहती हैं । 
मध्यम आवरण में संहार मूर्तियाँ होती हैं। इनमें मगवान आसुरी प्रवत्तियों के 
प्रतीकों का संहार करते हुए दिखाए जाते हैं । सर्वोच्च आवरण में मगवान की 
योग मूर्तियाँ होती हैं। इन आवरणों के नीचे तथा इधर-उधर सिद्ध, गंबर्व 
और अप्सराक्षों की भक्ति एवं उत्साह पतित पुरुष की मूर्तियाँ उत्कीर्ण रहती 
हैं ।* इस प्रकार सभी संप्रदायों के मन्दिर-निर्माण का द्ास्त्र विकसित हुआ । 





१. अग्नि पुराण ६१॥२६-२७ 
२. हा० राम ररेश वर्मा, हिन्दी सग्रुग काव्य की सांस्छतिक न्ुमिका, 
पुृ० दपफर-झ-प८प८€ 


२६ सुरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


भवन-निर्माण कला तथा मूर्ति कला का मिला-जुला रूप चलता रहा। दक्षिण 
में विधि-विधान से बने मन्दिर मिलते है । वे एक प्रकार से समस्त सृष्टि का 
प्रतिनिधित्व करते हैं । इृष्ट-विग्रह के अतिरिक्त स्तंमों और भित्तियों पर अनेक 
मूर्तियाँ बनी होती हैं । 'गोपुरा भी विविध मूर्तियों से भरा रहता है। इस 
प्रकौर वास्तुकला और मूतिकला ने वैष्णव भक्ति को विशद सज्जा प्रदान की 
और भक्ति-भावना ने इन कलाओं को नव जीवन दिया । 


पूर्वी भारत के मन्दिरों में इतना जटिल कला-विधान प्राप्त नहीं होता । 
उनमें कमल आदि के प्रतीकों का विधान तो मिलता है । ब्रज के मन्दिरों की 
कला में भी निकुज-भावना की प्रतिच्छाया मिलती है। स्तंभों और भित्तियों 
पर मूर्ति के स्थान पर फूल, पत्ते और लताओं की योजना मिलती है। 
वललभ संप्रदाय के मन्दिरों में भी कलागत्त सरलता ही अधिक है। राजस्थानी 
चित्रण कला का योगदान अवश्य मिलता है। जिस प्रकार अजन्ता की चित्र- 
कला वास्तुकला का शज्भार कर रही है, इसी प्रकार वलल्‍्लमभ संप्रदाय के मंदिरों 
में भगवान की मधुर या मंगलमयी लीलाओं के भित्ति चित्र मिलते है। साथ 
ही लीला गान की गज भी मन्दिर के वातावरण को कलात्मक बना देती है । 
दक्षिण के मन्दिरों में वेद, सांप्रदायिक साहित्य, प्रबंधभम भादि अनुगूज 
मन्दिर के वातावरण को गंभीर दाशंनिकता से मर देती है। बंगाल या ब्रज 
के मन्दिरों में नाम संकीतेन या लीलागान मिलेगा । इससे वातावरण अधिक 
भावात्मक और कलात्मक रहता है। 


'सूरदासजी की काव्य साधना “गिरिराज जी पर स्थित श्रीनाथ जी 
के मन्दिर आश्रय में चलती रही । श्रीनाथजी वल्लमभ संप्रदाय के सेव्य थे । आज 
कल यह मंदिर रिक्त पड़ा है। श्रीनाथजी का विग्रह अब नाथद्वारे में प्रतिष्ठित है । 
मुस्लिम असहिष्णुता के समय में श्रीविग्नह को वहाँ ले जाया गया । इस प्रकार 
के न जाने कितने मंदिर मकत कवियों के लिए प्रातिभ साधना के केन्द्र बन गए ! 


५. लोकभाष्य साहित्य का प्रामाण्य-- 

दक्षिण भारत में लोक भाषाओं में रचित ऐसा प्रचुर साहित्य है, जो 
भक्ति संप्रदायों में मान्य रहा : संप्रदाय की यदि एक आधार शिला प्रस्थानत्रयी 
की थी, तो दूसरी भाव प्रवण लोकभाषा साहित्य की। भक्ति संप्रदायों के 
अतिरिक्त अन्य शव, शाक्‍त आदि संप्रदायों में भी लोकभाषा-साहित्य की 
प्रतिष्ठा थी । इसका वहुत सा माग जब भी प्रकाशित है। इन लोक भाषाओं 
में से प्रायः सभी आर्य-मापा के विकसित रूप ही थे । पर इन रूपों के बोलने 


पृष्ठाधार २७ 


वाले सभी आवद्यक रूप से आय॑ आचार-विचार से सम्बद्ध नहीं थे : उनके 
संस्कारों में अनेक जार्यपूर्व या आदिम तत्त्व बने हुए थे। इनकी अभिव्यक्ति 
इनके द्वारा ग्रहीत आर्य मापाओं के माध्यम से भी होती रही । जहां संस्कृत 
धर्म सिद्धान्तों की बौद्धिक पीठिका प्रस्तुत करती रही, वहां लोक भाषाएँ 
निश्छल आर्य एवं भार्यत्तर भाव घाराओं को सजोए रहीं । आर्यतर भाषाओं 
में भी ये भाव परम्पराएँ अक्षुण्ण रूप से चलती रहीं। यही कारण है कि 
जहाँ भक्ति संत्रदायों ने दार्शनिक या बौद्धिक पीठिका (प्रस्थानों' के संस्कृत-बद्ध 
सिद्धान्तों से वनाई, वहाँ मावात्मक संरचना लोकमापा-साहित्य से की गई । 


देश के अन्तराल में प्रवाहित भार्य और भार्यतर भाव धाराओं को 
संस्कृत के एक काव्य रूप ने प्रश्नय दिया :-यह काव्य रूप पुराण है। इनमें 
दार्णनिक सिद्धान्तों की रूपकात्मक या प्रतीकात्मक परिणतियाँ, लोक मानस में 
प्रतिविवित इतिहास-धाराएं, भायें और भार्यत्तर संस्क्ृतियों के वाचक आख्यान- 
उपाख्यान और विविध जातियों का उत्थान-पतन (पुराण नामक साहित्य- 
विद्या के विपय बने ; संस्कृत में होते हुए भी इनकी शैली जनोनुकूल रही । 
इस हृष्टि से दार्शनिक साहित्य या जास्त्रीय साहित्य दोनों की शेली से यह 
विशिष्ट रही | पर इनमें आये हुये आर्येत्तर तत्त्वों का भी आर्य संस्कार या 
उनका आये तत्त्वों में विलयन ही किया यया है । केन्द्र वेद-वेदान्त की विचार- 
धारा का ही है। इस केन्द्र का वृत्त-विकास ही पुराण साहित्य है । बहुत से 
मौखिक भाव-विचार इस काव्यरूप में संग्रहीत हो गये ।इस प्रकार संस्कृत के 
अन्तर्गत ही एक लोकामिमुख भाषा शैली (पुराणों को जन्म दे रही 
थी । “पुराणों के अन्तर्गेत और स्वतन्त्र रूप में मी स्तोन्रर काव्य रूप प्रगट 
होने लगा । 


वेद विरोधी विचारधारा भी लोकमापषा में अपना स्थान बना रही 
थी । अनेक वेद विरोधी साधनाओं और संत्रदायों का प्रचार साहित्य लोकमाषा 
और लोकगत काव्य-रूपों में वद्ध है । 


'पुराण' काव्यहूप इतना लोकप्रिय हुआ कि विष्णु, शिव, दुर्गा, जैन- 
धर्म, बोद्ध धर्म सभी में पुराण-साहित्य रचित होने लगा । इस विधा ने परस्पर 
विरोबी मतों में सामंजस्य के सूत्रों का भी संगठन किया | स्मार्तों में समन्वय 
की पहली झाँक्नी मिलती है । ये पंचदेवोपासक थे । इन पंचदेवों में शिव का 
नी स्थान था । अधिकांश पुराण पंचदेवोपासना को लेकर चले हैं। चाहे 
वेष्णव उपादान अनुपाततः इनमें अधिक हों, पर गरुड़ पुराण, अग्निपुराण जैसे 


र्‌८ सरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


पुराण पंचदेवोपासना के समर्थक है। वैसे पुराणों का विभाजन भी देवों के 
अनुसार मिलता है ।* इस दिभाजन के अनुसार सबसे अधिक संख्या शेव 
पुराणों की है । विष्णु पुराण, भागवत, नारदीय और गरुड़ को वेष्णब पुराण 
कहा जाता है । अग्नि पुराण में अग्नि की और ब्रह्मवैवर्त में सूर्य की महिमा 
का ज्ञान है । 


“'लीलागान' का माध्यम होने से लोकभाषा साहित्य का प्रामाण्य और 
भी बढ़ गया । लीलागान की प्रेरणा और उसके लिए विषय अधिकांश भागवत 
से प्राप्त हुए । भागवत भावुक कवियों के लिए बाइविल वन गई। सूर्रा के 
शब्दों में मागवत यह हैं-- 


निगम कल्पतरु सीतल छाया । 
हादस पेड़, पुष्टि घन पल्‍लव, त्रिग्रुन तत्त्व व्यापं नहिं माया ॥ 
फल अति मधुर, सरस पुष्पयुत्त, अध्याय तीन सत पेंतीस शाखा । 
सुन्दर श्लोक सहस्त्र अष्टादस, श्रीमद्भागवत उत्तम भाषा ॥ 
पॉच लाख पुत्र: सहस्त्र छहत्तर, अक्षर प्रांत है ज्षु पत्रा। 
अघ अरु अज्ञान दूर करन को, एक एक अक्षर हे जु मंत्रा ३ 
नवधा भक्तित, चारु मुक्ति-फल, ज्ञान-बींज अरु ब्रह्म रस मीता* । 
'स्रदास' श्रीभदृभागवत भक्ति, गद गदु कंठ कोउ प्रेमोजन पीता ॥) 


६. लीला विधान : लीलागान-- 

देवालयों में प्राय: दो प्रकार की मूर्तियाँ मिलती हैः अचल और चल | 
स्थिर मूरति मगवान के स्वर्य रूप का प्रतीक है। लौला मावना चल-मूर्तियों के 
माध्यम से सिद्ध होती है । विविध लीलाओं के लिए ये मूर्तियाँ इधर-उधर ले 
जायी जा सकती है । देवालयों में सभी प्रकार की क्रियात्मक लीलाओं का 
विधान मिलता है । गर्म ग्रह होता है । इसमें अंधकार और प्रकाश का मिश्रण 
होता है । इसका उद्देश्य एक रहस्यमय वातावरण उत्पन्त करना है जिसमें 
भगवान के कटस्थ रूप की रहस्य लीलाएँ सम्पन्न हो सके | इसी प्रकार ब्रज के 
रसवादी मंदिरों में रास मंडल या मंडपों का विधान है : यहाँ भगवान की 
रसमयी रासलीला संपन्न होती है । मन्दिरों में लीला-रप को विविध प्रकार 
से संपन्‍न किया जाता है । 





१. १० शव पुराणन-४ ब्राह्म पुराण-- २ शाक्‍त पराण-- २ वेष्णव पराण --- 
१८ [स्कंद पुराण, केदार खंड] 


२. भ्रमुदयाल मीतल द्वारा, 'सूर निर्णय', पृ० २७१ पर उद्धृत । 


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३० सूरसाहित्य-: नव मल्यांकन 


संभावनाओं का उद्घाटन करने लगा । लीलागान! ने नवीन काव्य रूपों को 
जन्म दिया : राग-रागिनियों का प्रयोग हुआ । 

लीलागान की परम्परा प्राचीन है। देवालयीय अग्राम परम्परा में 
आरमभ से ही इस कला का बिलास मिलता है । गायन और वाद्य के साथ- 
चरित्र के गायन की परम्परा का उल्लेख पतंजलि ने भी फिया है| इस सगीत 
विधान के साथ अभिनय भी चलता था ॥ नृत्य भी होता था ।'" महाभाष्य- 
कार ने इन रूपों को 'ग्रथिक' नाम से उद्घुत किया है। इनके अनुसार संपूर्ण 
कृष्ण-कथा का सस्वर अभिनय होता था। समाज और “यात्रा के समय 
इस प्रकार के संगीतात्मक अभिनय का विधान विशेष रूप से होता था। 
वात्स्यायन ने 'समाज' के समय सरस्वती के मन्दिर में इस प्रकार के देव-चरित 
के अभिनय का उल्लेख किया है ।* शव उत्सवों में मयपान, गान, वादन आदि 
के विधान का परिचय महाभारत से मिलता है।* कौटिल्य ने यात्राओं के 
समय इसी प्रकार की योजनाओं का वर्णन किया है ॥ आज भी बंगाल में 
तथा अन्य मन्दिरों में इस प्रकार की 'यात्राए” प्रचलित है। वल्लभ संप्रदाय 
में प्रति वर्ष “'वौरासी कोस की यात्रा करने का नियम है। इस यात्रा का 
नेतृत्व वल्लम संप्रदाय के कोई-न-कोई गोस्वामी ही करते हैं। जहाँ यात्रा रात्रि 
को विश्वाम करती है, वहाँ उस स्थल से सम्बधित लीला का ग्रायन अभिनय 
रास मंडली करती है। “रास लीला' का ब्रज के सभी संप्रदायों में प्रचलन है । 
इन अभिनयों के साथ सूरदास, परमानंद दास आदि कवियों के पदों का गायन 
रहता है। "रास लीला की परम्परा भी इसी प्रकार की है । 
७--लोक भाषा 


एक महान्‌ सांस्कृतिक और धामिक आन्दोलन भाषा संबन्धी दृष्टिकोण 

में भी परिवर्तन कर देता है । इस प्रकार का आन्दोलन भाषा की स्वामाविक 
विकास-प्रवृत्ति को गति देता है । पालि ओर प्राकृत भाषाएं गैसे स्वाभाविक्र 
भाषा-क़म की ही स्थितियों का द्योतत करती है, पर वैदिक धर्म या ब्राह्मण 
धर्म के विरुद्ध हुई धाभिक क्रान्तियों ने इस क्रम में अधिक योगदान दिया | 


कृष्णमाचरियर, हिस्ट्री आफ क्लेसिकल संस्कृत लिदरेचरः पृु० ५३५ 
फास जत्र- १४४।२६ | 
हाप्किन्स. एपिक साइयालाजी. पु० ६५--२२० । 


50, 00० कर 7 


अयथंश्ञास्त्र. १३१५ । 


पृष्ठाधार ३१ 


इनको आश्रय देकर इनका मान्य-मूल्य बढ़ाया ॥ बुद्ध के उपदेश पालि में ही 
लिखे गए । अझ्ोक ने अपने शिला लेखों में इसी भाषा का प्रयोग करके धर्मे- 
प्रचार किया। धर्मश्रय के साथ राजाश्रय भी मिला ।7 साहित्य में भी 
मान्यता हुई । संस्कृत की अपेक्षा इस भाषा को कोमल और काव्योपयोगी 
घोषित किया गया +*४ धर्म में वौद्धों ने पालि को, जनों ने अद्ध मागधी को 
प्रश्रय दिया । जेन महाराष्ट्री और जन शौरसेनी रूप भी विकसित हुए | इसका 
तात्पय है जन-धर्मं की व्याख्या, उसका आचार-निरूपण आदि तो अद्धं मागधी के 
माध्यम से हुए, पर घामिक साहित्य तत्कालीन साहित्यिक भाषाओं--शौरसेनी 
जोर महाराष्ट्री में हुआ । मराराष्ट्री मुख्यतः काव्य के लिए, शौरसेनी नाटकों के 
लिए विशेष रूप से मान्य थीं । मागघी और पंशाची में भी साहित्य-रचना 
हुई । अन्य प्राकृत विभापाओं का भी नाटकों में प्रयोग मिलता है । वौदों 
की अपेक्षा जनों का सिद्धान्तेतर साहित्य अधिक समृद्ध है । जन धर्म के अनु- 
यायी कवियों ने अनेक काव्य रूपों को अपनाया और प्राकृतों को प्रचुर साहित्य 
दिया। जन महाराष्ट्री में विमल सूरि ने 'पउमचरिय' ज॑ंसी रचना प्रस्तुत की । 
यह जन पुराणों की शैली में लिखा हुआ महाकाव्य है। जन शौरसेनी में 
दिग्रंवर संप्रदाय का साहित्य विज्येपष रूप से मिलता है । 


साहित्य की परिनिष्ठित प्राक्ृतें दो हैं। महाराष्ट्री तथा शौरसेनी । 
अधिकांश विद्वान इन्हें परथक स्वीकार नहीं करते : एक प्राकृंत के पद्य-काव्य 
तथा गद्य-नाटक में प्रयुक्त होने वाले ये दो रूप थे। दंडी ने महाराष्ट्री को 
प्रकृष्ट प्राकृत कहा है । शौरसेनी की कोई प्रमुख स्वतंत्र रचना तो नहीं हैं, पर 
नाटकों में इसके उदाहरण मिलते हैं । यही दशा मागघी की है। पैशाची में 
गुणाढ्‌य ने “वड्ढकहा' की रचना की थी । 


संस्कृत माठकों में पात्र एवं परिवेश के अनुसार लोक भाषा प्रयुक्त 
होती थी ॥ पद्य प्रायः महाराष्ट्री प्राकृत के इन नाटकों में रहते थे । मध्य चर्गे के 
पात्र, स्त्रियाँ और बच्चे शौरसेनी में बोलते थे एवं निम्न वर्गों के लिये मागघी 


१. कलिय के जन राजाओं, आंध्रवंशी राजाओं, कश्मीरराज प्रवरसेन, 
तथा यशोवमंन ने प्राकृतों को राजाश्रय दिया या इनके कवियों को 
सम्मानित किया । 

२. परुसा सदकअवबंधा पाडअवंधों वि होइ सुउमारो 


पुरुस महिलाणं जेक्तिम मिहंतरं तेत्तिभ मिसराण्ं ॥ [ राजशेखर, कपू र- 
संजरी, श८] 


३२ सूरसाहित्य : नव मुल्याकन 


का प्रयोग स्वीकृत था ।' शकारी का प्रयोग भी यत्र-तत्र मिलता है । अश्व- 
घोष के नाटकों में भी पात्रों की भाषा वर्गों और सामाजिक स्तर के अनुसार 
नियोजित है ।* भास के नाटकों में प्राय: शौरसेनी का ही प्रयोग है। वसे 
मागधी और अधंमागधी का प्रयोग भी भास के कुछ नाठकों में है।” कालिदास 
के नाटकों के गीत महाराष्ट्री में हैं, तथा शौरसेनी और मागधी पात्रानुकूल 
प्रयुक्त हैं। शौरसेनी की विभाषाओं-प्राच्य तथा आवंठी आदि का भी प्रयोग 
संस्क्रृत नाटकों में मिलता है। शकारी और ढक्‍की भी मिलती हैं । विक्रमोवे- 
शीय में अपभ्रश भी प्रयुक्त है। नाढठकों में प्रयुक्त प्राकृत प्रचलित रूप में नहीं 
कृतिम रूप में ही मिलती है । 


प्राकृत का परिनिष्ठित रूप जन-जीवन से दूर होता गया । देशी भाषा 
इस भाषा से दूर पड़ने लगी | देशी भाषा को कई नामों से पुकारा जाता था : 
अपश्र श, अवहंस, अबब्मंस,अवहटठ, अवह॒त्यथ आदि । इन शब्दों से देशी भाषा 
और वेयाकरणों की अनादर भावना का द्योतन होता, है। मरत में एक उकार 
बहुला विभाषा का संकेत मिलता है ।४ सम्मवतः यह आभीर-गिरा थी। 
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि इस भाषा के विकास में विदेशी जातियों का 
भी योगदान था । इस प्रकार अपअ्रश भाषा देशी विदेशी तत्त्वों और सौन्दर्य 
से युक्त होने लगी। . | 
मध्ययुग में अपभ्रश की परम्परा ब्रजभाषा के रूप में विकसित हुई । 
'ऐसा जँचता है कि अपनी बेटी ब्रजभाषा में शौरसेनी अपशभ्रश को नवीन कले- 
त्रर मिला, नये आयुकाल को उसने प्राप्त किया ।* इसकी व्यापकता सभी ने 
स्वीकार की है। सूर्पूर्व युग से भारतेन्दु युग तक यह काव्य के रूप में 
१. शाकुतल में मछुआ तथा राजसेवक मागधी का प्रयोग करते हैं । मृच्छ- 
कटिक में मागधी का प्रयोग स्थावरक, कुभीलक, वर्घभानक. रोहसेन 
तथा चांडाल करते मिलते हैं + 
२. ग्ृच्छेकटिक में राजश्याल संस्थानक दकारी में हों बोलता है । 
रे. खलपात्र प्राचीन सागधी का, गणिका तथा विदूषक प्राचीन शौरसेनी का, 
तथा तापस प्राचीन अद्ध सागधी का प्रयोग करते सिलते हैं। सं० ड्रा० 
पृ० ८६--८७ ॥ 
वही. पृु० १२२१ 
ना०दाए० १८ाईंए। 


डा० सुनीतिकुमार चटर्जी--पोद्दार अभिनंदन प्र'य, पु० ८० | 


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पृष्ठाघार रे 


एक व्यापक केत्र में समाहत रही । द्वरद की बची क्वांन के साय अपने पदा 


0. दाल लािवकनसनक रप्द्डस्थाद ्ग्म्ख्ब्ज बल. दीं नानदेद की न 35७५ सर 
घहार मिलाक्षर चाचदे दाली मीरा राजस्थाद का था, दानदेद 

















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नहार्मष्टू के ८, दरसा गुदरात के थ, मारतेनदु मांइजुआ भसापा झकझेत् दाय।त। 











झजसरजू५६ क्लो ४य३ एक स्््‌ छु्क्त क्ाददया का स्साः पचछझ पवै६ू॥। या अत चुपदा 





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भुलााइसाभाइैमान्‍ममनम0...स्‍साथमााकन निशा जडडक >> हे कमदरन- मूह 4». दांहियाल समय हि कल-न- 
समझ दना देद दाद प्राष्टमाग के द्ाचाय भा दाक्च्रात्त 4 चटा' थे साह- 





रे हि...» च 4० शह2 5०» 8००० ] इबदाया जे... अंक: अजाक- >> ्य इधर जप 
पुरी, मगही कौर मंधिली भाषा छेतरों में भी द्रदमाया के कई हातमात्यादा 
फातद हुए हू । इस नकार सार उत्तरी भारत की काव्यमाया इनाया दवा । 





दजमभायदा कच्छु दक्त समाहद ८४ । वहा के महाराव उखपतद बड़ विद्यानप्रेमी थे । 





इजमाया के पचार के लिए उन्होंने एक विद्यालय छोला था।"* ददाल क्ते 


पादाडां बज ०्ज 
कवियों ने मी दइजमाया में कविताएं लिखीं। मराठा पाोवाड़ा या दुद्ध-गोद के 





खक् भा कर्भा-कर्दा दृंझमापा का प्रयांय करते थ॥* इस प्रकार एक व्यापक्त 


छाद झा५या सांदंद ऊानच्यंदझद के साथ संदद्ध दे भर [ चू दंत सद्द इसा साषा 
न. 
च्तदटव 


सुर का माठूदादा अंदमभाया था। दिल्‍ली झोर हानरे के दीच दज- 


आए बा... किक... 
सापा हां प्रचतलतद दा चर सबम्दददर अपवच जअध्चद मर इंच कझत्र स दहर चए 





नहीं ब्तभापा कि. मन > मय 230 कल नल ०2 लक. 
च्द्दा। प६८७ पे पूच भा इजमाएा काव्य आर सबांतदत के क्षत्र भ साक्तद्धद हा 


सदी इरल क- सब 34 अपनी प्रच्तिभा >> भाषा 
सुदे। || सर उन अपदा ध्रात्तद्या से इस साथा कि विद्वेष उंस्कार किया। 








प्ज्ड्च्से पद >.% बन्‍भयलक जल्द सलसा अभी इफाफिजलिल्जले हे साडहिल्यदः 
छउपघऊे -45६ का सावा दइचद्धजनदउद्धाय दांत हुए भा साहुत्वक हूं जार साहत्यक् 
द्वार हुए रब ऋुजजदपद्ायद [7 हंस प्रकार चर को भाषा की फनी एच सच 


“>फिल्क. दी ५ 
घ्त्ध्ट 


--+--तततततत 
१. डा० विश्दनायप्रसाद मिश्ष-तई घारा - दर्ष ब्ज्ञक ११-चू० ६ 

२. अगरचन्द नाहुद - सुन्दर #ईगार की भाषा - नारतो' - (ज्वालियर) 

अग्रेल १६५५--४० ३१२---१४ 

डा० सुदोतिकुमार चदर्जी पोइदार अनिवंदन प्रथ--प्रू० ८० 

पुर दिल्लों जौर ग्वालियर दोच ब्रज्ञादिक्त देस। 

दिगल उपनायक गिरा तिनकों मघुर दिलेत ।0 (वंशभाष्करः सूरजमल) 

डा० प्र सनारायण दंडन--सुर की भचादा घु० ४७ । 


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[_] | अकबर से ] जो आजु पाछें हमको कबहूँ फेरि मति बुलाइयो और 
सोसों कबहू सिलियो सत ।' 

[] तब श्री महाप्रभुन जी ने कहयो जो अब तो सूरदास तुममें कछू अविद्या 
रहो नाहीं ।... 

[] '...ओऔर सूरदास को जब श्री आचाये जी देखते तब कहते जो--भावों 
'सुरसागर--सो ताको आशय यह है, जो--समुद्र में सगरो पदार्थ होत है, 
तसे ही सूरदास नें सहस्रार्वाध पद किये ॥ 

(| श्री आचाये जी भाप तो सुर कहते। जैसे--सूर होय सो रण में सों 
पाछो पांव नाहि देय, जो सबर्सो आगे चले । तंसेई सूरदास जी की भक्ति 
दिन-दिन चढ़ती दिद्वा भई ।' 

[_] 'पृष्ठि मार्ग को जहाज जाता है, जाकों कछू लेनी होय तो लेउ ।' 

वार्ता 


सूर का व्यक्तित्व 


रूऊत्गक्तिवव का विश्लेषण कभी आन्तरिक चेतना-कैस्धों और 
स्नायविक संकायों के विकलन के आधार पर किया जाता है 
और कभी बाह्य परिस्थितियों के विश्लेषण को आधार बनाया जाता है । 
आन्तरिक केन्द्रों की खोज में कभी विकल राग-तंत्रियों की छटपटाहुट सामने 
आती है, कभी चेतना के स्वाभाविक विकास को जटिल '्रन्थियाँ' जकड़ती 
हुई मिलती है । और कभी इस आन्तरिक विक्षोम के कारणों को बाह्य परि- 
स्थितियों में खोजा जाता है । कभी छृततित्व या अन्य अभिव्यक्तियों का अध्ययन 
व्यक्ति के रहस्यों को प्रकट करता है 
सूर' के व्यक्तित्व-विश्लेषण में सबसे आकर्षक आधार उनका अन्धत्व' 
प्रतीत होता है। विकलॉगता हीनता-पभ्रन्थि को जन्म देती है। नेत्र जेंसी इन्द्रिय 
की हीनता से उत्पन्न ग्रत्थि और भी जटिल और कठ होगी । 'सूर' की हीनता, 
ग्रस्त चेतना सूर-साहित्य में यत्र-तत्र रो पड़ी है। सूर के विनय-साहित्य का 
स्वर अन्धत्व-जन्य हीनता से विचलित हो उठा है ।* इस बात को लेकर वह 


१. सूर का अन्धत्व असन्दिग्ध है। केवल जन्मान्धत्व विवादास्पद है| 
२. क-यहै जिय जानिके अंध भाव त्रासतें, 'सूर' कार्मी-कुटिल सरन आयो । 


(सूरसागर ११५) 
ख-'सूर' कहा कहे द्विविध आँधरो, बिना मोल कौ चेरो। 


ग-सूर कूर आँधरो हों द्वार परुयो गाऊं । (सूरसागर ६।१६६) 
३. क-कर जोरि 'सूर' बिनती करे, सुनहुन हो रुकुमिनी रचन । 
कटो न फंद भो अंध के, अब बिलब कारन कवन || 


ु (सूरसागर, १११८०) 
ख-सूरदास कुंध अपराधी, सो काहे बिसरायो (सूरसागर, १।१६२) 


सूर का व्यक्तित्व ३७ 
अपने इष्ट से झगड़ा भी है ।' अनुभूतियों के बाह्य संदर्भ से चाक्षुप सम्पर्क न 
हो सकने पर सूर ने एक व्यंग्यपूर्ण विक्षोभ का भी अनुभव किया है । वात्सल्य 
ओर श्वज्जार दोनों ही भाव-स्थितियों में नेचर-हीनता वाघा बनी है ।* उसकी 
यही विनय है कि उसे आगे भी नर-देह प्राप्त हो और उसे दो अंखें भी मिलें। 
अन्धत्व निश्चित ही हीनना-ग्रन्यि का जनक है । यह हीनता-अ्रैन्थि जन्मान्ध 
होने पर एक प्रकार की परिणति प्राप्त करती है, और पीछे अन्धचा होना एक 
अन्य प्रकार से दिशा निश्चित करता है । अन्तर्साक्ष में जन्मान्वत्व स्पष्ट नहीं 
प्रतीत होता । 'सूर निर्णय में कुछ नवीन पदों की सूचना दी गई है, जिनसे 
सूर का जन्मांच होना सिद्ध होता है ।२ यद्यपि इस प्रकार से प्राप्त कीर्तेन-पदों 
की प्रामाणिकता अभी पूर्णतः: स्वीकृत नहीं है, फिर मी इन पदों की मापा और 
मावभूमि सूर के प्रामाणिक पदों से साम्य अवश्य रखती है। वहिर्साक्ष में तो 
सूर' को प्राय: जन्मांधघध माना गया है। रघुराजसिंह कृत 'रामरसिकाबली 
तथा मियॉसिह कृत “भक्त-विनोद इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय हैं | इन दोनों 
ही ग्रन्थों में तूर को जन्मांवब कहा गया है।* सांप्रदायिक वहिर्साक्ष भधिक 
विश्वसनीय हो सकता है । सांप्रदायिक लेखकों का सूर अथवा सूर सम्बन्धी 

अनुश्र तियों के निकट का संबंध था : 


१. स्रदास' सो कहा निहोरों नेननि हू को हानि । (सूरसागर, ६।१६६) 
२. क-हँ लोचन साबित नहिं तेऊ | 
... बिनु देखें कल परति नहीं छिनु, एते पर कोन्‍्हों यह टेक । 
ख-रास-रस-रीति नह बरनि आव | 
इहे निज मंत्र, यह ज्ञान, यह ध्यान है, दरस दंपति भजन सार गाऊ । 
इहे माँगों वार-वार, प्रभु 'सूर' के नयन हँ रही, नर-देह पाऊ | 
क-सूर की विरियां निदर होइ बठे, जन्म अंध कर॒यो। सूर निर्णय, 
सम्पादक, प्रमुदयाल मोतल, प्रु० ७४ 
ख-रहौो जात एक पतित जनम को आँधरो सूर सदा की। 
(वही, पृ० ७५) 
ग-करमहींन जनम को अंबी मोर्ते कौन न कारो । (वहीं, ० ७६) 
४. क-जन्मत तें हुँ नंन-विहीना । दिव्य हष्ठ देखह सुख भीना । 
(राम रसिकावली) 
ख-जनम अंध हग ज्योति विहोता । जननि-जनक-कछु हरष न कीना । 
(भकत विनोद) 


नर 


जद सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


|... --श्री-गोकुलनाथ जी रचित मूल चौरासी वार्ता सांप्रदायिक वहिसाक्षि 
में सबसे प्रमुख है। इसमें अन्धत्व की सूचना तो मिलती है ।. पर जम्मांधता 
का स्पष्ट संकेत नहीं- है । इस वार्ता का भावात्मक विस्तार .औओर क्षतिरिक्त 
सूचनाओं के आधा[र पर विशदीकर॒ण हरिराय जो ने किया ।. हरिराय जी ने 
स्पष्ट रूप से, सूर को जन्मांध कहा है। उन्होंने 'सूर-और “अंध' में भेद किया : 
'सूर' वह जो जन्म से-नेत्र विहीन हो; 'अंध' -वह जो पीछे .अंधा हो । फिर 
उन्हें स्पष्ट रूप से जन्मांध कहा गया--'सो सूरदास .जी के जन्मत ही सों नेत्र 
नाहीं हैं ।। हरिराय जी के . इन स्पष्ट कथनों को, अप्रामाणिक नहीं कहा जा 
सकता : उन्हें सम्प्रदाय की समस्त प्ररम्पंरा का, ज्ञान था। सूरदास जी का 
एक चित्र .भी किशनगढ़ से प्राप्त हुआ है । इसका चितेरा सूर का समकालीन 
था। इस चित्र में सूर की आँखें नहीं हैं। इन सभी प्रमाणों के आधारों पर 
सूर की जन्मांध मानना ही संमीचीन 'प्रतीत होता है।* सूर के समेक्रालीन 
श्रीनाथ भट्ट ने संस्कृत मणिमाला' "में सूर को जन्मांध कहा है--जन्मांधो 
सूरदासो<भूत्‌**“। प्राणनाथ कवि ने भी इसी प्रकार की उक्ति की है |” 
की प्रतिभा को देखकर भी ऐसा विश्वास होता है कि उनकी शक्तियों की 
अन्तमु ख साघना ही इतना पूर्ण विस्फोट कर सकी । जन्म से ही एक प्रमुख 
इन्द्रिय के हीन होने पर उसकी संचित शक्ति प्रातिम-साधना को दिग्ंत-व्यापिनी 
बना सकती है । | 

मूक करोति वाचालं वाली उक्ति अन्य कवियों में प्रभु के ऐश्वर्य 
निरूपण की औपचारिकता का अंग हो सक्रती है। :सूर, के हीनता-प्रस्त 
व्यक्तित्व के लिए यह एक मामिक पुकार बन गई। उतकी आशा और उनके 
विश्वास को इस विरद से समुचित संबल प्राप्त हुआ होगा। उनके विनय- 





१. यह सूचना अकबर सूरदास भेंट प्रसंग में तथा सूर के अन्तिम समय 
के विवरण में प्राप्त होती है। 

२. “जन्में पाछे नेत्र जाय, तिनको आँधरा कहियें, सूर न कहिये, और ये तो 

सर हैं। स 

३. श्रों प्रभूयाल मीतल, सूर निर्णय, (मथुरा, २००८) पु० ७६; डा० 
सत्येद्ध 'सुर की झांकी , (आगरा, १६५६) पृ० ६६ । 

४. बाहर -नेन - विहीन . सो,, सीतर सेन बिसाल । 
: जिन्हें न जग कछु देखियो, लखि हरि रूप निहाल ॥ 


सूर का व्यक्तित्व. ३६ 


साहित्य में यही विश्वास उच्छलित है ।* सर्व-समर्थ प्रमु क्या नहीं कर सकते । 
उनकी कृपा से सब कुछ संभव है ।* यह विश्वास मौतिक परिणति के अभाव 
में एक वन्नानिक को तो संतुष्ट नहीं कर सकता : वह पिंड में आँखों को उदित 
होता नहीं देख सकता । पर अन्तर्नाव की क्षतिपूरक प्रखरता, या अन्य किसी 
इन्द्रिय की गक्ति में वृद्धि हो जाना, एक स्तर पर मनोविन्नानी को स्वीक्षत्त है । 
दार्यनिकों के मतानसार यही अन्तर्मान या स्वयं प्रकाश ज्ञान का विकास हैं। 
इसी का नाम दिव्यदृष्टि या अन्तह ष्टि है । 'सूर' में इस दिव्यदृश्टि का प्रकाश 
प्रायः समस्त वहिसर्साक्ष में बतलाया गया है । 

नामादास जी ने 'भक्तमाल' में लिखा है कि ये अपनी दिव्यदृष्टि से 
भगवान की लीलाओं का अभ्यास पा सके ॥* “रामरसिकावलीकार ने 
भगवान की दिव्य लीलाओं का आस्वाद इसी दिव्य दृष्टि के माध्यम से माना 
है-- दिव्य दृष्टि देखहि सुख भीना । सामान्य रूप से सुर के सम्बन्ध में ये 
बातें प्रचलित नहीं | प्राणनाथ ने भी अन्तर्चक्षओं की विशालता का उल्लेख 
किया है: वाहर नंन विहीन सो भीतर नन विसाल ॥ कहा जाता है कि 
संप्रदाय में इनकी दिव्यहप्टि की परीक्षा मी की जाती थी : श्रीनाथ जी के 
श्रद्धार का आंखों देखा जैमता वर्णन सूर करते थ । एक दिन परीक्षा के लिये 
श्रीनाथ जी का नग्न श्ाद्भार किया गया और सूर नेगा दिया--आज बने 
हरि नंग्रम नंगा । चौरासी वार्ता में दिव्य दृष्टि की परीक्षा के सम्बन्ध में स्पप्ट 
उल्लेख है--- 

“सो इनके हुदय में स्वरूपानन्द को अनुमव है। तासीं जैसी तुम 
सिग्रार करोगे सो तंसो ही पद सूरदास जी वर्णन करिके ग्रावेंगे । तासों भग- 
बदीय की परीक्षा नाहीं करनी ।**'सो सूरदास जी जयगमोहन में व॑ठे हते । 
सो इनके हुदय में अनुमव मयौ ।7” इस प्रकार संप्रदाय में अन्तर्प्रकाश ज्ञान 
ओऔर तज्जन्य अनुभूतियों के घनी सूरदास की प्रतिष्ठा थी । । 





१. चरन-कमल बंदों हरिराइ । 
जाकी हपा पंयु गिरि लंघे, अन्‍्बे को सब कछ दरसाई । 
२. हर ज्‌ तुमतें कहा न होइ । ः 
अं श्र 4 >< 
बोल गुंग, पंगु गिरि लंघं, अर जावे अंधा जग जोइ। - 
३. प्रतिविधित दिवि दिप्ट, हृदय हरि-लीला भासी । (भकतमाल). 
४. अप्ट छाप को वार्ता, मब॒रा, पूु० १७, श८। 


४० स्रसाहित्य : नव मूल्यांकन 


जन्मांच सूरदास के जन्म से माँ-बाप खिन्‍न हुए । सूर के प्रारम्मिक 
जीवन का कुछ आमास हरिराय जी के भाव प्रकाश से होता है । भाव प्रकाश 
के अनुसार सूर का जन्म एक अत्थन्त दरिद्र ब्राह्मण परिवार में हुआ ।६ 
जन्मांघत्व का संयोग सूर के वंश के दारिद्रय से हुआ। कदुता बढ़ती गई । 
वंश वालों को सूर मार स्वरूप प्रतीत होने लगे । बाल्यकाल से ही जनन्‍्माँधत्व- 
जन्य हीनता से जिस बालक का अन्तमंन एक कड़वी घ्ुंटन से भर गया हो, 
वह दरिद्रता और उपेक्षा की चोट से अवश्य ही तिलमिला गया होगा । घर 
का समस्त वातावरण जंसे सुर को धकेल रहा हो : वहां रहना कठिन होगया । 
छोटी अवस्था में ही सूर को ग्रह-त्याग करना पड़ा ।ई गृहत्याग का कोई कारण 
भाव-प्रकाश में नही दिया गया है। उपेक्षा और तिर॒स्कार से- बड़ा और कौन 
सा कारण हो सकता है ? यह दारुण कारण किसी भी छोटी घटना से मिलकर 
निष्क्रमण की भूमिका तैयार कर सकता था। अपनी ,हीनता और मसूर की 
अन्धता से सूर के माँ-बाप पीड़ित रहते थे। सूर के अपने अस्तित्व में एक 
व्यंग की पीड़ा चुलमिल गई । वे गृह-त्याग कर, सीही से चार कोस पर स्थित 
एक गांव में पेड़ के नीचे, तालाब के किनारे रहने लगे । मियाँसिंह ने एक और 
वार्ता दी है : ८ वर्ष की अवस्था में यज्ञोपवीत के अनन्तर सूर ने अपने माँ- 
वाप के साथ ब्रजयात्रा की और मथुरा से उन्होंने लौटना स्वीकार नहीं 
किया | पर, इस वार्ता को संदिग्ध माना जाता है 7 तात्परय यह है कि उपेक्षा, 
होनता और तिरस्कार से प्रताड़ित बाल सूर अधिक समय तक घर में न रह 


सका | 


सूर्‌ का स्थान : एक पीपल के पेड़ के नीचे, तालाब के किनारे। 
वेराग्य-मावना की अस्फुट छाया उनके मुख पर । छोटी अवस्था ! इन सबका 





१. जनम अध हग ज्योति विहीना । जननि जनक कछु हरष न की ना । 
(भक्त विनोद) 

२. कुछ दिद्दानों ने सूर को भाट, ढाढ़ी या जाट भी कहा है ! गो० यदुनाथ, 
श्रोनाथ भट्ट, प्राणवाथ त्था हरिराय जी के साक्ष आधार पर 'सूर' को 
न्राहमण हो माना जाता है । ' 

३. हरिराय जी कृत भाव प्रकाश के अनुसार गृह-त्याग छः वर्ष की अवस्था 
में हुआ और 'भक्‍त विनोद के अनुसार आठ वर्ष की अवस्था में ।. 

४. डा० दीनदयाल गुप्त--अष्द छाप और बल्‍लभ संप्रदाय, पृ० १२४; प्रभु-. 
दयाल मीतल--सूर निर्णय, पृ० ७८ | 


सूर का व्यक्तित्व ४१ 


एक आकर्षण ! सूर को एक वाल योगी की सी स्थिति प्राप्त हुई । गाँव का 
जन किसी आन्तरिक चमत्कार का दशन इस स्थिति में करता है। उपेक्षित 
और उत्पीड़ित सूर को अपने आस-पास एक मृदुल वातावरण का अनुभव 
हुआ । यहीं एक आकस्मिक चमत्कार घटित हुआ : सूर ने स्थानीय जमीदार 
की कुछ खोई हुई गायों का पता बतलाया और वे मिल भी गई । बस, प्रसिद्धि 
हो गई -सूर शकुन बतलाते हैं, सूर की वाणी सिद्ध-बाणी है । जमींदार ने 
उनके खाने-रहने का प्रवुद््ु .करं-दिया । चारों झोर से लोग शकुन पूछने या 
चमत्कार की आशा में आने जग इस प्रंकरिं सूंरुपुजु गये £इअन्त, वस्त्र और 
द्रव्य की कमी न रह गई : सूर के विकर्ल-विकृज्त “बह. मैं «एक *शीतलता का 
अनु भव किया : तिरस्कार के प्रति मूक प्रतिहिसा की चीख _कुछ-कुछ शान्त 
हुई | सरदास स्वामी जी” बनेगये.। कुछ लोगों ने उत्नसे दीक्षा ली : कुछ 
उनके सेवक हो गये । प्रातः साय सर्ग यु संर्गूतित्कीतेजसमी जमने लगा । सूर का काव्य 
और संगीत उनके सिद्ध व्यक्तित्व को“ अतिरेक्त-आकर्षण बन गया । दरिद्रता 
की आरंभिक कठुता ऐश्वर्य की हलकी लहरों से धुलने लगी। उखड़े हुए 
व्यक्तित्व को पर रखने के लिये घरती मिली । अब हीनता-प्रस्त व्यक्तित्व के 
लिये दो मार्ग हुए : सिद्ध वाणी के चमत्कार के द्वारा अपनी क्षति पूर्ति करे या 
काव्य और गायन की प्रतिमा साधना से उच्चतर क्षतिपूर्ति का मार्ग पकड़े। 
सिद्धि और भक्ति में भी एक दन्द्र चलने लगा। भक्ति का संकेत प्रातिम साधना 
की ओर था--लोकरंजन की ओर । प्िद्धि की सफन्नता क्ृच्छ साधना पर 
आश्रित थी--संदिग्ध भी थी | सूर के अन्तद्व न्द्व का यही स्वरूप क्षतिपूर्ति के 
आरम्भिक क्षणों में घटित हुआ । इसी संघषंपूर्ण स्थिति में सूर की अवस्था 
अठारह वर्ष की हो गई | सूर में वराग्य भावना का जन्म तो हुआ, पर सिद्ध- 
जन्म मायाजाल में फंसी रही । इसकी सूचना उनके कुछ पदों में मिलती है । 
सत्य स्वरूप की खोज इस सबसे विलंबित हो गई ।* 'े एक दिन गये अलेखं' 
जुसी उक्तियाँ पश्चाताप से विकल है । जब इस द्विविधा की मनःस्थिति को 


१. जो लों सत्य सरूप न सूझत। 
तो लो सन सन्ति कंठ विसार, फिरत सकल बन बुझत । 
५ 5 2५ 2५ 
'सूरदासः जब यह मात आई, वे दिन गये अलेखें । 


कह जाने दिनकर कीं माहमा, अंध नेन बिनु देखें ।। 


४२ सरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


उचित मार्ग मिल गया, तब 'देर आये दुरुस्त आये” वाली कहावत चरितार्थ 
हुई | सूर' की वाणी-- 
चलयो सबेरा आयो अबेरो, लकर अपने साजा । 
'स्रदास' प्रभु तुम्हरे मिलि हैं, देखत जम दल भाजा ॥॥ 
इस प्रकार सूर ने -अन्ततः द्विधा-ग्रेस्त मनःस्थिति से. छुटकारा पाया : 
इस स्थिति की चर्चा संभवत: सूर सम्प्रदाय में कभी-कभी करते रहे होंगे । 
इसीलिये यह अनुश्रूति प्रचलित होकर, हरिराय जी के “भाव विलास' में 
अवतरित हुई । 5 - शनि 
“या प्रकार सूरदास तालाब पै, पीपर के वृक्ष नीचे, बरस अठारह के 
भये । सो एक दिन रात्रि को सोबत हते, ता समय सूरदास-कौं वेराग्य आयी । 
तब सूरदास जी जो अपने मन में बिचारे जो देखो मैं श्री भगवान के मिलन 
के अर्थ बेराग्य करिकें घर सों निकस्यों हतौ सो यहाँ माया न ग्रसि लियी |... 
पाछें सुरदास एक पहरिके लाठी लैकें उहाँ ते कूच किये ।...-कितनेक सेवक 
संसार सों रहित हते सो सूरदास जी के संग चले ।” | 
और सूरदास अपने कुछ सच्चे त्यागी सेवकों सहित मथुरा होते हुए 
गऊघाट पहुँचे । 
उस गाँव के तालाब के किनारे पर रहने वाला सूर अब यमुना किनारे 
गऊघाट पर आ गया। सिद्धि की ओर चलने वाला व्यक्तित्व भक्ति की 
भावना में डूबने-उतराने लगा । काव्य-साधतना के लिए अधिक अवकाश मिलने 
लगा । स्वरचित पदों के संगीत में भक्ति की भावनाएं झंकृत होने लगीं। इन 
झंकृतियों ने सूर की उपासना के क्षणों को आप्लावित कर दिया : 'सूर' के 
अन्तराल का अभाव, घनीभूत भाव-संचार की चोट खाकर खिसकने लगा । 
विनय और दंनन्‍्य अब व्यक्तित्व के बोझ नहीं थे : उनको काव्य का उदात्त 
माध्यम प्राप्त हुआ : यह काव्य हरि! को निवेदित होने लगा | 'दंन्य के उदा- 
त्तोकरण का क्षण अधिक से अधिक भाव-विहद्धल होता गया । अपनी हीनता 
अब विस्तृत होकर जीव-मात्र की पीड़ा प्रतीत होने लग्री : प्रभु की ऐश्वर्य 
कल्पना विभिन्‍न स्रोतों में पुष्ट होने लगी । विनय-विह्नलता के क्षणों में कुछ 
ऐसी अनूठी दक्तियाँ भी निःसृत होने लगीं जिनमें इष्ट के साथ अधिक सामीप्य 
प्रकट हुआ है। उसने अपनी मूलभूत अंधत्व-जन्य-हीनता की झुझलाहट को 
सिर आशलेलद $ अत रशजह # मी के 
कप वह है जो इन्द्रियों का दाता'है । और तुम 


सूर का व्यक्तित्व ४३ 


इतने निष्ठुर हो गये कि जन्म अंध करयौ-: एक दिन उसने कह दिया, तुमने 
औरों को कुछ भी दिया होगा, पर मेरे ऊार आयका कुछ भी अहसान नहीं 
है। मुझे त्तो आपसे नेत्र मी नहीं मिलि-- 


कहावत ऐसे त्यागीं दानि । 

चार पदारय दिए सुदाम हि, अर गुरु के सुत आवि । 
रावन के दस मस्तक छेंदे, सर गहि सारंग पानि ॥॥ 
लंका दई विभीषन जत कों, पुरत्॒जी पहँचानि । 
विप्र सुदामा कियो अजाचो, प्रीत्त पुरातन जानि ॥ 
'सुरदास॑ सो कहा निहोरो, नेतन हू की हानि ॥ 


इस प्रकार की निर्मय, झु ललाहट से भरी उक्तियों के कारण ही तुलम्ी 
की 'विनय' से सूर की विनय विशिष्ठ हो जाती है। इनमें प्रभु के साथ समीप 
का सम्बन्ध व्यंजित है। अन्चत्व-जन्य-्हीतता ने सूर की वाणी को खरा कर 
दिया है | ऐसा प्रतीत होता है कि यह अन्तमु ख व्यक्तित्व इष्ट के साथ और भी 
घनिष्ट संबंधों की स्थापना करने को व्याकुल है। इप्ती व्याकुलता के कारण 
द॑न्य और विनथ की उतक्तियरों को सब्य-मात्र का संदर्भ प्राप्त होता सा प्रतीत 
होता है। इन घनिष्ट संबन्धों की 'नावना' के लिए समुचित उयादान अभी नहीं 
जुड़ पा रहे थे : लीला पुदय की लीलाओं का रहस्थ जानना इस भात्रता की 
परिणति के लिए बावदयक है | 


इस समय तक सुर संगीत-कला में कुशल हो चुके थे | सूर की संगीत 
कुगलता को देखकर कुछ विद्वान यह मानने लगे क्रि वे पहले हरिदासी संप्र- 
दाय में दीक्षित थे । ब्त्र के समी संदव्रदायों में संगीत सावचता का एक प्रेमुख 
अंग वन चुका था। संगीत में रुचि रखने वाले सभी भवत्तत हरिदास जी से 
सम्पर्क रखते थे । यह आश्वर्य की वात नहीं, बाद सूर के संगीत का परिष्कार 
इसी सम्पर्क का परिणाम हो । इस प्रसाव-सम्पर्क के प्रमाग में सूर की राघा, 
यमुना और वृन्दावन के प्रति भक्वि-आसक्तित को बात भी कही जाती हैं। 'सूर' 
को स्वामी नी कहा जाता था और बह उपाधि हरिदासी सम्प्रदाय में अधिक 
प्रचलित थी । इन दृष्टियों से सूर का हरिदासी संप्रदाय से कुछ संयके प्रतीत 
तो होता है, पर इसका कोई पुष्ठ प्रमाण प्राप्त नहीं है। इनता आवश्य माना 
जा सकता है कि खूर का किसी मावुयश्चित संत्रदाव से कुछ संपर्क अवश्य 
था। उनके व्यक्वित्व में मावुर्य की एक अन्तवरिा बत्रध्य प्रवाहित थी। 


४४ स्रसाहित्य : नंब मूल्यांकन 


वललभाचार्य जी से यह धारा सीधे-सीघे सूर 'को नहीं मिली । इस अंन्तर्धारा में 
तीव्रता तब आई, जब गो० बिट्ठलनाथ जी ने माधुये का समावेश सांप्रदायिक 
साधना में किया । संगीत और माघुये की स्त्रोत 'हरिदासी संप्रदाय को ही 
मानना आवश्यक और प्रामाणिक नहीं है “ब्रज उस समय अवश्य ही संगीत का 
गढ़ रहा होगा । इस युग में ब्रज के जिस व्यक्ति-से भी परिचय प्राप्त करते हैं, 
वही सगीतज्ञ है । ” जिस समय गौघाट पर उनकी वल्लभाचार्य जी से भेंट 
हुई, सूर संगीत कला का अर्जन कर चुके थे । 

गंऊघाट के पास श्री वललमांचांयजी 'की बंठक है। भड़ेल से ब्रज 
जाते हुए महाप्रभू यहाँ ठहंरे । सूरंदास'जी को उनके एक सेवक ने सूचना दी : 
दक्षिण और काशी में मायावाद का खंडन करने वाले महाप्रभु वलल्‍्लभाचार्य 
जी गऊघाट पर पधारे' हैं। उन्होने मायावाद का खंडन करके भक्तिमार्ग की 
स्थापना की है | सूर ने अपनी हीनंता से निरन्तर संघर्ष'करते हुए व्यक्तित्व को 
एक अत्यन्त महिमामय व्यक्तित्व से संपके करने की इच्छा हुईैं। जब आचार्य॑ 
महाप्रभु भोजनादि से निश्चिन्त होकर बैठे, तब “सूरदास! जी उनके दर्शन 
के लिए गए | वार्ताकार ने इस प्रसंग को इस प्रकार लिखा है-- 


“तब सूरदास जी अपने स्थल तें आय के श्री आचार्य जी महाप्रभु के 
दरसन को आये । तब श्री आचन्चार्य जी महाप्रभ ने कह्यौ जो !'सूर' आओ, 
बैठो । तब सूरदास जी श्री आचाये जी महाप्रभून कौं दरसन करिकें आगे आय 
बेठे ।” 

सूर के क्षत-विक्षत और निरंतर संघर्षशील व्यवितित्व को एक महान 
व्यक्तित्व से जेसे मृदुल भाह्वान मिला हो । यहां 'दरसन' शब्द के प्रयोग को 
देखकर कुछ विद्वान उनके सूरत्व में संदेह करते हैं ॥ वास्तव में यह दर्शन 
चाक्षुप नहीं था, मानसिक था। आचार्य जी के सामने उपस्थित होना ही 
उनके दर्शन करना था । सूर के मन में आचार्य जी के ध्यक्तित्व का एक चिम्ब 
अवश्य वन गया था : एक भावना मूर्त हो उठी थी | वही दर्शन है। आचार्य 
जी के आह्वान-शब्द एक ध्वन्यात्मक विब धूर के मन में प्रस्तुत कर रहे थे । 
यह बिम्ब आत्मीयता से सजल था (जहां 'सूर' सम्बोधन में बाह्य रूप से एक 
व्यंग्य प्रतीत होता है, वहाँ यह ध्वनि भी निकलती है कि महाप्रभमु जी ने कहा 


ब्् पे कं अभिशाप तठी थे अओ दा डी 7.ल्‍+9+०--०>»-«+मनन--मलनन»-»«++ «न 
हो : सूर होना भमिशाप नहीं; यह वरदान भी बन सकता है। इन भावनाओं 


की मूक झक्तियाँ सूर के अन्तराल में हो ही रही थीं, कि सर को सुनाई 


१. डा संत्येन्द्र, सूर को झाँकी, पृ० १०५। 





४६ सूरसाहित्य : नव मुल्यांकन 


स्वर मिले | सर का समग्र व्यक्तित्व-हीनता के मार से मुक्त होकर आमार-नत 
ही गया । ' 


आचार्य जी ने 'सूर! को अपनी शरण में लिया | सांप्रदायिक विधि के 
अनुसार सूर दीक्षित हुए । 'सूर' के कानों में गुरुमुख से निर्गेत अष्टाक्षर मंत्र 
'नाम गज उठा--श्रीकृष्ण: शरणं मध ।” 'नार्मा की ध्वनि भौर गुरु के 
उष्ण इवास का अनुभव 'सूर' ने साथ-साथ किया ।* दूसरी सांप्रदायिक औप- 
चारिकता 'समर्पण-दीक्षा' है: वह भी सम्पन्त हुई ।7 तदनंतर लीला-अनुक्रम 
का कथन किया | दशम स्कंघ की अनुक्रमणिका , भागवत की स्वचरित टीका 
सुबोधिनी' और भागवत-सार-समुच्चय रूप पुरुषोत्तम सहुख्ननाम” के रूप में 
आचार्य जी ने निज प्रसाद दिया । सूर के सम्मुख समस्त गेय विषय की 
सीमाए' निश्चित हो गई । सूर| को लीला-रहस्य अवगत हुआ | सूर' का 
चेतन-अचेतन क्ृष्ण-लीलाओं से मर उठा | उनके अन्तचेक्षुओं को सब कुछ 
हृदय हो गया । वार्ता के अनुसार आचायें जी ने तब पुरुषोत्तम सहख॒नाम 
सुनायो । तब सूर को सम्पूर्ण मागवत की स्फुरना भई । यह सव आचार्य जी 
के त्रिदिवसीय गौघाट-निवास काल में सम्पन्त हुआ । 


१. श्री बललभ अवको बेर उबारों । 
सूर' अधमस को कहू ठोर नहीं विनचु एक सरन तुम्हारो । 
>< >< >< >< 
मन रे तू भुल्यों जनम गंवावें । 
'सूरदास' बल्‍लभ डर अपने यरन-कमल चित लाबे । 


>< ५ ५ 2५ 
मन रे तें आयुष बृथा गंवाई । 
अजहू चेत कृपाल सदा हरि श्री बल्‍लन सुखदाई । 
'सूरदास' सरनागत हरि की और न कद्ू उपाई ॥ 


२. अजहु सावधान किन होहि । 
कृष्ण नाम सो मंत्र संजीवति, जिन जग भरत जिवायो । 
वार बार छ्व ख्त््र निकट, तोहि ग्रुरु-गार॒ड़ी सुतायी ॥। 
रे. या में कहाघटेगो तेरी। 
नंदनेंदन कर घर को ठाकुर, आायुन ह्वँ रहें चेरी । 
सब समपंत सूर' स्थाम कों, यह साँचौ मत मेरी 0 


सूर का व्यक्तित्व ४७ 


वहाँ से महाप्रभु वलल्‍्लभाचार्य जी गोकुल की ओर चले । सूर' गुरु के 
अनुवर्ती हुए । अब और कोई दिशा नहीं रही । 'सूर आचाय॑ जी के साथ 
गोकुल गये । वार्ता में इस प्रसंग का कथन इस प्रकार है :-- 

“अब जो श्री आचाय॑ जो महाप्रभु ब्रज कौ पाँव धारे, सो प्रथम श्री 
गोकुल पधारे । तब श्री आचारय॑ जी महाप्रभून के साथ सूरदास जी हु आये | तब 
श्री महाप्रमुजी अपने श्रीमुख सौं कह्मो जो सूरदास जी श्री गोकुल कौ 
दरसन करो, सो सूरदास ने श्री गोकुल कों दण्डवत करी। श्री गोकुल की 
बाल-लीला सूरदास जी के हृदय में फुरी । तव सूरदास जी ने विचार कियौ 
मन में, जो श्री गोकुल की बाललीला को वर्णन करिके श्री आचाये जी 
महाप्रभून के आगे सुनाइये ।” 


आचाये जी कृष्ण की लीलाओं का रहस्य तो उद्घाटित कर ही चुके 
थे | गोकुल में आकर सूर के व्यक्तित्व ने बाललीलाओं की स्थली के साथ 
भावात्मक तादात्म्य किया । उनकी कल्पना में गुरु-निर्दिष्ट लीलाएँ सजग हो 
उठीं । श्री नवनीत प्रिया के सान्तिष्य से यह पद बरबस निकल पड़ा । 


सोभित॒ कर नचवनीत लिऐ । 
घुजुरव चलत, रेनू तन मंडित, घुख दधि लेप किऐ । 
>< व 2५ 2५ 
धन्य 'सूर' ऐकोी पल यह सुत्य, कहा भयों सत कल्प जिऐ । 
इस प्रकार ब्रज में प्रविष्ट होते ही भावनाओं से अभिभूत मन में लीलाएँ 
मृत होकर प्रकट होने लगीं । लीलासक्ति के क्षणों की कल्प-व्यापी स्फीति का 
उन्हें अनुमव होने लगा । मृतं-लीलाए काव्य की ध्वनि और संगीत के नाद से 
युक्‍त होकर दृश्य चित्रों की रेखाओं में आकर ग्रहण करने लगीं । “भन्धत्व' ने 
पहली बार हार मानी । प्रत्येक पद हृश्य चित्र का आकार लिए है। लीला- 
विग्नह की भावना मात्र ने सूर की बन्द आँखों को खोल दिया । सूर को सारे 
रहस्य प्रकट दिखलाई देने लगे । गोकल ने सूर को वाललीला-साहित्य की प्रथम 
प्रेरणा ओर स्फूरति प्रदात की । अनजानी किरणों ने भावना-विंबों को जगमगा 
दिया। अनेक पद सूर की वीणा-लता से अनायास झर पड़े । 
और यह है 'श्रीनाथ जी द्वार मिरि गोवर्धन का एक सुरम्य कक्ष ! 
आज भी वल्‍लम संप्रदाय का यह ग्राम-जतीपुरा प्रमुख केन्द्र बना हुआ है। 
पर्वत पर आचाये महाप्रभु जी का इष्ट-विग्रह प्रतिष्ठित था। यही सूर' का 
भोतिक और आध्यात्मिक ग्रन्तव्य वना । सूर के लिए यह स्थल लीलासक्तिमयी 


र्डदध मुरचाहित्य : नव मूर्ल्यांकव 








छत्रा का स्थल बचा । उनके नए जादन का जाधकाज साय यहा च्यत्ाद हुआ | 
थीं _>ममयान्म्यन्‍+०-रमान०---पान. है». अजाफिया का अन्‍ननममययानककाल८. मेल अलन+>>मन करे 
बहा सूद का उक्त क्ेसना अननति की इच्छा सर उच्चचर संह्ाश्ंवा का झ3च+ 


ऋरचता 8 खात्ाकार कााबुकन.. गरम. चमिम्मया॥. बकमममह लग न्‍अवललब्म्मनपयाक कार दाज़ दिवरस्ण जा चदिदा 
हुये कच्चा वच्ध । दाद्ाकार व इस लग क्ा यह दिवच्य दा 








॥[ अआीनायजी किक “74 जी व्न्‍्य-+ पे < 

नाथजा हार | तठ सूरक्मम हां दा कहता का सुरदात---ज्दान 
ऋषचिकि भा दाथ जां का इदय कार । जब चून्दास वो पृर्दद्ध ऊन जाथ देर 
शआीनाथ #ण०. मे. हट, आह 2 





श्रीनाथ जी को का इच्नाव काया । उतर कान 


9 ॥ सुनादों ल्‍्|ू [०४र० है 


हर 


द्पै 





बल 
<८४८< 


2, वसंत पे अपन कि 
५ लनुचव कया कि धति और मक्ति का क्षय हफपा पहुचा 8 $ उच्दु।व 
ऊआावात्नक्त बधाथ का इस प्रकार व्यत्त क्रिया--- 


सर के अआमत व्य क्तित्व ने लपनी चिकलता लन्चिम वार व्यक्त हद 
| 


अब हों नाच्यों बहुत युपाल 
काम-ब्लेष को पहिरि चोलना, कंठ विपय कीं माल ! 
कै > 24 
कोटिक कला काछि दिखराई, जल-यल छुधि नाह काल । 
सरदात्त को से बंचिचा, दरि करो बेंइलाल ॥ 
पद की अन्तिम पंवित में सर की कात्मा हो उद्दल पड़ी । उनके सन मे 





अविद्या का अन्धचक्तार अब नवीन आना की चोट खाकर तिलमिलाने लगा । 


शहर कसम. भागने >स्बलवानअओ, शाच्ता बीकल्यन-+- लापता काबू क को अनाज अूााम-पूछरयुकना कर. नवाोदित 5०. + ८०2 ननक ए्रक्ाध ज+0--/ कक घनी भर 
वह बाहर साभन का राज्ता लाजद लगा | चचादद जकादश आई चवचानूप 
बन्वक्ार क्ते इस इन्द्र में सुर एक ल' 


न््ठ मे सुर एक लग रहूु। इसक पश्चात नुदनुस च एक सकते 
(5ए2९९४707) प्राप्त हुआ । 


कप कक 
७ म“्पकर-. 


'तठतव श्री महाप्रस जी ने क्यों जो अब ही सर्दाचस तुम म कछू 


| 


अविद्या रही नाँही | ताते कहछू मगवच्च वर्गव करे ! 

ओर इस शक्त्तिजालो संकेत ने सूर के मन को दन्दनुक्त कर दिया ।॥ 
यह 'द्विविध बाँवरें' का जैसे ज्योति-उंस्कार हुआ : चेतवा को बन्‍्तवाच्य 
अन्चत्व से छठकारा मिला | गिरि गोवर्धन पर स्थित शआऔीनाब जी का मन्दिर 
सूर की प्रातिन सावना का केन्द्र वन गया | सूरकाव्य की बनिद्व ज्लोतस्विनो 


इसी गा प्रदाहित £: का >्ज पक दातिजा हे अधि सगह्ररा ल्ज्ञों मे प्रद्चिप्ट प्रा चर ज्यॉः न्‍्तः 
इसी अंत स प्रदाहित हाकर, रुसका के अधर बपद्नुरा से अत्वप्ट हांकर, ज्यात- 


चमक है 


निर्मरों की स्छात मरने लगी। श्रीनाथ जी को एक दिव्यहष्युक्त अन्या 
कीतनियां मिला : कब्रजसमापा को एक जमर यावक्त मित्रा : वल्लन संप्रदाय को 
एक जहाज मिला : वल्लनाचार्च जी को बपनी साव-चाघता के एकान्च क्षमणों 
का एक सांबी मिला | इस प्रकार सूर के व्यक्तित्व क्ला परिण्कार बौर पुनर्जन्म 


हला , 


(१॥ 


सूर का व्यक्तित्व ४६ 


श्रीनाथ जी सूर के भ्रमित व्यक्तित्व के लिये आकर्षण केन्द्र बन गये । 
अनेक पदो में सूर ने अपनी मक्तिमावना उनको निवोदित की ।*-या यों कहिये 
समी पद उनको संबोधित किये गये। सूर के व्यक्तित्व का बाह्य परिवेश 
श्री वललभाचाये जी के प्र रक शब्दों से ग़ज रहा था| सूर का अन्तराल 
श्रीनाथ जी की छाया से आच्छादित था । उन्हें .अन्तध्व॑नि भी सुनाई देती थी । 
सूर को अपने आन्तरिक क्षणों में श्रीनाथ जी का साक्षात्कार जेता होता था । 
उन्हें उनकी वरदान-वाणी भी सुत पड़ती थी--स्याम कह्यौँ सूरदास सों 
मेरी लीला सरस वनाय' अथवा तब बोले जगदीस जगत गुरु सुनहु 'सूर मम 
गाथ । ये स्वर सूर को भाव समाधि की स्थिति में सुनाई पड़ते थे । सूर 
संभवत: अष्टयाम माव समाधि में लीन रहते थे । समस्त रस-कोष उमड़ कर 
समाधि और समाधि भाषा को स्तात कर देता था। अब उनका व्यक्तित्व 
अथाह-भकूल रसाम्बुधि का जीव था। 


हे यह रस सागर श्री गिरि गोवर्जन की उपत्यका में उमड़ा था। यहाँ 
से लगभग एक मील की दूरी पर परासौली में सूर को कुटी थी । वहीं श्री 
आचाये जी की बंठक है । आचार्य जी भाव साधना के अत्यन्त एकान्त क्षणों 
में सम्भवतः सूर का प्रवेश था । महाप्रभु सूर को 'सागर' नाम से भी पुकारते 
थे | मगवतोक्त लौलाओं के माध्यम से सूर ने जिस रस-सागर का उद्घाटन 
किया था, वह वस्तुत: उनके व्यक्तित्व से भिन्‍न नहीं था--सूर का_ व्यक्तित्व, 
एक लहराता हुआ चलता-फिरता रस-सागर । महाप्रमुनी भगवान की लीलाओं 
को क्षौर सागर' से उपमित करते थे । जिस व्यक्तित्व में यह लीला-दक्षी राब्धि 
अजेष रूप से अवतरित हो गया हो--बही है सागर, सूर सागर, रस सागर 


भौतिक रूप से यह 'समुद्र' मथुरा वृन्दावन और गोकुल तक ही जाता 
था । यही उस व्यक्तित्व-वृत्त की मौतिक परिधि थी । आध्यात्मिक रूप से इस 
सागर की लहरें समी सहृदयों के अन्तस्‌ को प्रक्षालित करती है । या तो वे 





१. फक--अनाथ के नाथ प्रश्चु कृष्ण स्वामी । 
क्रीनाथ सारंगधर कृपा करि मोहि सकल अघ हरन हरि गरुड़गासी । 
ख--श्री गोव्घंनघर प्रश्चु, परम मंगलकारी । 
उधरे जय सूरदास! ताकी बलिहारीं । 


प्रू० सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


श्रीनाथ जी के विग्रेह के साथ चलते थे अथवा गोकुल के नवनीत श्रिय जी के 
प्रति कौर्तन-निवेदन करने जाते ये ।'* सूर को रासस्थली वृन्दावन से विशेष 
अनुराग प्रतीत होता है। सूर का अल्पकालीन प्रवास भी वहाँ होता था । 
वार्ताओ में सूर से सम्बंधित इन स्थानों की सूचना मिलती है--गऊधघाट, 
श्री गोकुल, श्रीनाथ जी द्वार और परासौली | अन्तर्साक्ष से गोकुल, मथुरा 
वृन्दावन के नाम भी मिलते है। 'सूर सागर होगये : समस्त ब्रजभूमि से 
रसानुभूति सचित करके उन्होने रस सामर को साहित्य बना दिया । 


श्रीनाथ जी के मन्दिर मे आचार्य जी के कीतेन-मडान को स्थापना 
की । इस कीतेन-सस्थान के केन्द्र मे 'सूर की स्थिति थी । वे नियमित गायक 
थे । दूसरे नियमित कीतेनियाँ परमानन्द दास थे। कुम्मनदास गृहस्थ होने के 
कारण कभी-कभी श्रीनाथ जी का संकीर्तन करते थे । गो० बिठठलनाथ जी ने 
कीत॑न-परिकर की पुनर्योजना की । आठो समय की झाकियो के लिए वे एक- 
एक कीत॑नियाँ रखना चाहते थे | अष्टछाप की स्थापना हुई : महाप्रभुजी के चार 
सेवक इसमे थे।* गो० बिठ्ठलनाथ जी के चार सेवको! ने इस परिकर मे 
प्रविष्ट होकर अष्टछाप को पूर्ण किया । अष्टछाप क वियो ने सेवा के रागात्मक 
अग 'कीतैन' का विस्तार किया । अनेक राग-रागिनियाँ और वाद्ययंत्रो का 
साहाय्य इस सेवा-विभाग को सगीतात्मक विस्तार दे रहा था। इस सस्थात 
में सूरदास के व्यक्तित्व को प्रमुख स्थान प्राप्त था। इस सस्थान मे दो सागर 
थे--सूर, और परमानन्द दास | इनमे 'सूरसागर” की सीमाएँ क्षितिजों से 
होड लगाती रही । रस और भावना की अदुमुत छाया-छंबियाँ अवतरित होकर 
सागर की तरंगो का चुम्बन करने लगी। यो तो सभी अष्टछापी कवियों मे 
परस्पर सौहादं था, तथापि सूर का सम्बन्ध नन्ददास से अधिक घनिष्ट 
था। 

'सूर' की ख्याति गायक के रूप में दूरूदूर तक हो गई। अकवर 
संगीत प्रेमी था | उसने तानसेन जेसे सगीतज्ञ को प्रश्नय दिया 
था । तानसेन, हरिदास, सूरदास जैसे भक्त गायकों से बड़ा प्रभावित था । 





१. अष्ट सखान की वार्ता पृ० १६ । 

वृन्दावन एक पलक जौ रहिये । 

'स्रदास! बेकुण्ठ मधुपुरी भाग्य बिना कहाँ ते पेय । 
३. सुरदास, परमानंददास, कुभनदास, और कृष्णदास । 
४. छीतस्वामी, चतुशु जदास, गोविदस्वामी, नन्‍्ददास । 


-सूर -का व्यक्तित्व - १ 


अकबर ने तानसेन से सूर का एक पद सुना। उसने सूर को आमंत्रित भी 
किया, पर सूर ब्रज से कहाँ जाने वाले थे । मथुरा. में अकवर ने स्वयं आकर 
सूर से मेंट की । आईने-अकवरी में मी एक सूरदास से अक़वर की मेंठ का 
उल्लेख है। क्रिन्तु ये सूरदास हमारे सूर्रा नहीं थे । अक्रवर के विशेष आग्रह 

पर सूर ने पद गाया : मना रे कर माधो सों प्रीत ।. अकबर सूर की वाणी में 
विमोर हो गया । कहा जाता है कि प्रसन्‍त होकर अकबर उन्हें एक मवसव 
देना चाहता था, पर सूर ने स्वीकृत नहीं किया ।* वार्ताओं में एक उल्लेख 
है: अक्रवर ने सूर से कहा --कछु तो मो को आजा करिये । इस पर सूरदास 
जी का उन्मृक्त व्यक्तित्व उठा, जो सांसारिक वैभव को 'छीलर' बनाकर छोड़ 
चुका था। सूर ने निर्मेय होकर कहा : “जों आज पीछे हमको कबहूं फेरि मति 
वुलाइयो और मो सों कत्रहूँ मिलियो मत । सूर के व्यक्तित्व की महानता से 
यह प्रसंग भरा हुआ है। अकबर ने जब सूर से अपने यश गायन के लिए 
प्राथना की तव सूर ने यह पद ग्राया-- 


नाहिन रह्मो मन में ठौर। 

नंदनंदन अछुत कंसे आनिए उर और ॥ 

स्याम गात सरोज आनन, ललित अति मृद्दु हास । 

सूर ऐसे रूप कारन, मरत लोचन प्यास ॥ 

सूर के व्यक्तित्व की अनन्यता इस पद से प्रकट है। भक्वर इस रहस्य 

को समझ गया | पर इस पद की अन्तिम पक्ति को लक्ष करके सूर के विस्मृत 
अन्धत्व पर अकवर ने व्यंग्य किया; सूरदास जी तुम्हारे नेत्र कहाँ हैं कि रूप 
की प्यास उन्हें लग सके ? नकवर के इस प्रश्न पर 'सूर' मृक् ही रहे। अकवर 
क्या जानता था कि सूर अन्धत्व से मुक्त हो चुके हैं ? उसे क्या पता था कि 
अंबवा सूर बब नहीं रहा ? उसका पुनर्जन्म हो चुका है। पर सूर ने यह सब 
वतलाना आवश्यक ही समझा । इस प्रकार लौकिक वँप्तव और सम्मान की 


हौीा++“+..क्‍७७-+जचछ"-७+..० ०५७... 


ऊची लहरें सूर के अटल व्यक्तित्व से टकरा कर लौद गईं । 


हर, 


सूरदास का व्यक्तित्व संपूर्णत: भक्ति-नावना के लिये समण्ति था। 

समस्त दिन सख्य भावाकुल लीला-मावनाओं में व्यतीत होता था। अष्टछाप 

१. कुछ विद्वानों के अनुसार यह भेंद इलाहाबाद में हुई, पर यह मत प्रामा- 
णिक नहीं हैं । 


२. वार्ताओं में यह सूचना नहीं हैं कि सूरदास जो ने अकवर का कोई दान 
स्वीकार किया । के 





भर सुर साहित्य : नव मुल्यांकन 


के कवियों की अष्टसखाओं के रूप में सांप्रदायिक कल्पना की गईं । सूरदास 
जी कृष्ण सखा' के रूप में मावित थे ।* कृष्ण सखा के रूप में सूर दिन भर 
सख्य भावाशित समाधि में लीन रहते थे । अष्ट सखाओं की सख्य भावना 
इतनी घनी और अनन्य हो जाती थी कि उन्हें अपने बीच श्रीनाथ जी को 
उपस्थिति की भावना यथार्थ रूप में होने लगती थी । 


शेष समय में सूर 'सखीभावापन्न' रहते थे । सूर का सखी भावाश्रित 
नाम चम्पक लता था ।+ भावना को सजीव और यथार्थ रूप देने के लिए 
भावना का विस्तार किया : रंग, रूप, वस्त्र आदि की भावना भी को 
गई । सखा और सखी भाव से आकुल अहनिश लीलागत समाधि का विवरण 
हरिराय जी ने भाव प्रकाश में इस प्रकार दिया है-- 


“तहाँ कहत हैं जो श्री भागवत में कहे है जो--अब श्री ठाकुर जी 
आप बन में गोचारत लीलान में सखान के संग पधारत हैं सो सगरी गोपीजन 
लीला को अनुभव करत हैं । सो घर में सगरी बन की लीला गान करत हैं । 
ता पाछें जब श्री ठाकुरजी संध्या समय बन ते घर क्‌ आवत है, सो तब 
रात्रि कों गोपीजन सों निकुज में लीला करत है। सो तब अंतरंगी 
सखान को विरह होत है | तब वे निकुज लीला कौ ग्रान करत है, अनुभव 
करत हैं । सो काहे तें ? क ज में सखीजन है सो तिन के दोय स्वरूप है, सो 
कहत है | पुभाव के सखा और स्त्री भाव की सखी | सो दिन में सखा द्वारा 
अनुभव तथा रात्रि में सखि द्वारा अनुभव है ।” 





१. 'सो ये सूरदास जी लोला में श्री ठाकुर जी के अष्ट सखा हैं सो तिनमें 
ये कृष्ण सखा को प्राकट्य है ।” [ हरिराय क्ृत 'भाव प्रकाश' | 


२. अन्य कवियों की सखी और सखा भावना नीचे की तालिका से स्पष्ट हैं- 


१. सर कृष्ण सखा चम्पकलता 
२. परमानंददास लोक सखा चन्द्रमाला 
३. कुभनदास अजु न सखा विशाखा 
४. कृष्णदास ऋषभ ललिता 
५. छीतस्वामी सुबल पद्सा 

६. गोविन्दस्वामी श्रीदामा जाम 

७. चतुभुजदास विज्ञाल विमला 

८. नन्ददास जी भोज 


चन्द्ररेखा 


सूर का व्यक्तित्व ५३ 


इसी प्रकार की भाव समाधियाँ अन्य संप्रदायों में भी प्रचलित थीं ॥7 
श्री वल्लमाचार्य में मी कृष्ण या ठाकुर जी एवं स्वामिनी जी दोनों भावों का 
समन्वय था। इस हृष्टि से सर जंसा अहनिश भाव-समपित कवि समस्त 
हिन्दी साहित्य में नहीं, संसार मर के साहित्य में नहीं मिले सकता । सूर 
की एक-एक अनुभूति और कल्पना इसोलिए अनोयास रसभीनी है कि इनका 
जन्म समाधि के गहरे स्तरों से प्रसूत हैं। इस 'भाव-समाधि में गहरे, और 
गहरे उतरने में सूर का अन्चत्व भी सहायक्र रहा। अन्धत्व-जन्य हीनता 
तिरोहित हो चुकी थी : इसका वरदान प्रकट होने लगा । सूर में भावात्मक 
एकाग्रता और अनन्यता प्रकट हो गई । 


रसिक जनों के सौभाग्य से सूर को दीर्घायु प्राप्त हुई ।* पर अन्तिम 
क्षण आ ही पहुचा--रससागर नित्य निकुज लीला में लीन होना चाहता है । 
सूर को अज्ञात्त देश से आह्वान मिला । सूर के मन में एक ही पीड़ा शेष थी--- 
काव्य-रचना का संकल्प पूरा नहीं हो सका : सवा लाख पद नहीं बनाए जा 
सके । केवल एक लाख पदों की ही रचना हो सकी । इस पीड़ा को देख कर 
स्वयं श्री गोवद्ध ननाथ जी प्रकट हुए और जेषांश को पूर्ण कर दिया । इस 
अलौकिक घटना पर आज का वंज्ञानिक मस्तिष्क विचार नहीं कर सकता । 
प्राप्त काब्य-परिसाण से भी इस प्रसंग की पुष्टि नहीं होती पर आश्चर्य नहीं 
कि सूर के गाये हुए समी पदों का संग्रह नहीं हो सका हो। उस दिन सूर' 
श्रीनाथ जी की मंगला आरती के पश्चात्‌ परासौली लौट गये । अपनी कुटी के 
पास पहुँच कर वे एक चबूतरे पर लेट गये | वहां से श्रीनाथ जी की ध्वजा 
का दर्शन हो सकता था। उन्होंने ध्वज को प्रणाम किया । अपनी समस्त 
वृत्तियों को श्रीनाथजी में केन्द्रित करके सूर' अन्तर में ही लीन हो गए । राज- 
मोम आरती के उपरान्त श्रीगो० विट्ठलनाथ जी, रामदास, कु भनदास, 
गोविन्द स्वामी, चतुमु जदास आदि मिलकर सूर के समीप आये । उस समय 
कुछ मामिक वार्तालाप चला । इस वार्तालाप से सूर' के व्यक्तित्व के मुलाधार 
स्पष्ट होते हैं । 


१. चंतन्य सम्प्रदाय की इसी प्रकार की भावना के लिए हृष्ठव्य मेरा लेख 
चतन्यमत में सखी और मंजरी'--ब्रजभारती । 

२. सूर का उपस्थिति-काल सं० १५३५ से संवत्‌ १६४० तक माना 
जाता है । 


श्ड सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


गोसाईं जी ने आदेश दिया : (ुष्टिमा्ग कौ जहाज जात है, जाको 
कछु लेनो होय तो लेउ और जो भगवदिच्छा तें राजमोग पीछे रहत हैं तो मैं 
हूँ आवत हों ।' पीछे गोसाई जी भी भा गये । चतुभू जदास ने जब सूरदास 
जी से पूछा कि उन्होंने इतने पद बनाये, पर श्री वललभाचार्य जी की प्रशस्ति 
में कोई पद नहीं लिखा ) इसका क्‍या कारण है ? तब सूरदास जी ने कहा कि 
मेरी दृष्टि में महाप्रभू जी और भगवान में कोई अन्तर नहीं है । मैंने जितने पद 
भगवान के लिखे हैं, वे सब महाप्रभु के लिए भी नवोदित समझने चाहिये । 
फिर आचार्य जी की प्रशस्ति में एक पद गाया : 


भरोसों हृढ़ इन चरनन केरो 

श्री वललभ नख-चन्द्र-छटा बिनु, सब जग माँझ अंधेरो । 
साधन और नहीं या कलि में जासों होत निबेरों । 
'सूर' कहा कहे द्विविध आँधरी, बिना मोल को चेरो ॥॥ 


इससे सूर की गुरु-निष्ठा प्रकट होती है । सूर के लिये वलल्‍्लभाचाये जी 
एक प्रकाश स्तंभ थे जिससे 'द्विविध आँधरौ” व्यक्तित्व, हीनता-प्रस्त चेतना 
सागर” बन सका। इस पद को गाते-गाते सूर विह्नल हो गये : गला रुध 
गया । 'सूर' भावात्मक मूर्च्छा की स्थिति में हो गये और उनका चित्त “श्री 
ठाकुर जी को श्रीमुख तामें करुणा रस के भरे नेत्र देखे |” 'सूर' की यह स्थिति 
देखकर गोसाईजी के नेत्र भी वाष्पाकुल हो उठे । उन्होंने पूछा : तुम्हारे नेत्र 
की वृत्ति इस समय कहाँ है ? अंधे सूर से इनकी नेत्र-वृत्ति की स्थिति पृछी 
गई । 'सूर ने वृन्दावनेश्वरी श्री राधा में अपनी चित्तवृत्ति बतलाने के लिए 
एक पद गाया : “बलि बलि हों कुमर राधिका नंदसुबवन जासों रति मानी ।” 
सूर के व्यक्तित्व का यह दूसरा आधार स्तंभ था। सं तन्दय, माधुय र संबम्धी 
समस्त आवनाओं की अधिष्ठात्री देवी उनके लिए राधा ही थी। पर उक्त पद 
से सूर की चित्त-वृत्ति ही प्रकट हुई, नेत्र-वृत्ति नहीं। इसके स्पष्टीकरण के 
लिए 'सूर' ने एक और पद गाया : 


खंजन नेच रूप-रस माते । 
अतिसे चारु चपल अतियारे, पल पिजरा न समाते। 


चलि चलि जात निकट स्रवनन के, उलटि-उलटि ताटंक फँदाते । 
सूरदास' अंजन गरुन अठके, नतरु अर्त्रह जड्डि जाते ॥ 


ओर यह संगीत लहरी सदा के लिए सो गई । 


सुर कां व्यक्तित्व हे 


अन्तिम क्षण में सूर के व्यक्तित्व का यह रूप प्रकट हुआ : एक सच्चे 
के प्रसार का अपने चारों ओर अनुभव : चित्तवृत्ति का राधा में केन्द्रीकरण : 
और नेत्रों में राधा के रूप-रस का चित्र। संक्षेप में यंही सूर के आन्तरिक 
व्यक्तित्व की झाँकी है । 


हो सकता है सूर के जीवन का तथ्याकलन वैज्ञानिक की अपेक्षा 
भावात्मक अधिक हो, पर आन्तरिक सत्य स्पष्टतः इनसे ध्वनित है। सूर का 
व्यक्तित्व शत प्रतिशत भावमय था । उनके व्यक्तित्व के आसपास' जो अलौकिक 
तंत्र उपस्थित हो गया है, वह भाव-जनित ही है। 'सूर' काव्य का आलोचक 
सूर के अति भावात्मक व्यक्तित्व में भविश्वास नहीं कर सकता है। सामान्य 
व्यक्ति के लिए जो भाव स्थितियाँ आरोपित लगती हैं, वे स्थितियाँ विश्वास 
और अनन्य भावना के परिवेश में 'सूर के लिए यथार्थ थीं। अन्धत्व-जन्य 
हीनता की पीड़ा से दमित व्यक्तित्व अन्ततः उत्कर्ष की चरम कोटि का स्पे 
कर सक्रा । सूर के व्यक्तित्व के विकास का अनुक्रम कितना मामिक है। 


सूर का व्यक्तित्व सतत संघर्ष का परिणाम है। संघर्ष ने उसे गत्या- 
त्मक बनाया | गति--सीमा से असीम की ओर । संघ ---आबद्धता से उन्मुक्त 
होने के लिए । प्रथम बद्धता ऐन्द्रिय क्षति ओर पारिवारिक हीनता के कारण 
वनी । बाहय जीवन भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के अभाव से ग्रस्त था : 
अन्तमंन क्षतिपूर्ति की साधना को न जाने कितनीं ऊँचाइयों तक ले जाना 
चाहता था। स्वामी” बने : भौतिक अभावों से मुक्ति मिली : लौकिक सम्मान 
ने क्षत-विक्षत अस्तित्व को सहलाया। “अस्तित्व के प्रति आस्था जमी। 
अस्तित्व से व्यक्तित्व की ओर विकास करने के लिए एक दुर्दमम पीड़ा सिर 
उठाने लगी | इसने कलात्मक शक्तियों को उकसाया : नादात्मक या श्रव्य 
कला की मैत्री से, चुटन के क्षण तिलमिलाने लगे। संगीत कला का अजेन 
हुआ । यह आंशिक मुक्ति तो थी क्योंकि व्यक्तित्व के उन्‍नयन के लिए नादा- 
त्मक माध्यम प्राप्त हो गया था, फिर भी कुठा गेय विषय को आबद्ध किए 
रही । विनय और दैन्य व्यक्तित्व से उतर कर काव्य-परिवेश में तो आ गये 
थे, उनका उन्नयन भी होने लगा था, पर बाणी पूर्णतः: मुक्त नहीं हो सकी । 
विनय के पदों में संग्रथित उपालंभ, व्याज, व्यंग्य, वक़ोक्ति से युक्त उक्तियाँ 
उन्‍तयन की दूसरी ही दिशा की सूचना देने लगीं थीं। इन क्षणों में स्वामी 
, जीवन एक बोझिल .बद्धता के रूप में अनुभव किया जाने लगा । उच्चतर 


५६ सुरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


वेराग्य भावना का उदय हुआ । यह वैराग्य भावना राग के उच्चतर स्तरों 
की प्राप्ति के लिये थी। भागने की वृत्ति नहीं, एक दृढ़ आधार की खोज थी । 
उनकी चेतना व्यापक संबंधों की खोज में थी। एृष्ट की महत्त्व-स्वीकृति की 
स्थिति वरावरी की या अति मधुर स्थिति में संक्रमित होने को मचल 
रही थी । 


वललभाचार्य जी ने अस्तित्व को व्यक्तित्व की ओर ले जाने में सहयोग 
दिया । व्यक्तित्व की वद्धता को उन्होंने पहचाना--- घिघियाते क्‍यों हो ” और 
सूर की भावना के तिस्तार के लिए उदात्त लीला-संदर्भ प्रदान किया--भिग- 
वल्लीलां बरनन कर ! विस्मृत शक्तियों को उत्त जित किया--सुर है के 
तुम्हारी यह स्थिति ? यहाँ 'सूर' का अर्थ है साहसी, शूर । और जंसे सूर का 
अस्तित्व व्यक्तित्व के रूप में अवतरित होने लगा । पर, एक आरोपण भी 
होने लगा । ददीक्षा' और 'समयंण” की विधि ने उनके नवोदित व्यक्तित्व को 
एक सांप्रदायिक बद्धता प्रदान की । किन्तु वह संदर्भ इतना उदार और उदात्त 
था, कि वद्धता संबंध बन गईं । फिर भी सूर का नवोदित व्यक्तित्व कुछ क्षणों 
में इस रागात्मक बद्धता से भी मुक्त रह कर विशुद्ध रूप में मुक्त रहना चाहता 
था । इन स्वच्छ॒न्दता के क्षणों ने स्वयं संप्रदाय में एक उलझन उत्पन्त कर दी 
थी । अन्तिम क्षणों में जो सम्वाद चला उससे सूर' के प्रति एक संदिग्ध दृष्टि 
की सूचना मिलती है । क्‍यों इन्होंने महाप्रमु आचाय जी का यश-गान नहीं 
किया ? देखें, इनकी चित्तवृत्ति कहाँ है ? साथ ही वल्लभाचार्य जी और 
पृष्टिमार्ग में समपित उनका व्यक्तित्व इतना तेजस्वी था, कि संदेह कभी प्रकट 
नहीं किया जा सका--'पृष्टि मार्गे का जहाज नामकरण कितना सटीक था । 
फिर भी सूर के व्यक्तित्व और ऋृतित्व में कुछ ऐसा मिल ही जाता है, जो 
सांप्रदायिक वृत्त से बाहर का था । 


वललभाचाय जी सूर के व्यक्तित्व को स्वच्छन्दता को पहचानते थे । 
यह स्वच्छन्दता चाहे संप्रदाय की वाह य आचार-प्रणाली की तुलना में स्पष्ट 
दिखलाई पड़ती हो, पर संत्रदाय की चरम आध्यात्मिक परिणति से यह 
स्वच्छन्दता कोई विरोध नहीं रखती थी। इस दृष्टि से आचार्या जी ने उन्हें 
'सागर' नाम से विभूषित किया । (पृष्टिमार्ग के जहाज' को जो 'सागर' चाहिए 
था, वह आचाय जी को 'सूर के व्यक्तित्व में मिला। पुष्ठिमार्गीय सेवाचार 
सूर के व्यवितिस्व॒ के - चरम भमावोन्नयन पर हीतैरता रहा। सागर! सूर के 
व्यक्वितत्व की अतुल गहराइयों और अकल विस्तृति का प्रतीक है । वल्‍लमाचार्य 


सुर का व्यक्तित्व प्७ 


जी संप्रदाय की माव विस्तृति को महत्त्व और मुल्य देते थे | पीछे सांप्रदायिक 
आचार प्रमुख होता गया । अतः सूर का व्यक्तित्व संप्रदाय के जहाज के रूप 
में तो उनके लिए हृश्य रहा : सागर की विवु-चुम्बी लहरों का साक्षात्कार 
परवर्ती कर्णघार पूर्ण रूप से नहीं कर पाग्रे । संग्रदाय' के जहाज के रूप में 
सूर का कृतित्व है, पर उनके सागरीय कृतित्व के अनुयात में बह क्रितना वौना 
है । सांप्रदायिक दायित्व की ओवचारिकता का निर्वाह सार रूप में सूर ने कर 
दिया--सूर सारावली | लीलारस का साग्ररीय विस्तार नवीन क्षितिजों का 
स्पर्श करता गया । आचार जी ने संप्रशाय-बोव के रूप में सर का जो बोद्धिक 
संस्कार किया था, उम्तका संस्पर्श तो सूर के साहित्य में किसी न किसी रूप में 
मिलता है, पर उनके द्वारा मावोन्‍्तयन का जो रागात्मक अनुष्ठान संपन्‍त हुआ 
था, उसकी छाया इतनी विस्तृत हो गई कि संमत्रतः जआाचाय जी मी चकित 
रह गये और सूर को सागर कह उठे । 


आचाये जी ने 'सूर' को शूरवीर के रूप में भी देखा । हरिराय जी ने 
भावप्रकाश में लिखा : “श्री आचायें जी आप तो 'सुर' कहते। जेसे--सूर 
होय सो रण में सो पाछो पाँव ताहि देय, जो सवपों आगे चले । तैसेंदई सूरदास 
जी की मक्ति दिन-दिन चढ़ती दिसा मई । तासों श्री आचाये जी आप सूर 
कहते ।” इस प्रकार मक्ति भाव के संग्राम में 'सूर' के व्यक्तित्व ने कमी पीछे 
पैर नहीं रखा | इस शूर के 'सूर का अनुमव तानसेन ने भी किया था-- 
“किधौं सूर कौ सर लग्यौ...।” इस व्यक्तित्व में उन्नत कतित्व की संमावनाएँ 
निहित हैं । 


तीन ._, 
पस्स्वह््व्यान्ल्य + सआअम्प्लच्यय्म्त्र 


[] हरि में तुम सों कहा दुराऊ । 
जानत को प'ुष्टिपय” मोसों, काह काह जस प्रगटाऊ १ 
सारग रीति उदर के काजजं, सीख सकल भरमाऊ । 
अति आचार, चारु सेवा करि, नींकरे करि करि पंच रिझ्ञाऊ । 


[] भाव, भक्ति, सेवा सुपिरन करि पुष्टि पंथ' में घाव ॥ 


सिद्धान्त सम्प्रदाय 


प्रास्ताविक-- 


सूर का लघु व्यक्तित्व जहाँ अपनी निजी शक्तियों से उदात्तीकरण की 
छोटी-मोटी भूमियाँ खोज रहा था, वहाँ एक महान्‌ सांस्कृतिक आन्दोलन से 
संबद्ध होने का सुयोग भी उसे प्राप्त हुआ | सूर का सीमित साधनों वाला 
व्यक्तित्व चाहे एक बोद्धिक उत्क्रान्ति का साथ न दे पता, पर सक्ति आन्दोलन 
की मावात्मक भूमिका के साथ वह पूर्ण तादात्म्य कर सका । पहले ही वह 
भावात्मक गहराइयों में उतरने लगा था ४ भब एक भव्ति-संप्रदाय से संबद्ध 
होकर एक निश्चित संरचना में घटित होने लगा : उसे विस्तृति और ऊँचाई 
मिलने लगी । सूर का सम्बन्ध शुद्धाद् त दर्शन और पुष्टि-मार्गीय भक्ति-पद्धति 
से हुआ । इस दर्शन के प्रवर्तक, आचार्य वल्लमाचार्य जी ने स्वयं उन्हें 
दीक्षित किया । 


भक्ति आन्दोलन शंकर अद्ग तवाद के प्रति एक उत्कट भावमुलक प्रति- 
क्रिया थी । ज्ञानवाद के प्रचार से देश की उच्चतर मेधा संतुष्ट हो सकी । 
सामान्य जन नीषिता को इस ऊँचाई तक पहुँचने में असमर्थ था । उसे जो 
भावात्मक संबल बौद्धधर्म जैसे लोकोन्मुख विधान से प्राप्त था, वह क्रमशः 
छूट रहा था : वीद्धवर्म की अपनी निजी दुबंलताएं सतह पर आ चुकी थीं । 
अद्व तवाद के थपेड़े ने उसे भूमिसात कर दिया। जनमानस का संबल छूट 
गया । यह शुद्ध बुद्धिवादी अभियान एकपक्षीय रहा : जनता के लिए एक 
लोकघर्स को जन्म न दे सका | जनता एक घामिक विब्रटन की स्थिति का 


अनुमव करने लगी । मक्ति आन्दोलन ने इस स्थिति को समाप्त किया । यह 
आन्दोलन देश में ओर-छोर व्यापी हो गया । 


सिद्धान्त संप्रदाय ६१ 


इस सांस्कृतिक आन्दोलन का एक व्यवस्थित स्वरूप दक्षिण के आचार्यों 
द्वारा घटित हुआ । इसकी दक्षिणात्य संरचना में बौद्धिक या दशन पक्ष भी 
रहा और भावात्मक पक्ष भी । दाशंनिक पक्ष में शंकर मुख्यतः: प्रस्थानन्रयी--- 
उपनिषद्‌, ब्रह्मसूत्र और गीता--को स्वीकृत कर चुके थे । इस त्रयी का एक 
विज्येष भाष्य प्रस्तुत करके शंकर ने एक विस्मृत दाशनिक परम्परा को नवीन 
संस्कार और जीवन प्रदान किया । भमवित के आचार्यों ने शांकर-सिद्धान्त का 
खंडन इसी बौद्धिक पीठिका पर, इसी भाष्य-पद्धति सें किया । भक्ति के प्रायः 
समी भकत्याचार्यों ने प्रस्थानत्रयी पर भाष्य लिखा। श्री रामानुजाचाये जी ने 
तीनों पर विधिवत भाष्य लिखकर विशिष्टाद्व त दर्शव की प्रवत्तित किया । इस 
संप्रदाय के सिद्धान्त श्री भाष्य. पर ही आधारित हैं । मध्वाचायं जी ने भी 
प्रस्थानत्रयी पर भाष्य प्रस्तुत करके द त-दशन का सूत्रपात किया। श्रीनिम्बा- 
कांचाये जी ने केवल ब्रह्मसूत्र पर एक स्वल्पकाय भाष्य 'पारिजात सौरभ 
लिखा । गीता वाक्यार्थ एक संदिग्ध रचना है। पर “विष्णुस्वामी' के नाम 
से कोई भाष्य नहीं मिलता : इनकी एक 'सर्वज्ञ सूक्त”' नामक रचना को ही 
प्रमाण माना जाता है ।॥ अतः ऐसा प्रतीत होता है कि प्रस्थानत्रयी पर भाष्य 
लिखना अनिवाय॑ नहीं था। श्री वल्लभाचाय जी ने अवश्य ब्रह्मसृत्रों पर 
अणुमाष्य' लिखा और छुद्धाहं त दर्शन की स्थापना की । इस प्रकार मुख्यतः 
प्रस्थान-त्रयी पर अथवा ब्रह्मसूत्रों पर जो भाष्य प्रस्तुत किये गये उन्होंने भक्ति 
आन्दोलन की बौद्धिक और दाशेनिक परीठिका को सुहढ़ किया। आगे के 
विकसित कुछ संप्रदायों ने इस पीठिका को या तो आवश्यक नहीं सम्झा अथवा 
एक सामान्य दाशेनिक पीठिका को स्वीकार कर लिया | श्री चेतन्य ने प्रस्थान 
त्रयी पर कोई भाष्य नहीं लिखा । उतके एक अनुयायी श्री विद्याभूषण ने 
गोविन्दभाष्य” की रचना करके श्ञास्त्रीय पद्धति से अचिन्त्यभेदाभेद सिद्धान्त 
की प्रतिष्ठित किया । राधावललभ संप्रदाय, रामानन्द जी के रामावत संप्रदाय, 
हरिदासी संप्रदाय जेसे संगठनों में आचार्य के शब्द को ही प्रमाण माना गया : 
कोई भाष्य नहीं हुआ । इन संप्रदायों ने आन्दोलन के भाव पक्ष को ही पुष्ट 
किया : एक भक्ति पद्धति को स्वीकार और पालन किया । 


चाहे बौद्धिक पीठिका को लेकर चलने वाले आचाये हों, चाहे अन्य, 
सभी ने जन-मानस और जनवाणी के माध्यम से प्रस्तुत मावात्मक खोतों की 
खोज और इनके आधार पर भक्ति-व्यवस्था को आवश्यक माना | श्री संप्रदाय 
में प्रबन्धम की भावाकुल अभिव्यक्तियों को भक्ति प्रेम के आधार के रूप में 


ध्र्‌ सरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


स्वीकृत किया गया । श्री चैतन्य ने सहजिया वेष्णव तंत्रों, या काव्य में प्रस्तुत 
भाव-भूमि को संप्रदाय में स्थान दिया । कुछ संप्रदायों में लोकमाषान्तर्गेत 
भाषात्मक साहित्य का योजना-बद्ध सृजन हुआ और संप्रदाय की भाव-भूमि 
संपन्‍न हुई । वल्लभाचाय॑ जी ने प्रस्थान-त्रयी के साथ भागवत जोड़ कर 
प्रस्थान-चतुष्टय स्वीकार किया। इस प्रस्थान-विस्तार के पीछे भागवतोक्त 
भाव-सरणियों की खोज निहित थी । आचाये जी ने 'सुबेधिनी टीका लिखकर 
भागवत का भावान्वेषण किया । तत्त्वदीप, निबंध और षोडश ग्रन्थों की रचना 
करके माव-दशन और भाव साधना के तत्त्वों को सुहढ़ किया । पर जिस प्रकार 
श्री रामानुजाचार्य जी को 'तमिल-प्रबन्धम! और श्री चेतन्‍्य को सहजिया- 
वेष्णव साहित्य, या अन्य काव्य रूप प्राप्त थे, जो इन संप्रदायों को लोक मानस 
से जोड़ सके या दर्शन की लोक मानसोनुकूल परिणति कर सके, उस प्रकार के 
साहित्य-रूप के अमाव का अनुभव वल्लभाचार्य जी कर रहे थे। इस कारये- 
सम्पादन के लिए छुद्धाद्व त दर्शव और पुष्टिमार्यीय भक्ति को लोकभाषा-काव्य 
का माध्यम प्रदान करने के लिए आचायें जी को जिस प्रकार के स्वच्छ प्रतिभा 
और ज॑से समर्पित व्यक्तित्व की खोज थी, वे उन्हें 'स्रदास' में मिले । पुष्टिमार्ग 
की भावात्मक निर्मित और ब्रजभाषा के माध्यम के परिष्कार में सूर का 
योगदान महत्त्वपूर्ण है। सांप्रदायिक मावभू मे को साहित्यिक 'सागर' में उन्होंने 
परिणत किया । संप्रदाय का कण-कण सूर की वाणी से झंकृत हो उठा। 
पीछे सांप्रदायिक साहित्य की योजना ने “अष्टछाप' का रूप ग्रहण किया । 
शुद्धाहइ त दर्शन से भी सूर की वाणी प्रभावित है और पुष्टिमार्गीय भक्ति, सेवा 
ओर साधना से मी। आगे श्री वललमाचार्य जी, 'शुद्धाह्वत दशंत और पुष्टि- 
मार्गीय भावासक्ति का संक्षिप्त विश्लेषण 'सूर' के सदर्भ में प्रस्तुत है । 


१. वलल्‍लभाचार्य जी 


१.१ सामान्य-परिचय --भारत के बड़े दार्शनिकों में इनका स्थान 
है । एक ओर वेदान्त के शुद्धाह्व त संप्रदाय की उन्होंने प्रतिष्ठा की और दूसरी 
ओोर पुष्टिमार्गीय भक्ति का प्रवरतंन किया । सन्‌ १६३४ में, रायचूर के समीप 
चम्पारन में इस आचार्य का उदय हुआ । इनके पिता लक्ष्मण भट्ट एक तेलुगु 
ब्राह्मण थे। ये सम्मवतः कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के अनुयायी थे । 

वल्लभाचारय जी की स्थिति दर्शन के क्षेत्र में बड़ी विशिष्ट होगई। एक 
जोर उन्होंने शांकर मायावाद से निरपेक्ष 'शुद्ध अद्वैत' को ग्रहण किया । इसी 
कारण से मध्वाचार्य जी के अद्व त-विरोधी तक॑ स्वमेव निरस्त हो गये । 


द्ड सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


भूमिका में भी ये ही व्यापक उद्देश्य थे । अपने आपको ही जैसे उन्होंने चौरासी 
रूपों में विभक्त किया । विविध रूपों में इन वंण्णवों ने आचार्य जी के महत्कायें 
सम्पादन में योगदान दिया । हरिराय जी ने अपनी झोली में यह निरूपण 
किया है : चौरासी वैष्णव को कारण यह है जो देवी जीव चौरासी लक्ष योनि 
में परे हैं । तिनमें ते निकासवे के अर्थ चौरासी वैष्णव कीए ॥..-ओऔर रस 
शास्त्र में रसादिक विहार के आसन चौरासी वैष्णव किए हैं, सो वर्गन किए 
हैं ।....गास्त्र रीति सों बआासन चौरासी या भाव सों बलौकिक हैं ..-और 
साक्षात पूर्ण पुरुषोत्तम की लीला चौरासी कोस ब्रज में है....। इस प्रकार 
चौरासी वेष्णव आचार्य जी के ही अंगभूत हैं। दाशंनिक सिद्धान्त की पुर्ने- 
स्थापना, लीलासक्तिमय भक्ति-पथ का का प्रवर्तन चीलास्थलियों की खोज, तथा 
जीवोद्धार के सम्मस्तित उद्देश्य की सफलता के लिए इन चौरासी वेष्णवों का 
प्राकट्य किया गया । इस विश्लेषण से यह प्रतीत होता है कि वललमाचाय 
जी की प्रकृति समन्वववादिनी थी । उनका दर्शन भी सारसंग्रही प्रतीत 
होता है । । 

सांप्रदायिक साहित्य (संप्रदाय प्रदीप) में वल्लमाचाय जी की आध्या- 
त्मिक पृष्ठभूमि पर विचार किया गया है । इसके विश्लेषण में पहले शंकराचाय 
जी की स्थिति को स्पष्ट क्रिया है। समी अधिकारी-अधिनकारी जीव भगवत्तत्वन्न 
होकर मक्त्ति में सम्मिलित होने लगे । मगवान न देवी और आसुरी सृष्ठि में 
भेद करने के लिए एक योजना की । भगवान ने शंकर से कहा: ऐसे श्ञास्त्रों 
का प्रणययन और प्रचार करो जिससे मेरे माहात्म्य का तिरोबान्‍्न हो औौर 
तुम्हारे माहात्म्य की वृद्धि हो । वे ऐसे ज्ास्त्र हों जो आपातत: सत्य और 
सारत: असत्य हों । शंकर ने गंक्राचाय जी के रूप में अवतरित होकर यही 
किया । गंकराचाय जी ने आसुर-सृष्टि को मोहने के लिए श्र॒ति के यथार्थ 
अर्थ को प्रच्छन्‍्त कर उपनिपद्‌, गीता एवं व्यास सूत्र (प्रस्थान च्रयी) पर भाष्य 
किया । इससे जगत में केवलाह्न त मत का प्रचार हुआ । इसी को 'मायावाद 





१. प्राचोन वार्ता रहस्थ, प्रथम भाग पृ० १५-१६ । 

२. शंकराचार्य जो के सम्बन्ध में यह्‌ कल्पना अन्यत्र भी मिलतों है। सांख्य 
प्रवचन भाष्य में पदुमपुराण के कुछ श्लोक्त उद्युत हैं। उनका भाव यह 
हैँ : शिवजी ने पार्वती से कहा कि मायावाद बड़ा असत ज्ञास्त्र है। कलि- 
युग में इसकी रचना मैंने हो ब्राह्मण रूप से को है । इनमें मेंने श्र्‌तियों का 
अन्त अर्य किया है। तभी कर्मो का इसमें परिश्रश दबतलाया गया है । 
इस प्रकार इसमें नेप्कम्यं सावना समपित है । 


सिद्धान्त सम्प्रदाय ६५ 


भी कहा जाता है। इसे भक्ति संप्रदायों में आसुर मत भी कहा जाता है । 
इस विधि से देवी और आसुरी सृष्टि का पृथककरण हो गया। देवी सृष्टि के 
कल्याण के लिए चार भवित सम्प्रदायों का जन्म हुआ--रामानुजाचार्य : 
श्री सम्प्रदाय; श्री मध्वाचार्य : द्वत सम्प्रदाय; श्री निम्बार्काचार्य : दताद्वत 
सम्प्रदाय (अचित्य भेदाभेद) तथा विष्गुस्वामी : का संग्रदाय जिसका संशोधित 
रूप वललभाचायें जी ने सुस्थिर किया । 

वल्लमाचाये जी ने सबसे पहले मायावादियों का खंडन किया । विद्या- 
नगर में मायावादियों को उन्होंने शास्त्रार्थ में पराजित किया और शुद्धाहत 
की प्रतिष्ठा की । इस शास्त्रार्थ की अध्यक्षता माध्व संप्रदाय के यतिराज व्यास- 
तीर्थ कर रहे थे । व्यासतीर्थे श्री वललमाचार्थ जी की प्रतिमा और विद्वता से 
प्रभावित हुए और उन्हें माध्व सम्प्रदाय को सम्हालने के लिए आमंत्रित किया । 
वल्लभाचारय जी तत्क्षण कोई निर्णय न कर सके । उसी रात विष्णुस्वामी 
संप्रदाय के प्रमुख मनीषी विल्वमंगल ने स्वप्न में आचार्य जी को दर्शन देकर 
आदेश दिया : व्यासतीर्थ के शिष्य मत हो । विष्णु स्वामी सम्प्रदाय का आचार्य 
पद रिक्त है । उसे ही सम्हालो । मुझे भगवान ने ही ऐसा कहने की प्रेरणा 
दी है। भगवान के मुखस्वरूप अग्नि के तुम अवतार हो । अतः इस संप्रदाय 
का दायित्व तुम सम्हाल सकते हो । इसी स्वप्न में अन्य सम्प्रदायों नें इस विष्णु 
सम्प्रदाय का वेशिष्ट्य भी वतलाया गया । इनकी तुलना इस प्रकार की गई-- 


१. रामानुज संप्रदाय --- पादम कल्पीय--परदुमपुराणोक्त--आचाय ---उपास्य 


सृष्टि सिद्धान्त लक्ष्मी, लक्ष्मी- 
गरुड़ नारायण 
२. माध्व संत्रदाव -- श्वेतवाराह -- भारत रामा---आचार्य --उपास्य 
कल्पीग्र सृष्टि यणोक्त सिद्धांत वायु, हनुमान रामचंद्र 
भीमसेन आदि 
३. निम्बाक सम्प्रदाय --- सौर कल्पीय--सू्थ मंडलस्थ--आचाय --उपास्य 
सृष्टि हिरण्मय पुरुष हिरण्मय हिरण्मय 
प्रोकत सिद्धान्त 


४. विष्णस्वारों संप्रदाय-- सारस्वत--बेद, गीता, व्यास---आचाय --उपास्य 

कल्पीय सृष्टि. सुत्र-सिद्धात्त भगवन्मुख गोपी 

स्वरूप वल्‍लभ 

वेश्वानर भगवान 
क़ष्ण 


६६ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


इस तुलनात्मक दृष्टि के पश्चात्‌ विष्णु स्वामी सम्प्रदाय की भावात्मक 
संक्षिप्ति प्रस्तुत की गई । पहले इस संप्रदाय में आत्मनिवेदनात्मक भक्ति की 
स्थापना की गई थी । फिर भी वह मर्यादा मार्गीय है। वल्लभाचाय जी को 


इसमें आत्मनिवेदन द्वारा प्रेम स्वरूप निगुण भक्ति का प्रकाश करने का आदेश 
दिया गया । कह 


इस विवेचन से स्पष्ट होता है कि वललभाचाय जी ने पहले मायावाद 
का खंडन किया । पीछे विष्णु स्वामी संप्रदाय का भावात्मक नव-संस्कार प्रस्तुत 
किया । सबसे पहले इस संप्रदाय को उन्होंने मर्यादावाद के बन्धन से मुक्त 
किया । दूसरे इसके आत्मनिवेदत्‌ .को सुरक्षित करते हुए (पुष्टि तत्त्व का 
संप्रदाय में प्रवेश कराया । उपास्य--गोपी वललभ कृष्ण--की भावना के 
अनुसार इस संप्रदाय में गोपीभाव के प्रवेश की संभावना हुई। सिद्धान्त को 
हृष्टि से भागवत को जोड़कर प्रस्थान चतुष्टय की स्थापना की । आचाय रूप में 
गोपियों की प्रतिष्ठा की गई । उपरोक्त तीनों संप्रदाय मर्यादावादी हैं, केवल 
विष्णु स्वामी संप्रदाय को आचाये जी ने अमर्यादित किया । इस दृष्टि से इनका 
विचार अन्य राधावादी संञ्दायों के समकक्ष होगा । जिन संप्रदायों में राधा 
इष्ट ओर गोपी आचाय॑ हैं, उनका मर्यादा से सम्बन्ध नहीं हो सकता । साथ ही 
राधा-गोपी-भाव ब्रज में ही अनिवायंतः घटित हो सकते है, अन्यत्र नही, अतः 
ऐसे संप्रदाय ब्रजोन्मुख हो गये । वललभ भी अन्ततः ब्रज में ही अपने प्रमुख 
पीठ की स्थापना करने लगे । अन्ततः विष्णु स्वामी संप्रदाय की सगुण मकिति 
के स्थान पर निगुण (त्रैगुण्यातीत, अहेतुकी, निष्काम) भक्ति की स्थापना 
वल्लभाचाय जी ने की । विष्णुस्वामी संप्रदाय को पाँच सिद्धान्तों से विभूषित 
करके आचाय जी ने पुनप्रंतिष्ठित किया । ये सिद्धान्त हैं--गुरुसेवा, सुबोधिनी 


(मागवतार्थ), मगवत्स्वरूप निर्णय, भगवत्सेवा तथा निरपेक्षता-- (भावना मय 
निष्कामता) । 


१.३ वल्‍लभ और सुर--हमारे सूरदास जी का संबंध इस समन्वयशील 
संप्रदाय से हुआ | इसी समन्‍्वयशीलता के कारण संप्रदाय का व्यापक प्रचार 
मी हुआ 'सूर' ने संत्रदाय में दीक्षित होकर सभी तत्त्वों का आत्मसाक्षात्कार 
किया ओर सांध्रदायिक सिद्धान्तों को गलाकर भाव नुभूतियों के रूप में ढाला 
और एक ऐसे काव्य की सृष्टि की, जिसमें सांप्रदायिक रूढ़ियाँ गैर आचार- 
सरणियाँ भी भाव चकित हैं । काव्य और सिद्धान्तोक्तियाँ इस प्रकार घलमिल 
गये हैं कि उनका विभाजन संभव नहीं है । हु 


- सिद्धांत सम्प्रदाय ६७ 


यदि आचाय॑ जी के व्यक्तित्व पर सांतअदायिक दृष्टि से विचार किया 
जाय तो, संप्रदाय में उनकी सात रूपों में प्रतिष्ठा मिलती है । १. मुख्य पुरुषा- 
कार सुधा, २. आनन्दस्वरूप : भगवदर्भावरूप कृष्णस्वरूप, ३. परमानन्द 
स्वरूप : गूढ़ स्त्री-माव रूप स्वामिनती स्वरूप ४. क्ृष्णस्वहूप : धर्मी विप्र- 
योगात्मक स्वरूप, ५. वेश्वानरस्वरूप : तात्पात्मक, ६. वललभस्वरूप : लीला 
मध्यपाती दास्यरूप तथा आचाय॑े स्वरूप--सन्मनुष्याकृति, भक्तिमार्ग मारतेण्ड 
और वाक्पतिस्वरूप | इस प्रकार गुरु-आचायय रूप तो उनके वाह्मय कतृत्व से 
संबद्ध था और उनका आव्यात्मिक व्यक्तित्व उपास्य से एक्राकार हो जाता है । 
सूरदास जी का व्यक्तित्व प्रकटत: आचार्य रूप के संबन्ध में मोन है। पर 
आचार्य जी के आध्यात्मिक व्यक्तित्व के साथ उनके भावात्मक व्यक्तित्व का 
उच्चतर सामंजस्य स्थापित हो चुका था । अन्तिम क्षणों में सूर ने वल्लमाचायें 
जी के आध्यात्मिक व्यक्तित्व की स्वीकृति और मास्यता प्रकट की--मिरी 
दृष्टि में आचारय जी और श्रीक्षष्ण में कोई भेद नहीं। भाचाय जी के आधघ्या- 
त्मिकर व्यक्तित्व के विश्लेषण से उसमें दो विभाग मिलते हैं : कृष्णछप और 
गोपीरूप । पहला विभाग आनन्द स्वरूप है और दूसरा परमानन्द स्वरूप । 
'सूर! की भक्ति साधना भी आनन्दस्वरूप कृष्ण से आरम्म होकर परमानन्द 
स्वरूप गोपीमाव में विश्राम लेती है। भआाचाये जी के स्वामिती रूप का 
प्राकट्य ब्रज में हुआ । वार्ता साक्ष्य के अनु सार-- 


“तहां आधिदंबिक भक्ति तौ श्री स्वामिनी जी, सो सदा ब्नज में लीला 
करत हैं । सो भक्ति तो श्री गोकुल में प्रकट भई । ताही तें आचार्य जी, श्री 
स्वामिनी जी रूप को प्राकट्य ब्रज में अलीकिक रीति सों है ।” 


इस प्रकार वललभाचार्य जी के सांप्रदायिक व्यक्तित्व का विकास और 
निर्माण, बौद्धिक आधार पर दक्षिण में हुआ और काशी के शास्त्रार्थ से इस 
वीद्धिक व्यक्तित्व का चरम उपलब्ध हुआ | पर आचाय जी के भावात्मक 
व्यक्तित्व का उद्घाटन, विकास और चरम ब्रज में प्राप्त हुआ । सूरदास जी का 
संबंध यद्यपि आचाय जी के बौद्धिक व्यक्तित्व से यत्किचित था, पर उसका 
पूर्ण तादात्म्य आचाय जी के भावोत्मक व्यक्तित्व से था। यही तादात्म्य गोपी 
भाव का प्रतिष्ठापक है । इस पर आगे कुछ और विचार किया गया है। यहां 
केवल यही कहा जा सकता है कि आचार्य जी के आधिदेविक भावात्मक 
परिकर में सूरदास जी का स्थान प्रमुख हो गया । सम्मवतः सूर का प्रवेश 
आाचाय जी के नितांत एकांत साधना-क्षणों में भी था । सुर की भावात्मक 


द्ध स्रसाहित्य : नव मल्यांकन 


परिणति इतनी पूर्ण हो गई थी कि आचार्या जी के और सूर के व्यक्तित्व में 
अन्तर ही नहीं रहा । इसकी स्वीकृति आचार्य जी ने प्रकारान्तर से अनेक 
स्थानों पर की है । 


ऊपर के विवेचन में यह बात आई हैं कि वल्लाभाचाय जी के संप्रदाय 
का संबंध विष्णु स्वामी संप्रदाय से था । पर कुछ विद्वान्‌ इस मत को मानने 
के पक्ष में नहीं हैं। फकु हर ने बिष्णु स्वामी के दो मठों की चर्चा की है : एक 
कामबन में है और दूसरा काँकरौली में ।' ये दोनों स्थान आज वल्लम संप्रदाय 
की प्रमुख गदिदयों के लिए प्रसिद्ध हैं। कामबन ब्ज में हैं। पर यह नहीं कहा 
जा सकता कि यह वही कामबन है। पर है यह सांप्रदायिक तीथथे । विष्णु 
स्वामी के मत का प्रचार महाराष्ट्र में माना जाता है ।* पीछे यही मत 
'बारकरी' मत में परिणत हुआ ।* पर इस जनश्रृति का कोई ऐतिहासिक 
आधार नहीं प्रतीत होता । विष्णु स्वामी कृत प्रस्थानन्रयी पर कोई भाष्य नहीं 
मिलता । कहा जाता है कि वललमभाचाय जी इछन्हीं.की उच्छिन्न गददी पर 
विराजे । पर वललभाचार्य' जी के विचारों पर इस संप्रदाय का कोई प्रभाव 
परिलक्षित नहीं होता । आचार्य जी का मत नितांत नवीन है । ईश्वर, जीव 
एवं प्रकृति के संबंध में बिल्कुल नवीन विचार आचार्य जी ने रखे । विष्णुस्वामी 
के प्रत्यक्ष शिष्य तो आचार्य जी नहीं हो सकते : इन दोनों के समय में लगभग 
तीन सौ वर्ष का अन्तर है। ऐसा कहा जाता है कि उनके पिता लक्ष्मण मट्‌ट 
विष्णु स्वामी संप्रदाय के अनुयायी थे और अपनी बाल्यावस्था में आचाय जी 
भी इसके अनुयायी थे । पीछे स्वतन्त्र मत के वे प्रवर्तक बने )? विष्णु संप्रदाय 
के प्राप्त सिद्धान्तों गौर भक्ति पद्धति से वललम संप्रदाय का कीई साम्य नहीं 
है। 'माधुर्य भाव का प्रवेश विष्णुस्वामी संप्रदाय में उस समय नहीं हो सकता 
था । यह इस पुष्टिमार्ग की विशिष्ट देन है । 


१२. जिथवर्णानल', था 00 ॥एढट ए (एछढ शलाए0छ55 [,ललाथाए० ए 
पञा09, ?. 304. 


२. जनश्नूति के अनुसार श्री ज्ञानदेव, नामदेव केशव, त्रिलोचन, हीरालाल, 
ओर शभ्रीरास जंसे महाराण्ट्री संत विष्णुस्वामो मत के अनुयायी थे । 


३. डा० दीनदयालु गुप्त, अष्ठछाप और वललभ संप्रदाय, पु० ४२ । 


४. दुर्गशिंकर केवलराम शास्त्री, वेष्णव घर्मं नो संक्षिप्त इतिहास, पृ० २४०- 
२४२॥ 


सिद्धान्त सम्प्रदाय ६६९ 


२. बुद्धाह त दर्शन-- 

सूर का काव्य वस्तुतः पुष्टिमार्गीय मक्ति कौर भावात्मक सेवा-मावना 
से छलका पड़ रहा है। पर यूर के सांप्रदायिक साहित्य में शुद्धाद्वत दर्शन की 
छाया भी स्पष्ट दिखलाई पड़ती है | ब्रह्म, जगत, माया, जीव, संप्तार भा्दि 
के संबंध में जो सांप्रदायिक चिन्तन प्रचलित था, उससे भी सूर अनभिन्न नहीं 
हूँ । उन सिद्धान्तों का कथन करने वाली स्पप्ट उक्तियाँ मिल जाती हैं । उन पर 
आगे संक्षेप में विचार किया गया है । 


२-१ बैह्य- 

सबसे पहले तो थ॒द्धाद्वत दर्शन में मान्य ब्रह्म माया से नितान्त अलिप्त 
होने के कारण थुद्ध है ॥* ब्रह्म की घुद्धता सजातीय, विजातीय और स्वगत 
भेदों से रहित होने के कारण भी है ।* इस प्रकार ब्रह्म एक, अखंड, आदि- 
अनादि अर्द्वत है। सूर के सिद्धान्त कथन में इस शुद्धता की प्रतिध्वनि 
मिलती है--- 

क-पहले हों ही हाँ एक । 
'अमल, सकल, अज भेद विवलित' सुति विधि विमल विवेक | 
ख-ब्रह्म पुरन एक, द्वितीय न कोऊ । राधिका सर्व हरि सर्व एक । 

दोप तें दीप ज॑से उजारों । त॑से ही श्रह्मा घर घर बिहारी ॥। 

गुद्धाढ त दर्शन में ब्रह्म के तीन प्रकार हैं--(१) आधिदेविक + परब्रह्म 
(२) आवब्यात्मिक८"-अक्षर ब्रह्म । तथा आधिमौतिकः"जगत |* इस प्रकार 
जगत ब्रह्म का आधिमौतिक रूप है । इन तीनों के विपय में यहाँ विचार किया 
जा सकता है । 
२-११ परन्नह्य आधिदेविक-- 

वेद-बदान्त में जिस निगुण कां कथन किया गया है बही इस 
मत के अनुमार परब्रह्म है । इसका निमुणत्व प्राकृतिक धर्मों के अभाव के अर्थ 
में ही है । पर परब्रह्म में आनंदात्मक दिव्य गुणों का आश्रय है। इस बर्थ में 
वह सगुण भी है | परब्रह्म के तीन धर्म हैं : सत््‌, चित्र और आनंद[(--सच्चिदा- 
नंद) इसके लिए दूसरा घद्द सदानंद भी प्रयुक्त होता है। सदानंद का पर्याय 





१. डा० बल्देव उपाध्याय, पृु० ५१५ (भारतीय दर्शन) 


की । 


सजातीय विजातीय स्वगत हूं त्वाजतमु (निबन्ध ] 
वल्देव उपाध्याय, भारतीय दर्शन, प्ृ० ५१६॥ 


न्रैपं 


७० सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


'कृष्ण' हैँ ।* शुद्धाइत दर्शन के अनुम्तार परब्नह्म और कृष्ण एक ही हैं-- 
'परत्रह्म तु कृष्ण हि । प्रत्रह्य अपनी भआत्ममाया से सदा आदृत रहता है ।* 
इसीलिए उन्हें श्रीकृष्ण कहा जाता है। (श्री--आत्ममाया) । सूर ने ब्रह्म का 
निगु ण-सगुण होना लिखा है-- 
वेद उपनिषद जस कहे 'निगुण हि बतावें | 
सोई 'सभुण होइ नंद के दाँवरो बंघावे ॥ 
तुलसी ने इसी सिद्धान्त को 'अगुनहि समुर्नाह नहिं कछु भेदा' कह कर 
व्यक्त किया है । उन्होंने भी परत्रह्म और कृष्ण में भेद नहीं माना--- 
कृष्णमक्ति कर कृष््णाह पावे । " 
'कष्णहि तें यह जगत प्रगट हैं, 'हरि' में लय हल जावे । 
यह दृढ़ ज्ञान होय जासों ही, हरिलीला जग देखें। 
तो तिह सुख-दुख निकट न आवें, ब्रह्म रूप करि लेखे । 
परत्रह्म धर्मी है। 'धर्मी वह है जिसमें विरुद्ध धर्म एक साथ रह 
सके । इस दृष्टि से परब्रह्म अणु से अणु, महाव्‌ से महानूु, करस्थ और चल, 
अकत और कतृ आदि है। इसी प्रकार के अन्य विषमान्वयों से ब्रह्म को 
युक्त बतलाया जाता है | कृष्ण (--परत्रह्म) 'कतु म्‌ अकतु मू, अन्यथा कतु म्‌ 
सर्व-मवन-समर्थ' हैं ।* वे अविकृृत होते हुए भी कृपा द्वारा परिणाम बनते है । 
यही अविकृत परिणामवाद का रहस्य है । इसी 'परिणाम' का । 
२-१२ पुरुषोत्त म-- 


शुद्धाह त या ब्रह्मवाद दर्षव के अनुसार यह जग्रत समस्त देवों सहित 
पुरुषोत्तम से प्रकट होता है । संसार में ऐसे भी जीव हैं जो प्रुरुषोत्तम के स्वरूप 
से अनभिज्न है और इन्द्र, वरुण, सूप आदि देवों को ही सर्वशक्तिमान मानकर 
उनकी उपासना करते हैं । कुछ व्यक्ति ऐसे हैं, ब्रह्मा, विष्णु या महेण की 
पूजा करते है । पुष्टिमार्ग में उच्चतम तत्त्व पुएपोत्तम ही मान्य है। वेद और 
गीता के अनुमार यही तत्त्व ध्येय है ॥7 यही तत्व सर्वब्यापी, सर्वेनज्ञ और सर्वे- 





१. कृषिभ्‌ सत्तावाचकःशइ्च निवृ क्तिदवाचक: । 
तयोरंक्य परंत्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ।॥ 
२. माययादत ( पुरुषोत्तम सहस्ननाम ) 
विरुद्ध सर्वधर्माणामाश्नयो युक्‍त्यगोचर. । ( निबंध ) 
४. यस्मात्कषरमतीतो5हमक्षरादपि चोत्तम: । 
अतोषस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरपोत्तम. ॥ गीता १५॥१८ । 


2 





सिद्धान्त संप्रदाय ७१ 


दक्तिमान है। सामान्य देव तथा प्राकृतिक सभी विभाग त्रिगुण से प्रभावित हैं, 
पर इनके सभी प्रभावों से परे पुरुषोत्तम हैं । इसी दृष्टि से पुरुषोत्तम को निगुण 
कहा जाता है। 


वल्लभाचार्य जी के अनुसार निगुण का भर्थ गुण-रहित नहीं है । 
निगु ण--गुण रहित बर्थ उपनियदों में मिलता है। पुष्टिमार्गीय व्युत्पत्ति के 
अनुसार निगुण का तात्पय है वह तत्त्व जो त्रिग्रुण-प्रमाव से परे हैं । ये 
त्रिगुण माया अथवा प्रकृतिजन्य है। यदि गुण-रहित अर्थ किया जाय तो 
मूलतत्त्व की कुछ भी उपयोगिता विश्व के संदर्म में नहीं हो सकती । घामिक 
साहित्य में पुरुषोत्तम के जिन अलौकिक गुणों की चर्चा है, गुण-रहित अर्थ, 
करने पर, वे निरथेक हो जाते हैं। इसीलिए त्रिग्रुण-प्रभाव से निरपेक्ष सत्ता 
जंसा अर्थ ही निगुंण से लेना चाहिए। निम्नतर दिव्य तत्त्वों की उपासना 
में कछ भी पाप नहीं है : यह निरथेक भी नहीं है। जो इनका भजन करते हैं, 
वे इन्हीं को प्राप्त होते हैं : जो सर्वशक्तिमान की पूजा करते हैं, वे उन्हीं को 
प्राप्त होते हैं । निम्नतर देव विभूतियों की पूजा से जिन फलों की प्राप्ति होती 
है, वे सीमित और अस्थायी होते हैं | पुरुषोत्तम की पूजा से मिलने वाले फल 
शाश्वत और असीम होते हैं ।" सभी देव ब्रह्म के अ शभूत हैं। अतएव देवों को 
निवेदित सच्ची पूजा प्रकारान्तर से पुरुषोत्तम को ही निवेदित हो जाती हैं ।* 
चाहे यह सत्य हो पर पुष्टिमा्ग में भक्ति अन्तर्यामी, सर्वव्यापी आदि विशेषणों 
से विशेष्य पुरुषोत्तम को ही निवेदित को जाती है । 


निमुण परन्नह्म अपनी आंतर-शक्तियों के साथ आत्मारमण करता है। 
उइसीलिए वह आत्माराम है। स्वेच्छा से यही 'आत्माराम” आधिदेबिक रूप से 
वाह्यरमण में निरत होता है। आनन्दात्मक धर्मो से विभूषित परतब्रह्म का 
बाह्य प्रकट रूप ही पुरुषोत्तम है । यह श्र॒तियों द्वारा निरूपित परब्रह्म से 
भिन्‍न नहीं : उसका स्वेच्छा से रूपांतरण मात्र है। यह परन्नह्म का सगुण 
लीलारूप ही है : यह आनन्दमय और भग्रणितानंद है। इस पुरुषोत्तम का 
मनिरूपण 'सूर' ने इस प्रकार किया है-- 


अविगत आदि अनंत अनुपम अलख पुरूष अविनासों । 
पुरन ब्रह्म प्रकट पुरूषोत्तम नित निज लोक विलासी ॥ 
2५ ढ+ ५ 

१. गीता, ७२३ ह 

२. वही ६२३ 


७२ स्रसाहित्य : नव मूल्यांकन 


सोभा असित अपार अखंडित आप आत्मारास । 
पुरन ब्रह्म प्रकट पुरुषोत्तम, सब बिधि पुरन काम ॥। 


पुरुषोत्तम की बाह्य लीलाओं के लिए उसकी आंतरिक शक्तियाँ भी 
बहिभूत होती हैं । ये शक्तियाँ विविध रूप, नाम और गुण से उनमें विलसित 
होती हैं | श्रिया, पुष्टि, गिरा, कांत्या आदि द्वादश शक्तियाँ हैं। ये ही शक्तियाँ 
श्री स्वामित्ी, चंंद्रावली, राधा और यमुना आदि के रूप में पुरुषोत्तम की 
बहिलीलाओं में स्थित होती हैं । इनके सम्पर्क से उत्पन्न विविध भाव सखी- 
सहरी के अनेक रूपों को निष्पन्न करते हैं | वृन्दावन भी परब्रह्म की आन्तर 
लीलास्थली का ही लाला के लिए अवतरित रूप है। पुरुषोत्तम की लीलाए' 
भी नित्य हैं। ये लीलाए श्र तियों की प्रार्थना पर सारस्वत कल्प में ब्रजभूमि 


में अवतरित हुई । सूरदास ने पुरुषोत्तम की नित्य लीलाओं का तत्त्व अनेक 
प्रकार से बतलाया है-- 


जहाँ बृन्दाबन आदि अजर जहाँ कुज लता विस्तार । 
तहाँ बिहरत प्रिय-प्रितम दोऊ निगम भंग गुजार। 
2५ 2५ 2५ 
'सहस रूप बहु रूप रूप पुनि एक रूप पुनि दोय । 
कुमुद कली बिगसित अबुज मिलि सधुकर भागी सोय ॥। 
गोपियाँ श्र्‌ति की ऋचाए हैं ।' इसकी प्रा्थेना पर पुरुषीत्तम लीलाओंका 
प्राकट्य हुआ ।* वृन्दावन भी बहा के निज धाम का ही अवतरित रूप है ।* 
इस प्रकार पुरुषोत्तम ने श्रतिरूपा गोपियों के साथ लीला-विस्तार 
किया ।४ 


२१३ अक्षर ब्रह्म --(आध्यात्मिक रूप) 


यह परब्रह्म का आध्यात्मिक स्वरूप है। तत्त्वतः यह रूप परकब्रह्म- 
पुरपोत्तम से भिन्‍न नहीं है। यह भी सच्चिदानन्द स्वरूप है। इसे पुरुषोत्तम 


१. गोपी पद-रज-महिमा विधि सो कही । 
व्ज सु र्दार नह नारि, रिचा अति कीं आाहीं ।॥ 
२. श्र्‌तन कह्मों हवे गोपिका केलि करें तुब संग । 
३. बृन्दावन निज धाम कृपा करि तहाँ दिखरायी। 
४. सो श्र॒ति रूप होय ब्रज मंडल कीनों रास-बिहार । 
नदल कुज में अंस द्ाहु धरि फीन्हीं क्वेलि अपार ॥ 


सिद्धांत संप्रदाय न ७३ 


ऋक क किक 


चरणस्थान' मी कहा गया है- बोंकार ज्योतिस्वरूप होने से परब्रह्म का 
धाम रूप भी है । परत्रह्म के समान आदि, -सनातन, अनुपम,--अविगत होते 
हुए भी अक्षरत्रह्म में आनंद की न्यूनता मानी गई है । इसीलिए इसे गणितानंद 
मी कहा गया है | इसी च्यूनता के कारण यह अपने में से जीव-जगत आदि 
का निर्माण करता है। यह काल-कर्म-स्वमाव वाला और कक्षर है। प्रकृति, 
जीव और बनेक देवादि रूप से अक्षरब्रह्म सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता और संहार 
कर्ता है ।* प्रकृति, पुरुष, नारायण ब्रह्म की इसी स्थिति के अंशरूप हैं । 
ब्रह्मा, विष्णु, महेश मी इनसे भिन्‍न नहीं हैं : इसके सत्‌ से जगत्‌ का, चित्‌ से 
जीव का और बानंद से अन्तर्यामी का आविर्माव होता है। इसके अन्तर्यामीरूप 
का कथन 'सूर ने इस प्रकार किया है :-- 
१. हरि स्वरूप सब घट पुति जानो । 
ईख माँहि ज्यों रस है सानो ॥ 
५ र् 204 - ५ 
२. अपने आप करि प्रकट कियो है हरि “पुरुष अवतार ।” 
माया कियो क्षोभ वहु विधि कारि “काल पुरुष” के अंग । 
राजस-तामस-सात्चविक वहु करि 'प्रकृति-पुरुष' को संग । 
३. प्रभू तुम मर्म समुझि नहों परयो । 
जग सिरजत, पालत, संहारत पुरचि क्यो बहुरि करयो। 
इस प्रकार सूर की अनेक उक्तियाँ बक्षरत्रह्म का कथन करती हैं । 
२- २ जगत (आधिभौतिक रूप) -- 


२.२१ तत्त्व दर्शन--'जगत तत्त्व का निरूपण करने के लिए आचार्य 
जी ने अविकृत परिणामवाद' स्वीकार किया है । जिस प्रकार कुण्डलादि में 
परिणत होने पर मी स्वर्ण अविकृत रहता है, उसी प्रकार जगत के रूप में 
परिणत होकर ब्रह्म मी विकृत नहीं होता । भक्ति संप्रदायों का जगत को सत्य 
मानना अद्व तवादी जगन्मिथ्या' वाले सिद्धान्त का खंडन करता हैं। आचार्य 
जी के अनुसार जगत सत्य हैं : ब्रह्म और जगत में तात्त्विक अन्तर नहीं, मात्र 
रूपांतर है । जगत की उत्पत्ति भी नहीं होती, और इसका विनाझ भी नहीं 
होता । वास्तव में उसका आविर्नाव-तिरोंभाव ही होता है। जगत के प्रति 
यही भावना श्र यस्कर है । ह 





१. उत्पत्तिस्थितिनाज्ञानां जगत: कतृ वे बृहत्‌ । (अणुभाष्य ) 


७४ सुरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


फ्चला 


जग प्रपंच हरि रूप लहे जब दोष भाव मिटि जाहीं।ग 
'स्रदास'-तब कृष्ण रूप हवे, हरि हिय में रहे आहीं॥। 
इस जगत-प्रपंच की सृष्टि का विकास ब्रह्म के सतृ-तत्त्व से निर्गेत बद्ठा- 
ईस तत्त्वों से हुई है। सूर ने जयत के इस तात्त्विक विकास के संबंध मे 
लिखा है-- 
खेलत खेलत चित में आई सृष्टि करन विस्तार । 
अपुन आपु करि प्रगट कियो है हरि पुरष-अवतार ॥॥ 
कीने तत्त्व प्रगट तेही क्षन सब्बे अष्द अरू बोस । 
आगे इस तात्तिक विवेचन का और भी विस्तार किया गया है ।* 
भागे प्रश्न यह रह जाता है कि पुराणादि में जगत को भिथ्या क्‍यों कहा गया ! 
वस्तुत: इसको मिथ्या कहने का कारण वैराग्य-सिद्धि के लिये ही है ।२ यह 
तथ्य सूर ने स्पप्ट किया है-- 
हरि इच्छा करि जग प्रगठायों । 
अरु यह जगत जदपि हरि रूप है 'तउ सायाकृत जानि 
तातें सन निकारि सब ठाँ तें एक कृष्ण मत आनि 
साम्प्रदायिक मान्यता भी इसी प्रकार की है ॥7 जगत्‌ के संबंध * 
दाशनिक हृप्टि से यह एक क्रान्तिकारिणी घारण है। जगत को सत्य कह 
गया; उसे हरि-रूप माना गया । फिर भी हरि के इस रूप को भक्त अन्तिम 
लक्ष्य नहीं मानता । अतः इससे आगे चलने के लिए वं॑राग्य भावन 
भावश्यक है । 





१. अधष्टविशति तत्वानां स्वरूप यत्र वे हरिः। (निबंध) 
२. आदि निरंजन निराकार कोउ हतो न इसर। 
रचों सृष्टि विस्तार 'भई इच्छा इक ओसर । 
निगुण तत्त्व में महत्तत्त्व, महत्तत्त्व ते अहंकार । 
सन-इन्द्रिय शब्दादि पंची ताते कियो विस्तार । 
इब्दादिक तें पंचभृत सुदर प्रगठाये। 
पुनि सबकों रचि अंड, आप में आप समाये। 
तीन लोक निज देह में, राखे करि विस्तार । 
आदि पुरुष सोई भयी जो प्रभु अगम-अपार । 
सायाकित्वं पुराणेपु वेराग्यायंमुदीयंते । निवन्ध) 
४. प्रपंचों भगवत्कार्य स्वरूपोम्ायकाउभवत्‌ । ( निवन्ध) 


हर 
] 


७६ सुर साहित्य : नव मुल्यांकन 


भेद-बुद्धि अविद्या के कारण ही है । जगत की उत्पत्ति के संबन्ध में कुछ 
विद्वान सूर पर प्रतिबिबवाद का आरोप करते हैं, पर यह मान्य नहीं |" 

विरुद्ध घर्माश्रयात्त्व सर ने बड़ी भावुकता के साथ चित्रित किया है। 
कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं--- ु 

एक एक रोम वराट कूप सम अखिल लोक ब्रहसंड । 
ताहि उछेग लिऐ' मात जसोदा अपने निज भुज दंड ॥। 
रवि-ससि कोटि कला बिब लोचन त्रिविध तिमिर भजि जात । 
अंजन देति हेत सुत के, चक्षु ले कर काजर मात ॥ 

सघन भावात्मक लीला-कथन में भी सूर इस विरुद्ध धर्माश्नयत्त्व की 
पद्धति को अपनाए रहे । इससे भाव की अभिव्यक्ति में एक वेचित्र्य आ 
जाता है। 
२.३ जीव- 

अक्षरत्रहम के चिदंश से जीवों का आविर्भाव हुआ। कारण भगवान 
की रमणेच्छा ही है ।* भगवान ओर जीव के संबन्ध को स्पष्ट करने के लिये 
अग्नि-विस्फुलिग न्याय का प्रयोग किया गया है। जीव ब्रह्म का ही अश है। 
यह भश-अजश्ी भाव प्रायः भक्ति संप्रदायों में स्वीकृत हुआ | इस न्याय से दोनों 
की तात्त्विक एकता तो सिद्ध हो जाती है पर सीमा-असीमा के भेद हो जाते 
है । ऐश्वर्यादि धर्म जो भगवान में रहते हैं, वे जीव में से तिरोहित हो जाते 
है । इनके तिरोधान से जीव दीन हीन होकर संसारी बन जाता है। इस तिरो- 
धान का क्रम इस प्रकार है : ऐश्वय के तिरोधान से दीनता, यश के तिरोधान 
से हीनता, श्री के तिरोघान से समस्त विपत्तियों का स्थल; ज्ञान के तिरोधान 
से आत्मरूप देहादिकों में आत्मदुद्धि और आनन्द के तिरोधान से दःख को 
जीव प्राप्त होता है । पर इस क्रम में जीव की नित्यता सुरक्षित रहती है । 
जीव का भगवान से उसी प्रकार व्युकच्चरण होता है जिस प्रकार स्फुलिंग का 
अग्नि से । इससे नित्य॒ता का छास नहीं होता । मगवान के अविक्ृत चिदंश से 
जीव का निर्ममन होता है। निर्गामनन में आनंदादि गुणों का तिरोभाव 
रहता है । 

१. पारीख और मोतल, 'सूर निर्णय पृ० १६७-१६८। 

२. तदिच्छामात्रतस्तस्माद ब्रह्मपुतांश चेतना: । 


सृष्द्‌ यादी निर्गता: सर्वे निराकारस्तदिच्छपा | (निबंध) 
रे मर्मवांशों जीवलोके जीवमृत: सनातन: । (गोता) 


सिद्धांत सम्प्रदाय ७७ 


पंचपर्वा विद्या और भक्ति आदि साधनाओं से जीव अपने खोए हुए 
गुणों को प्राप्त करने लगता है और अविद्या के बन्धन से निमु कत हो जाता है । 
इस प्रकार क्रमश: वह अपने मूल रूप में स्थित होने लगता है । इस प्रकार 
बद्धजीव मुक्त हो जाता है । 
मूलरूप से मुक्तावस्था की प्राप्ति तक जीव की अवस्थाए' घटित होती 
हैं। उसकी तीन अवस्थाओं की स्वीकृति इस संप्रदाय में है : शुद्ध, मुक्त, 
संसारी । केवल आनन्द के तिरोधान होने से पूर्व वह शुद्ध अवस्था में रहता 
है । अविद्या से सम्पुक्त हो जाने पर जीव संसारी हो जाता है । मुक्त अंवस्था 
में आनन्दादि की प्राप्ति कर जीव सच्चिदानन्द हो जाता है। संसारी जीवों के 
भी दो भेद माने गए हैं : आसुरी और दंबी। देवी जीव अपनी मुक्ति-साधना 
के प्रकार की दृष्टि से मर्यादामार्गीय कहे जाते हैं । 'सूर से जीवों के संबंध की 
ये सांप्रदायिक मान्यताए प्राप्त हो जाती हैं। मगवान की लीलाओं में सम्मि- 
लित होने वाले गोपीजन शुद्ध जीवों की कोटि में आते है ।' माया से ग्रस्त 
होने पर जीव अपने संसारी रूप में मोहित हो जाता है और अपने सत्य रूप 
से अनभिज्ञ हो जाता है ।* इस बद्धता का कारण स्वय जीव की अविद्या है। 
अन्यथा जीव नित्य और ब्रह्मांश है ।? अपनी साधना से जीव अपने विस्मृत्त 
रूप की पुनर्प्राप्ति मी कर लेता है । इसमें साधना के साथ गुरु-कृपा भी कारण 
बनती है और सत्य प्रकाश प्रस्फुटित हो जाता है।” इस प्रकार जीवन का 
उद्धार होता है । 
२. ४ माया-- 
शुद्धाह्व त सिद्धान्त के अनुसार माया भी दो प्रकार की है : आत्म या 
विद्यामाया और अविद्यामाया | आत्मयाया ब्रह्म की 'सर्वेभवन समर्थ शक्ति 


१. गोपिन मंडल मध्य बिराजत निसदिन करत बिहार । 
सहस रूप बहुरुप पुनि एक र्‌प पुनि दोय ॥ 
२. अपुनपी आपुर्नाह बिसरयो । 
जसे स्वान काँच संदिर में, भ्रमि-श्रसि भूसि मरयौ। 
ज्यों सपने में रंक भूप भयौ तस्कर ऑऔऑर पकरयो ॥ 
>< >< >< >< 
सूरदास नलिना को सुअटा कहि कौने जकर॒यों ।॥। 
रे. तनु सिथ्या छन-भंगुर जानो । चेतन जीव सदा चिर मानो । 
डे. अपुनपो आपुन में ही पायो । 


सव्द ही सब्द भयौ उजियारो, सतगुरु भेद बतायौ । 


छ८ सूरसाहित्य : नव मुल्यांकन 


ही है। जो संबन्ध सूंयं और उसकी दाहक शर्वित में हैं, वही संबन्ध ब्रह्म और 
उसकी भात्ममाया में है। इसी दृष्टि से भिन्‍त आभासित होने पर भी मूलतः 
माया ब्रह्म से अभिन्‍न है । तुलसी ने भी 'कहियत भिन्‍न व भिन्‍न से इसी तत्त्व 
की स्वीकृति की है । वेसे माया ब्रह्म के आधीन है: इसका विपय य सत्य नहीं 
है । वल्‍लभाचाय जी ने इस माया के भी दो रूप माने है : व्यामोहिका और 
करण । इनमें से प्रथभ भगवान के चरणों की दासी है।* अतः वह भगवान 
के अनुचर के पास जाने में लज्जा करती है ।* इस र्‌पक का तात्पय यह है 
कि भगवान की इस शक्ति की स्थिति मात्र है । इसमें चेष्टा या गति नहीं है । 
यह निरंतर ब्रह्मस्थ रहती है। दूसरी माया करण है | इस शब्द से ही ज्ञात 
होता है कि यह क्रियात्मिका है। इसी शक्ति को प्रकट करके भगवान इस 
समग्र जगत की उत्पत्ति और उसका पालन एवं नाश करते हैं ।* इसी माया 
को सर्वेसमर्थ कहा गया है। इसी का प्रतिनिधित्व ब्रह्मा, विष्णु, महेश करते 
हैं। व्यामोहिका माया की झलक सूर की इन पंक्तियों में मिल जाती है-- 


सबतें परे कृष्ण भगवान । 
सो भाया है हरि को दासी निसदिन आज्ञाकारोी १ 
इस प्रकार करणर॒प माया का आभास निम्नलिखित पंक्तियों से मिल 
जाता है | 
पालन सुजन प्रलय के कर्ता माया के गुम जानो ।. 
मो में रजगुन, सिच में तस शुन, विष्णु हि सतगुन मानो ॥ 
करण माया भगवान की इच्छानुवतिनी है| उन्हीं की इच्छा का संकेत 
पाकर माया इस प्रपंच का विस्तार करती है ।7 इस प्रकार 'सूर' की दार्शनिक 
धारणाएँ सम्प्रदाय से बाहर नही जात्तीं 


१. इयं चरणदासी.. इयं व्यामोहिका । (सुबोधिनी, २।७।७७) 
ये वाषईभिसुखश्चकारादनुचराश्च ज्ञानिनों भवताश्च तत्र सर्चेत्रेव विलज्ज- 
माना । ( सुधोधिनी, वही ) 

३... साया सर्वभवन सामथ्येम, शवितर्वा काचित्‌, अप्रयोजिका, तामपि करण- 
त्वेन स्वीकृत्य इद॑ सर्वभेव जगदुत्पादगत्ति पालयति नाश्यति च॑ । 
( सुबोधिनी, १०१५४११५ ) 

४. हरि इच्छा करि जग प्रगटारी । 
अरु यह जगत जदपि हरि रूप है, तऊ 'मायाकृत' जानि। 


हि 


सिद्धांत सम्प्रदाग ७६ 


अन्तु न यहां कहा जा सकता ह्‌ कि सर ने संप्रदाय के वौद्धिक या 
तत्त्वदर्शन का कयन अलग से 'सूरसारावली' में कर दिया है। उनके भावात्मक 
* साहित्य को यह दर्जन कहीं-कहीं ही स्पर्श कर पाया है। इसका तात्पय॑ यह 
नहीं कि जेष साहित्य में इस दर्शन की उपेक्षा की गई है, अयवा इसके विरुद्ध 
कुछ बातें आई हैं | समस्त साहित्य में छुद्धाहंत सिद्धान्त की आात्मा का 
निवास है पर, इसके संवन्ध के स्पष्ट या अभिधामलक कथन समाप्त हो जाते 
। इस प्रकार के कयनों से काव्य का रूप विक्ृत ही होता है। अतः सूर ने 
इस सच्रका तत्त्व निह्पण अलग से घूर सारावली में करके लक्ष्यकाव्य को 
सुरक्षित कर लिया है. | जा 


हु जन 
कक ल्‍यक का हे 


जहाँ तक पुष्टिमार्गीय मक्ति-मावना या सेवासक्षित संवन्च हैं, वह तो 

शुद्ध भावात्मक है । उसका सूर की - काव्यधारा से आत्मीय सबन्ध है। एक 

प्रकार से सूर के काव्य का रस इस भक्तिरस से मिलकर इतना उत्कटद 

और व्यापक हुआ है। इस दर्शन का भक्ति संबन्धची व्यावहारिक दर्शन सूर- 

साहित्य में अधिक मुखर है । इस पक्ष पर आगे विचार किया 
गया है । 


३. भक्ति निरूपण--निग्रु ण भक्ति 


३-१ निगुण भक्ति--वेल्लमाचार्य जी के सिद्धान्त के अनुसार भग- 
वत्पाप्ति उसी को होती है, जिसे वह चाहे | मगवान के द्वारा जन का चुनाव 
ही पुष्टि है। पुष्टि की प्राप्ति मक्ति के विविव प्रकारों के निवंहण से होती है। 
यह भक्ति सिद्धान्त ही पुष्ठिमार्ग' का प्राण है। पृण्टिमार्ग दया या कृपा 
हैं । पुष्टिमार्ग का अर्थ है मगवदनुकम्पा की प्राप्ति का मार्य | इसे निनुण भक्ति 
का माग मी कहा जाता है। इस मार्ग में मक्ति की यह परिनापा की गई है : 
मगवान के प्रति सुदृढ़, माहात्म्य ज्ञानयुक्त, सर्वाधिक प्रम ही भक्तित है। इसी 
से मुक्ति की प्राप्ति हो सकती है, अन्य किसी भी मार्य से नहीं। माया या 
प्रकृति त्रिम॒गणात्मिका है। सतत, रज, तम ये तीन शक्ष्तियाँ जागतिक विचार 
बाौर जीवन के प्रवाह को प्रमावित करती हैं। इन गुणों के जाबार पर विचार 
करने से भक्ति के चार प्रकार निश्चित होते हैं: तामसिक, राजसिक, सात्विक 
और नियु ण : नियु ण, भक्ति तर गुण्यातीत हैं। क्रोव, हिला आदि विकारों से 
अस्त प्रकृति में पलने वाली भक्तित तामसिक है | सांसारिक विपयों या यश की 
प्राप्ति से उछि्॒ट भक्ति राजसिक कही जाययी। पाप-विनाश, भगवान की 


८० स्रसाहित्य : नव मूल्यांकन 


प्रसन्‍नता, भगवान के लिए कर्म-समपंण तथा निष्कामता वाला प्रेम सात्विक 
भक्ति है ।* 

निमुण भक्ति का स्थान सर्वोच्च है। पुष्टिमार्ग के आचाये को भवित 
का यही रूप मान्य था। इसका स्पष्टीकरण आचार्य जी ने इस प्रकार किया है : 
मन की गति मंगवान की ओर इस प्रकार की होनी चाहिए जंसी गंगा की 
सागर की भोर है। यह गति प्रतिवन्‍्ध रहित, अविच्छिन्न, वेद, स्मृति, लोक 
आदि के प्रतिबन्धों की उपेक्षा करने वाली भगवतोन्मुख हृदूगति ही मक्ति है । * 
मक्ति फलानुसंघान से रहित तथा अहैतुकी होनी चाहिए ॥३ केवल सेवा-भाव 
की उपस्थिति इसमें मान्य है। इसकी गति पुरुषोत्तम या उनके अवतारों की 


ओर होनी चाहिए ॥४ इसी निगुण मक्ति की प्रतिष्ठा महाप्रभु वल्लभाचार्ण ने 
की ।* 


इस निगुण भक्ति का साम्य शंकर द्वारा प्रतिपादित अन्तिम कोटि की 
भवित से है । शंकराचाय जी ने मकत के निविड़ प्रेम की पाँच कोटियाँ पाँच 
रूपकों के द्वारा प्रस्तुत की हैं : 


१. अंकोला फल की भांति : यह फल भूमि पर गिरता है! उसके 
बीज बिखर जाते हैं । पर वे तत्काल ही मूल की ओर बलात्‌ आकर्षित होने 





२. साहात्म्यज्ञानपूर्वस्तु सुहृढ़ः सर्वतोष्घिक: । 

स्‍्नेहो भक्तिरिति प्रोक्‍तरस्तपा मुक्तिर्नंचान्यथा ॥ (तत्तवार्थ दीप १।४२) 

अभिसंघाय यो हिसां दम्सं सात्सयंमेव वा । 

संरम्भो भिन्‍नहग्मावं मयि कुर्यात्‌ स तामस ॥ 

देषयानशिसन्धाय यश ऐश्वयंमेव वा ॥ 

अर्चादाव्चयेद्यो मां प्रथग्भावः: स राजस: । 

कर्मंणिहरिपुद्श्य परस्मिन्वा मदर्पणम । 

यजेद्यहृष्टमिति वा प्ृथग्भावः स सात्त्विकः ॥ (भागवत ३।२९।८-१०) 

'३ सर्वगुहाबये म.य भवगत्ति प्रतिवन्ध रहिता अविच्छिन्ता था मनोगति: 
पर्वेतादिभिदनमपि कृत्वा यथा गंग्राम्भ: अम्बुधी गच्छति तथा लौक्षिक- 
वेदिकप्रतिवन्धान्‌ दूरी इत्म या भगर्शत सनसो गतिः। (सुवोधिनी) 

४. प्रंसपूच्रिका सेवाहेतु: फलानिसन्गानं तद्रहिता महैतुकी अनिमित्तावा। 


(वही) 


>ह 


५. पुरुषोत्तम एवं भक्तिनतु पुरुपेष्ववतारेपु । ( भागवत्त, ३२६११२ ) 


सिद्धान्त सम्प्रदाय ८ 


लगते हैं | इस प्रकार तने की ओर आकर्षित होकर वे अपने उद्गम से चिपक 
जाते हैं । । ु 

२. अयसकान्त (चुम्बक) की ओर सुई विवश आकर्षित हो जाती है। 

३. पतिव्रता, साध्वी स्त्री अपने पति की मावना ओर सेवा में संलग्न 
रहती है । 

४. एक बेल या लता अपने अवलम्बन के लिए एक वृक्ष को खोज 
करती है। एक वार वृक्ष के मिल जाने पर यह उससे लिपट जाती है, जेसे 
इसका उससे अनुराग हो । यदि इसको वृक्ष से वलातु अलग भी कर दिया 
जाय तो भी यह वृक्ष की ओर चल कर ही लिपटना चाहती है। 

-< ४; मार्ग की वाबाओं को तिरस्कृत करती हुई सरिता अनवरत रूप से 
समुद्र की ओर प्रवाहित रहती है। इसी प्रकार का भगवत्परेम होना चाहिए--- 
शाश्वत, तीन्र और बलवान । 

संभवत: श्री वललभाचार्य जी ने भी अन्तिम रूपक को लेकर निगुण 
मवित की स्थापना की । 


जो पुष्टिमार्गावलम्बी बनना चाहते हैं उनके लिये निम्नलिखित नियम 
पालन करने चाहिए :--- 

१. शक्तुयानुसार स्वधर्माचरण (संमव्रतः वर्णाश्नमवर्म परिपालन) | 

२. विवर्मी कार्यों से बचना; तथा 

३. एइन्द्रिय विनिग्रह ।* 

इस प्रकार सामान्य, परम्परागत मूल्यों की स्वीकृति वललमभ संप्रदाय 
में मिलती है। इन मूल्यों के प्रति क्रान्तिमावना इस मार्ग में नहीं है। यद्यपि 
गोपीमाव में इन सभी मूल्यों का विलय हो जाता है, तथापि सामान्य जन के 
लिए इन नियमों का परिपालन श्र यस्क्र माना जाता है। 


३.२ सरणियाँ-- 


पुष्टिमार्ग में सर्वोच्चि मूल्य आत्म-निवेदत है । अउने आपको अशेयप रूप 
से समर्पित कर देना आवश्यक तत्त्व है: उपनिषद्‌ में कहा गया है : ब्रह्म सर्वे 
भूताधिपति है और सभी जीवों का राजा है। जिस प्रकार रथ चक्र में सभी 





४. अस्मत्पतिपादितश्च नेगु ण्यः । (सुत्रोधिनो) (देखो पृष्ठ 5०) 


१. स्वघर्माचरण शकत्या विधिमाच्च निवरतनम । 
इन्द्रियाइच विनिग्नाह्‌ सर्वेथा त्यजेत्‌ च्रयम्‌॥ (तत्त्वाथंदीप, २।२३८) 


८२ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


तीलियाँ चक्र की घुरी और उसके वृत्त से संबद्ध होती हैं उसी प्रकार रथ नाभि 
चक्र न्यास से सभी जीवों, देवताओं और ब्रह्माण्डों से ब्रह्म का सम्बन्ध होता 
है । सभी ब्रह्मम से आबद्ध हैं ।* सभी जीवों का उद्गम ब्रह्म से है । अतः सभी 
का धम है कि अपना सर्वस्व ब्रह्म को समर्पित कर दें। आत्म-निवेदन अपने 
अहं को ब्रह्मम को समपित कर देना है। भक्त भगवान को सर्वेस्व समर्पित कर 
देता है--शरीर, मन, आत्मा सब कुछ । अपने निमित्त वह कुछ नहीं रखता । 
दुःख-सुख आदि को भकत भगवान के उपहार के रूप में ग्रहण करता है और 
अपने को इन दोनों से ही निद्व न्द्न रखता है ॥ उसकी समस्त ऐन्द्रिय ऐषणाओं 
का शमन हो जाता है। शरत्र्-मित्र भाव से भी भक्त निरपेक्ष हो जाता है। 
यहाँ तक कि वह मोक्ष की भी कामना नहीं करता । वह भगवान के अतिरिक्त 
कुछ भी नहीं चाहता । वह भक्ति से ही तुष्ट रहता है : भक्ति से कुछ भी 
असाध्य नहीं है । 'पुष्टि' की प्राप्ति ही सर्वोच्च है : वह भी भक्ति से सभव है। 
इस प्रकार संप्रदाय में पूर्ण आत्मसमर्पण को ही सर्वोच्च सूल्य स्वीकार किया 
गया है। पूर्ण आत्मसमर्पण के समर्थन में गीता और भागवत एक मत हैं । 
इसी से 'ब्रह्मम' संबन्ध की स्थापना होती है । इस मूल्य की मान्यता प्रायः सभी 
धर्मो भौर दशनों में हैं। पुष्टि और आत्म-निवेदन के मूल्यों की स्वीकृति 
सावंदेशिक है ।* 
आत्म-निवेदन और पुष्टि अन्योन्याश्रित हैं। आत्म-निवेदन से पृष्टि की 
प्राप्ति होती है और पुष्टि से आत्म-निवेदन पूर्ण होता है। आत्म-निवेदन हृदय 


२. वृहदरण्यकोपनिषद, २।५।१५ 

२. बाइबिल के अनुसार, (9 शा गण 8४९ व0णक्षत्र 0एथ ४05, 0 
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फोर सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


करने से पहले होना चाहिए ।* भोग की चुद्धि से प्रकृति की शुद्धि होती है 
प्रकृति की शुद्धि से स्‍्नृति क्री उपलब्धि होती हैं। स्घपरृति की उपलब्धि से 


उसके समस्त दझारीरिक मोह-वन्धन स्वयं छूट जाते हैं।* सृद्धिकरण का 
सर्वोच्च द्वत्त्त स्वयं मयवान हैं । अत: उनको चमपित सभी वस्तुएं निर्दोष और 
गुद्ध हो जाती हैं | चाहे ये समर्पित वस्तुएं मोत्तिक मोज्य, विचार, कार्ये, 
किसी नी रूप में हों, उपभोग से पूर्व समपित होकर विजुद्ध हो जाती हैं । 
इससे जहं से भी मुक्ति मिलती है। भगवान की माहात्म्य सावना का जन्म 
होता है। सर्व-कर्म समर्पण का सिद्धान्त गीता में भी कहा नया हैं। इससे 
निष्कामता जन्म लेती हैं और कर्त्ता तदगत पापों से मक्त हो जाता हैं ।* पाप 


हमारे जीवन-केन्द्र को ही विचलित कर देते हैं । जीवन के केन्द्र में मगवान की 
स्थिति होनी चाहिए । पापों के द्वारा उस्त केन्द्र पर हमारा अहं प्रतिष्ठित हो 


4), 


जावन ० ाओ।. क्लां 


जाता हैं: जीवन की हर वस्तु बहू केन्द्र के चतुदिक चक्कर काटती रहती 
। भगवान को जीवन के केन्द्र में प्रतिष्ठित करने के लिए सेवा, आत्म- 
निवेदन और समर्पण का त्रिसृत्री साय हैं। इससे अहूं पिघल कर भगवान 
लब दा जाता हूं । 


) /27४/ 





न 
कक । 


न ्ँ 


नक्ति का वीज पहले बात्मनिवेदन में सूल-प्रसार करता हैँ। फल- 
निरपेक्षता की भूमिका में इसकी वृद्धि होती हैं। भगवान के माहात्म्य का 
श्रवण-कीतेन इसकी पुष्टि करता है। ग्रह में स्थित होकर, स्वबर्म पालन करके 
कृष्ण के प्रति प्रेम-मावना को जगाकर, उसकी सेवा आदि करके ही भक्त्ति के 
वृक्ष को सुहढ़ किया जा सकता है 7 यही श्री वल्‍लमाचार्य जी का मत्त है। 
इसके अनुसार ग्रहत्याय जनिवाय नहीं । अपनी स्थिति के अनुसार भगवान 
कृष्ण में प्रेम हृढ़ किया जा सकता है । 


१. असमरपित वस्तुरतां तत्मात्‌ आचरेत्‌। [सिद्धान्त रहस्य, कारिका ४] 





२. आहारशुद्धी सत्त्वशुद्धि: सत्त्वशुद्धों श्र्‌वा स्मृति: । 
स्मृतिलम्ने सर्वेप्रन्योनां विप्रमोक्ष: [छन्दोग्योपनियद्‌ ७॥२६] 
३. गीता, ५॥।१०; ६॥२७, २८ 
वींजनावे ह॒ढ़े तुत्या-त्वागाच्छ वणक्ीतंनात । 
बीजदादर्सप्रकाररतु गहे स्वित्वा स्वघर्मत ; ।] 
नव्याश्त्तो भजेत्कृप्णं पृजया श्रवणादित्ति: 


[ भक्तिवद्धनी, कारिका १, २] 


सिद्धांत सम्प्रदाय प्भ्र 


'ब्रवण' का तात्पयं है भगवान के गुणों, उनकी लीलाओं और उनके 
यूत्तों को सुतना, जिससे मस्तिष्क सांसारिक आकरपंणों से छूट कर भगवान में 
लगे । भगवान के गुण श्रवणेन्द्रिय द्वारा हृदय में प्रविष्ट होकर, पापों का मंथन 
करते हैं और उन्हें वहाँ से निष्काषित कर देते हैं । इस प्रकार हृदय को शुद्धि 
होती है ।* श्रवण का उद्देश्य भगवान का कथन करने वाले शब्दों और वाक्‍यों 
के अर्थ की प्रतीति है।' भगवत्कथा में छः गुणों का निवास -रहता है: 
ऐश्वर्य, वीये, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य । इन पड़्गुण-युक्त भगवत्कथाओं से 
मोक्ष लाभ होता है : आनन्दावस्था की उपलब्धि होती है ।* इसी दृष्टि से इसे 
'कथामृत' कहा गया है । कथामृत ही वास्तविक अमृत है। जिस प्रकार 
भगवान की लीलाए समस्त विश्व में व्याप्त है, उसी प्रकार भगवत्कथा भी 
सर्वत्र व्याप्त है । भगवान अवतरित रूप में प्रकट होता है और फिर अन्‍्तर्धान 
हो जाता है पर कथामृत तो सदंव प्रकट ही रहता हैं ।। इसका तिरोभाव 
नहीं होता । 


श्रवण कथा का ग्रहण है। कीतेन उस कथा का गायन!। कीतेन का 
तात्पयं है भगवान से संबन्धित अर्थ-बोध और उस अर्थ का प्रेषण। 
केवल अर्थ ही नहीं, उस शब्द की आन्तरिक शक्ति का बोध और प्रेषण भी कीत॑न 
से अभिप्र त है ।* 'गायन' से पूर्व भगवान का माहात्म्य-बोध नितांत आवश्यक 
होता है | एक विशेष प्रकार से संस्कृत, परिष्कृत और सांसारिकता से मुक्त 
मस्तिष्क ही भगवान की लीला और गुण का सकीतेंन करने योग्य होता है। 
जिस प्रकार जल-प्लावन में कड़े-करकट का ढेर बह जाता है, उसी प्रकार सभी 


२. श्रवरों प्रविश्ञात कथा पुरो हृदये तदः सर्वमेव दोषमालोढ्य सुखतो 
निस्सर्राल एनं कियत्काल पर्याव्वत्या सर्वथेव शुद्धो भर्वात । [सुबोधिनी | 
२. श्रवण भगवद्वाचकाकनां परवाक्यानां भगवति दक्तितात्पर्यायधारणम्‌ 


[सुबोधिनी ] 


३२. यथा तब सामर्थ्ण तथा सापि षड्गुणात्मिका मोक्षदायिनि परमानन्दरूपा 
च तदाह - तव कथा असृतरमव अम्नतं भगवद्रसात्मकं सर्वेषां मरणादि 
निवर्तक यद्रूप॑ तदसृतशब्देनोच्यते अतो सोक्षदात्त त्वं, परमानन्द 
र॒पताच सिद्धा: [सुबोधिनी | 

डं. कथा तु समागत न तिरोभवति [सुबोधिनों ] 

५४. वक्तितात्पर्य बोधनं कोंतेनम्‌ [सुबोधिनी] 


ध््द सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


पाप-पुज भगवान के लीला-गुण गायत और श्रवण से बह जाते हैं ।* जो इन 
गुण और लीला रूपों का गायन करता है वह महानु हो सकता है। मगवान के 
गण शक्ति-स्वरूप हैं।वे क्रिया के अमाव में मी आन्तरिक हंष्टि से सक्रिय 
रहते हैं ।* 

श्रवण और गायन के पश्चात्‌ स्मरण” है। इसका तात्पय है मगवान 
के नामों का स्मरण । शुद्धाद्व त दर्शन के अनुसार भगवान के 'नाम ओर रूप 
यथार्थ हैं क्योंकि वे स्वयं भगवान के द्वारा रचित हैं। भगवान के नाम ओर 
रूप वेद-स्वर॒प हैं, वे सत्रकी शुद्धि करते हैं। "नाम! भगवान के स्वरूप से 
विछित्न नहीं है । इसीलिए नामोच्चारण के साथ-साथ र्‌प भावना भी होती 
रहती है | इसी दृष्टि से ध्यान-गत सभी प्रक्रियाओं से नाम-स्मरण की क्रिया 
श्रेष्ठ है।* श्री [लक्ष्मी] का प्रयोग भगवान के समी नामों के साथ पूर्व॑प्रत्यय 
या उपसर्ग के र॒प में होना चाहिए | इसी नाम का सौन्दर्य बढ़ता है ।४ अर्थात्‌ 
नाम का सौन्दर्यपक्ष श्री” में निहित है। इससे नाम अलंकृत होकर र्‌प-कल्पना 
में सहायक होता है। भगवान के माहात्म्य-ज्ञान, रपकल्पना, और लीलाबोच 
के अभाव में सक्षम नामस्मरण का यही महत्त्व है। हृदय इन प्रमाव-बिबों से 
परिपूर्ण हो जाता है : 


सेवा, श्रवण, कीर्तन और स्मरण का लक्ष्य 'निरोध की सिद्धि है । 
इस शब्द का प्रयोग योग-शास्त्र में मी मिलता है। संग्रदाय से इस शब्द का 
यह अथे मान्य था : प्रपंच की स्मृति से विरहित भगवदासक्ति ही “निरोध' 
है ।* निरोध की तीन स्थितियाँ हैं : प्रेम, आसक्ति और व्यसन । भगवान के 
प्रति प्रेम उनके माहात्म्य-ज्ञान से पुष्ट होता है। जब तीब्रता और विस्तृति 
की दृष्टि से इस प्रेम का विकास होता हैं, तो इसका निषेधात्मक पक्ष भी 
विकसित होता है--अर्थात्‌ सांसारिक वस्तुओं से प्रेम क्रमशः कम होता जाता 
है । मगवान के साथ प्रे म-सम्बन्ध हढ़ और अन्रिच्छेद होता जाता है। जगत- 
प्रपंच की विस्मृति होती जाती है | इसी स्थिति का नाम आसक्ति' है । अन्तिम 





१. पुण्ये श्रवण कीतेने अस्य अनेन पाप॑ जलपुरणणोेव नाश्यते । [सुबोधिदी] 
२. गुणास्त्वनुभावरूपा: क्वियां नापेक्षत्रे । [वही : कृष्णतीला] 
३. वेदवेदार्थर्‌पत्वान्नामेबाशिल शोधकम्‌ । 
तादध्येत्‌ ध्यानसिद्ध प्रायश्चित्त तु दुर्बलम्‌ । [तत्त्वार्यदीप] 
४. साकारत्वात्त, सौख्य श्री शब्देनामिधोयते । [सृदोधिनी ] 
५. प्रपञ्चविस्मृतिपुर्वके भगवदासक्ति: निरोघ: । 


सिद्धांत सम्प्रदाय घे७ 


स्थिति व्यसन की है | इस स्थिति में मक्त का सन अशेष रूप से भगवान के 
विचार-चिन्तन से भर उठता है: उसमें सांसारिक विचारों के लिए स्थान ही 
नहों रहता । सूर ने स्पष्ट किया है--नॉहिन रह्मौ मन में ठोर | व्यसन की 
स्थिति राधा-भक्ति से प्रतीकायित है: मक्ति का चरम रूप व्यसन राधा-भक्ति 
के रूप में प्रकट होता है। निगु णियों ने 'अजपाजप' की जो वात कही है, वह 
तामोच्चारण संबन्धी व्यसन ही है। 'सूर' ने अपने अन्तिम क्षणों में अपनी 
चित्त-वृत्ति और नेत्र-वृत्ति राधा में ही केन्द्रित बतलाई थी । इस प्रकार 'सूर' 
सदा ही व्यसन के क्षणों में जीने लगे थे | इसी व्यसन की स्थिति में अमर्या- 
दित भक्ति या निग्रुण भवित उदित होती है । मर्यादा अनावश्यक होकर स्वय- 
मेव छट जाती है और भावना त्रगुण्य के संस्पश से विरहित हो जाती है। 
चेतना एक अलोकिक भूमि का अनुभव करने लगती है । जब भक्‍त का मन 
भगवान के गुणों से पूर्णत: अभिभूत हो जाता है सांसारिक दुख-सुख के 
स्तर भी तिरोहित हो जाते हैं। चित्त भगवदानन्द में मग्न रहता है | इस 
प्रकार जब भगवान के गुण भक्त के शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं, तो सांसारिक 
विषयों के प्रति एक स्थायी विराग जगने लगता है। एक ऐसा अविच्छिन्न 
आनन्द-ख्रोत उमड़ पड़ता है कि किसी भी काल-खंड में दुःख का अनुभव नहीं 
होता ।* पारिभाषिक रूप से यही जीवन-मुक्ति की अवस्था है । 


“निरोध' के आगे की अवस्थाएँ मुक्ति और आश्रय हैं। जब पूर्ण 
निरोध की सिद्धि हो जाती है तो भकक्‍त ब्रह्म में ही निवास करता है। यही 
मुक्ति है । उपनिषद्‌ के अनुसार जो ब्रह्म में निवास करता है वह अमृत हो 
जाता है।* यदि ऐसा भक्त भगवान में चुलमिल कर एक नहीं हो गया है तो 
वह ब्रह्म का अनन्यभावेन आश्रित हो जाता है। इस स्थिति में महाप्रलय भी 
उसे स्पर्श नहीं कर सकता : नाश की शक्तियों से वह अतीत हो जाता है । 
यही स्थिति आश्रय कहलाती है । 


२. गुशोष्वाविष्चचित्ानां सर्वदा सुरवेरिण: ॥ 
संसारविरहक्लेशी न स्यातां हरिवत्सुखस । 
[निरोध लक्षण, कारिका १३] 
२. भगवद्धमंसामर्थ्यात्‌ विरागो विषये स्थिर: । 
गुण: हरे: सुखस्पर्शान्त दुःखं भाति कहिचित्‌ । (वही, कारिका १५) 
३. ब्रह्मसंस्थो5्मृतत्वभेति । --छान्‍्दोग्योपनिषदु, २।२३११ 


८ सरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


सेवा, श्रवण, कीतंन तथा स्मरण--सभी का लक्ष्य एक है--भवक्‍त के 
मन को भगवान में निरत रखना । इसीलिए श्रवण, कीतंन, एवं स्मरण सेवा” 
के ही विभाग हैं। भक्ति का लक्ष्य मगवत्मम है । इस दंष्टि से और भक्ति 
का प्रयोग' समानार्थक रूप में होता है। भिजू--घातु का प्रयोग सेवा के अर्थ 
में किया जाता है। इसलिए इसका प्रवुद्ध प्रयोग भक्त यर्थेंक भी हो जाता है । 
सेवा भक्ति का महान्‌ साधन है ।' सेवा का फल त्रिविध है : इससे अलौकिक 
साम्थ्यं की प्राप्ति होती है, सायुज्य की प्राप्ति होती है 'वथा वेकुठ की प्राप्ति 
होती है ।* अलौकिक सामथ्य सें सिद्धियों का समावेश हो जाता है । सायुज्य 
का तात्पये है ब्रह्मगसंयोग या उससे अविच्छेय संवन्ध । “बेकुण्ठः -का तात्पय है 
कि भक्त को दिव्य शरीर की प्राप्ति होती है और वह बंकुण्ठ लोक में तथा 
अन्यत्र भगवान के आदेझ्यों के पालन की शक्ति से विभूषित हो जाता है। 
इसी तत्त्व का निरूपण सूरदास जी ने अपनी 'सेवाफल' नामक रचना में किया 
है । अधिक विस्तार तृतीय फल “<बेकुण्ठः का किया गया है । 


संक्षेप में पुश्टिमार्गीय सेवा” का यही स्वरूप है। इस मार्ग की अपनी 
विशेषताएं हैं। इस संप्रदाय के अनुसार केवल एक भगवान--क्षष्ण, परत्रह्म, 
परमात्मा, पुरुषोत्तम से प्रेम, उसकी सेवा या उसकी उपासना की जाती है । 
आचार अनुष्ठान को इस संप्रदाय में प्राथमिकता नहीं दी गई है । भगवर्प्र म ही 
इसमें सर्वोच्च मूल्य के रूप में स्वीकृत है | इसमें सर्व-शक्तिमान और उसकी 
पुष्टि (-कृपा) में अटल विद्वास की अनिवार्यता है । किसी फल्नेच्छा से भक्ति 
करना निपिद्ध है। मर्यादा मार्गीय पद्धति से दुःख ही मिलता है । पुष्टिमार्ग में 
'प्रेम' का मूल्य केन्द्रीय है। इसकी प्राप्ति ऐसे साधनों से हो जाती है जो 
सरलता से उपलब्ध हो सकते हैं । इसका परिणाम सुख ही होता है ।३ पुष्टि- 
मार्गीय भक्ति आरम्म होती है : क्रमशः गतिशील रहती है: अन्त: इसकी 
परिणति चरम प्रेम में हो जाती है। एक प्रकार से यही भक्ति का स्वरूप है । 
मर्यादा मार्ग में, भगवान श्र्‌ति के फल-विधान का अनुसरण करके फल-प्रदान 
करता है । पुष्टिमार्गीय भक्ति के अनुसर्ता को फल प्रदान में वेदोक्त फल-विधान 


१. भज इत्येष वे घातुः सेवायं परिकीतित: । 
तत्मात्सेवा बुध: प्रोव्ता: साधनभुयसी ॥ ( उपदेश मीमांसा ) 
२. सेवाया फलत्रमम्‌ । अलोकिकसामर्थ्य सायुज्य'... वेकुण्ठादिष । 


श्रीकृष्ण भजयेदुभवत्या यथालव्धो5पचारके: । त्‌ त्दा्थंदीप, २।२२६ 


सिद्धान्त संप्रदाय ८६ 


का ध्यान किए बिना ही भगवान सक्त की आन्तरिक इच्छा का ध्यान करके 
फल प्रदान करता है। दामोदर लीला इसका प्रमाण है ।९- - 


भक्त के पक्ष में सेवा का निरूपण किया गया है और इस संदम में 
भगवान की पुष्टि में अटल विश्वास रखना अनिवाय वतलाया गया है। भक्त 
की सेवा और 'पृष्टि मिलकर ही एक आध्यात्मिक्र पूर्ण इकाई को जन्म देती 
हैं । मबवान का अनुग्रेह ही “पुष्टि है। मागवत से ही यह शब्द लिया गया है 
पोपणं तदनुग्रह: । उपनियद्‌ में भी अनुग्रह तत्त्व का समावेह् है ।* इसी शब्द 
के आधार पर पुष्टिमार्ग को मर्यादा मार्ग से भिन्‍न सिद्ध किया गया है ।* 
मर्यादा माग की मान्यता जो जस करे सो तस फल चाखा ॥ पुष्टि मार्गे 
में कहा गया है कि फल-दान में भक्त की इच्छा का आघार रहता है। 
वल्लमाचारय जी ने अणुभाष्य में कहा है : “कृति साध्यं साधन ज्ञान भक्ति रूप॑ 
शास्त्रेण वोब्यते | ताभ्यां विहिताम्यां मुक्ति मर्यादा। तद्गरहिता नामापिस्व- 
स्वरूपवलेन स्वप्रापणं पुष्टिरित्युच्य्रत । यथा च य॑ं ।” जो मुक्ति भगवान अपनी 
ही गक्ति से प्रदान करते हैं,बह पृष्टि है । इसमें फल कर्मानुप्तार नहीं मिलता । 
उसकी प्राप्ति मगवान की कृपा, अनुग्रह या पुष्टि से होतो है--मुक्ति कर्म का 
फल न होकर भगवान की (पुष्टि का फल है। 'पृष्टि' के फरस्व॒रूप काल, कर्म 
और स्वभाव (अतप्र कृति) आदि की बाघाओं का निराकरण हो जाता है ॥४ 
इसमें विश्वास हो जाने पर भक्त अपने को भगवान के हाथों में स्वे-सु रक्षित 
समन्नता हई । 
पुश्मार्ग की श्रशता भी सिद्ध की गई है । इसके लिए इस पद्धति की 
तुलना अन्य मार्गों से की गई है। सबसे पहले बेदमार्ग को लिया गया है ।इस 





१. यत्र च भक्तस्य स्वातंतक््य तदिच्छायुसारेण भगवत्कृतिर्णयया दामोदर- 
लीलायां सा पृप्टि: । (त्तत्त्वार्थदीप) 

२. नायमात्मा बलहोंनेन लभ्यो न मेघया न बहुना श्र्‌॒तेन | यमेवेष दृणुते 
तेन लम्यस्तस्थेयु आत्मा दिण्णुते तंवर स्वामु । सुण्डक्ोयनिषद ३, २, ३ । 
ओर भी हृष्टव्य कठोवन्तिषद १-२-२२। 

३. फलदाने क्मपिक्ष: | कर्मकरणएोे प्रयत्वापेज्ष:। प्रयत्ते कामापेक्ष:। कामे 
प्रवाहापेक्ष इति मर्यादा रक्षार्थ वेदं चक्नार | ततोन ब्रह्माण दोष गन्धोडपि । 
न चानीश्वरत्वप््‌ । मर्यादा सार्गस्य तयब निर्माणात्‌ । यात्रान्यया स पुष्टि 
सब्य इति | ब्रह्मसुत्र, २३४२ पर-अणुभाष्य । 

४. कृष्णनुग्रहरूपा हि पुष्ठि कालादिवाधिका । (तत्त्वार्थदीप) 


लिए 


पार्दांद्र द 


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*'-5]३॥ 


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तन 


नहा 2-7 
सह 


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अहधनअनलन 
० 


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मै 


सद मल्याक्रत 
च्द्नी 


दे 


पु 


सरसाहित्य 


अधराम: अवतार 
च्ट् 


चाय 








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ज्ञानमसघधरस 


क्रियामयश्चेद्यत्मोपद्रवकारी मनन - कम 
तकारा, 


तप 


ब्यदूकरा-- पक 


गोठा ७॥१६) 
ध्वध 


# 


[8 
द्चा 


प्रपद्चदे । (था 


७, 
चहू 


डे. ८4। ७३५५ ० च] 


सच्ोधिनी 
लद्दा 


अकाओ 


| 


क्वाप कदाचन । 


नो) 


द्च्य 


प 


ब्क 


* अं 


( 


ना 
आब्रलाधिपा 
क्धा 


बा 


द्रव्यमयश्चेत परोपद्रवक्तारों, 


कक 
का 


उजनीयों 


धर्मोहि नानन्‍्य 


तपस्ि ॥ 


#, 


कावदातन | 
जचा 


द्च पे अपहाासुक००...अह*ायूड ०५ ाबूए 


त 


कक. 
च्क्‌ 
जि 
कक 
साई 
4 आन 
तू 


बहुनां जन्मनानन्ते 


म्मा 


तयायनेदापच्तोद 


त 


तक 
#क. 


4... 


$ 


पप 
स्दंदा सर्चनावेन 


ऋण 
कद वाइुए+ दमन ुड->तामआ2-- 


रथ] 
७ 


“4६०4 *$प्ने 


स्वक्यायनेद दा 


राप्य८ 


हर 
जी 


त्त 


ता 


है. सो 


र्‌ 
के 
३३ 


सिद्धान्त चम्प्रदाद ६९१ 


मा ८घञ्ाचा 5८ 07 अं है आल माना गया व ध्ल्ज्जए पृष्टिमार्ग >> 878६ ण्फन्टट ० “न 
को पुरुपा कद (लए ही-नि। ना गया है, वहां प्राष्टमाग विना भेद-माव के 





ह द्द्त 
अन्कन्क>> फल अपन लिए >> कमन- ४० इसका ख्य >> 8 चला 
सभा के लिए झखला हुं | यहा इसका व्यापक्र रूप ह्‌ । भादा मर पृष्ठि क्ना स्पष्ट 


सनथधद हे | गाता के ऊअतुसार, सभा कदम करत हुए, भा बाद का जाद्वव लत 





ब के गज 5७ अमल 8 3 रू प्रगदाद >मन्‍बकन का 
हुए, भगवान का छंपा स हा ज्ाज्दतु पद का प्राप्ति होती है । भगवान क 
चिन्तन करने से सझी दावाए निराक्ृतत हो जाती हँ--उन्हीं को कृपा इसका 


कारण हूं ।7 कालकाल म कम-नादाद का णांकत का छ्ास हा गया हू । अत: 











5 उसके प्रति प्रम ही फलदायक ले ३ मार्ग इसलिए सर्वत्र 5 
कृष्ण का सवा उसक पात्र प्रम दा फलदायक हू पृष्टिमार इखालए सदवश्व 5 
हैं कि मगवान के रकण के कारण इसमें पठन-मय नहीं हैं । यही इस माय 
जि ही. 5 पे: प्रत किया £-- 
का वाचप्ट्य हू । सूर न भा इस मान का श्र 2दा का कथन कया हू 





उच्छालित कर... ममम>म»»--4०>> पाक» +म्याक बडे >> दर्शन कर 5 पीठिका ॥ <५«अ जिम जग 
उच्छालतव ह ॥ ऊपर के वबचदच स स्पप्डट हू क्कि बइद्धाइ्तत दशाच का पराठका मे 


मिरूपित गया है| वह जोर विश पंच एक ही है; 
अन का तत्त्व हा दिरहापत क्रिया गय हू्‌। उएुष्टद ताज ावशुद्ध अम एक हा हू ५ 
कत हू का बआावकल ब्रताक्न 








यगांपाजन हूँ । अठ: दे ही प्रम के गढ़ हैं। सर ने गोपियों को चरण-रज की 
समाहमा याइई हूं। जूरू भा इस रज का कामना करते हूं- 


तिनकी पद-रज जो कोड दुन्दावन भुद माँही । 
परस सोड गोपिका-ति लहे संशय रूाँहीं ॥ 
भृगु तातें में चरन रज गोपिन की चाहत । 
अति-मत बारंदार हृदय अपने अवगाहतता 


वापियों ३. आ को ध्य बा 


इनसे बाधपया के तांद चंद हू + सापानतचाए , गापा (कमारिका काए ) त्या 


इ्च्य्ख््श्षप 


अन्‍ननल नस गापा हल कम से (कक धरम किम के कलंकमन्‍यल पका ४... अ्वानाए- सनम... सकिममममुमानरिनपामा».. 3++3+>मदरमा--+नमाा+.... स्‍ामरामाक, 
बजा हुचाएं | तापाड्ुदाओआ न सब घम् पघारत्यज्यथ, तथा उादानबंद दूं 


साय स 
ञ्प साव्ल स्जब 52-22 पुरुपात्तर जे है गैह-कुकप्न्‍म- मु टी स्थिति 
नदत हाकर, सान्नात्‌ रूप से पुरषात्तन का चजन किया हैं। अतः इनकी स्थिति 





या 


००. 
दसक+>+-+यक 


[#) 8. ;०> बी] ह2फ जाता चित्र ध्ानज्त्यि 
परकीय नावासिक्तत व्यसन की हैँ । गोपाडुनानों ड्ूचाओला के अनके चनत्र सूर-ताहत्य 


र्पिं | | | 


पलक जोद नहों होत कब्हाई। 
घर ग़ुरुजन बहुतें विधि ज्ासत, लाज करावत लाज न जाई ॥॥ 





« गीता १८५६ 

सच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यति ६ गीता १४४८ 

- करृप्णश्चेत्सेब्यते भक्‍त्या कलिस्तस्थ फलाय हि ॥ (तत्त्वायंदीप, ११६) 
सार्योष्यं सर्वमार्गाणामुत्तम: परिकोतित:ः । 

यस्निनु पातनर्य नास्ति मोचकः सर्चया यतः ॥ (वही, २२२२) 


८ शी 


०६ ,(0 


६२ स्रसाहित्य : नव सुल्यांकन 


नेंन जहाँ दरसन हरि लटके, त्रवन थक्ते सुनिट बचन सुहाई । 
रसना और कह्ू नहि भाषत, स्थास-स्थास रटठ यहे लगाई ॥! 
चित चंचल संगाह संग डोलत, लोक-लाज मरजाद मिठाई । 
हरि लियो सुर प्रश्नु तद ही, तन वपुरे की कहा बसाईं ॥ 
दइसरी श्रेणी गोपी की है । इन कमारिकाओं ने कात्यायनी ब्रत आदिं 
पुरुषोत्तम का परोक्ष भजन किया है ।यथे 'पुष्टिमर्यादा का अतिनिधित्व करती 
पुप्टिपुप्ट' योपाड्ुनाओं से इनका यही भेद है । इनमें स्वकोय स्त्री-मावना 
ती है । माहात्म्यज्ञान की पीठिका पर यह आसक्ति सजीव होती है । इनकों 
अमीप्ट सुख रासलीलां द्वारा प्राप्त हुआ। चीरहरण लीला के समय इनका 


री वि 400 4| रै 


परोक्ष भजन कह्ृप्ण के प्रति प्रकट हुआ। सूर ने इसी भावना के लिए 
द्््ट्डज >> 
कहा हूं--- 

भजि सखि भाव-भाविक देव । 

कोटि सावन करों कोऊ, तौऊ न मारे सेद ॥ 

दर दर शरर् >< 

त्र॒ज बच्च बस किये मोहन 'सूर' चतुर सुजान ॥। 


तीसरी कोटि ब्रजाज्ुनानों की हैं। ये लोकवत्‌ वालमावना से भगवान 
का भजन करती हैं । इनका पारिभापिक नाम पुष्टि प्रवाह है। वात्सल्य 
नावना इसी की पुप्टि में है । इस भावना के विस्तार में सूर की तवृत्ति विशेष 


र्मा ट्‌ ) चाललाला के समः पद इसी भसादवता के प्रतीक हैं--- 

क्वोऊ कहे 'ललन पकराब मोहि पाँवरी', कोऊ कहूँ लाल बलि लाओ पींढी ।' 
क्ोऊ कहे 'ललन' गहाव सोहि सोहूँनी, कोऊ कंहे 'लांल चंढ़ि जाउ सीढ़ी ।। 
कफोऊ कहै 'ललन' देखो मोर कंसे नंचे,, कोऊू कंहे 'अ्रमर कंसे गुजार। 
कोऊ कहे 'पीरि लगि दौरि आवहु लाल, रोपधन मोतिन के हार वार ॥ 


कहने की जावज्यक्रता नहीं समस्त सूर साहित्य इन्हीं गोपी-मावनाओं 


की विस्तार कथा कहता हैं। इसी विस्तार में पुप्टिमार्गीय मक्ति का सार्वजनिक 
रूप है गेप दो कोटियाँ परिप्छतत 


नावुकों के लिए साथना-मार्ग हैं । इनका 
क्रमश: विकास एकान्त सेवा के रूप में होता हैं। तीसरी अवस्था उत्कट 
माधुर्य मावना का उदय होता है | इस प्रकार वल्लम संप्रदाय में चाल, दाम्पत्य 
सोर परकीय कांताभाव, तीनों की स्वीकृति है। स्वयं आचाय॑ जी न मधुरा- 
प्टक', 'परिवृद्धाप्क' तथा सुवोधिनी में मधुर मावना का विद्वद चित्रण किया 


हैं। यह भावना अ्म ही होगा कि इस संप्रदाय में मात्र वाल-माव की भक्ति 


सिद्धाग्त सम्प्रदाय ६३ 


को प्रश्नया मिला । वालभाव का संवंन्ध प्राय: मन्दिरों से रहा। इसका कारण 
यह हो सकता है कि सामाजिक रूप से यही भाव अधिक निरापद और स्वच्छ 
है | इंसके पतनोन्मुख होने की संमावना नहीं है। मांधुर्यमाव का प्रवेश तो 
आचार्य जी के समय में ही हो गया था, इसकी पुष्टि गो० विट्ठलनाथ जी ने 
की । एक सीमा तक उन्होंने चेतन्य- संप्रदाय की पद्धतिं का भी अनुकरण 
किया । इस परिवतेन के परिणामस्वरूप सूर की माधुर्याश्रित काव्यलता भी 
नवीन स्फृ्तियों से युक्त हो गई । सूर के प्रगाढ़ माधुयें को देखकर उन पर 
गोड़ीय, हरिदासी या राधावललमभीय प्रभाव का आरोपण अनावश्यक है । वैसे ये 
सभी सप्रदाय माधुयेवादी हैं। माधुयं को अन्तिम परिणति समान भी होती 
है । इससे अन्य संप्रदायों का प्रभाव सिद्ध नहीं हो सकता । सूर के अनेक पदों 
में माधुय की जो मामिक अभिव्यक्ति हुईं है, वह पुष्टिमार्गीय ही है । 


४. विग्रेह (स्वरूप) सेवी--पुष्टिमांर्गीय सिद्धान्त का तीसरा स्तर 
सेवा का है। सभी आचार्यो ने इष्ट के विग्रह को ध्यान केन्द्रित करने और 
मावनाओं को प्रेरित करने के लिए आवश्यक माना है। मन्दिर इसी सेवा 
भावना के लिए उचित परिवेश देते हैं : इष्ट-विग्रह भावनात्मक सेवा का ध्येय 
वनता है : भौतिक पूजा-विधान से तन और मन संभी वृत्तियों का निरोध 
होता है और प्रतिक्षण भकक्‍त की चेतना उसी विधान में संलग्न रहती है। 
पांचरात्र संहिताओं में इस विपय का पर्याप्त विस्तार किया गया है। इन संहि- 
ताओं में जहाँ ज्ञान [ब्रह्मम, जीव, जगत आदि का निरूपण], योग का निरूपण 
है, वहाँ देवालय का निर्माण, मूर्तिस्थापन, पूजा, नित्य नेमित्तिक कृत्य, 
मूर्तियों तथा यंत्रों की पूजा पद्धति, पर्व विशेष के उत्सव आदि का विस्तार भी 
मिलता है। एक प्रकार से इस विपय का विस्तार ही अन्य विभागों से अधिक 
हुआ है। 'क्रिया' और चर्या ही संहिताओं के प्रधान विषय हैं। यह विधान 
वेष्णव मन्दिरों में चरिताथें हुआ | इसको अपनी-अपनी भावनाओं के अनुसार 
सभी भवित संप्रदायों ने ग्रहण किया । “पुष्टिमार्ग! भी इसका अपवाद नहीं है। 
दक्षिण के मन्दिरों में इस विधि-विधान का परिपालन अधिक होता है। ब्नज में 
इस विधान में भी क्रिया की अपेक्षा भावना प्रधान हो गई । पहले दक्षिण के 
मन्दिरों में वेखानस संहिताओं में विहित पूजा-पद्धति प्रचलित थी । रामानुणा- 
चाय जी ने इसका विरोध करके पांचरात्र पूजा-विधि चलाई। तिरुपति के 
श्री वेंकटेश्वर के तथा कांजीवरमू के मन्दिरों में वैखानस पूजा विधान के कुछ 
चिह्न अब भी मिल सकते हैं । ब्रज में भावना ही मन्दिर-चर्या को अधिक से 


8४ सरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


अधिक प्रभावित करती गई । वललभाचार्य जी का इष्टविग्रैह श्रीनाथ जी का 
है । यह विग्रह आजकल श्रीताथ द्वारा (राजस्थान) में है। उस समय इसकी 
प्रतिष्ठा श्री गिरि गोवधंनव पर हुई थी। इसी प्रकार के अन्य विग्वहों की 
स्थापना गोकुल आदि स्थानों पर भी हुई । श्री वललमाचाय जी ने गिरिराज जी 
के 'मुखारविन्द' (जतीपुरा : ब्रज) की भावना का प्राकट्य किया । इस प्रकार 
एक प्रकार से समस्त गिरि गोवर्धन की भावना भी इष्ट-विग्रह के रूप में को 
गई । यहीं पुष्टिमार्गीय भौतिक सेवा-विधि का विस्तार हुआ। 'स्रदास' जी 
यहाँ त्िविध सेवा-मोग, राग, शछाद्धार-के राग भाग से विशेष रूप से 
संबद्ध थे । 

सेद्वान्तिक दृष्टि से. सेवा दो प्रकार की होती है : क्रियात्मक और 
भावनात्मक । क्रियात्मक सेवा के भी दो रूप हैं : तनुजा और वित्तजा। पहले 
प्रकार में शरीर, उसकी इन्द्रियों तथा कुटुम्बी जनों द्वारा होने वाली सेवा 
आती है ॥ द्रव्य या अन्य सामग्री के दाव आदि से की जाने वाली सेवा वित्तजा 
है। भावात्मक सेवा 'मानसी' होती है। इस 'मानसी' सेवा की सिद्धि के लिए 
भी तनुजा और/या वित्तजा सेवा आवश्यक है। 'मानसी' सेवा में इन्हीं के 
माध्यम से क्रमशः प्रवेश होता है । इस दृष्टि से क्रियात्मक सेवा सभी स्थितियों 
में अनिवाय है। इन सभी सेवाओं में ब्रह्मभावना-पुक्त बाल-भावना, स्वक्तीय 
भावना और परकीय भावनाओं का संचरण होता रहता है। 'मानसी' सेवा 
के द्वारा जीव चरमगति को प्राप्त होता है। क्रियात्मक सेवा के अनेक तत्त्व 
निर्धारित किए गए । 

सबसे पहला तत्त्व गुरु के आशय का है। 'सेवा' की पूर्ण सिद्धि के 
लिए यह आवश्यक है कि श्री कृष्ण के माहात्म्य और स्वरूप का निर्श्रान्तज्ञान 
होना चाहिए | भगवत्तत्त्ववेत्ता आचाय ही ऐसा ज्ञान करा सकता है। इस 
ज्ञान की उपलब्धि के लिए श्रद्धा और जिज्ञासा से प्रेरित भक्त को 'सर्वात्ममाव' 
से गुरु की शरण में जाना आवश्यक है। इसकी अन्तिम भावना में गुरु और 
ईश्वर में अभेद स्थापित हो जाता है | गुरु शरण का महत्व सभी संग्रदायों में 
मान्य है। सूर में गुरु के प्रति सर्वात्ममाव मिलता है-- 

भरोसो हृढ़ इन चरनन केरो । 
श्री बललभ नख-चंद्र छुटा बिनु, सब जग माँश अँधेरो । 

ऐसे भी पद हैं, जिनमें 'वल्लभ' शब्द गुरु और हरि दोनों का बर्थ 
प्रकट करता है । ऐसे स्थलों पर सूर की वृत्ति गुरु-हरि के में न 
के ज क का वृत्ति गुरु-हरि के अभेद में रमी हुई 


सिद्धांत सम्प्रदाय ध्प्‌ 


२. श्री बललभ अबकी बेर उबारो ॥। 
सब पतितन में विख्यात पतित हों, पावन नाम तिहारो । 
२. श्री वल्‍लभ भले बुरे तोऊ त्तेरे। 
तुर्माहू हमारी लाज बड़ाई, बिनती सुन प्रश्चु मेरे । 
यह गुरु के लिए एक प्रकार से आत्म-समपंण है, जो प्रभु के लिए 
आत्मनिवेदन की भूमिका बनाता है। 
दूसरा तत्त्व नित्यसेवाविधि है । इस सेवा का अष्टयास विधान है और 
वर्षोत्सव विधान भी है । प्रातःकाल से शयन-पर्यन्त इस संप्रदाय के मन्दिरों में 
झाँकियों और सेवा का विधान हम गया व्यपूजक" की वृत्तियाँ अन- 
वरत रूप से क्ृष्णापित रहती हैं; 2 उपूसक्षक्रो खजागनाओं ; | गोपियों और 
गोपाजूनाओं की भावनाओं का सम्रंविश करते हुए “नित्य- लीलाओं का'व्िधान 
किया गया है : मंगला, ४ ज्भार, शाला) [जभोग, उरकिक्ि,, भोग," सं्धया- १. 
आरती भोौर शयन । "लि हक 


में सपा लक कु 
मंगला में गुरु-स्मरण के पश्चात कप कृष्ण केनक्रेग्नह की जगाया जाता 
है । जगाकर उनको कलेऊ कराया जाता हैवक्रेंगलमोग. तत्पश्चात्‌ मंगला 
आरती होती है । इस समस्त प्रक्रिया में बाल-भाव भावित रहता है। ऋतु 
के अनुसार वस्त्र और सामग्री आदि की योजना इसमें रहती है। सूर के पदों 
में जागरण*, कलेऊ, तथा आरतीर आदि की भावना मिलती है। 'सूर' 
अनेक प्रकार की भावनाओं और संदर्भो के साथ इन सामयिक पदों का गायन 
करते थे । 'श्ृद्भधार' की भावना यह है : गरम पानी से स्‍्तान, अंग रागादि 
का लेपन और वस्त्रालंकरण ।४ शृद्धार के अनन्तर खझाड़ार भोग आता है। 
१. लाल नाहि जगाय सकत, सुन सुबात सजनी । 
अपने जान अजहू कान्‍ह, सानत सुख रजनी ॥। 
जब जब हों निकट जाऊ', रहत लागि (लोभा । 
तन की सुधि बिसरि गई, देखत मुख सोभा ॥। 
दोउ भैया माँगत संया पे, दे मेया दधि साखन रोटी । 
न्रजमंगल की आरती । 
क-जसोमति जबही कहयो नहाववन, रोय गये हरि लोटत री । 
तेल उबठनोौ ले आगे धरि, लाल ही चोटी पोदत री॥ 


ख-करति सिगार मेया सन भावत । 
>< >< . >% >८ 
पहिरो लाल झगा अति सुन्दर, आँख ऑजि के तिलक बनार्वात । 





०८ बण २० 


६६ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


तीसरी झाँकी ग्वाल' की है | इसमें <घेया” (दूध के फेव का पदार्थ) आरोगांई 
जाती है ।' चौथा दरशन राजमोग का है। शीतकाल में राजभोग घर में 
ही होता है और ग्रीष्मकाल में घृप के मय से कृष्ण बन-गमन जल्‍दी करते है 
और राजभोग की छाक' वहीं भेजी जाती है ।* छः: घड़ी जब दिन रहता है 
तब कृष्ण को जगाया जाता है। यह जागरण “राजभोग' के अनंतर 'अनोसर 
(--शयन) के पश्चात होता है । इसे “उत्थापन' का दर्शन कहा जाता है । 
उत्थान! के पश्चात 'भोग' के दर्शन होते हैं । जगने के पश्चातु लाल जी फल- 
फूल का भोग करते हैं। सातवीं झाँकी संध्या आरती” है: वन से गायों को 
लेकर कृष्ण ब्रज की ओर आते है । उस समय घर में आरती होती है।* 
अन्तिम झांकी शयन' की है। ब्यारू! (रात का भोजन) करायी जाती है। 
तत्पश्चात्‌ दर्शन आरती होती हैँ और कृष्ण के 'स्वरूप' को पौढ़ाया जाता हैं । 
इन सभी झाँकियों के भाव कीतेन का गायन 'सूर' ने विविध पदों में किया हू । 
'सूर' की क्रियात्मक सेवा का यही रूप हे । 


इन देनिक झाँकियों के अतिरिक्त संप्रदाय में वर्षोत्सतव भी मनाए जाते 
है | इनमें धामिक और ऋतुसंबन्धी भी उत्सव सम्मिलित है। इन वर्षत्सिवों 
को पाँच भागों में विभकक्‍त किया जा सकता है। पहले वर्ग में वे उत्सव आते 
हैं जिनमें लीला-मावना प्रधान रहती है ॥ नित्य एवं अवतार लीलाओं से 
संबन्धित उत्सव ये है : संब्रत्सर, गनगौर, अक्षयतृतीया, रथयात्रा, पवित्रा, 
जन्माष्टमी, राधाष्टमी, दा, झाँकी, नवरात्रि , रास, अन्तक्ट, गोराष्टमी, त्रत- 
चर्या । दूसरा प्रकार पटऋठुओं के उत्सवों का है--वसंत ऋतु (डोल), 
१. दे मेंया रो दोहिनी, दुहिं लाऊ गया । 
८ 2५ >< 
दुृहि लाऊ तुरताह तब मोहि करि दे घेया। 
२. जेंचत कान्हु नंद जू की कनियोँ । 
कछुकि खात, कछू धरनि गिरावत, छूबि निरखत नेंदरनियाँ। 
३. बहुत फिरी तुम काज कन्हाई । 
टेरि टेरि हों भई बावरी, दोउ भेया तुम रहे लुकाई । 
जे सव ग्वाल गये घर-घर कों, तिवतों कहि तुध्र छाक सेंगाई । 
४. बह देखो नंद की नंदवत आवत । 
वृ दावन ते गाय चराय के, कर धर बेनु वजाबत । 


सिद्धान्त संप्रदाय 8७ 


ग्रीष्मऋतु (फूलमंडली), वर्षा ऋतु (हिडोरा) शरद (राप्त) हेमंत (देव प्रवो- 
घिनी का जागरण), शिशिर (होली) । अन्य अवतारों की जयन्तियाँ भी मनाई 
जाती हैं : रामजयन्ती, नृसिह जयन्ती त्तथा वामन जयन्ती। चौथा प्रकार 
वंदिक पर्वों का है--मकर संक्रान्ति, ज्येष्ठाभिषेक, रक्षावन्‍्धन, दशहरा, दिवाली 
और होली भी मनाए जाते हैं । सभी वर्षोत्सवों पर संगीत-कीर्तत का विशिष्ट 
विधान किया जाता है। सूर के अनेक पद इन वर्षोत्सवों से संबन्धित हैं ।* 
कहने की आवश्यकता नहीं कि लीला-सम्वन्धी उत्सवों की भावना का विस्तार 
ही सर्वाधिक किया गया है। ऋतु सम्बन्धी उत्सवों में से सबसे अधिक पद 
रास, वसंत, होली और हिडोरे के हैं। इनमें भी बसंत ओर होली और भी 
प्रमुख हैं । 'सूर का संवन्ध मन्दिरों में चलने वाली क्रियात्मक सेवा से बहुत 
अधिक था | 


पुष्टिमार्गीय सेवा के तीन अंग हैं: भोग, राग, शुद्भार। भोग में 
भगवान के लिए खाद्य सामग्री निवेदित करने का विधान है। बाल या किशोर 
भावना, ऋतु और काल के अनुसार, भावपूर्वक यह सामग्री मगवान को अपित 
की जाती है | इसके अनन्तर यह सामग्री प्रसाद बन जाती है। सूर' का इस 
सेवांग से अधिक घनिष्ट संबन्ध तो नहीं था, पर कुछ पदों में भोज्य सामग्री 
का विवरण और विधि विधान अवश्य मिलता है । 


राग सेवा का प्रमुख अंग है। भगवान की लीलाओं के कीतेन में 
सभी रागनियों का प्रयोग किया जाना चाहिए। सुरसारावनी' के एक पद में 
राग-रागनियों की लम्बी सूची मी दी गई है। राग और लय के साथ कीतेन 
करने से मन अधिक तनन्‍्मय और एकाग्र होता है। 'निरोब' की प्रक्रिया में भी 
राग-कीतंन का विशेष महत्त्व है । 

सेवा में विविध वस्त्राभरणों से इष्ट वित्रह को विभूषित करना '्ृद्भार' 
सेवा के अन्तर्गत आता है। अध्ट-दर्शनों में भोग और शड्भार के दर्शनों की 
व्यवस्था तो है ही, राग-सेव्रा सबी प्रकार की सेत्राओं और सेवत्रांगों के साथ 
संबद्ध तत्त्व है । इसलिये राग की व्याध्ति अधिक है। सूर' ने श्ज्भार सेवा के 
लिए उपयुक्त वस्त्र और आशभूषणों की सूचियाँ भी दी हैं । 

मानसी सेवा की अन्तिम परिणति तो गोपी भाव की सिद्धि है। तनुजा, 
वित्तजा, क्रिय्रात्मक सेवा का आदर्श शरण है। गीता में शरण के भी दो 


१. विशेष विवरण के लिए हष्डव्य सूरनिर्णय, पु० २२७-२४४ । 


श्द सूरसा हित्य : नव मूल्यांकन 


स्तर हैं : 'सर्व कर्माण्यपि सदा” तथा 'सर्वेधर्मान्‌ परित्यज्य' । पहले में भक्ति- 
भावना पूर्वक सभी कर्मो को क्ृष्णापण किया जाता है और द्वितीय में सभी 
धर्मो का परित्याग करके भगवान की शरण में जाने का विधान है। प्रथम 
साधन रूप है, दूसरा फल रूप । क्रियात्मक सेवा इसी शरण के लिए भूमिका 
तैयार करती है । इसका मूल तत्त्व 'अनन्यता' है। सेवा में गृहीत शरण के भी 
इस प्रकार दो तत्त्व हो जाते हैं: सर्वे समर्पण और अनन्य भाव। ये दोनों 
पतिव्रत घमंरूप हैं। इस देह का उसके पति क्ृष्ण में इसी प्रकार विनियोग 
हो जाना चाहिए, जिस प्रकार एक नवेली--नवबंधू का अपने पति में । 
अत: इस क्रियात्मक सेवा का चरम आदर्ा पतिव्नत के रूप में स्वीकार किया 
गया हैं। जो इस सेवा भावना से विमुख करने वाले तत्त्व हैं, वे त्याज्य हैं ।* 
जाके प्रिय न राम बदेही' वाले पद में तुलसी ने भी यही वर्णन किया है | 
'सूर' ने सवे-समपंण के मूल्य को इस प्रकार कहा-- 
या में कहा घटगो तेरो । 
कर 2५ 2५ 
सब समपंण 'सूर' स्याम कों, यह साँचो मत मेरो । 
अनन्य भाव की स्वीकृति इन पंक्तियों में हैं--- 
यह बिधि' स्थाम लग्यौ सन सोर। 
2८ 7५ >< 
ज्यों पत्िव्रता नारि अपने सन, पिय कों सर्वंसु दे है । 
कृष्ण विमुखों का परित्याग भी अनिवाये है-- 
तजो मन हरि बिसुखन को संग। 
जाके संग कुबुधि उपजित हैं, परत भजत में भंग । 
अन्त में शरणागति के आदशे का कथन है-- 
ु राखो तंसे रहों जसें, तुम राखो तंसें रहों । 
५--उपसंहार 
इस प्रकार सूरदास जी ने शुद्धाइत दर्शन और पृष्टिमार्गीय भक्ति के 
तत्त्वों का पूर्ण परिपालन करते हुए, प्रत्येक भावना या मे क्तिमार्गीय, रागा- 
त्मक और काव्यात्मक विस्तार किया है। औपचारिकता के स्थान पर निजी 
अनुमवों के संयोग से सजीव संदर्भ की योजना के कारण संप्रदायाश्रित काब्य 


१. प्रोढ़ापि दुहिता यहत्तसनेहान्न प्रेष्यते वरे । 
तथा देहे न कत व्य॑ चर स्तुष्यात नान्‍्यथा | ( अंतः:करण बोध) 
२. तत्त्यागे दूषणं नास्ति यतः कृष्ण बहिसु खा । ( पंचश्लोकी) 





सिद्धान्त सम्प्रदाय ६६ 


भी विशुद्ध मानवीय सावभूमि पर उतर आया है। धर्म-संप्रदाय की आत्मा को 
तो ग्रहण किया गया है, पर इस प्रकार उसकी योजना है कि काव्य की आत्मा 
अक्षत रह सके । यही 'सूर के भवित्र साहित्य का वैशिष्ट्य है। इसमें संदेह 
नहीं कि सूर संत्रदाय के जहाज के र्‌प में सांजदाविक भावना का तिरस्कार 
नहीं कर सके । उन्होंने प्रष्टिमांगं का स्पष्ट उल्लेख किया है ।' संप्रदाय के 
आराध्यदेव श्रीनाथ” जी का स्मरण अनेकत्र किया गया है! 'नवनीत जिया 
जी तथा 'मधुरेश' जी भी प्रमुख स्वर॒प हैं। सूर ने इनको भी अनेक पदों में 
गाया है। संप्रदाय में सवसे अधिक महिमा यमुना जी और गिरिराज जी की 
है । यमुना जी का महिमा गान 'सूर' ने मृक्त कंठ से किया है।ई संप्रदाय की 
मान्यता के अनुसार मक्ति का केन्द्रीय त्तत््व 'प्रम है। प्रेम की परम सिद्धि 
विरह में होती है । 'सूर' ने विरह॒ का भहत्त्व कई स्थानों पर निर॒पित किया 
है 5 पुष्टिभक्ति की तीन अवस्थाएं हैं : स्त्ररपासक्ति (मिलिबौ नतन ही को 
नीकौ) लीलासक्ति (जहाँ श्री सहस्न सहित नित्त क्रोइत सोभित 'सूरदास') तथा 
भावासक्ति (माव विनु माल नफा नहिं पावं)। सूर ने इन तीनों ही आसक्तियों 
का पूर्ण भाव-विस्तार किया है। संप्रदाय की भक्ति का निरपण प्रपुखतः 
भागवत की सुत्रोधिनी टीका पर आधारित है। इमी में भावनाओं की भक्ति- 
मूलक परिणतियों का कथन किया गया है। सूर' ने भी इसे प्रमाण ग्रन्थ के 
र॒प में स्वीकृत किया है ।* बेद, गीता, ब्रह्ममूत्र और भागवत की समाधि 
भाषा के प्रस्थान चतुष्टय का भी अनेक स्थानों पर उल्नेख मिलता है। इन 
सभी तत्त्वों के आधार पर कहा जा सकता है कि सूर' का सांत्रदायिक्र 
व्यजितित्व भी पूर्ण था | यही सांप्रदाधिक व्यक्तित्व उनके भावात्मक व्यक्तित्व 
की पीठिका है । संप्रदाय में भावों का प्रचुर वेविव्य मिलता है। अतः सूर 
के भावात्मक व्यक्तित्व ने कमी अमावन और घचुटन का अनुभव नहीं किया । 

संप्रदाय का दर्शन पक्ष या वौद्धिक पक्ष एक एक सीमा तक ही सूर को 
प्रभावित कर पाये । 


७) 


'भावभक्ति सेवा सुमिरिन करि (पुष्टि पंय में धादे ॥' 

२. श्रींवाथ सकौो तो मोहि उधारो। 

३. श्री यघुनाजी अपनो दरस मोह दीज और 'श्री जमुने पतित पावन 
करेउ' जसे अनेक पद उद्धरणीय हैं । 

४. विरह बिनु नाहिन प्रीति की खोज । 

४. श्री सुकदेव के वचर आश्रय 'सुनौ सुब्योधिनी' टीकृत जिनकी । 


दिए कि 


चार ध्ट> 
स्व््ापछल्स्त्र च्टच्जन्प + 


सराच्तन्तयास्ट 


श्री बल्‍्लन ग्रुद तत्त्व सुनाया, लीला नेद बतायो । 
ओर # ५ 
ता दिन तें हरि लीला गाई, एक लक्ष पद बंद ॥ 
'सुरदास' नें सहत्नावधि पद किये ॥' 
सो तब सूरदास जी मन में दिचारे तो-में तो अपने मन में 
सवा लाख कींतेन प्रकट करिवे को संकल्प कियो है, सो तामें ते 
लाख कीतंव तौ प्रकट भये हैं ।..-वाही समय श्री गोवद्ध ननायजी 
आपु प्रकट होय के दरशन देके कह्मों जो--सूरदास जी तुमने 
जो सवा लाख कीर्तन को सत्र में सनोरथ क्ियो है, सो तो पुरन 
होय चक्‍्पों है, जो पचीस हजार कीर्तन मैंने पुरव करि 
दिये हैँ 

वार्ता 


साहित्य-सुजन : रचनाएं 


4 


झ्ट्जन के लिए जैसे उन्मुक्त व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है, वसा 
सूर को मिला था। वह अत्यन्त केन्द्रित, समर्वित और गतिशील 
था । दीर्घायु सूर को साधना की जहाँ आन्तरिक श्क्तियाँ उपलब्ध थीं, वहाँ 
कालगत अवकाश भी अधिक मिला । 'सूर की साहित्य राधना भाव विकास 
की दृष्टि से उत्तट और परिमाण की दृष्टि से विस्तृत होती गई । इस साधना 
के मार्ग में जो भी बाधाएं आईं, उनका निरसन भी उनका जाग्रत व्यक्तित्व 
करता गया । उनकी गतिशीलता जहाँ आन्तरिक शक्तियों से पुष्ट हुई थी, वहाँ 
उन्हें बाह्य परिस्थितियों के कारण भी भाव-विकास करना पड़ा : हीनताजन्य 
दैन्य--वल्ल मोकत वात्सल्थ--साधनात्मक मधुराभक्ति--विट्ठलोक्त शलद्धार- 
सेवा : इस प्रकार साधना के आयासों को नवीन उत्तेजना मिलती गई । किसी 
स्थिति में सूर ने स्थैयें या वासीपन का अनुमव नहीं किया | साधना में 
नवीनता और ताजगी बनी रही । साहित्य-प्ताधना के इस पूर्ण समर्पित रूप ने 
हमको जो दिया, वह किसी भी देश या युग के लिए गवे की वस्तु हो सकती 
है । सूर की दृष्टिहीनता के कारण बहुत कुछ लिपिवद्ध न हो सका : बहुत कुछ 
संग्रहीत न हो सक्रा : बहुत कुछ सांत्दायिक दृष्टि से काठ कर अलग कर 
लिया : बहुत कुछ बमी भी कहीं बंद पड़ा है । जो कुछ प्राप्त है, वह भी कम 
नहीं है । उत्तका सामान्य परिच्रथ आगे दिया गया है । 
रचना-तालिका-- 


सूरदास के नाम से कई रचनाएं प्रचलित हैं । इनमें से कुछ प्रकाशित 
हैँ ओर कुछ अप्रकाशित । इनमें से कुछ की सूचना खोज रिपोर्टो से प्राप्त होती 
है और कुछ का परिचय प्राचीन ग्रन्थागारों के संग्रहों से मिलता है। अब तक 
प्राप्त सूचनाओं के आधार पर उनकी २५ कृतियाँ वतलाई जाती हैं। उनकी 
सूची इस प्रकार है : 


साहित्य-सचृजन : रचनाएं १०३ 





मानना का कक गाव धतलोलो 4, ४०९ सरफच्चासा कि 2 
२. घूर साराददा 4४०: गांवद्नलाल (९० सूरपच्चार 
अवालयाइमबक सनक लत्नरोी श् जी आज ४» 2 लक गा] दिया 
२. साहत्य लहर ४९. दानलाला २०. सवाफल 
ध" हे मर अवरमीत ध 85 विनय हि 
<« २३७५ ७।९ १२- मवर्यांत २६- विचव के पद 
सनीयया-आ०--हमटमन- यह _सक, मदन ०.५ /लन जल अब. 7 अचल 
४- झानदत भसापा १२. नागलाला र२. हारवदा टीका 

















2. सूरद्ानर सार १४. प्रायय्यारी रथ. नल दमबंती 
७- छूर रानाबण १६. दृष्टि कूट के पद. २४. रामजन्न । 
८. मानलीला १७- सर झतक 
€. रावा रसकेलि कंततुह ८ श्द्ध सूर-साठी > 
93 उ 8 50 
इनमें से बन्तिम चार (२२-२५) अग्रामाणिक मादी जाती हैं ।* इनमें 
से छघुरसागर् स्वस्दीक्षत प्रामाणिक रचना है। अतः इसके अंग्रभूत वन्य 











अककनन्‍ा3--“सजाय--वाल्कतधन, अल सम्मिलित कक वनननसचकबनमपरन्‍रापपानतन प्रामाणिक सिद्ध न 7 
उद्बह जा उद्च छूच्ा म साम्मालद हू, च्चत्त गरीयिक् चर दा जात हू 
#%. 








सरसागर से समग्रहात पद सकलन य हूं : झागवत भाया, दशम स्कव साया, 





मसाचलाला राधारस --न्‍द्रा--->पहमननदत,. ९. की तक फ+ «५. ओला तिलक रन की /५+. अल. ह मकर 
सूरसामर सार, चर रामादथ, मसाचदाला, साधार्स कालए काउट्ूल, धाववध 


पक 


लीला ([सरसलीला) दानलीला, भंवरगीत, नागलोला, व्याहूदा, प्राणप्यारो, 


हृप्टिकिट प्ट्कट पद झान सुर्दाठक, सू रसागर कहा अशय नचच्करण हू | सूरु सारावला 








खार साहित्य लहरा का मिश्ववन्ध, रामचन्द्र शुक्ल, दा० दानदयालु मृप्त, 

















की हक के सााजए 202 कल $ रुजकीडमकाहुतत-मकयए पर हटा उम्म 2.34. >> लक दया डा 3०“ आकर 8. प्रसाद प्रामाणिक 

पघृ० उसददलार दाजपबथः, श्वा प्रददयाल माल दया डा० वदच[भ्चा5द सकाणदक 
आओ] भर 

मसादद् हू । कल डा० हुझरशचर दना द इन्ह परनचछ्त नहूा। सादा हू । इचद्च मद 














पर तअन्यत्र दचार कया ग्रया हु । इन दानव हउ्न्या के जात्रारक्त चार आर 


कक न, ख् 
शा प्चासा 


बलि #ऋ्र. 
हू + सूरचाठा, (८० पचासा, चदा- 





तनन्‍्द्र रचनाएं प्रामाणिक्र रूप से क््त 


है | 








«मदर “+6- “जनक बज जी अल, ८२० अर दिाप्रज पता समनन्नामक अनिल... अननननन--नक स्डन्त्पूाता मील अजअम 
फल दार चधृरदादय के उदय दाद के सूट पद | चधुर के ५४4४ को अयुस सास 
“न अल जल... जनक >> लक 2 > 7 जटटइश “० है ए >3.न्‍ ० >> >> 33० रन क 
चरसागर हू | साहत्य-लहरा कावब्यरूप ऊआार झादला का हांश से अपठा स्थान 








74 


अमन. 


पर सारादली का महत्व सर के संद्धान्तिक पक्ष और सांप्रदाथिक 











घारदन का च्यथट करद का 


> रु >> होप सार हइचासायं 
हंप्टि से लत्यन्त मह्त्ववूण हूं । अप चार रचताए 





्मममामका- जिम अधमााआ- नगर प्रक्रार धान धाागादुऋपम्पवइ ब्दा न्‍फकअअमनक्न्‍कणलासन-प्न नमक. जुट हु मैन 7/ रचचाएं कप नल मम कील, «६0-“अ फम्मणयाक--०+ मजाक. साहरााा-पी*हइकक 
छाटा हू । इस अकार सूद का झाद प्रामाणथक रचनाएं हुई | यद्याव इद रच- 


चर 
उ संनजज5ा था चाप्रक्‍लसा ूछप+ पिन ही धया बंज्ञानिक सडआ अं अनन 
साझा दे सदादव के झखचन्दत ने अयत्त हुए हूं, फिर सा पृण्य वन्धाचक ससकरण 











२. ढा० दीनदयाल गुप्त, अध्दछाप जौर वल्लभ संप्रदाव, प्रचम भाग, 


पृ० रृ६८ तथा पारीक्ष-मीतल, सुरनिर्णयं पु० १०५ । 


१०४ सरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


सर की उक्त प्रामाणिक रचनाओं को संदर्भ की दृष्टि से तीन भागों में 
रखा जा सकता है : स्वान्तःसुखाय कृृतियाँ, दूसरों के लिए लिखी कृतियाँ 
तथा संप्रदाय के लिये प्रस्तुत रचना । 'सूरसागर' और स्फुट पद, पहले विभाग 
में आने वाली रचनाए हैं । इनमें संप्रदाय के तत्त्वों का सायास या सचेष्ट 
समावेश नहीं है । पूर्णतः भाव-समर्पित होकर सूर ने कृष्ण-लीलाओं की भावा- 
त्मक स्फीतियों का उद्घाटन किया है। जहाँ स्नोत--भागवत-के कथा- 
प्रसंग बन्धन बने हैं, वहाँ विवरणात्मक या इतिवृत्तात्मक पदों की रचना करके 
सूर ने मुक्तिलाभ किया है और फिर भावापिंत व्यक्तित्व स्वतन्त्र 
साधना में लगा है| 'सूर' का व्यक्तित्व दूसरों के प्रति उदासीन नहीं था। 
दूसरों के प्रति सहानुभूति, उनकी जिज्ञासा और आातुरता ने भी 
सूर/ को कुछ करने के लिए उत्तेजित किया । दूसरों के लिए जो 
साहित्य-रचना की गई, उसके भी दो विभाग हैं : चेतावनी पूर्ण रचनाएं और 
एक विशिष्ट पद्धति के भावोदबोघन के लिए की गई रचनाएं : चेतावनी पूर्ण 
रचनाओं में 'सूरपचीसी' 'सूरसाठी आती हैं। सूर के ऐसे पद जो किसी 
ज्वारी के लिए या अन्य किसी भ्रमित व्यक्ति के उद्धार के लिए लिखे गये, इसी 
श्रेणी की रचनाएं कही जायेगी । 'साहित्यलहरी” काव्य पद्धति से मक्ति रसोद- 
बोध के लिए रची गई | 'स्रसारावली और 'सेवाफल' सांप्रदायिक दृष्टि के 
स्पष्टीकरण और उसकी प्रतिष्ठा के लिए लिखी गईं । संक्षेप में-- 


--भागवत्तोक्त कथाश्रित 
--विनय पदावली 
“शुद्ध लीला-भाव-संकुल 





--स्वान्त: सुखाय : सूरसागर 


सूर की रचनाएँ “विशेष भावोदुबोधनार्थ 
-5परार्थ 
--चेतावनी के लिए 


5 .सारावली (संद्धान्तिक) 
“7 सेदायार्थ 


“ज्यावहारिक (सेवाफल) 


सूर सारावलि-- 


सूरसागर की कुछ मुद्रित प्रतियों के मारम्म में यह ग्रन्थ संग्रथित है । 
इसमें ११०७ तुके हैँ । इसके संबन्ध में यह मान्यता रही है कि इसमें 'सूर- 


साहित्य-उचुजव : रचनाएं १०५ 


सागर का सार दिया गया है अथवा सूर के सवालाख पदों का यह सूचीपत्र 
हैं । इसमें स्त्रयं इस प्रकार का संकेत है : 


णि।/ 


श्रीवललन गुरु तत्त्व चुनायौ, लीला-भेद बताया । 

ता दिन तें हरि लॉला गाई एक लक्ष पद बंद । 

ताकी सार 'सूरां सारावलि गावत अति आनंद ॥7 

डा० ब्रजेश्वर वर्मा ने इस ग्रन्थ को अप्रामाणिक माना है :* “.. यह 
निस्संक्रोच कहा जा सकता है कि कथावस्तु, भाव, भापा, शेली और रचना के 
हृश्कोण के विचार से 'सूरसागर-सारावली' सूरदास की प्रामाणिक रचना 
नहीं जान पड़ती ।* डा० वर्मा ने अपने अभिमत के समथ्थन में सूरसागर और 
सारावली के वीच २७ अन्तर दिखलाए हैंँ। साथ ही डा० वर्मा ने यह भी 
लिखा है कि 'सारावली' सूरसागर के पदों का सूचीपत्र नहीं है। यह एक 
स्वतंत्र रचना है, जिसकी कथयावंस्तु में सूरसागर की कथावस्तु से घनिष्ठ त्ाम्य 
होते हुए मी उसे निश्चित सूरसागर का संक्षेप नहीं कह सकते ॥*”* श्री 
द्वारकादास परीख और श्री प्रभुदबाल मीतल ने इस ब्रन्ध की प्रामाणिकता 
का परीक्षण अन्तर्साक्ष और सांप्रदायिक साक्ष के आवार पर किया है ।* पहले 
तो उन्होंने बह सिद्ध किया है कि यह सवालाख पदों की सूची नहीं है| वास्तव 
में यह एक स्वृतन्त्र रचना है। इसकी विपयवस्तु और सूरसागर के कीेन 
भाग की विपयवस्तु में इतना साम्य है, जो सूरसागर और सारावली के एक 
ही कर्त्ता को सिद्ध करता है। अन्त में उन्होंने इसे पूर्ण प्रामाणिक रचना 
माना हैं । 
सारावली की सूचना के अनुसार इसकी रचना कवि ने ६७ वर्ष की 

बायु में की थी ।* जो लीला रहस्य झिव के लिए भी अमप्राप्य था, उसका 
साक्षात्कार कवि ने गुरुकृपा से ६७ वर्ष क्री अवस्था में किया। यदि जन्म 
संवत्‌ की दृष्टि से ६७ वर्ष की अवस्था देखी जाय, तो इसका रचना काल 
सं० १६०२ वि० ठहरता है। मीतल जी ने विपय वस्तु के साम्प्रदायिक दिकास 





सूर सारावलि, तुक्त ११०३ 

सूरदास, एृ० रे 

वही पृ० ७० 

सूर-निर्णय, पु० १०७-१४३ 

गुरु प्रसाद होत यह दरसन, सरसठ घरतस प्रवीन | 

सिव विधान तय करेऊ बहुत दिन, तऊ पार नहीं लीन । तुक, ११०२ 


$ 


[रह कण दु० (० 


१०६ सरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


की दृष्टि से इसी रचना काल को उचित कहा है| साथ ही यह सूरसागर का 
सूचीपन्न न होकर एक स्वतन्त्र रचना सिद्ध होती है । 

इसकी विषयवस्तु को भी कवि ने स्पष्ट किया है। उसने लिखा है कि 
आरंभ में मैंने कमेंयोग और ज्ञान-योग के मार्गों को अपनाया और अ्रमित 
होता रहा; अन्ततः श्रीवल्लभाचार्थ जी ने लीला-रहस्य का उद्घाटन किया 
और मैंने भगवान की लीलाओं का गायन आरम्भ कर दिया ।* इससे प्रकट 
होता है कि सर ने भगवान की दिव्य लीलाओं का तात्त्विक स्वरूप इसमें रंपष्ट 
किया है। लीलाओं का सांप्रदायिक दृष्टि से तत्त्व निरुपषण ही कवि की इस 
रचना में अभीष्ट है। वार्ता-साहित्य के साक्ष से प्रतीत होता है कि शरणागति 
के समय महाप्रभु॒ वल्लभाचायें जी ने “दशम स्कंध की अनुक्रमणिका' और 
'पुरुषोत्तम सहस्ननाम' सुनाया था । इसी प्रारम्भिक ज्ञान के आधार पर सूर 
को श्री वललभकृत 'सुबोधिनी' का बोध हुआ था । 


“पाछें आप दशम स्कंध की अनुक्रमणिका करी हती सो सूरदास कों 
सुनाये....सो सगरी श्री सुबोधिनी कौ ज्ञान श्री आचार्य जी ने सूरदास के 
हृदय में स्थापना कियौ ।....ता पाछें श्री आचाये जी ने सूरदास कू' पुरुषोत्तम 
सहखनाम सुनायौ । तब सगरे श्री भागवत की लीला सूरदास के हृदय में 


स्फुरी । सो सूरदास ने प्रथम स्कंघ श्री भागवत सों द्वादस स्कंध पर्यत कीर्तन 
वर्णन कियो ।* 


इस प्रकार “पुरुषोत्तम सहख्नाम' के श्रवण के पश्चात्‌ सर को समग्र 
विषय का अंतर्शान हुआ । पुरुषोत्तम सहख्ननाम” वास्तव में श्रीमद्भागवत का 
सार समुच्चय' ही हैं । श्रीमद्भागवत में से ही महाप्रभु ने शुद्धाद्व त” सिद्धान्त 
प्रतिपादक एक हजार नामों को उद्घृत कर “पुरुषोत्तम सहख्ननाम' की रचना 
की है|” सूर ने तत्त्व सुनायो' भौर लीला भेद वबतायो” से इन्हीं तत्त्वों की 
ओर संकेत किया है। “तत्त्व का यहाँ तात्पय है--शुद्धाहत दर्शन की दृष्टि से 
भागवत का तत्त्वाख्यान । पुरुषोत्तम सहख्ननाम में महाप्रभु जी ने मागवतोक्त 
१. सूर निर्णय पृ० १०९ 
२. करम-योग पुनि ग्यान उपासन सब ही श्रम भरमसापौ । 
श्री बललभ गुरु त्तत््व सुनायी लोला-भेद बतायौ॥ 


सु० सारावलि, तुक ११०२ 








३. पाचीन वार्ता रहस्य, पृ० १४-१५ 
४. सूर निर्णय, पृ० १२१२ 


साहित्य-पृजन : रचनाएं १०७ 


सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और 
आश्रय नामक दद्म विव लीलानामों का स्कंधानुसार निरूपण किया है। 'लीला- 
भेद वतायौ से सूर ने इसी लीला-दर्शन के प्रवोव की ओर संकेत किया है । 
लीला-तत्त्व का बोच समग्र भागवत के अर्थ-बोवब का सूचक हैं। इसी समग्र 
अर्य को सूर ने सादरावली में अनुस्यूत किया है । श्रीमद्मागवत की लीलाओं 
का कथासूत्रावलंवी माव-विस्तार सूरसागर में किया गया है और उसी का 
सरल मापा में तत्वाव्यान सारावली में । 'सारावली' में कथासूत्र और भाव 
विस्तार की ओर कवि का इत्तना ध्यान नहीं है, जितना तत्त्व के स्पप्टीकरण 
की ओर | उसके सिद्धान्तात्मक सर्गादि दशविध लीलाओं के सार-तत्त्व रूप से, 
जिसको उन्होंने सारावली नाम दिया है ।7' सार का तात्पर्य संक्षिप्ति या 
सूची नहीं है । इसका अर्थ है सिद्धान्त का सार या तत्त्व! सूरसायरा यदि 
कीर्तेन-काव्य है, तो सारावली सिद्धान्त काव्य । महाप्रमु जी ने दघ्यवा लीलाकों 
का समग्र तत्त्व सूर के अंतः:करण में प्रतिष्ठित कर दिया था । इसी के फंल- 
स्वृह्प लूर स्वर्य सागर वने थे । इसी सागर के तात्तविक रत्नों का आकलन 
'सारावली में है। पुरुषोत्तम सहच्ननाम' और सारावली” के अनुक्रम और 
विवेचन में पूर्ण साम्य है । सारावली की रचना का उद्देश्य सूरसागर' के 
उद्देज्य से भिन्‍न है 

सारावली के वियय का एक दूसरा विभाग भी है--सरस संवत्सर 
लीला । डा० मुझीराम जर्मा ने 'सरस नामक संवत्सर की कल्पना की है ।* 
वास्तव में इसका अर्थ है संवत्सर की सरल लीला ।*_ वर्ष भर की दान- 
मानादि रखात्मक लीलाओं का निरूपण भी 'सारावली' में हुआ हैं । रसात्मक 
श्रीकृष्ण ने घुद्ध आनन्दमबी लीलाए ब्रज में की थीं। इन शुद्ध आनंदमयी 
लीलाओं की स्थिति ब्रज में है । थे लोलाएँ नौतिक नहीं, शुद्ध मावमय हैँ। 
इन्हीं लीलाओं का गायन पदुन, ऋह्क्त, वाराह आदि पुराणों, श्रीमद्भागवत्‌, 


पं जल हला सारद "322० पांचरात्र सकता, आदि 4... कि अमल पम--- पके +जमत. 5 पृष्टिम 382 अश नम 2042 था विधान 22-4८ 
गर्ग सहिता, नारद पांचरात्र आदि में हुआ है। पुष्ठिमार्गीय सेवा-विधान में 
[8 बरव-ब०ा अन्‍य >2>म्या यू >> >> जल बन सकाक समन बुकममइुछ < हि०००-लशआम्ममाई 8: लालाड न “2 अब संचद्ध चबप [स्सिवों ह अल्नननक 
मा इनका महत्ववृग स्थान ६। इस लालाओआ से संबद्ध वषात्सवा का तथा 


नित्य भावनाएं हैं। नित्य की नावनाएं लीला-्चर्बा से सम्बन्बित हैं। 
नन्‍्द-मवव की वालमावना और निकुंज की किशोर-मावना तक नित्य-भावना 





१. बही प० १२४ 
२- सुर सौरन, द्वितीय भाग, पु० ३३ 
३. सूर लिर्णय, पृ० १३३ 


६०८ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


का विस्तार है| प्रातः:काल से शयन पर्यत नित्य-मावना के अनेक रूप घटित 
होते है । वर्षोत्तत की लीलाओं में प्राकट्य से लेकर, ऋतुपरक लीलाओं 
(हिंडोलना, होली आदि) तक का भाव-प्रसार समाविष्ट है। सूरदास जी ने 
रसात्मक कृष्ण की इन नित्य और वर्गोत्सव की भावनाओं से आपन्न लीलाओं 
का क्रमबद्ध वर्णन 'सारावली' में किया है ।'* वर्षोत्सव भावनाओं का आरम्म 
जन्माष्टमी से माना गया है । यदि विपय के पूर्वद्ध में शुद्धाहत दर्शान का 
तत्त्वान्वेषण किया गया है, तो उत्तराद्ध मे पुष्टिमार्गीय सेवा भावना का स्वरूप 
और अनुक्रम स्पप्ट किया गया है ।* इस प्रकार सारावली बुद्धाहव त दर्शत और 
संप्रदाय में मान्य लीला-भावनाओं का कथन करने वाला ग्रन्थ है। इसकी 
रचना में शुद्ध सांप्रदायिक उद्देश्य निहित प्रतीत होता है ।. 

सूर की गलीगत प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर भी 'सारावली पर 
विचार किया जा सकता है| सार, सूचीपत्र या संक्षिप्ति देने की प्रवृत्ति 
सूरसागर' में मिलती है। 'सूरसागर' में प्रायः एक" लीला प्रसंग को एक 
लम्बे पद में कह दिया गया है। यह लम्बा पद प्रसंग के आरम्भ, मध्य या 
अन्त, में कहीं भी हो सकता है | इसकी शली भाव-प्रवण पदों से भिन्‍न होती है । 
वहुधा 'चौपाई' या सारावली की 'तुक शैली का प्रयोग ऐसे पदों में हुआ है। 
इन लम्बे पदों में आये संभावनापूर्ण भाव-सूत्रों का विस्तार कीतंन-पदों में 
किया गया है। लम्बे पदों की शैली बहुध्ा विवरणात्मक रही है। जिस प्रकार 
एक प्रसंग के सार को समेटे हुए लम्बे पद सूरसागर में मिलते है, उसी प्रकार 
समस्त भागवतोक्त लीला-पु ज का भी सार विवरणात्मक शैली में दिया जाना 
भाश्चयें की वात नहीं है । जहाँ सूरसागर के लम्बे पदों में आये भाव-सूत्रों का 
प्रसार कीतेन के गेय-मुक्तकों में किया गया है, उसी प्रकार सारावली में सैद्धा- 
न्तिक विस्तृति की ओर कवि का व्यान रहा है। जहाँ कीत॑न पदों में भावों की 
ज्ञात-भज्ञात छवियों की खोज और उनकी निवृत्ति 'सूरसागर' के कवि को 
अमीष्ट है, वहाँ सांप्रदाधिक सिद्धान्तों का स्पष्ट कथन सारावली के कवि का 


अभिप्रेत है। इस प्रकार सारावली में कवि की एक शलीगत प्रवृत्ति का ही 
सद्धान्तिक विकास माना जाना चाहिए । 





१. सूर सारावलोी, तुक ८७० से १०८६ 


२. इन लोलाओं ओर भावनाओं के विशेष परिचय के लिए हृष्टव्य, सुर 
निर्णय, पृ० १३४, १४२ । 


साहित्य-सुजन : रचनाएं १०६ 


'सारावली' का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने पर ज्ञात होगा कि 
इसमें सर के व्यक्तित्व का बौद्धिक पक्ष ही विशेप सजग है । वललभाचार्य जी 
ने सूर के व्यक्तित्व का बौद्धिक परिष्कार भी किया था और भावात्मक उन्नयन 
भी । वौद्धिक दृष्टि से सूर को संप्रदाय सिद्धान्त और सेवा विधियों का 
यथार्थ ज्ञान कराया गया । वल्लभाचार्य जी के पश्चात्‌ यही एक ऐसा व्यक्ति 
था जिसने आचार्य जी के श्रीमुख से संप्रदाय के रहस्यों को सुना था और सभी 
का मर्मस्पर्श किया था । आचाये जी के व्यावहारिक जीवन को जितने समीप 
से सूरदास जी ने देखा था, उतने समीप से सम्भवतः किसी ने नहीं देखा था । 
संप्रदाय के सिद्धान्तों की उलझनों को सूर बिना लिखित प्रमाण और ज्ञान के 

अत्यन्त सरलता से सुलझा देते थे । इस दृष्टि से उन्होंने एक रचना ऐसी करना 
“उचित समझा जो संग्रदाय के तत्त्वों का निरूषणे"कर सके । स्सष्ट: इसके दो 
विभाग प्रतीत होते हैं : विशुद्ध सैद्धान्तिक और वर्षोत्सिवों' की व्यावहारिक 
सेवा विधियों से संबन्धित । 

इस रचना मे 'सूर' को सांप्रदायिक-दायित्व से मुक्त किया। इस 
दायित्व को पूर्ण करना सूर के लिए इसलिए भी आवश्यक हो गया कि उन्हें 
माव-साधना के लिए पर्याप्त अवकाश मिल सके । सांप्रदायिक सिद्धान्तों का 
ज्ञान उनके लिए गर्व की वस्तु भी वत सकती थी, पर सूर की हृष्टि विशुद्ध 
भावात्मक थी । उन्हें लीलासक्ति का ही विस्तार करना भअभीष्ट था। उसके 
लिए व्यावहारिक या लौकिक जीवन से वे संदर्भ चुनने थे जो लीलासक्ति को 
सेद्धान्तिक जड़ता से मुक्त करके समग्र अभिव्यक्ति को सजीव कर सके। अतः 
सारावली' की रचना करके वे सांप्रदायिक दायित्व से मृक्त हो गए--एक 
बद्धता को समाप्त किया । इससे उन्हें अपनी निजी साधन के लिए अपेक्षित 
स्वच्छन्दता मिल सकी। 


साहित्य लहरी---[ रचनाकाल--सं० १६०७-१६२७ के वीच कहीं । ] 


इसमें ११८ दृष्टकट पदों का संग्रह है: डा० ब्रजेश्वर वर्मा ने इस 
कृति को सूरक्ृत नहीं माना है ।* अधिकांश विद्वानों ने इसे सूर की प्रामाणिक 


१. इस रचना का प्रकाशन सबसे पहले बा० हरिव्चन्द्र की प्रति के आधार 
पर सन्‌ १८६२ ई० में खड्गविलास प्रेस से हुआ था। पुस्तक भंडार, 
लहेरिया सराय ने इंसका पुनप्र काशन सं० १६६६ में किया । 

२. सूरदास, पृ० ८७,६३। 


११० सूरसाहित्य : नव सुल्यांकन 


रचना के रूप में स्वीकृत किया है।"* इस वर्ग के विद्वान इस रचना के केवल 
दो पदों--१०६ तथा ११८--को प्रक्षिप्त मानते हैं। पद संख्या १०६ में 
साहित्य लहरी का रचना काल और ११८ में सूरदास का वंश परिचय दिया 
गया है । डा» ब्जेद्वर वर्मा ने इसे अप्रामाणिक मानने में एक यह तक भी 
दिया है: 'सूरसागर जैसे वृहद्‌ ग्रथ में कवि अपूनी रचना के विषय मैं मौन 
रहा हो, वह साहित्य लहरी' जैसे असफल प्रयत्न में नाम और रचनाकाल में 
इतना मुखर हो जाए, यह भी उसी प्रवृत्ति के प्रतिकूल जान पड़ता है” । इस 
तक॑ का समाधान उक्त दो पदों को अमान्य ठहरा कर हो जाता है। 
अधिकाँश विद्वान इन दो पदों के अतिरिक्त समस्त रचना को प्रामाणिक 
मानते है । 


डा० वर्मा का दूसरा तक साहित्य-लहरी - की शैली और भावना को 
लेकर है । एक सिद्ध भक्त से यह आशा, नहीं की जाती कि वह शुद्ध साहित्यिक 
उद इय से किसी साहित्य-रचना में प्रवृत्त होगा ।* यह एक प्रकार से नायिका- 
भेद का लक्षण ग्रंथ सा बन गया है। हशली-में चमत्कार की सृष्टि कवि का 
उद्देश्य प्रतीत होता है। क्‍या ये दोनों प्रवृत्तियाँ 'सूर की कही जा 
सकती हैं ? 


संप्रदाय में रसेश्वर कृष्ण की प्रतिष्ठा थी । श्रूति ने भी उसे 'रसो 
वे स: कहा और भगवान की रसात्मक लीला-मावना और कल्पना के लिए 
द्वार उन्मुक्त कर दिया | बाह्य जगत में जहाँ-जहाँ रस-कणों की स्थिति है, 
वह भगवान के रस को ही छाया है ।* अश्छाप के कवियों में भी इसी भावना 





सूर्रानर्णय, पृ० १४३ | 

“साहित्य लहरी के प्रणयन में उसके कवि की प्ररणा साहित्यिक है, 
भक्ति नहीं ... ।....साहित्य लहरी का रचना फाल स० १६२७ माने तो 
यह स्वीकार करना पड़ेगा कि यदि सूरदास ने इसकी रचना कीं है, तो 
अपनी मृत्यु के कुछ ही पहले उन्होंने अपनी भक्ति भावना पूर्ण मनोदृत्ति 
में आकस्मिक परिवर्तन कर दिया और मात्तो वे अपने साधन को साध्य 
रूप में ग्रहण करके मरते-मरते एक असफल और शिथिल लक्षण 
ग्रथ रचक्वर अपने भावी साहित्यिक बन्धुओं का नेतृत्व करने के लिए 
तत्पर हो गए “सूरदास, पृ० ६३॥। 

३. सुबोधिनो, तु० स्क., १५-३६ । 


साहित्य-चूजन : रचनाएं १११ 


दा अचत्तरप हुझ्ला था ! इस प्रकार लोकिक रस-लप समांपष्रच्उन्त हप से 

पैक्चिक्ष रस-रूप का, सलौक्तिक छाया का संकेत 
बलोक्षिक संदन्ध रखता हूँ । लाकिक्न रस-हूप का, अलाकंक छादा के चंद 
करते हुए, दयन करना रा वाजतद नहा हू। शामइुनाववत्त म भी रास पंचा- 


घध्यायी के उन्तिम अध्याय में यही दात कही गई--- 
एवं शच्चाड्रांशु विराजता निशा: संसत्यकामोष्चुरतादला गण: । 
छ्िदेव सात्मन्यपस्द्धसोौरत: सर्वाः झरत्काव्यकया रसाध्रया:।। 


बिक 


किन श्दा पतन 


इस कृधद से घ्वनित होता है कि काव्य-रस की पद्धति से दी मगवान 


छण्यण दे लाला वित्तार किया था । इसका स्पष्डाक्रण महाजन दल्लसादचाय 





# ब््फ दिया दाव्यात्त रा 3. 2०-43 गीदति 27-4० £०- संगदाद 0-३ ०माकन्‍य कट नक, पक 
जऊीचऊिया : काव्याक्त सीत्र या गांद्ध गोविन्द हक पद्धति से भी अधरदाव च 
रुमय किया ।* मागदद आर पक्ति-आचारयो के एस सकता का पाकर ही 


ह्दार्या 


अत्ति-रस च्ट्लो चऋचव्यप्तात्दईंद ल्याड्दा का चुत्रपाक ह्का ! भतक्तिक्ताव्प पच्फ्कांण्य हे सदस्य 





दो दर्जेव रोतिकार हुए । दंगाल रे मदुसूदन सरस्वती, रूपयोस्वामी, * कवि 


कृणपुर ग्ास्दामा दार जीवमोंस्थार्म वगोस्वामी ज्स भरक्ति त्नःरस वे कागगचध्यशासक्छताय 








दाचाय हुए ॥ सवथय दतल्लनाचा कल्लमाचाय जी ने क्री अपना मन्तव्य इस संदध में स्पष्ट 


पु न शक ७०» 7०5 नम... ह.। “माफिया 4५० 05०५ न संवन्ध 02 
॥5- सर्सा चद लक्षाकको रात्तर के चसदच्ध सम 


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जा अल 
पुछ कंहा ढ़ | 


25६९ फऔच्चलजऋपए 





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ह4)| ” ( श्र्ग 


स्वीकार किया हैँ कि साहित्य या काव्य के भाव 


संगदद झालद्वच स सदंद्ध हांकर शुद्ध मक्तिमाव का आश्रय ग्रहण करते हैं, तो 











हक 2० >> हक #०-रंऑर्सिकिएं॥० सो _फिलनमय. पोपक्त चिकम्म्या०>-मम्पााक 
उदात्त हो जाते हूँ। दे शुद्ध ह क्तिरस के बाधक न होकर पोपक्ष बन 
जाचाच अ ० शुद्ध अरब खाद शा ३७० चकमक. पक्षिरस 38४४ है ४ चत्ति ०. ही वंच्तीएो ०३ साहित्यभाद २3०० पहन्ग्यु- >सन्‍्बमस- झावों 
ऊत हैं। शुद्ध भाव (ध क्तिरस) अपनी झरक्ति से संकीण। (साहित्यभाव ) व्‌ 
की भी पृष्ठि करके लपना ऊझंँग दचा लेता हैं। साथ हो उन्होने वह भी ल्वोकार 


किया हैं कि भक्तरस में शजझ्ञार ( काव्यशास्तीय ) का मिश्रण, प्रथम को 
वलदव॒त्तर और तीक्षतर दना देता है । इस प्रकार काव्याक्ष्त लोकिक नजर स॑ 
समन्दित भक्तति जाह्य हू १ 


१- रूप प्रंस आनन्द रस जो कछु जग में आहि! 
सो सब गिरिघर देद कौ निघरक बरनों ताहि॥ 

२. काव्यकया अपि नीता: । क्ाव्योक्षत प्रकारेण गीतगोविन्दोक्तसन्यायेनारपि 
रते ऋतवान्‌ । तत्र हेतु रताधया इति । सुदोधिनों १०-३३-२६।॥ 


३. इनका ब्रन्य नगवदनक्ति रसायन हैं । 

४. इन्होंने भी हरिनक्तिरसामृ्तासन्धु' नामक ग्रथ की रचना को । 

५. इस हृष्दि से इनका अलंकार कौस्तुन भामक ग्रंथ उल्लेखनीय है 
दर 

च्कूक 


'रासपंचाब्यादी की सुदोघिदी टीका में इस प्रकार को व्याल्या को 


गई है । 


११३ मुरसाहित्य : नव सल्यांकन 


रूपगोस्वामी की विचारणा कुछ भिन्‍न प्रकार की है। उनके अभिमत 
का सार इस प्रकार है: मक्तिकाव्य की आत्मा मक्तिरस है । यदि मक्तिकाव्य 
में काव्यरस की प्रधानता हो जायेगी तो श्युद्धार, हास्य, करुण आदि की अभि- 
व्यक्ति होगी । यह अभिव्यक्ति भक्तिकाव्य का दूषण ही कही जायेगी | जिन 
काव्यों में लौकिक भावों की ध्वनि या रस-घ्वनि का संचार होगा, उनसे भक्ति 
का समर्थन नहीं हो सकता । यदि काव्योक्त भाव प्रधान हो जायेंगे, तो मक्ति 
रस अखंड नहीं रह पाता । यदि काव्य रसों की कुछ भी स्थिति है, तो गोण, 
अगभूत रूप में । काव्योकत रस भक्तिकाव्य में स्वतन्त्र न होकर मक्तिरस के _ 
आश्रित रहते हैं क्योंकि इनके आलंबनं-आश्रय क्ृष्ण हैं तथा विपय मकतगण । 
इस प्रकार अंगभूत रूप में ही सही, काव्योक्त भावों और विधान का कुछ स्थान 
मक्तिकाव्य में है। 


इस प्रकार बंगाली वैष्णव आचार्चो ने मक्ति-साहित्य को लक्ष्य करके 
भक्तिमुलक रस-शास्त्र के लक्षण ग्रथों का प्रणयन किया । आचार्य वलल्‍लम ने 
भी भागवत के आधार पर मक्तिमूलक मधुर भाव की कुछ शास्त्रीय व्याख्या 
की । वल्‍लमभाचारयय जी की दृष्टि में राधाकृष्ण की श्ृद्धारलीला लीलारस' के 
अन्तगंत आती है । भागवत इस लीला-रस का पोषण करती हैं। लीलारस' 
काव्य सामान्य रस-काव्य से श्रे छतर है | इस श्र छता के मूल में भक्ति में अनि- 
वार्य रूप से व्याप्त उदात्तता, पवित्रता और अलौकिकता जैसे तत्त्व हैं । आचाये 
महाप्रभु जी ने वेणुगीत की सुबोधिनी टीका में रस को दो भागों में विभक्‍त 
किया है: केवल रस तथा धर्म सहित संभोग रस । प्रथम की स्थिति केवल 
नाटकों में है, और धर्म सहित रस भक्तिकाव्य में संचरित रहता है। भमक्ति- 
काव्यों में विपयवस्तु कृष्ण की रूपलीला है ।' मोपीमक्त एवं मातृभकत धर्म 
संवृत रस के उपभोक्ताओं की दो श्र णियाँ हैं। गोपीमक्तों में परम प्रेमासक्ति 
की व्याकुलता, हरिचरणामृत की प्यास, ज्ञानाज्ञान से मुक्ति, नाना विलास- 
कला, कैलि-क़ीड़ाए' आदि रहती है। वे कामुककृप्ण के प्रति आसक्‍त-आकृष्ट 
रहती हू और प्रतिक्षण कामोत्पीड़िता के रूप में स्थित रहती हैं ।* यह भी 
माना गया है कि कृष्ण का रसात्मक कामभाव अत्यधिक गढ़ है। गोपीमाव 





१. रसो हि द्विविध: धर्मंसहित: केवलश्च, केवलो नादये प्रसिद्धों: धर्मंसहितो 
सम्नोगे भागवत्तोवरुभयविघमधप्यत्त:--घोडशग्र थाणि पु० १७ । 
२. रास पचाध्यायी : श्लोक सं. ४२ का भाष्प । 


साहित्य-छुजन : रचनाए ११३ 


की आकुल-व्याकुल कामना से ही गृढ़ रस का आस्वादन सम्भव है।' इस 
रसास्वाद के लिए भक्त को स्त्रीभमाव का आरोपण अनिवार्य होता है। यह 
स्त्रीमाव अत्यधिक्र गृढ़ भाव है ।* इस स्त्रीभाव की स्वीकृति वललभ संप्रदाय 
में थी। सम्प्रदाय में इसीलिए गोपियों को गुरु के रूप में स्वीकार किया 
गया है ।* सूर को गोपी-हृदय की सिद्धि हो चुकी थी ।* स्त्रीभमाव की अनि- 
वार्यता का कथन सूर ने इस प्रकार किया है-- 


भज सखि भाव भाविक देव । 

कोटि साधन करी कोऊ, तोऊ न माने सेव ॥ 
घुमकेतु कुमार माँग्यों, कौन मारग रीत । 
पुरुष तें तिय भाव उपज्यौ सब॑ उलटी रोंत ॥ 
दसन भूषन पलदि पहरे भाव सों संजोय । 
उलटि सुद्रा दई अकन वबरन सूचे होय 0 
वेद-विधि को नेम नहिं जहाँ प्रीति की पहचान । 
त्रजबध्‌ बस किये मोहन, 'सुर' चतुर सुजान ॥ 


भावना के उद्देक् से पुरुष में भी स्त्रीमाव जाग्रत हो जाता है। इसी 
वात को परमानंददास जी ने भी स्वीकार किया है।* 
इस विवेचन से यह निष्कर्ष निकला कि वृन्दावन के, बंगाल के सभी 
राघावादी संप्रदाय में स्त्रीमाव की मान्यता थी । इसी मावना से भक्त कृष्ण 
की रूप-श्द्भार लीलाओं में प्रविष्ट होता है। शुद्ध भक्तिरस यहाँ उमड़ पड़ता 
है । इसके साथ लौकिक काव्यरस भी संयुक्त या अंगभूत रह सकते हैं। इनसे 
भक्तिरस बलवत्तर और तीज्नत्तर होता है। यहीं मधुर रस-सावना में कावग्योक्त 
पद्धति का समावेश होता है। इसी काव्पोक्त पद्धति में नायिका भेद का प्रवेश 
हो जाता है। विविध्र नायिकाओं के रूप में भावित होकर गोपीजन कृष्ण- 
संभोग का रसास्वादन करती हैं । 'साहित्य-लहरी' इयी वाथिका भेद के आश्रय 
१. रस पंचाध्यायी : इलोक २ की प्रयम पंक्ति को टीका । 
२. रास पंचाव्यायी : & तथा ५ पंक्ति क्षी दीका । 
३. .-गो पेका प्रोक्ता गुरवः साथनं च तत्‌ ।' 
४. हों चेरीं महारानी तेरी तया 'सूर सब्री कैप्ते मर मान जंसी पंक्तियों 
से यही सिद्धि प्रकट होतीं है । 
५. लगे जो बृन्शबन कौ रंग । 
स्त्री भाव सहज सहज में उपज, पुरुष भाव होय भंग । 


११४ स्‌रसाहित्य : नव मूल्यांकन 


से मधुर लीलाओं के कथन और 'आस्वादन की पद्धति को लेकर चली है। 
इस रचना में श्रीकृष्ण के मायिकाभेद की पद्धति से भक्तिरसास्वादन का स्वरूप 
स्पष्ट किया है। नायिका-भेद पद्धति का प्रवेश बंगाली वैष्णव साहित्य में भी 
हुआ था । रूप गोस्वामी का 'उज्ज्वलनीलमणि इस दृष्टि से उल्लेखनीय ग्रन्थ 
है । नायिका-भेद को उन्होंने 'मधुर' भाव की संरचना में ढाल दिया । उज्ज्वल 
या मधुर रस रसराट्‌ है। इसका स्थायीभाव मधुरा रति है। इसके आलंबन 
विभाव में रस-विग्रह कृष्ण और उनकी वललभाए' आती हैं। समस्त नायक- 
नायिका भेद को कृष्ण, राधा एवं गोपषियों पर घटित करने का यह प्रथम 
शास्त्रीय प्रयास माना जा सकता है। 


अष्टछाप के शिरोमणि सूर ने साहित्य-लहरी' के द्वारा इसी पद्धति का 
उपक्रम किया । इसका लक्ष्य पक्ष ही सूर को अभीष्ट था। लक्ष्य पक्ष पर रूप- 
गोस्वामी की पद्धति का प्रभाव स्पष्ट है । भक्तिकाव्य में क्ृपाराम ने हिततरं- 
गिणी' नामक नायिका भेद का ग्रन्थ लिखा । इस रचना के नाम से सिद्ध होता 
है कि यह कवि श्री हित हरिवंश जी के संप्रदाय का अनुयायी था। पर इसमें 
भक्त तत्त्व इतने प्रमुख नहीं है। सूरदास' ने साहित्य लहरी में भक्ति के तत्त्वों 
का समन्वय किया । इसी पद्धति पर आगे चलकर नन्ददास ने 'रसमंजरी की 
रचना की । इसकी लक्षण-पद्धति भानुमिश्र के समान और लक्ष्य पद्धति रूप- 
गोस्वामी और सूर के समान है । केशव ने अपनी कृति 'रसिक प्रिया” में भक्त 
कवियों के लक्ष्य साहित्य की पद्धति का ही अवलम्बन किया : इस प्रकार भक्ति 
ओर रीति दोनों ही साहित्य-परम्पराएं राधा की मधुर लीलाओं को 
लेकर चली | संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि 'सूर' की साहित्य-लहरी में 
काव्यशास्त्रोक्त पद्धति से भक्तिरस का निरूपण हुआ है। यहाँ एक बात और 
हमारा ध्यान आकर्षित करती है। सूर ने लिखा है--“नंदनंदनदास हित 
साहित्य लहरी कीन ।” अर्थात्‌ साहित्य लहरी' की रचना “नंदनंदनदास के 
लिए की गईं। “नंदनंदनदास' का सामान्य अर्थ 'भक्तजन' होता है। पर इसका 
विशिष्ट अर्थ नंददास' भी सम्प्रदाय में मान्य है ।* नंददास पहले रामभक्‍त थे | 


२१. उज्ज्वल नील मणि, १॥२ तथा टीका भाग ।- 
वक्ष्यमाणविभावाद्य: स्वाद्यतां मथुरा रतिः। 
नीता भक्तिरस: प्रोक्तो मधुराख्यों मनीषिभिः 0 
अस्मिन्नालम्बना: प्रोक्ता: कृष्णस्तस्थ बल्‍लभा: । 

२. सूर निर्णय, पु० १५३। 


साहित्य-घचुजन : रचनाएं श्श्श 


पीछे वे पुष्टिमार्ग में दी क्षित हुए। प्रवेशांतर वे आरम्म में सांप्रदायिक रहस्व- 
ज्ञान के लिए 'सूरदास! के पास छः: मास तक चन्द्रसरोवर (परासौली) में 
रहे ।* नन्‍्ददास की वृत्ति अधिक साहित्यपरक प्रतीत होती है । इसी को हृष्टि 
में रखकर संमवत' सूर ने काव्योक्त पद्धति से रसोपासना का रहस्य नन्ददास 
जी को स्पष्ट किया । इसी की नादात्मक परिणति हमें नन्‍्ददासक्ृत 'रसमंजरी' 
में मिलती है। ननन्‍्ददास जी पूर्णतः गोपी प्रेम से मावित हो गये । 


अब प्रश्न साहित्य लहरी' की हृष्टिकूट शैली का रह जाता है । वैप्ते 
रहस्थवादी साहित्य में रहस्य शेली के रूप नवीन नहीं हैं ॥ सिद्ध साहित्य में 
संब्या मापा! और उल्टवोसियों की शैली का प्रयोग गूढ़ तत्त्वों के विवेचन के 
लिए किया गया है। सिद्ध-ताथ परम्परा में पारिमापिक्र अर्थोंकी निष्पत्ति 
के लिए विरोधी-शब्दावली गौर अदुमृत रूपकों एवं प्रतीकों का योग “गुद्य- 
वाणी' और संबा भाषा के रूप में होता था ।* “.,,.उपमानों की विरोधा- 
त्मक योजना पर आधारित उलटवासियों की चमत्कारपूर्ण शैली सिद्धों के 
काच्य में भी व्यवहृत होती थी ।...कवीर तथा उनके वाद के संतों में इप 
उलटबाँसी पद्धति का बहुत प्रचलन रहा है....।* तांत्रिक साहित्य में इस 
शैली का प्रयोग प्रचुर रूप से होता रहा । वेप्णव तंत्रों में भी इस शैली की 
थोड़ी बहुत मान्यता रही । तब तंत्रों का वेष्णव्रीकीण हुआ, तव किसी न 
किसी रूप में शैली भी स्वीकृत रही । इस शेली के प्रयोग का उद्देश्य 
उपयोगितावादी भी था और चमत्कारवादी भी | उपयोगितावादी दृष्टि से 
अलौकिक या आदव्यात्मिक स्थिति का लौकिक स्थिति से वसा हृश्य के द्वारा 
गृढ़ अर्थो की ब्यंजना इससे की जाती थ्री । दूसरे गूढ़ तत्त्वों को छुपाने या 
अनधिकारी से इनको सुरक्षित रखने के लिए यह एक शैली तात्त्विक वर्जन के 
रूप में हृष्टिकूट का प्रयोग होता था । सूर' की अन्य रचनाओं में छिटपुट रूप 
से इस शैली के निदर्शन मिलते हैं । साहित्य लहरी में यह शैली पुजीभूत हो 
गई है। सूर का उद्देश्य इस शली के प्रयोग में यही उद्देश्व ज्ञात होता है कि 
कृप्णलीला रस का अति ख्ृद्भारी रूप कहीं अपात्र के हृदय में पृड़कर लांछन 
न बन जाये : “....इन पदों में काव्योक्त्त (लौकिक प्रकारों वाली) कृष्ण लीलाएँ 
होने से उन्हें गढ़ रखना आवश्यक था । अत: लौकिक इनमें प्राप्त नायिकाओं के 





१. प्राचीन वार्ता रहस्य, हितीय भाग, पृ० ३४० । 
२. डा० घमंदीर भारती, सिद्ध साहित्य, पृ० डंडे १, ४४७ । 
रे. वहां, पृ० ४६६, ४६७ । 


११६ सूरसाहित्य : वव मूल्यांकन 


उल्लेखों में भी कुछ गूढ़ता लायी गयी है जिसके कारण नखशिख वर्णन न होते 
हुए भी इसमें दृष्टिकूट शैली की नितांत आवश्यकता थी १” साहित्य लहरी 
की विपयवस्तु और शैली कां यही स्पष्टीकरण है । इसमें कुछ सामान्य शेली 
के पदों का भी समावेश है। अधिकांश विद्वान इसे प्रामाणिक रचना स्वीकार 
करते हैं ।* इसकी प्रामाणिकता का सबसे बड़ा प्रमाण साँप्रदायिक रस-रोति- 
निरूपण भौर सेवा भावना है ॥ 


'सूरसागर' 


यह सूर की सर्व स्वीकृत प्रामाणिक रचना है। इसकी अनेक हस्त- 
लिखित प्रतियाँ भारत के विभिन्‍त ग्रन्थागारों में मिलती हैं ।* इनका विस्तार 
समस्त उत्तरी भारत में मिलता है। स्रसागरा का प्रकाशन लखनऊ'ँ, 
वम्बई आदि से आरम्म हुआ । बम्बई वाले संस्करण का काये भारतेन्दु जी 
ने आरम्भ किया था और इस कार्य को बाबू राधाकहृष्णदास ने पूर्ण किया । 
इनके आधार पर कुछ संक्षिप्त संस्करण भी संपादित हुये । इनके संपादक डा० 
ठेनीप्रसाद (१६२२), डा० धीरेन्द्र वर्मा (१६२६) तथा डा० रामकुमार वर्मा 
(१६३३) रहे । हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने भी वियोगी हरि द्वारा संस्करण 
प्रकाशित किया | नागरी प्रचारणी सभा काशी ने पं० नन्ददुलारे बाजपेयी 
द्वारा संपादित 'सूरसागर' प्रकाशित किया । अब यह कार्य पं>० जवाहरलाल 
चतुर्वेदी ने अपने हाथ मे लिया है। कलकत्त से उनके द्वारा संपादित 'सूर- 
सामर' का वृद्दत्त्‌ संस्करण प्रकाशित हो रहा है ॥ इसका प्रथम भाग प्रकाशित 





१. सूरनिर्णय, पु० ४४६ । 

२. मिश्रवन्धु, (हिन्दी शवरत्त, चतुर्थ संस्करण, प्ृ०२३२) रामचन्द्र शक्ल 
(हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ० १६४-५) डा० दीनदयालु गुप्त (अष्ट- 
छाप और बलल्‍लभ संप्रदाय, प्रथम भाग, पृ० २७८५, २६८ ) तथा श्री 
पारीख और मीतल (सूर निर्णय, पृ० १४३ १५२) ने माना है । 

३. डा० प्र मनारायण टंडन ने सूर को भाषा ( पृ० ५६७-६०१ ) में इस 
प्रकार को २४ प्रतियों की सूची दी है। पं० जवाहरलाल चतुर्वेदी ने 
प्रतियों की शोघ सबसे अधिक की हैँ। उन्होंने इनका विवरण भी प्रका- 
शित कराया है । 


नवलकिश्योर प्रस, सन्‌ १८६४ । 
५. बेंकटेश्वर प्रेस, वम्बई । 


साहित्य -सूजन : रचनाएं ११७ 


भी हो गया है। चतुर्वेदी जी ने अनेक अछूती प्रतियों का उपयोग भी इसमें 
किया है और नवीन सामग्री जोड़कर इसके आकार में वृद्धि की है । 


'सूरसागर' शब्द का प्रयोग आचाये जी ने सूरदास जी के लिए किया 
था ।' सर के व्यक्तित्व का काव्यमय संस्करण ही 'सूरसागर' हैं। व्यक्तित्व 
ओर रचना में इतना घतनिष्ट साम्य एक अत्यन्त विरल साहित्यिक घटना मानी 
जानी चाहिए । सूर के व्यक्तित्व की सागरोपम विस्तृति की वललभाचायें जी 
द्वारा स्वीकृत इस रचना की प्रमुख प्रेरणा कही जा सकती है । विषय का बोध 
या आध्यात्मिक संक्रमण भी आचायें जी ने किया | 'दशम स्कत्ध को अनुक्- 
मणिका' सुबोधिनी और “पुरुषोत्तम सहखनाम' के द्वारा वल्लमभाचार्य जी ने 
विषय का रहस्य-बोध सूर को कराया । इससे सूर को भगवान की दशधा 
लीलाओं का बोध हुआ ।* इसका ख्रोत श्रीमद्भागवत है। द्वादश स्कन्ध पर्यत 
भागवत कथा का इसमें विस्तार हुआ है ।३ किन्तु इसका यह तात्पयें नहीं कि 
सूरसागर भागवत का अविकल अनुवाद है। समस्त कथा सूत्रों के निर्वाह की 
सर ने चिन्ता नहीं की । केवल भागवत की संरचता को सूर लेकर चले हैं ! 
वैसे उनकी वृत्ति दशमस्कंध में ही रमी दुई है । अन्य स्कन्धों के प्रसंग-विधान 
में कवि की वृत्ति नहीं रमी है। यह नीचे की स्कधानुसार पद-सांडख्यिकी से 
स्पष्ट होती है--- 


प्रथम स्कृध डर ३४३ पद पंचम स्कंध ... ४ पद 
हदित्तीय स्कंध.....«« रे८प पद षष्ठ स्कंथ ... ए८ पद 
तृतीय स्कंध.....« १३पद सप्तम स्कथ ...  ए् पद 
चतुर्थ स्कंध न १३ षद अष्टम स्कंध .... १७ पद 


१. “ओर सूरदास को जब श्री आचार्य जी देखते तब कहते जो--आयो 
सूरसत्गर, सो ताको आशय यह ॒ है जो--ससुद्र में सगरो पदार्थ होत 
है । तेसे ही सूरदास ने सहुख्रावधि पद किये हैं। तामें ज्ञान बेराग्य के 
न्यारे-त्यारे भक्ति-भेद, अनेक भगवत अवतार सो तिनव सबन कीं लीला 
को बरनन कियो है।” ( प्राचीन वार्ता रहस्य, तृतीय भाग, पृ० २३ ) 

२. भरी वलल्‍लभ गुरु तत्त्व सुतायो, लाला-भेद बतायौ । 
( सूर सारावली, तुक ११०३ ) 
३. व्यास फहे सुखदेव सो द्वादस स्कंध बनाइ । 
सूरदास सोई कहै पद भाषा करि गाय ॥ ( सू. सा. स्कंध १ पद २१४५ ) 


श्श्८ स्रसाहित्य : नव मूल्यांकन 


नवम स्कंध 4 १७४ पद एकरादव स्केंघ ..-. ४ पद 
दक्षम स्कंच ««»«. ४३०६९ पद हादश स्कंच ... ४ पद 


प्रथम स्कंव की पद संख्या इसलिए बढ़ी है कि - इसमें २२३ पद विनय 
के हैं। भेष में मागवत प्रसंग है । नवम स्कंघ में रामचरित होने के कारण पद 
संख्या वढ़ी है। इस प्रकार 'नूर॑ ने केवल १२ स्कंघों की संरचना को ग्रहण 
किया है। उनका रागात्मक तादात्म्य केवल दशमस्कंध के सांथ है । इस संख्या 
वंपम्य को देखते हुए डा० ब्रजेश्वर वर्मा ने सूरसागर को सांगवत्त का अनुवाद 
नहीं माना है ।! मागवत और सूरसायर की परिमाणगत तुलना से यह तथ्य 
प्रमाणित हो जाता है । 


सूरसागर के पद-परिमाण के संवन्ध में विरोधी मत मिलते हैं। 
'सरदास' संवन्धी वार्ता के अनुसार उन्होंने सहल्लावधि पद किये। पर 
हरिराय जी के 'भाव प्रकाश' के अनुसार सूर ने सवा लाख पदों की रचना का 
संकल्प किया था । अन्तिम समय तक वे एक लाख पदों की रचना कर सके, 
और जेष पच्चीस हजार कीतंन स्वयं श्री गोवर्धननाथ जी नें पूरे किये ।* सूर 
सारावली के अनुसार भी सूर के एक लाख पदों की ही यूचना मिलती है ।ई* 
ऐसा प्रतीत होता है कि सूर-काव्य की विशालता को देखते हुए संग्रदाय में 
सवालाख पदों की संख्या प्रचलित हो गई थी | यह संख्या भावात्मक है, या 
यथार्थ, यह कहना कठिन प्रतीत होता हैं। एक अनुश्न॒ति से यह भी प्रकट 
होता है कि सूर के नाम से अनेक पद इस सागर' में आ मिले थे | अनुश्न ति 
इस प्रकार है: “पाछे देशाधिप्रति ने आगयरे में आायके सूरदास के पदन की 
तलास कीनी । जो कोऊ सूरदास जी के पद लावे तिनक्‌ रुपया और मौहौर 
देय । सो वे पद फारसी मे लिखायकें बाँच | सो मौहर के लालच सों पडित 
कवीश्वर हु सूरदास के पद वनाय कें लामें ।,,” आगे कहा गया है कि इनकी 
प्रामाणिकता की परीक्षा अकबर (देशाधिपति) ने पदों को पानी पर तैरा कर 
की । नूर-कृत पद तो पानी पर तंरते रहे और प्रक्षिप्त पद पानी में घूब गये । 





१. “..«किसो अर्थ में सूरसागर भागवत का अनुवाद नहीं कहा जा सक्तता 
और न संपूर्ण भागवत की यथा तथ्य कथा कहना ही कवि का उद्देश्य 
जान पड़ता है ।” ( सूरदास, पुृ० १०३-४ ) । 

प्राचीन वार्ता रहस्य, द्वितीय भाग, प्ृ० ४६।॥ 

ता दिन ते हरि लीला गाई एक लक्ष पद बन्द । 

* प्राचीन वार्ता रहस्य, द्वितीय भाग, पृ० २७ । 


०८ 


वर न! 


साहित्य-सृूजन : रचनाएं ११६ 


इसमें सदेह नहीं कि सुर के नाम से अन्य कवियों के पद भी चल पड़े होंगे । 
साथ ही सूर' नाम धारी व्यक्ति भी कई थे। उनके पद मी सागर में आकर 
मिल गये होंगे । पर, सत्य यह भी है कि सूर-रचित अनेक पद अलिखित रहने 
के कारण खो भी गये हों । अकवर वाली अनुश्न्‌ ति से यह भी स्पष्ट होता है कि 
सूर के पदों का संग्रह और परीक्षण होने लगा था। प्रसिद्ध संस्करणों में 
जितने पद संकलित हैं, उनके अतिरिक्त अनेक पद सांप्रदायिक कीतंन संग्रहों 
में संगृहीत हैं । नागरी प्रचारिणी के 'घुरसागर' के प्रकाशन के पश्चात्‌ भी 
नवीन सामग्री खोज में मिली है। खोज अमी चल रही है। इस स्थिति में 
निश्चय रूप से सूर' के पदों की संडया वबतलाना संभव नहीं है । अब तक सूर 
के ८-१० हजार पदों का अनुसंधान किया जा सका है। यह कहा जाता है कि 
सूर' ने कीतेन में कमी पुराना पद नहीं गाया। यणितीय पद्धति से हिसाव 
लगाकर, सूर निर्णय के लेखकों ने यह सिद्ध करने की चेष्टा की है कि सवालाख 
वाली संख्या नितांत अश्विसनीय नहीं है। अन्त में यह निष्क दिया है: 
“हमने सूरदास के पदों की जो आनुमानिक गणना की है, वह कम से कम है 
ओर प्रामाणिक आधार पर है, अतः उसमें शंका के लिए कोई स्थान नहीं 
है ।१” इस प्रकार सूर के रचे हुए सवालाख पदों की रचना को सिद्ध करने 
का प्रयास हुआ है । संमवत: यह अन्तिम शब्द इस संवन्ध में नहीं है, फिर भी 
सांप्रदायिक साक्ष पर आधारित होने के कारण पूर्णतः: अविश्वसनीय भी नहों 
है । जो रचता-परिमाण अब तक सिद्ध हो सका है, बह भी सूरसागर की 
महिमा को प्रतिष्ठित करने के लिए पर्याप्त है । 

जहाँ तक सूरसागर के विषय का प्रश्न है, इसके तीन स्तर हैं। 
वल्लभाचार्य जी के अनुसार भागवत में त्रिविध भाषा प्रयुक्त है: लौकिकी, 
परमत और लौकिकी । ऐतिहासिक या पौराणिक चरित्र-कथन लौकिकी भाषा 
के अन्तर्गत माता है । इस भाषा का प्रयोग सूर जी ने सामान्य-जन के प्रवोधन 
के लिए किया है। भागवत में ऐसे स्थल भी हैं जहां विभिन्‍न ऋषियों-मुनियों ने 
सैद्धान्ति अभिमत प्रस्तुत किये हैं । इन स्थलों की भमाषा'परमत' है । व्यासजी ने 
जिस भाषा का प्रत्यक्ष अनुभव अपनी समाधि की अवस्था में किया, वह समाधि 
भाषा है ।* यही समाधि भाषा आचाये जी ने प्रमाण-चतुष्टय में स्वीकार की 
है । यही वह भाषा है जिसमें मक्तिरस उच्छलित हुआ है। भक्तिमार्ग का 





१. सूरनिर्णण, पु० १७४। 
२. समाधि भाषा व्यासस्य प्रमाण तच्चतुष्ठयम्त' (निबंध ) 


2२० मुरसाहित्य : नव सुल्याक्रन 


यहा प्राय हूं । साग्रदाशयकर दृष्टि और अपने माव-यवल च्यच्छित्त की दाता में 
भागवत की समाधि माया की अभिव्यक्ति ही सूर ने विद्येष की, । देसे प्रथम दो 
मायाएं नी सूरसागार ने मिल जाती हैं, पर अनुपातिक दृष्टि से वे अत्यल् 
हैं । परम की सर ने और मी उपेल्ला की है | यह समाधि भाषा ही साहित्य 
व्यक्तिनिष्ठ प्रगोत्तों की जात्मा है। लीला-स्स समाधि नाथा की स्फृतियाँ मं 
आविष्ट रहता 

विधेष रूप से हुआ हैं। जहाँ तक लौकिका नापा का प्रश्न है, सुर ने प्रथम से 
द्ादश सर्ग के कथा भाग को, वर्णनात्मक रीति से, लम्बे पदों क्रे माध्यम से, 


24 


माव-सफीति के बिना ही, वर्णन कर दिया हैं। जहाँ मगवदोय करुपा, महिमा 
आदि के प्रसंग आते हैं, वहाँ सुर की सावना कुछ विरम गई है और रुफुट पदों 
में मक्तित्तन्तुओं को सजीव कर दिया हैं। द्रौपदी तहाय' जंसे प्रसंग इसके 
इन स्थलों को अधिक साव-संकुल या विश्वद बनाने के लिए 
भागवत के अतिरिक्त अन्य पुराणों से भी सुत्र संकलित किए गए हैं । फिर भी 
लौकिकर मापा के तत्त्व ही उच्तमें विज्ेप हैं । समाधि भापा में प्रविष्ट होने 
पर अनुपात की दिखा बदल जाती है। प्रसंग, कथांश, या इतिठृत्त उसी प्रकार 


के लम्बे पदों में कह दिया जाता है| नावात्मक स्फीसि का कनुपात अत्यवधिकर 


णि 





न! /3॥ 


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प्रमन जे कन्के>+-पननकन>नकक, >> एम के >>्रीयन+ 
| मत मे मगवान क्र एश्चब जार मसाहतत्म्य का दथगन दा 


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हो जाता हैं। समस्त दघ्म स्कंव में यह जनुपात ही चलता रहता है | सूर मी 
ज॑से माव-समात्रि में तनन्‍्मय होकर अनुभूति क्री चरम स्थितियों के अन्वेषण 


सा क के. 


ओर आकलन में लग जाते हूँ । 


“| 


सदे झब्दों में सूरसायर में तीत वियय है : पुराण कबा, वर्णन और 
माव-सम्पदा । पुराण कथा कहते समय सूर सूत जी के समकन्न रहता हैं । 
क्रवि शुद्ध कथा का कथन करके माहात्म्य के संक्रेत कर देता है। कथाओं में 
बवतार कथाओं का प्राघान्य हैं । वर्णन-वेंमव में भक्ति के परिवेद्य, रूपग-कल्पयना 
बोर &जड्भजार बादि आते हैं । इस वर्णन में ही यथा स्थान भावों के संकेत 
मिलते हैं । भाव-म्म्पदा के ल्षेत्रों में सूर बड़े विश्वास के साथ चलते मिलते हैं 

मनोमय कोश से लेकर आनन्दमय कोश तक की बात्रा में जितने मात-अज्ञात 


/गी 


संदर्म प्राप्त होते हैं, उन सबका सूर साक्षात्कार कर लेते हैं। मख्यतः वात्सल्य 
वार जाज्भार के खरे और स्वच्छ चित्र माव-संपद्ा के सजीव प्रमाण हैं । इसका 
विकास वात्सल्य से वियोग तक हुआ है । इन साव-स्वितियों में अनेक लीलाएँ 
बटित होती हैं । लोक संग्रहात्मकु लीताए मुख्यतः लोकिक्' और 'परमत' 
भापाओं में ही कही गई हैं, कौर विनेय रूप से वात्यल्कसमाधि में प्रचि् 


) 


साहित्य-सजन : रचनाएं १२१ 


भावात्मक स्थलों पर भो लीला-बृत्त संलग्न रहता है। उसका एक 
क्रम है । उस क्रम के निर्वाह में प्रवन्ध-क्रम मिलता है। कृष्ण-चरित्र की 
तात्त्विक कर भावात्मक विस्तृति से पूर्व सूर ने दशावतार-कथा की योजना 
की हैं। दशावतार कथा जयदेव ने भी संक्षेप में कही | इसी ने जयदेव के गीत- 
साहित्य की भूमिका प्रस्तुत की है। यही स्थिति सुर की भी है । सूरसागर के 
मुख्य काव्य की यही कथात्मक पीठिका है। समस्त भाव-गीत मिल कर 
सूरसागर को एक कीतंन-काव्य बना देते हैं। यहाँ एक और विकल्प उपस्थित 
होता है कि म्र का कीत्तेन-काव्य या भावात्मक गीत ही अधिक प्रसिद्ध हो 
गये । हो सकता हैँ कि उनके कथात्मक और वर्णनात्मक पदों की उपेक्षा हो 
गई हो और वे संकलित नहीं किये जा सके । अतः सूरसागर के पदों की संख्या 
की समस्या वनी ही रहती है । 

'प्रसागर' की लोकप्रियता एक ओर तो उसकी हस्तलिखित प्रतियों 
की भारत व्यापी स्थिति से मिलती है, दूसरी ओर इससे भी मिलती है कि 
उसके छोटे-छोटे अश भी भिन्न-भिन्न पुस्तकों के रूप में लिखे गए। पीछे 
इस प्रकार के १४ छोटे संग्रहों की चर्चा हो चुकी है । 


'सूरसागर' सूर की निजी साधना का फल है। इसमें उनके स्वच्छुन्द 
व्यक्तित्व का ही विलास अधिक है । 'सूर' का स्वच्छन्द व्यक्तित्व वस्तुतः गीतों 
की मधुरिमा से मर गया था। उन्होंने अपने व्यक्तित्व की इस साधना में बद्धता 
का अनुमव केवल इतिवृत्त के निर्वाह की दृष्टि से किया । उनको भागवत के 
ढाँचे में रंग मरना था । कृष्ण की लीलाए वस्तुतः अपने में पूर्ण लघु कथांश 
ही थे। प्रसंग-कथा बड़ी भी हो सकती है, छोटी भी | गीत में प्रसंग की 
प्रचन्धात्मकत्ता का ध्याव नहीं रहता : भाव की दृष्टि से ही उसे स्वयं पूर्ण होना 
चाहिए । प्रवन्ध संबन्धो दायित्व का निर्वाह करके ही सूर का व्यक्तित्व भाव- 
व्यंजना के लिए पूर्ण स्वच्छुन्द हो सकता था। अतः विविध छन्‍्दों, प्रवन्धों 
की परम्परागत शली, दीर्घ पदों की योजना करके प्रवन्धात्मक बद्धता से मुक्ति 
पाने को चेप्टा की गई । बौद्धिक तत्तवों को शान्त करके विश्वाम दिया । फिर 
केवल भाव कौ पूर्णता का ध्यान करके, सूर का माचाकुल व्यक्तित्व साधना में 
निरस्त कर दिया । 


संप्रदाय में दीजलित होने से पूर्व का देन्य और दास्य भी साधना के 
इन स्वच्छन्द क्षणों को कभी-कभी वाधित करता था। इस भाव-राशि का 
लीलारस से अभिमृत व्यक्तित्व में कोई स्थान नहीं हो सकता था। अतः इन 


१२२ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


भाव-छायाओं को इन्होंने संप्रदाय को समर्पित करना ही श्र यस्कर समझा । 


मंगला की आरती' से 'शयन' तक श्रीनाथ जी का मन्दिर लीला-कौतेंन की 
घ्वनियों से गूजता रहता था। इस वातावरण में विनय-भाव के लिए स्थान 
नहीं था | अतः मंगला से पूर्व की भूमिका में तथा शयन के अनन्तर के उप- 
संहार में सूर की विनयोक्तियों का प्रयोग हुआ । इस प्रकार शानन्‍्त-रस में 
उनकी परिणति करके सांप्रदायिक कीतन में उनका भी स्थान निश्चित किया । 
इत उक्तियों का व्यावहारिक उपयोग चितावनी' साहित्य के रूप में भी 
हुआ । 

संक्षेप में यही सूर के व्यक्तित्व की 'सूरसागरीय' परिणति है । 
सर-साठी-- 

यह एक छोटी रचना है । इसकी रचना एक बनिया के लिए की गई 
थी । सूरसागर में इनकी असंगति ही प्रतीत होती है । वार्ता में संक्रेत इसप्रतार 
है: श्रीनाथ जी के मन्दिर के नीचे गोपालपुरा गाँव में बनिया ६० वर्ष का । 
कभी दर्शन न किये । वेष्णव | सूर ने सोचा इसे वैष्णव वताओ | तीन दिन 
फिरे--भग्न दिखायो कि तेरा भेद खोल दूंगा । एक भी वेष्णव समान नहीं 
खरीदेगा । पद बनाया --आज काम, कलि काम परसों काम करनों । अन्तत: 
वह वेष्णव हो गया और दरणागत हुआ । सूरदास जी ने एक पद उसे 
सिखाया--ऋृष्ण सुमिरि तन पावन कोजे ।' 
सूर-पचीसी-- 

इसकी रचना अकवर वादशाह के लिए की गई | यह एक लम्बा पद 
है : 'मन रे तू करि माधौ सों प्रीत ।! यही उपदेशात्मक पद 'सूर पचीसी के 
नाम से प्रसिद्ध है। यह भी अपने भाप में पूर्ण और स्वतंत्र रचना है । इसका 
स्वर चेतावनी का है । 
सेवाफल-- 

महाप्रमु बल्‍लमाचार्य जी ने संस्कृत में 'सेवाफल” नामक एक ग्रंथ 
बनाया था । इसका स्पष्ट विवरण करने के लिए सूर ने यह रचना की । इसमें 
'वेकुण्ठादिपुः का अधिक स्पष्टीकरण हुआ है। यह भी एक स्वतंत्र 
रचना है । 
सूरदास के पद-- 

यह स्फुट पदों का संग्रह हैं। मन्दिरों में की गई प्रार्थनाएँ इसमें 
संगृहीत है । जिस प्रकार गोपालपुरा का वनियाँ सूर की प्रेरणा से वैष्णव बना 


साहित्य-सूजन : रचनाएँ १२३ 


उसी प्रकार अन्य ज्ञात-अज्ञात व्यक्ति भी सूर के संपर्क में आये । उनको वैरा- 
ग्यादि का उपदेश देते हुए कुछ छोटे-छोटे पद सूर ने किये | उनका संग्रह भी 
इसमें है । “शयन के अनन्तर और मंगला आरती के पूर्व जो दीनता आश्रय 
ओर विनय आदि के पद मन्दिरों में गाये जाते हैं, जिनमें कई स्थानों पर 


०] 


आत्म-चारित्रिक उल्लेख भी आ गये हैं, वे ही पद इस रचना के अन्तर्गत हैं ।६” 


सर की रचनाओं के उक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि इनमें केन्द्रीय 
स्थिति सूरसागर की ही है। यदि सूर के व्यक्तित्व का म्म-स्पर्श करना है, 
तो इसी केन्द्रीय रचना के संदर्म में समी रचनाओं को देखना होगा । सूर की 
सुदीर्थ साधना ने काव्य का परिमाण दिया । उस साधना की सफलता परिमाण 
की वृद्धि से सिद्ध नहीं होती । इसका मूल्यांकन इस वात को लेकर है कि 
परिमाण की वृद्धि के साथ काव्य की कोटि 'नी उच्चत्तर होती गई है | परि- 
माण और काव्यकोटि का यह सामंजस्थ संसार के बहुत कम कवियों में 
मिलेगा । सागर जो ठहरा : यह विस्तार और गहराई दोनों का समन्वित 
प्रतीक है । अन्य रचनाएँ लघु संदर्मों को देन है। रचना के परिमाण भौर 
कोटि-क्रम की दृष्टि से सुर का व्यक्तित्व मध्यकालीन हिन्दी साहित्य में महान्‌ 
हो जाता है। 





१. सूरनिर्णय प० १६६ । 


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सूर के कृष्ण 


प्रास्ताविक 


कृष्ण का व्यक्तित्व बहुमुखी है! दर्शन, धर्म, इतिहास, पुराण और 
काव्य के क्षेत्रों में उसका बहुविध आख्यान और चित्रण हुआ है। वेद से 
लेकर भक्ति-साहित्य तक की परम्परा में यह गतिशील व्यक्तित्व अनेक रूपों 
में विलसित है । आंगिरस परम्परा से संवद्ध होने के नाते वे एक नवीन दर्शन 
के व्याख्याता के रूप में मिलते हैं। वासुदेव के रूप में उनकी पूजा का प्रमाण 
बहुत प्राचीन साहित्य में मिलता है । फिर ब्रजकृुष्ण का विकास एक दिशा की 
और और दाशंनिक कृष्ण का विकास दूसरी दिशा में होता चलता है। पहले 
रूप के विकास का चरम पांचरात्र और भागवत में मिलता है और दूसरे का 
गीता में । उनकी पहले एक जातीय देवता के रूप में देखा जा सकता है: 
गवालों और कृषकों का देवता ! 'सात्वतम बर:। यादव जाति के सात्वतों ने 
उसे 'सू्यी या पूर्ण ब्रह्म घोषित क्रिया । सूर के गोपगण भी उनको इस रूप 
में घोषित करते है | पहले सूर का कृष्ण भी ग्रोकुल का कुल देवता ही माना 
गया । * फिर वह तीन लोक का ठाकुर बन जाता है ।* इस प्रकार सात्त्वतों 
का कृष्ण सूर-साहित्य में प्रतिष्ठित है। महामारत में “पार्थ-सारथि' रूप में 
कृष्ण की प्रतिष्ठा है। सूर-साहित्य' में इसकी गीता भी गूज रही है । 'पार्थ- 
सारथ' भी भकक्‍्ति-बशात्‌ इस कार्य में प्रवृत्त हुए है।* ब्रज के सखाओं से 
भजुन सखा की स्थिति कुछ भिन्‍न है। मेंत्री को रक्षा में गीता-कृष्ण मर्यादा 
१. गोकुल को कुल देवता, श्री गिरिघर लाल। (सुरसागर, १०८२३) 
२.  तीनि लोक कौ ठाकुर संगहि, तासों कहत सखा हम जोग । 

( वहीँ १०॥८५२७ ) 

३” देह बिचारि भक्त-हित कारन हांकत हों रथ तेरो। ( वही १५२७२) 


सूर के कष्ण १२७ 


को तोड़ते है। वचन के विरुद्ध, भीष्म के विरुद्ध शस्त्र ग्रहण करते हैं ।१ बह 
राज्यों और राजाओं का नियामक भी है। वृष्णि, अधक, कुकुर जैसे 
जाति-संघों का वह 'संघ-मुख्य' है। अखंड भारत का वह निर्माता भी है । 
महाभारत के पश्चात्‌ राजसूय यज्ञ में उसने अखंड भारत को स्थापना की ।९ 
भीष्म ने अंतिम समय जो ध्यान किया वह मामिक है। महाभारत क्रृष्ण की 
समस्त शक्ति भीष्म के भाव में अवतरित हो रही है-- 

वा पटपीत की फहरानि । 


कर धरि चक, चरन फी धावनि, नहिं बिसरति वह बानि ॥। 
रथ तें उतारे चलनि आतुर छू, फज रज फो लपटानि । 
सानों सिह सेलतें निकस्पो, सहामत्त गज जाति ॥ 
जिन गोपाल मेरो प्रनः रास्यो, मेटि बेद की फानि | 
सोई 'सुर/ सहाइ हमारे, निकह भए हैं आनि ॥* 


यह झ्ाँकी कितनी पूर्ण है। पीतांवरधारी ब्रजक्ृष्ण, चक्रधारी, 
अप्रतिहत वीर, वेद-मर्यादा की उपेक्षा करने वाले, भकक्‍तव्॒त्सल आदि सभी 
संकेत इस श्ञाँकी में हैं | 'सूरसाहित्य' में सभी की न्यूनाधिक परिणति है। 
पर इन सभी संकेतों में से ब्रजकृष्ण का संकेत चिर विकासशील रहा ! तंन्र- 
साहित्य में प्राप्त प्रतीक-रूपकों में भी ब्रजक्ृष्ण ही है। बेद-वेदांत के रूपक भी 
ब्रज के कृष्ण पर ही घटित होते हैं। भक्ति संप्रदायों में यही रूप एृष्ट है। 
समस्त कला-विलाप इसी रूप को लेकर हुआ है । इसी रूप ने मर्यादा के मूल्य 
का विरोध किया । यही रूप काव्य-रसों का आलंबन बना, । 'सूर' साहित्य 
भी इसी रूप की अचेना का अनुक्रम करता है | क्ृष्ण के प्रतीकत्व, उसकी 
लीलाओं, और उसके माधुये का कुछ विस्तार से पर्यालोचन उपयुक्त होगा । 


१. कष्ण और वेद 
वेद में जहाँ अन्‍य अचतारों के बीज प्राप्त हो जाते हैं, वहाँ कृष्णावतार 
के बीज भी मिल जाते हैं। 'गोपा' (+-रक्षक), 'यत्र गावों भूरि श्र जरा अयास: 


१. गोविंद कोपि चक्र कर लीन्ही । 
छाँड़ि आपनो प्रव जादव-पति, जन फौ भायी फीन्ही । ( वही १।२७३ ) 
२. धर्मपृत्र कों दे हरि राज | निजपुर चलिबे को कियो साज । 


| ( वही १२८१ ) 
३. वहीं ११२७६। 


१२८ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


तथा “अन्राह तदुरुगायस्य कृष्ण: जैसे वाक्‍यों में कृष्णावतार के तत्त्व खोजे जा 
सकते हैं । विष्णु यजमान तथा देवगणों के लिए “ब्रज प्राप्त कराने वाला भी 
है ।' इन सूत्र-बीजों में त्रजकृष्ण की कल्पना अन्तहिंत है। छान्‍्दोग्योपनिषद्‌ में 
कृष्णाजु न दब्द मिल जाता है। गोप, गोपाल, गाय, ब्रज आदि नामों का 
संधान हो जाता है। वेदिक साहित्य में कृष्ण एक ऋषि भी है और एक अनारये 
योद्धा भी । योद्धा के रूप में कृष्ण का संघषं इन्द्र से होता है। इन्द्र-कृष्ण 
युद्ध अशुमती नदी के तट पर होता है। इसके साथ दस सहसख्र योद्धा लड़े थे ।* 
यही संघर्ष 'गोवर्धन-लीला' के रूप में पौराणिक साहित्य में अवतीण्ं होता है । 
इस लीला का प्रमुख अभिप्राय इन्द्र-दपं-दलन ही है। हरिवंश में युद्ध में परा- 
जित इन्द्र के मुह से कहलवाया गया है: 'मैं देवेन्द्र हुँ। तुमने गौओं के ऊपर 
इन्द्र की शक्ति को पा लिया है गोविन्द के रूप में मनुष्य सदा तुम्हारी 
भक्ति करेंगे! इस प्रकार बेद का प्रधान देवता इन्द्र, कृष्ण से पराजित 
होता है । 


कृष्ण वेदिक कर्मकाण्ड को स्वीकार करके नहीं चले । वैदिक ज्ञान का 
नव-संस्कार भारत के पूर्वी क्षेत्र में हुआ। जब आये - संस्कृति का विकास- 
विस्तार सरस्वती-हशदवती दोआब से भागे गंगा की ओर होने लगा, तब 
अनार संस्कृति के विरोध सामने आने लगे । शास्त्रीय ब्राह्मण धर्म के केन्द्र 
कुरु-पांचाल क्षेत्र में थे | कालांतर में वैदिक विद्या का नवोत्थान मगध-विदेह के 
क्षत्रियों के आश्रय में हुआ | याज्ञवल्वय की “भधुविद्या' का विस्तार भी यहीं 
हुआ । वेदिक देवों का खंडन होने लगा। स्थूलयज्ञों का निराकरण किया गया। 
ब्रह्म की प्रतिष्ठा शुद्ध ज्ञाहूप और आनन्दरूप में हुईं। सबसे अधिक क्रान्ति- 
कारी नव-संस्कार करने वाला कृष्ण है। कृष्ण को घोर-अंगिरस का शिष्य 
वतलाया गया है | वैदिक साहित्य में भंगिरस-्ज्ञान का संबन्ध 'घोर' (80 
047 78००९5 परछाएटव 0 6 बपाठ्णा ध्राएआ०६5 ०00 ॥]6 
]७॥0) से जोड़ा गया है । इस प्रकार आर्येतर धर्म-दर्शन से कृष्ण का संबन्ध 
हो जाता है। कृष्ण ने यज्ञानुट़्ान की एक नवीन व्याख्या की। इस प्रकार 
कृष्ण के व्यक्तित्व में वेद-विरोधी स्वर मिल जाता है। क्रष्णलीलाओं में यज्ञ 
करने वाले ब्राह्मणों की पत्नियों से कृष्ण का भोजन मंगा लेना, एक प्रकार से 


१ ब्जं च विष्णु: सखिनां अपोणु ते । ( ऋक्‌० सं० १।१५६।४) 
२. छान्दोग्योपनिषद, १३६।५ । 
३२. राघाकमल मुकर्जी, 'द प्लावरग आफ इण्डियन आईं ।! पु० ५४। 


सूर के कृष्ण १२६ 


वदिक यज्ञों का खंडन करना ही है। शिल्पक्रला में वेद-विरोधी गोवर्घन लीलः 
का ही अधिक अकन मिलता है| यादव जाति के सात्वतों ने कृष्ण को दिव्य 
रूप में घोषित किया । उसे सूर्य, पूर्णत्रह्द कह दिया गया । कृष्ण ने वदिक धर्म 
के कर्मकाण्ड से भिन्‍त एक दर्शन दिया। दर्शन आंगिरस के सिद्धान्तों से 
अनुप्राणित है । इसी दर्शन ने गीता का रूप ग्रहण किया। गीता में वेदीं को 
त्रिगणमय कहा गया है और अजु न से निसत्रगुण्य होने के लिए कहा गया है। 
आंगिरस शिक्षा का सार यह माना जाता है : सदगुण, सत्कर्म, दाव, अहिंसा, 
सत्वाश्रचित आचरण उतने ही फलदायक हैं जितना एक यज्ञनिष्ठ ब्राह्मण को 
गुरु-दक्षिणा देना । इन शिक्षाओं में एक नवीन दर्शन के भी वीज हैं और भक्ति- 
साधना के भी । दोनों का मिलाजुला रूप गीता में मिलता है। फिर मक्ति- 
सूत्र का विदशद्‌ विस्तार भागवतादि पुराणों में हुआ । वेदिक रूपकों के आधार 
पर, तथा अन्य लोकसूत्रों के आधार पर भी लीला-साहित्य विकसित हुआ। 
“इन्द्र-शरणागति' प्रसंग में सूर ने देवेन्द्र की प्राजय का सुन्दर आख्याव खड़ा 
किया । 

ज्नजवासी इन्द्र को सबसे बड़ा देवता मानते थे : यजश्ञोदा ने कहा-- 
थई हैं कुलदेव हमारे । कृष्ण ने इन्र की पूजा का विरोध किया और ग्रोवर्धन 
की पूजा का विधान किया--जो चाहौ ब्रज की कुसलाई, तो गोवर्धन मानो : 
इन्द्र को जब पता चला कि मेरी बलि” गोवर्ववत को दी गई तो वह आग- 
बबूला हो गया--- 

ज्रजवासिनि सोकों विसरायों । 

भलों करो वलि मेरी जो कछु सो सब ले परवर्तह चढ़ायो ॥ 

सो सों गये कियो लघु प्रानी, ना जानिये कहा सन आयोौ ॥* 

तेतिस कोठि सुर॒नि को नायक, जानि, वूझ्ि इन मोहि भुलायौ ॥ 
बौर इन्द्र ने अपनी सेना एकत्र की--- 

सुनि मेघवर्त, सजि सेन आए । 

बलवते, वारिबते, पौनबतें, ब्नज, अग्निवर्चकू, जलद संग ल्याये ॥ 

घहरात, गररात, दररात, हररात, तररात, झहरात साथ नाए।'* 


त्रज॒ पर आक्रमण हुआ । सभी प्रकार के “आवर्तों' का अधिपति इन्द्र 
था | सभी ने ब्रजभरूमि का नाश करने का संकल्प किया । यह 'विजली', वर्षा 





१. सूरसागर, १०८५१ 
२. वही, पृ० १०८५३ 


१३० सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


और “आवरत्तों' के देवता का क्रोध था | छियानवे करोड़ मेघमालाओं ने ब्रज को 
घेर लिया । कृष्ण पर पुकार हुई--- 


(गगन) भेघ घहरात थहरात गाता । 
चपला चमकाति, चमकि नभ भहरात, रालि क्यों न ब्रज नंदजाता ॥* 
गिरि गोवर्धन को धारण करके कृष्ण ने ब्रज की रक्षा की। इन्द्र का 
मान मर्दत हुआ । ऐराचत पर आभरूढ़ होने वाला इन्द्र, देवताओं के सहित 
कृष्ण की शरण में आया । 
सुरपति चरन परुयों गहि धाइ । 
जुग-गुन घोइ शेष गुन जान्यो, आयो सरन राखि सरनाद ॥* 
इन्द्र के समान ही वैदिक देव-मंडल में वरुण का भी स्थान था। इससे 
सर के कृष्ण का दुद्धंष संघर्ष तो नहीं होता, पर जब नंद वरुण-पाश में बंध 
जाते हैं तो ऋृष्ण वरुण को भी अभिभुत कर देते हैं ।* इसी प्रकार यज्ञ-पत्नी- 
लीला के प्रसंग में कृष्ण ने यज्ञपुरुष की बलि को लेना चाहा, ब्राह्मणों ने 
भोजन देने से मना कर दिया-- 
'जज्ञहित हम करी रसोई । ग्वालिनि पहलें देहि न सोई ॥१ 


पर क्षाह्मणों की पत्नियों ने भोजन ही नहीं दे दिया वे स्वयं भी क्ृष्ण 
की सेवा में गईं । इस प्रसंग में भी वैदिक यज्ञ को ललकारने की ध्वनि है। 
“रासलीला' आदि में तो वेद-मर्यादा के प्रति स्वर ऊंचा किया ही गया है। 
इन्हीं प्रसंगों में वेद के प्रति कृष्ण की जो दृष्टि थी, वह प्रकट हो जाती है। 
ये प्रसंग 'सूर' तक पुराणों के माध्यम से आये। इनके मूल अभिप्राय तो ले 
लिए गये, पर भावात्मक विस्तार सूर ने अपनी ओर से किया । 
२. तंत्रेश्वर कृष्ण-- 


तंत्र साहित्य में कृष्ण की भरपूर प्रतिष्ठा है। श्रीकृष्ण से सम्बन्धित 
कई तंत्र है। ये भी शाक्‍त या शव तंत्रों की माँति ही पूर्ण है । पर वैष्णवतंत्र * 


» वही, १०८७० 
, वही, १०।६७७ 
० वही, १०।६८४ 
« वही, १०१८०० 


, इन तंत्रों में वेष्णवामृत » लक्ष्मी कुलार्णव, विष्णु घर्मेत्तरतंत्र, राधा तंत्र 
विष्णुयाभल तंत्र आदि प्रसिद्ध हैं। 


4 6९ 9 >> «४७ 


९३१ 


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९३९ सुरसाहित्य : नव मुल्यांकन 


भी आया है | श्रीबीज, मायाबीज या कामबीज के साथ "श्रीकृष्णगोविन्दाय- 
नमः स्वाहा: का द्वादशाक्षरी मंत्र तो बहुत फलप्रद माना गया है। सस्तोन्र' 
ओर कवच भी कृष्ण के आधार पर बने । 


श्रीकृष्ण गायत्री भी प्रचलित हुई : 'दामोदराय विदृमहे वासुदेवाय 
धीमहिः | तन्‌नः कृष्ण प्रचोदयातु । इस मंत्र के शब्द हैं गायत्री, ऋषि है गोपी 
(राधा) और देवता हैं कृष्ण । वेष्णवतंत्रों में राधातंत्र का भी महत्त्वपूर्ण स्थान 
है । ताँत्रिक दृष्टि से राधा और कृष्ण अलग-अलग नही हैं । 


यहाँ तंत्र में कृष्ण के स्वरूप को विस्तार के साथ देखने की आवश्यकता 
नहीं हैं । यहाँ केवल यह सकेत कर देना है कि तंत्रेश्वर क्ृष्ण ब्रजक्ृष्ण ही हैं । 
राधा, गोपी, वृन्दावन आदि सभी प्रतीक वहाँ विद्यमान हैं ) साधना में स्तोत्र, 
मंत्र आदि का विधान है। बालरूप, गोपाल रूप आदि को तंत्र प्रतीक के रूप 
में देखा गया है । सभी रूपों का उनका ध्यान करके विविध फलों की प्राप्ति 
की जा सकती है | कृष्ण की परम सुन्दर के रूप में कल्पना की गई है ।* मंत्र- 
दान की परम्परा भक्ति संप्रदायों में भी चलती रही | वल्लभसंप्रदाय में 
अशक्षर मंत्र प्रचलित हैं : श्रीकृष्ण: शरणं मम । इसी प्रकार गुरु अन्य संप्र- 
दायों में भी मंत्र देता है| तंत्र की छाया सांप्रदायिक विधान पर अधिक काव्य 
पर कम है । तंत्रेश्वर कृष्ण का आभास चाहे सूर-साहित्य में स्पष्ट न मिलता 
हो, पर मोहन आदि नामों में इनकी झंकृति अवश्य है। जिस योगमार्ग को 
तंत्रों ने प्रभावत किया था, उसमें नाड़ी और चक्रों का विधान गृहीत था और 
इन आंतरिक केन्द्रों में नाद! जौर “विदु' के विभिन्‍न हृश्य और श्रव्य आकृतियाँ 
घटित होती थीं । इन्हीं चेतना केन्द्रों पर कृष्ण की स्थिति बैष्णव तंत्रों में 
स्वीकार को गई । 'सूर' ने कृष्ण की इस स्थिति का कुछ आभास 
दिया है-- 


हृदय कमल में जोति विराज। अनह॒द नाद निरंतर बाज । 
इड़ा पिगला सुषमन नारी ॥ सहज सुन्न में वसत मुरारी । 


योग की शब्दावली ने अनेक स्थानों पर कृष्ण संबन्धी कथन को बक्रता 
प्रदान को है । 


१. चन्द्राकंत्तड़तिकोटिसमश ति: सर्वागसन्दरः. सौम्य॑ सर्वाभरणभुषपितः 
पीतवासश्च शंखगदापदुमोज्ज्वलभुजः ॥ 
२. सू० सा०, ४०६४। 


' सर के कृष्ण १३३ 
३. मर्यादा और कृष्ण-- 


राम मर्यादा के प्रतीक हैं और कृष्ण लीला (सहजता) के प्रतीक हैं । 
ये ही दो मूल्य मारतीय संस्कृति की धारा के दो किनारे हैं : हमारे पौराणिक 
सत्य के दो तब हैं । संस्क्ृति के इतने मर्मसार्थक प्रतीक अन्य देशों की पौरा- 
णिक्र परम्पराओं में नहीं मिलते । 


मर्यादा आदर्श से पोपित होती है। आदर्श हमारा लक्ष्य है। आनन्द 
मनुष्य की मूल प्रवृत्ति हैं। श्रीकृष्ण आनन्द-कन्द हैं: उनकी लीलाओं में सहज 
आनन्द की शक्तियों का विलास है । इसलिये वह मानव के सहज आकर्षण का 
केन्द्र वन जाता है। हमारी मधुर लौकिकता एक नयी छवि ग्रहण करने लगती 
है । ऋष्णचरित्र के लोकोत्तर संकेत भी आतंक के स्थान पर रस-सृष्टि ही करते 
हैं । इसी अर्थ में वे 'मोहन' हैं । इस केन्द्र के आसपास समी भाव सहज-रूप 
में है। राम के परिकर के पात्रों की भाँति, कृत्रिम माव का आयोजन यहाँ 
नहीं है | वात्सल्यमय पिता-माता, सख्य भाव रखने वाले सुग्रीव, हनुमान या 
विभीपण सभी जेसे एक माहात्म्य या दास्य की छाया में अपने भावों का निर्वाह 
कर रहे हैं । कष्णर्ल ला के सभी पात्र इन कृत्रिम छायाओं से मुक्त होकर भाव 
के प्रति ईमानदार हैं | राम ने सुग्रीव मैत्री के लिये एक वार मर्यादा को भंग 
किया । कृष्ण का जीवन मर्यादा-भंग की एक श्वखला है। सहायता के लिए 
आये हुए दुर्योधन के साथ छलपूर्ण कूटनीति का व्यवहार किया । अपना वचन 
भंग करके भीष्म के विरुद्ध शस्त्र-ग्रहण किया। भीम-पुत्र घटोत्कच की बलि 
ही मित्र की रक्षा के लिए हैं।अजुन को निह॒त्थे कर्ण पर वार करने की 
प्रेरणा दी । दुर्योधन का अन्त शास्त्रविराधी विधि से कराया । यह महाभारत 
के रणक्षेत्र में सख्यमभाव की रक्षा में मर्यादाभंग का वातावरण रहा । ब्नजभूमि 
में तो मर्यादा का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं किया गया । वहाँ तो लोक-वेद 
की समन्वित मयददा के बन्धन को तोड़ना प्रेम के अन्यतम मूल्य के निर्वाह के 
लिए अतिवाये हो गया । जहाँ राम का व्यक्तित्व मर्यादाओं की स्वीकृति के 
सहारे उदात्त और विकसित हुआ, वहाँ कृष्ण ने मर्यादाओं को ललकारना ही 
जीवन की सहज गति की रक्षा के लिए आवश्यक समझा.। "मर्यादा" के मूल्य 
के स्थान पर मानवीय मूल्य की ही स्थापना का यह उपक्रम था। मर्यादा भंग 
करके भी क॒ष्ण ने विघटन की स्थिति को नहीं आने दिया । उन्होंने मर्यादा- 
कथित 'स्थिति' को स्वीकार करने के स्थान पर सहज “गति” को स्वीकार 
करना ह्‌ ।अधिक श्र यस्कर समझा । उनकी दृष्टि से सम्पूर्ण मनुष्य कभी ओझल 


१३२४ सूरसाहित्य : नव मुल्यांक्रत 


नहीं हुआ । जहां प्राकृतिक-पराप्राकृतिक मानवीय-अतिमानवीय विरोधी 
शक्तियाँ इस सम्पूर्ण मनुष्य की गति को बाधित करतीं, वहीं कृष्ण की लोकौ- 
त्तर शक्तियाँ उदित होकर इनको निस्तेज कर देती हैं--चाहे वे इन्द्र के रूप में 
आयें चाहें ब्रह्मा के रूप में, चाहे यज्ञ के रूप में हों, चाहे शास्त्रीय आदर के 
रूप में | उतका मर्यादा भंग जीवन के नवीन आयामों और गति की नवीन 
संभावनाओं के अन्वेषण और उनकी स्थापना की भूमिका बनाता है। 

मर्यादा सभ्यता और संस्कृति का आवरण डालकर हमारे मौलिक मन 
को आवृत करना चाहती है | पर मौलिक मन अपनी अभिव्यक्ति करके रहता 
है । अपने प्राकृतिक, नग्न अस्तित्व का साक्षात्कार भी निश्चित रूप से कुछ 
क्षणों का सत्य अवश्य है। 'चीरहरण के प्रप्तंग का यही सत्य है। ओर चिर 
प्रश्नांकित रासलीला ? इसकी वह स्वक्रीया, या परकीया, या इन दोनों भेदों 
से विवजित नायिका राधा ! उसका प्रेम एक पत्नीन्रत के आदर्श की भवहेलना 
करके कितनी ऊँचाइयों में विलसित हो गया--सुर चित से टरत नाहीं 
राधिका की प्रीत । समस्त मर्यादा यहाँ गति चकित है । सारा भक्ति साहित्य 
इस रस से लबालब है । कृष्ण ने वेद-मार्ग बतलाया-- 


इहि बिधि बेद मारग सुनो । 
कपट ताज पति करो पूजा, कहा तुम्त जिय ग्रुनों । 
यह एक बात कठिन परीक्षा वन गई। गोपियाँ जंसे टूटने लगीं । 
उन्होंने अपने जीवन मूल्यों की घोषणा की:--- 
बिधि मरजाद, लोक की लज्जा, सर्ब॑ त्यागि हम धाई आई ॥* 
और मर्यादा-भंग के इस दावेदार को गोषियों को साधुवाद देना पड़ा । 
उन्होंने स्पष्ट कहा, मेरा पूर्वक्थन अआ्रामक था। जीवन का यथार्थ मूल्य 
यहं/ है-- 
स्पाम हसि बोले प्रभ्ुता डारि। 
बारंबार विनय कर जोरत, कठि-पट गोद पसारि ॥। 
तुम सन्पुख में विशुख तुम्हारी, में असाधु तुम साथ । 
धन्य-धन्य कहि कहि जुवतिनि को. आपु करत अनुराध ॥* 


२. सू्रसागर, १०११०१६ । 
२. सूरसागर १००१०२५ । 
३. सरसागर १०११० ३२३ १ 


| 


सर के कृष्ण (३२५ 


इस प्रकार गोपियों की मर्यादा-निरपेक्ष हृदय-गति को स्वीकार करते 
हुए कृष्ण ने उन्हें साचुवाद दिया : अपने वाकक्‍्यों की असाधुता को भी मान 
गये । इस रसात्मक जीवन पद्धति में चेतन्‍्य विह्‌वल हो उठे) चण्डीदास के 
स्व॒रों में रस उमड़ पड़ा । 'सूर' ने इस अमृत को लोक-सुलमभ बनाया | इन्हीं 
मूल्यों के सहारे कृष्ण का व्यक्तित्व हमारी आधुनिक वंश्विक चेतना के इतने 
निकट हो जाते है । उन्होंने संवेदना और “अनुमव' को नेसगिक रूप में ग्रहण 
किया । उनका संदेश आज भी उत्तना ही ताजा है। लोक-लाज और वेद-पथ 
त्थाग की बात तो मुरली, रास आदि के प्रसंग में असंख्य वार कही गई है । 
इसके अधिक प्रमाणों की आवश्यकता नहीं है । 


४ लीलापुरुप : एक प्रतीक 


कृष्ण का अवतार जहाँ लोकमंगल के लिए हुआ था, वहाँ लीला- 
विस्तार भी उसका एक कारण है | लीलावतार के पीछे भगवान की 'स्वेच्छा' 
ही है । मोदे रूप से लीला का उद्देश्य भक्तों के शुन्य को रस से आप्लाचित 
कर देना है | वैसे 'लीला' लीला के लिए भी है--वह अहैतुकी है। भगवान 
की अप्रकट लीला का अव्तारित रूप ही ब्ज-लीला है । सूर' आदि भक्त कवियों 
ने गान तो प्रकट लीला का किया है : पर इनमें अप्रकट लीला की झ्नक्न॑तियाँ 
ग्रूज रही हैं; दृश्य क्षितिजों पर दिव्य आभमा छिठक रही है। भक्तों 
के इन गतों में जो माव हैं, उनके आलंबन रसिंक शिरोमणि कृष्ण ही हैं । 
काव्य की आत्मा 'रस है । वस्तुत: इस सिद्धान्त का संमूृतन भक्तों के काव्य में 
मिलता है। “रस' का संमूर्तन कृष्ण में हुआ और कृष्ण भक्त कवियों की वाणी 
में अशेष रूप से समाविष्ट है। भक्तों के संदर्भ में कृष्ण विषयालंवन हैं। पर 
राधा के संदर्भ में कृष्ण को आश्रयालंवन होना ही पड़ता है । 


४.१ अवत्तरण प्रत्तीक 


कृप्ण का जन्म एक असाधारण परिवाषवँ में हुआ। राजपुरुष होते हुए 
भी इनका जन्म कारागार में होता है । कारागार्‌ में यदि हम चाहें तो अधर्म 
अमानुपिक अत्याचार एवं शोषण का प्रतीकत्व स्थापित कर सकते हैं । इन 
परिस्थितियों में स्वातंत्र्य के अग्रदूत का जन्म हुआ | इसी परिस्थिति के कारण 
कृष्ण को ब्रज का उन्मुक्त वातावरण मिला। मथुरा से कृष्ण गोकुल पहुँचाये 
जा रहे हैं। परिस्थिति : भादों का मेघाच्छनत आकाश, सूचीभेद्य. अन्धकार, 
उमड़ती हुईं यमुना, दहाड़वा हुआ सिंह-- 


१३६ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


भादों की अघरात अध्यारी। 
द्वार कपाट-कोठ भट रोके, दस दिसि कंत कंसभय भारी ॥॥ 
गरजत मेघ, महा डर लागत, दीच बढ़ी जघपुना जल कारी |" 
ज्योतिपुरुष के स्वागत में अन्धकार की निबिड़्तम शक्तियाँ लगी हैं। 
तुलसी के राम के जन्म की परिस्थितियों से इस अवतार की परिस्थितियों को 
मिलाइये-- 


नौमी तिथि मधुमास पुनीता । सकल पुचछ अभिनित हरिप्रीता । 

मध्यदिवस अति सींत व घामा । पावन काल लोक विश्लञाप्ता ॥| 

सीतल मंद सुरभि बहु बाऊ। हरिषित सुर संत सन चाऊ। 

बन कुसुसित गिरियव सनीआरा । स्र्वह सकल सरिताम्ृत धारा ॥ 
प्रकृति की सुन्दरतम शक्तियाँ राम के स्वागत में उपस्थित हैं । चैत/ 
भाद्रपद, शुक्लपक्ष/कृष्णपक्ष, दोपहर/अद्ध रात्रि का वैसाहश्य ( ००7४७$६ ) 
एक प्रतीकार्थ रखता है। आरंभ से अन्त तक प्रतिकूलताओों से संग्राम करते 
हुए ही कष्ण का व्यक्तित्व पूर्णता को प्राप्त करता है । जन-जन का अस्तित्व 
भौतिक और मानसिक है; में जकड़ा था। इस लीलावतार को अन्धकार 
से ही संघ करना था | छैक ओर मनुष्य की आनन्दवृत्ति के सहज विकार को 
घोटने वशली सड़ी-गली मर्यादाओं भौर मानसिक कुठाओं पर उन्होंने आधात 


किया, दूसरी ओर भौतिक ऐश्रूमा का शोषण करने वाली कंस-शक्तियों का 
उच्छेद किया । 


कालिमा या अन्धकार जीवन की जटिल परिस्थितियों का प्रतीक बन 

गया । वेदिक साहित्य में अग्नि का एक नाम कृष्ण वर्त्मा है--अधरे पथ पर 
आगे बढ़ने वाला । कष्ण के साथ यह छब्द-प्रतीक सटीक उतरता है । समस्त 
अन्धकार के सूत्र घने होकर सहज जीवन के मागें को अवरुद्ध करते है : कष्ण 
(श्याम) मार्ग की खोज करते भागे बढ़ते है । इसमें 'तम्‌ आसीत्‌ तमसा 
गूढ़मग्न --आर म्भ में वरआस्म । भी अंधकार में गूढ़ रहता है। नीलामवपु 
स्वर्ण किरणों से प्रोदभासित होकर ध्याम बनता हैं। उनका जन्म अन्धकार में 
ही होता है। कृष्ण के साथी गोरे है--भजु न भी गौर और राधा भी | पर 
यमुना काली । यमुना में रहने वाला 'कालियनाग” यमुना-चेतना धारा में 
रहने वाले अचेतन का प्रतीक है । यहां जीवन की अन्च प्रेरणाएँ निवास करती 

हैं । चेतना की गति इससे अवरुद्ध होती है । कालियदमन दिव्य चेतना और 





१. सूरसागर, १०११। 


सूर के कृष्ण १३७ 


अवचेतन की अघकारमय व॒त्तियों के बीच संवष है। 'कालिय' को प्रकट करके 
इसकी उदधत शक्तियों का दमत किया जाता है । “विष' के अज्ञात स्रोत को 
प्रकट करना होता है। इससे विषाक्त प्रभाव समाप्त हो जाता है | कालियनाग 
मारा नहीं जाता । इस प्रकार समस्त काले वातावरण में दो धवल प्रतीक 
जगमगाते मिलते हैं-राधा और अजु न । कृष्ण और भजु न के धबलत्व का प्रतोक 
वेद में मिलता है--अहश्च कृष्णममहरजु नं च* | इस प्रकार कृष्ण स्वयं 
एयाम होते हुए भी दिव्य ज्योति की किरणों के आश्रय हैं और राधा और 
अजु न उनके जीवन दशंन के दो धवल प्रतीक अमर हो जाते हैं । 


४.२ आध्यात्मिक्र प्रतीक 


आध्यात्मिक दृष्टि से कष्णलीला का प्रतीकात्मक आख्यान भी साहित्य 
में दीपंकाल से मिलता है। कष्णत्रीला के प्रतीकाख्यान में तीन रूपों से उनका 
ऐतिह्य विविक्त है । श्र्‌ तियों के एकीभूत गुप्तवित्त ब्रह्म ( उपनिषद्‌ में) गोपांग- 
नाओं के पुजीभूत प्रेमरूप परमात्मा ( भागवत ) तथा यदुओं के मूतिभूत 
भागधेयण पुरुपोत्तम (गीता में) | पांचरात्न पूर्व युग में ही क॒ष्ण के व्यक्तित्व में 
वेंदिक विष्णु, अध्यात्म के ब्रह्म और मारत के लोकतायकत्व का समावेश हो 
चुका था। मिथुनवासना को प्रधानता देने वाला शिव-शक्ति-संयोग वाला 
सृष्टि-सिद्धान्त पुराणकार को स्वीकृत था। इस पिद्धान्त का विक्रास भागवत 
में पूर्ण रूप से मिलता है। भागवतकार ने स्वीकार किया: वेदों का सार 
उपनिपद्‌ है । इनका दुग्ध 'वेदांत सूत्र' है, जिसको भक्तों ने पिया है| पर 
मेरी तृप्ति नहीं हुई । इसलिग्रे भागवत की रचना हुई है ।' इस ग्रथ ने लीला 
पुरुष के आख्यान से देश की, 'भावात्मक एक्रता संपादित की । समस्त शारत 
का मक्ति-साहित्य इपका साक्षी है। चित्तनगत थधाराओं का भी कृष्ण के 
व्यक्तित्व में समाहार मिलता है : ज्ञान के अद्व त, भावात्मक विश्व सौहाद और 
कमंगत योग की ज़िवेणी श्रीकृष्ण में मिलती है। औपनिष दिक तत्त्वज्ञान को 
प्रकट करने के लिए निममागम मूलक रूपकों और प्रतीकों का आश्रय सागवत- 
कार ने लिया । इन रूपकों से कहीं कष्ण का ज्ञानाश्रित रूप प्रकट होता है 
और कहीं पूर्ण भावात्मकरूप और कहीं पूर्ण धामिक रूप विविक्‍क्त है। संबद्ध 
स्थानों, पदार्थों, चरितों, परिकर आदि की व्याख्या भी इसी व्यवस्था के 
अन्तर्गत होती है । 





१. ऋग्वेद, ६।६॥१॥ 


१३८ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


सृष्टि प्रकरण में 'कृष्णण ओर “राधा” परमात्मा और उनकी शक्ति के 
प्रतीक हैं । इनका ऐक्य ही सृष्टि के मूल में हे । 'कृष्ण और “राधा शब्द की 
व्युत्पत्ति भी इसी सिद्धान्त को पुष्ट करने के लिए की जाती है। #ष्ण की 
व्युत्पत्ति इस प्रकार की जाती है (क्षषि --स्वे)--(नकार) (ण) 55 आदि- 
बीज, आत्म) 5"-क्ृष्ण । इस व्युत्पत्यर्थ के अनुसार कृष्ण 'सर्वादि, 'सर्वबीज, 
सर्वात्मा सिद्ध हो जाते हैं। वे सदानन्द हैं, इसकी पुष्टि इस व्युत्पत्यर्थ से होती 
है : (कृष --भू (सत्ता) -+- ('न' (ण) 5 निवृत्ति या आनन्द) 5 हुष्ण | इसी 
प्रकार 'राधा' (शक्ति) का पुराणों में निर्वेचन मिलता है : (शक्‌ ८"-ऐश्वर्य -- 
(ति--पराक्रम) शक्ति | राधा 'शक्ति के रूप में ऐश्व्य और पराक्रम प्रदान 
करती है | राधा" का यह व्युत्पत्यर्थ मिलता है: (राज-आदान) -+- (धार 
निर्वाण) "- राधा (मुक्तिप्रदा) | कृष्ण और राधा में सर्वात्मा/अंतरंगा शक्ति 
न्याय प्रकीतित है। ये परस्पर अपरिहाये बन्धन में आबद्ध होकर सृष्टि का 
मूल सिद्धान्त बनते हैं । इस व्युत्पक्तिलम्य अर्थे के आधार पर पौराणिक आख्यान 
यह बनता है: आदितत्त्व रूपरहित है। शक्ति के संयोग से वह रूप ग्रहण 
करता है । महाशक्ति (महामाया) कभी भोतिक शक्ति के रूप में और कभी 
चंतन्यरूप में समुल्लसित होती है । इसी के योग से निराकार, सग्रुण विग्रह के 
रूप में विलसित होता है | सम्पूर्ण जगत इसी तत्त्व का अज्भ है। इस प्रकार 
की धारणा किसी-न-किसी रूप में सभी संप्रदायों में मिलती है। वल्लम संप्र- 
दाय में भी यह मान्यता है जिसका प्रतिबिम्ब इन संप्रदायों के कवियों में 
परिलक्षित है। यही भगवान की सृष्टि-रूपा लीला है। सूर के शब्दों में 'पुरुष' 
'प्रकति! एकता यह है-- 
प्रकृति-पुरुष एक करि जानहु वा तन भेव करायौ । 
दंत न जीव एक हम तुम दोऊ सुखकारन उपजायोौ ॥ 
“इच्छा शक्ति' के रूप में महामक्ति ने ब्रह्म को सगुण रूप में प्रकट किया-- 
आदि निरंजन निराकार कोउ ह॒तो न दूसर । 
रचा सृष्टि विस्तार भई इच्छा इह भौसर ॥ 
भौतिक रूप से प्रकट जगत भी इसी “इच्छा” रूपा शक्ति का परिणाम हैं।३ 
हरि 'इच्छा' करि जग प्रगठायोँ । 
'सूर में प्रकृति-पुरुष की अद्व तता भी मिलती है, * और जगत की 
उत्पादिका शक्ति के रूप में राधा की प्रतिष्ठा है -- 


प्‌ सूरसागर, पद, १६८८ ॥ 


सूर के कृष्ण १३६ 


अरु यह जगत जद॒पि हरि रूर है, तऊ मायाक्रत जानि । 

इस प्रकार की रहस्यात्मक व्याख्या में अन्य चरित्रों की भी प्रतीक 
योजना देखनी होती है । वेद और वेदान्त की परम्परा को सिद्ध करने के लिए 
अन्य पात्रों का प्रतीकार्थ यह सिद्ध होता है: वसुदेव--निगम; देवको >नब्रहय- 
पुत्री; गोपियाँ और गायें+-ऋचाएँ, नंद--परमानन्द, यशोदा--मुक्तिमोहिनी 
तथा कृष्ण >-बेदार्थ ।* भागवत में भी गोपियों की श्र्‌तिरूपा या ऋचाओं के 
रूप में मान्यता है । सूर की गोपियाँ भी वेद-ऋचाए हैं-- 

'ब्रज सुन्दर नहिं नारि, रिचा श्रति की आहों ४ 

गोपियाँ यदि ऋचात्मक हैं, तो श्रीकृष्ण प्रणवात्मक हैं । श्र्‌ तियों को 
दो रूपों में देखा गया है: अन्यपरा और अनन्यपरा। अनन्यपरा श्र्‌ तियों 
(>ल्‍गोपियों) का पर्यवसान सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” में होता है। अन्यपरा 
गोपियों (श्र्‌तियों) का दूसरे देवताओं के माध्यम से परब्रह्म में पर्यंवसान होता 
है। रसाश्रयी भक्ति साधना की शब्दावली में प्रथम का प्रतीक 'परकीया है 
और द्वितीय का 'स्वकीया । अन्य पात्रों और चरित्रों के रूपक में भी वंदिक 
तत्त्वों का समावेश है। उदाहरण के लिए : बलरामनच'ज"शेषनाग, कश्यप्‌८-- 
ज>उलूखल, अदिति-"-रज्जु, वनन्‍न्‍बकुण्ठ, द्रुमच|-तापस, यश्टिकाज>न्नह्मा, 
वंश>--रुद्र, ध्यृद्धू --इन्द्र । 

इस प्रतीक योजना का लक्ष्य शुद्ध ब्रह्य, जीव और जगत के आध्या- 
त्मिक संवन्ध को स्पष्ट करता प्रतीत होता है । समस्त निगमागम का सार इस 
योजना को पुष्ट कर रहा है । इसी तत्त्वदर्शन का अवतार धामिक प्रतीकों में 
होता है तत्त्व की भावात्मक प्रीत घमं-संस्थानों का लक्ष्य है। इसी दृष्टि 
से कृष्ण की लीलाओं में प्रतीक-योजना उभरी | कलियुग के प्रतीक ये बने : 
कंसज>क लिधर्म, अघासु र--महाव्याधि । देवासुर संग्राम के मूल में सद्वृत्तियाँ 
ओर असद्‌ वृत्तियों का रूपक है । इन्हीं का संबषे होता रहता है। सद्वृत्तियों 
के प्रतीक पात्र कृष्ण वार्ता में ये हैं: शमज"-सुमामा, सत्य"-अक्र र, दम॑- 
उद्धव, दया--रोहिणी । असद्‌ वृत्तियों के प्रतीक ये हैं : गर्व --राक्षस, हे ष --- 
चाणुरमल्ल, दर्प->क्रुबलियापीड़ । इस विवान में कण लोक-मंगल के 
प्रतिष्ठापक, धर्म-संस्थापक तथा साथुओं के त्राता बन जाते हैं । 

कण की लीलाओं के भी प्रतीकार्थं सम्पन्न हुए। चीरहरण लीला का 
प्रतीकार्थ यह हुआ : गोपियाँ:--आत्मा, वस्त्र -5अस्मिता, चीरहरण--आत्मा 





१. इस प्रतीक योजना का रूप 'कृष्णोपनिषद्‌” में स्पष्ट किया गया है । 


१४० सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


के द्वारा अस्मिता का निरास | इसी प्रकार दूध-दोहन का अर्थ यह है : दूध ++ 
धीन्द्रिय संयम, दोहनर-पौर्वदेहिक मम न्द्रिय संयम | इन दोनों का संयोग ही 
इस लीला से ध्वनित है । 


कुछ प्रतीकों में ज्ञान और धर्म दोनों अभिप्रायों का समन्वय भी 
मिलता है। चौर' सम्बन्धी लीलाभथों का ज्ञानाश्रित प्रतीक यह है: कृष्ण 
समस्त संसार में अपने को लीन करने वाले हैं। धामिक दृष्टि से वे प्रयत्नों के 
अशुभ कार्यों को चुरा लेते हैं । इन प्रतीकों में सदा एक रूपता भी नहीं 
मिलती । कृष्णोपनिषदु के अनुसार सत्यभ्षामा 'घरा” है और पदमपुराण के 
अनुसार 'यशोदा' । कहीं ' प्रद्य मर! को 'मन' माना गंया है, कहीं ब्रह्मा को। 
अहंकार के रूप में कहीं अनिरुद्ध के और कहीं रुद्र के प्रतीक को स्वीकार किया 
गया है। इस प्रकार प्रतीक-योजना का विस्तार पुराणों में और पांचरात्रों में 
हुआ । इससे भारत की समस्त चितन घारा को समेटने का प्रयत्न हुआ । 
यह मारत को भावात्मक एकता का एक विराट प्रतीकात्मक 
आयोजन था । 


आगे के भवित संप्रदायों में गोपियों और कृष्ण का संवन्ध सबसे अधिक 
लोकप्रिय होता गया । उपनिपद्‌ के आनन्दवाद को भक्ति की तरंगों में बाँध 
देने का कार्य भी इसी प्रतीक के आख्यान से संभव हुआ । कामशवित को त्याग 
और आत्म-समर्पण के मूल्यों की छाया में कितनी ऊंचाई तक ले जाया जा 
सकता है, यह गोपी-कृष्ण प्रतीक योजना ने स्पष्ट किया । अहेतुकी कृप्णलीला 
में 'रति' किसी न किसी रूप में मिल ही जाती है। इन लीलाओं में रति 
दी विविध दिशाएं रूपायित हुई हैं। इन भाव-प्रतीकों की योजना संज्ैप में 
यह है : वाललीलान-प्रीति रति, गोचारण लीलाऊ-'प्रेमरति कशोर लीला 
>ममधुर रति, ब्रजलीलाज-विरह प्रधान रति; निकु जलीला >#संयोगेक- 
प्रधाना मोप्य-रति। इन रति रूपों के अनुसार गोपियों के प्रतीक के रूप- 
प्रकारों की कल्पना पुष्ट हुई | गोपियॉ--प्रेममवित साधना, राधा--रससिद्धि । 
इस प्रतीक परिवेश में श्रीकृष्ण 'रसेश्वर' परमात्मा हो। बृन्दावन ” अमर- 
पुरी' णा गोलोक का प्रतीक है : नित्यधाभ का अवतरित रूप । वेणुरव आनन्द- 
मयी लीला के आह वान का प्रतीक है । होली, बसनन्‍्द्र आदि लीलाओं में 
008 080 और काम की दुभ नियुक्ति का प्रतीक अधिक वध्वनिमय हो जाता 
है । मक्ति के आचार्यो ने कृष्ण संवन्धी, भावाकुल प्रतीकों के द्वारा समाज में 
एक स्नेहमूलक जीवनी शक्ति का संचार किया | इस प्रकार कृष्ण और उनकी 


सर ने कृष्ण १४९१ 


लीलाओं से संबन्धित व्यक्तियों, स्थानों और पदार्थों का जो प्रतीकत्व स्थायित 
हुआ, उससे कामोस्तवत की विभिन्‍न श्रेणियाँ शरीर सरणियाँ ही प्रकट 


होती दें । 
४/३ क्रामोन्‍न्नयन : रासलीला 

आधुनिक मनोबनानिक दृश्टि स क्रामोन्नयन का सिद्धान्त क्षण्ण की 
प्रजब-लीलाओं में व्यवद्ठत हो सकता हैँ । करामोन्नयन से संवन्बित लीलाओं में 
विराघ और बललग्य ही अधिक सामने आता #&4 नातक ओर मयादामू लक 
सूल्यों की अवज्ा को देखकर क्रृप्ण करा जीवन असामाजिक सा प्रतीत होता 
हैं । ऐसा प्रतोत होता हैं. कि कृष्ण का व्यक्तित्व इतना गत्यात्मक ट्रै कि एक 
निश्चित बुद्धि एक परम्परा और एक नंतिकर पूृत्राग्रह से ग्रस्त होकर उसका 
पकड़ पाना संभव नहीं हो सकता । एक बने-बताए संचि में इस तरल व्यक्तित्व 
को वादा नहीं जा सटता | इसका कान्ण है कि उनका चरित्र एक लीला' 
| | उनमें एक मतवाद को लेकर चलने को वास कहाँ मिल सकती है | लीला 
सहज कमे का प्रतीक है, जो - दृः्वा सु - उपसर्गों में नहीं 


7९] । ५ 


श्प्त पे 


बाँधा जा 
सकता | मनोविज्ञान की दृष्टि से लीला या सहज कर्म जो बर्जनों स दषित 
लहीं हो गये है; मानव जीवन के विकास के लिए आवश्यक है| संयम, मर्यादा 
थादि नकारात्मक तन्‍्व ह : व्यक्ति की गति इनसे सिद्ध हा सकती है । सीता 
सती है, पर राखा के साथ जैस स्ीत्व का प्रश्न ही नहीं उठता। राम 
आदण हैं, मर्नादित हैँ 4 कृष्ण जेस इन स्तरों से परे हैं। बह नहीं क्रि राम 


र्ड 


हर ९4 
पत्रित्र नहीं : पर राम और कृष्ण दो अलग-अलग संदर्म-श्र वो की ओर विकसित 
डो भिन्‍ने झक्षितियाँ हैं । 


कैप्ण की गोपियों के साथ की गई खलीलाएं बच्दार्थ में 
हैँ ।पर आन्तरिक सदन में वा प्रतीकार्थ की दृष्टि से नितांत संगत है । 

बड़ी मांसल क्र सरस हें | बदि आद्णे की द्रष्टि से उनको तोलें, तो थे 
अथार्थ लगती हैं | उनमें अरूप का अवत्तरण है । भीतिक परिवेश प्रस्तुत 
करते समय क्षाद्क को ब्यानत में नहीं रखा गया। कअलौक्षिकता की ब्यंजना 
चाद़े जितनी सुक्ष्म और स्फ्रीत हो, पर भौतिक पक्ष में वनत्व कम नहीं है। 
इतना है कि हमें एक वारंगी उसमें अप्रस्तुत कुछ नी नहीं लगता । अन्योक्ति' 
ओर “समायोकत्रित ऊंस दो अलग छायाओं को वन्निने का प्रयत्न करती हैं । 
एसा यहाँ कुछ भी नहीं | लगता है कि एक मानसिक्र यथार्थ अवतरित हो रद्ा 

टै | इन मानवीब अन्तर्मन क्रा बथाथ, कषवतार कल्पना में पहली बार उत्तरा 


+ चक्र चआीँ 


| 


कुछ विचित्र 


ध । 


»+ जि ९ 


2 


१४२ स्रसाहित्य : नव मूल्यांकन 


है। यह झाँकी नीतिज्ञ, कूटनीतिज, नेता या ज्ञानी कृष्ण की मृति से अधिके 
शक्तिशालिनी है। भारतीय मानस-पटल पर इसी छुबि की अमिट रेखायें 
अधिक खिची ओर उभरी हैं नेतिक उपदेष्टा कृष्ण मात्र दुद्धजीवियों के 
विलास का विषय है। हमारी आन्तरिक भाव-छायाओं का यथार्थ प्रतिनिधि 
न्रजक्ृष्ण ही है | हमारे प्रे-अचुरे स्वप्न ही जैसे अवतार ग्रहण करके आ गये 
हों । यह रूप किसी से दूर नहीं है । यह सबका अपना है। मर्यादा आदि का 
बोध हमको इतना उत्पीड़ित करता है कि कृष्ण की झाँकी के अतिरिक्त कहीं 
शरण ही नहीं दीखती, जहाँ सब कुछ सहज ! सब कुछ सुलभ ! कृष्ण का 
व्यक्तित्व नकार बृत्ति के लिए एक चुनौती है । नकारात्मक या शून्य की भाषा 
में बाँधकर क्ृष्ण के व्यक्तित्व को नहीं समझा जा सकता । मानव-प्रेम का 
अखंड रूप अपनी अभिव्यक्ति के लिए क्ृष्ण के व्यक्तित्व से बड़ा कोई प्रतीक 
नहीं पा सकता । इस प्रतीक के द्वारा ही कामोन्‍नयन की निश्चल सरणियाँ 
प्रकट हो सकती हैं । 


कामोन्नयन का चरम पूर्णकामता है। यही कृष्ण के व्यक्तित्व का 

न्द्र है। 'कार्मा में अतृप्ति का तत्त्व है। चरम स्थिति में इसका तिरोधान हो 
जाता है। काम जगत की प्राणशक्ति (शॉबा 0०6९) है । ऋषि ने इस 
शक्ति को नमन किया है |" यही “इच्छा शक्ति के रूप में समस्त 'लोला' की 
पृष्ठभूमि में व्याप्त है । कामशक्ति नाना खूपों में प्रस्फुटित होती है। इसके 
विकास के दो पथ हैं: सहज और मर्यादित । दोनों ही मूल्यों पर विचार हुआ 
है : दोनों ही केन्द्रों के आस-पास चितव और कल्पना का जाल न्यस्त हुआ 
है । समस्त कला-विलास इन दोनों का ही परिणाम हैं। पर आधुनिक वैज्ञा- 
निक दृष्टि यह कहना चाहती है कि सहज का वरण और पालन ही श्र यस्कर 
है । सहज ' वृत्ति में निम्नगामी होने का एक भय अवश्य रहता है । पर यह 
भय एक ओर तो एक सहज जीवन मूल्य में पूर्ण आस्था न होने के कारण 
है, एक और मुल्य नकारात्मक रूप में आकर्षित करता रहता है, दुसरे इस भय 
के कारण जीवन के मुलाधार का निषेध संमव नहीं है। भययुक्त साधना भी 
चली : काम के विनाश ओर निरोब के उपदेश भी दिये गये । सारा वातावरण 
'मिच्छाचार' (मिथ्या चार) अलीक कामया'द्वीन्द्रिय समापत्ति' से भर गया । मल 
जीवनीशक्ति को कितने ही कलुपों स युक्त कर दिया गया । क्षष्ण ने इन सब में 





१. 'कामस्तग्र समवर्तताधिमदसो रेतः प्रथमं यदासीतु” । 
(ऋक्‌० १०११२६॥४) 


सूर के कृष्ण १४३ 


रोग देखा | दमन और वर्जन की शक्तियों को उसने ललकारा । उसने अपने को 
कामशक्ति के रूप में घोषित किया ।* वास्तव में कृष्ण ने अपने जीवन में 
कामशक्ति के अनिचद्य विलास को उत्तार दिया । 


भारतीय दृष्टि से चेतना के चार स्तर हैं : प्राण, मन, वुद्धि और 
प्रज्ञा । इनके लिए क्रमशः अन्त, वासना, इच्छा और आनन्द दुनिवार हैं । काम 
की ऊध्वेगामी यात्रा भी इन्हों चार मुकामों में होकर चलती है। इसकी गति 
को अवाघ रखने के लिए संकल्प आवश्यक होता है। एक महान्‌ उद्देश्य 
आनन्दात्मक रहना आवश्यक है। सबसे अधिक आवश्यक है, अह का 
विसजंन : उत्समग । प्रतीक रूप से कृष्ण की लीलाएं इस ऊध्वंगामी यात्रा को 
प्रकट करती हैं । जो परिस्थितियाँ कृष्ण को जन्म से मिलीं, वे बनुकूल नहीं 
थीं। फिर भी विकासोन्मुख रहना उनकी इच्छाशक्ति और संकल्पशक्ति का ही 
परिचायक है | गोवर्बन घारण लीला प्राणमय कोश में महाशक्ति के स्फुरण 
की प्रतीक है । यहाँ भी भय-पूजा के स्थान पर प्रीति-पूजा की स्थापना का 
प्रयत्त मिलता है। गोववबेद-पूजा में अन्नमर्या मूल्यों का समावेश है । इस 
आधार पर सारा ब्रज एक पारिवारिक भावना में बंध गया : अन्नमय मूल्यों 
की सुरक्षा में ही कालियदमन, इन्द्रमानमोचन, वत्सासुर, वृक्रासुर, छेनुकासुर, 
दावानल-पान जैसी लीलाए घटित हुईं । इस प्रकार कामशक्ति का अन्नमय 
कोश में आश्चर्यंजनक्र विस्तार दिखलाई पड़ता है। 'माखनचोरी' आत्मविस्तार 
का ही प्रयत्न हैं। 
रासलीला-- 


मनोमय कोश में कामशक्ति के महासंचार को प्रकट करने वाली लीला 
'रासलीला' है। यह प्रकृति-पुरुष, नारी-वर के महामिलन का पव है। सृष्षि में 
व्याप्त मिथुन-सिद्धान्त का इससे बड़ा प्रतीक अन्यत्र नहीं मिल सकता । कामो- 
न्‍नयन के दो रूप होते हैं : एक सौन्दर्यमूलक, दूसरा सामाजिक | प्रथम पद्धति 
हमें कृष्ण की रासलीला में मिलती है । रास एक प्रकार से गोपियों के मनोमय 
कोश की उद्व लित चृत्तियों को ऊध्वेन्मुख करने के लिए ही सम्पन्न हुआ । 
इसमें एक तत्त्व सामूहिकता का है । एकांकी परिस्थिति में, एकाकी मन की 
विकृृतियाँ यहाँ समाप्त हो जाती है । 'अह का विसर्जन यहाँ पूर्णंूूप से प्रति- 
पादित किया है। 'अह” की गंध आते पर ही 'रास' रुक जाता है : विरहाग्ति 
उद्दीप्त करके अहं को भस्म करने की योजना भी है । उत्सगं के पवित्र क्षणों में 





१. धर्माविरुद्धो भुतेषु कामोइस्सि भरत्ंभ । (गीता ७११) 


श्ड्ड सरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


स्वार्थ नहीं रह सकता । इस तत्त्व को शुकरदेव ने परीक्षित के शंका-समाधान 
के लिए स्पष्ट किया ।। न यहाँ भय है, न संकोच, न आलस्य न जड़िमा । 
कामशक्ति का शुद्ध ऊध्वेंमुखी विलास ही यहाँ सो-सो छवियों में विद्यमान है । 
शान्ति का यही मार्ग है । मनुष्य का चित्त विषय-विकारों से शून्य नहीं हो 
सकता । पर इनको स्थिति इस प्रकार हो कि मानसिक शान्ति भंग ने हो । 
वास्तव में यही 'योग: कर्मंसु कौशलमू' का रहस्य है । इस प्रक्रार रासलीला 
में कामोन्‍न्नयन की भारतीय पद्धति का ही परिपालन है। 


“रासलीला' का प्रसंग इसीलिए जीवन के महान्‌ अर्थो की क्रीड़ास्थली 
बन गया है। भावुक-मक्त त्तो इसके रसास्वादन में रत रहते ही है, वेदान्तियों 
को भी इसमें साधना और समाधि के अनेक रहस्यों की झलक मिल जाती हैं । 
विभिन्‍न चिन्तकों ने इसका भिन्‍त-भिन्‍न रीतियों से मूल्यांकन किया है! पर 
इसकी कल्पना में काम और प्रम को पृथक करने का अभिप्राय अवश्य है । 
सत्र ही इसमें काम का निराकरण किया गया है। वल्लभाचार्य जी ने ब्रह्मा 
नंद से भी उच्चतर रस भजनानन्द की सृष्टि क्रे लिए रास माना है । मुक्तजीवों 
को यह रस प्रदान करना ही रास का लक्ष्य है ।* यह रस मानसिक अनुभूति 
से अभिव्यक्त होता है। यह देह द्वारा प्राप्त अनुमव नहीं है--रास क्रीड़ायां 
मनसो रसोदुगमः न तु देहस्थ ।” रास के तीन रूप वल्‍लभ संप्रदाय में माने गये 
है : नित्यरास, अवतरित रास तथा अनुकरणात्मक रास ॥$ प्रथम तो गोलोक 
या नित्य वृन्दावन में श्रीकृष्ण के आनन्द विग्रह और उसकी आननन्‍्द-प्रसारिणी 
शक्तियों के संयोग से होता रहता है | दूसरा वृन्दावन में होता है। 'सुबोधिनी 
में यह भी कहा गया है कि रास में काम की चेष्टाएँ तो हैं, पर काम नहीं ।४ 
इसमें लौकिक काम का उन्‍तयन और शुद्ध मानसिक प्रेम की उपलब्धि ही है। 


१. कुशला चरिते नेषामिह स्वार्थों न विद्यते । 
विपयंयेण वानर्थों निरहंकारिणा प्रभो ॥॥ (भागवत ) 
२. आपुर्षमाणमचलप्रतिष्ठ सतुद्रमाप: प्र.वदशन्ति यदवत्त । 
तद्व॒तु कामा य॑ प्रविज्यंति सर्दे स शान्तिमापनीति न कामकामी ।॥ 
(गीता २।७० ) 
३. ब्रह्मानंदात्समुद्धघुत्य भजनानंदयोजयेत । 
लोला या युज्यते रुम्पक्‌ सातुर्ये विनिरूष्यते ॥॥ (सुयोधिनी ) 
४. क्रिया सर्वापि सेवात्र परं कामो न बिययते । (चहीं) 


४ सर के कृष्ण १४५ 


सारी योजना निष्काम है ।* निम्नगा काम-वासना तो हृदय का एक रोग है। 
इस रोग को नष्ट करनेवाली रासलीला है ।* इसी से इसके द्वारा शुद्ध होकर 
मन परामकौ्ति को प्राप्त करता है। सनातन गोस्वामी ने रामलीला के समस्त 
प्रकारण को कामविहीन कहा है-- 


'हलादिनी शक्ति विलास लक्षण परमप्र मप्रीयर्ववेषा रिरंसा नतु कासमयीति ।! 


रासलीला में दो अभिप्रायों का समावेश है : अन्तरंग और वहिरंग । 
अन्तरज्ध अभिप्राय के अनुसार इसमें परमानन्द का आस्वादन होता है। 
वहिरज्भ दृष्टि से यह काम-विजय की कथा हैं। शैव-साहित्य में 'काम-दहनत 
का अभिप्राव है, पर रासलीला 'काम-विजय की कथा है। काम-विजय 
नकारात्सक नहीं, प्रकृति में स्वीकारात्मक है। श्री क्रिशोरीशरण अलि ने इस 
काम-विजय का प्रसंग सुन्दर शैली में दिया है : काम ने नारद, शिव, 
ब्रद्मादिकों को भी जीत लिया था, इससे उसका अभिमान वहुत वढ़ गया था । 
अव उसने इन सबके स्वामी भगवान श्रीकृष्ण से भी युद्ध करने का निश्चय 
क्रिया और मगवान श्रीकृष्ण ने भी उसकी चुत्रोती स्वीकार करली | काम 
ने...ब्रजांगनाओं के अज्भ रूप कांचतमय दुर्ग का आश्रय लिया, उनके प्रधान- 
प्रधान अवयवों को अपना युद्ध-मंच बनाया । पंचशर और सुमन चाप लिया । 
तथा अपनी अबंगी सेता को आगे करके युद्ध के लिए प्रस्तुत हुआ। इतने पर 
भी श्रीकृष्ण ने उसे दुर्बल ही देखा और उप्रकी उपेक्षा जैसी ही की क्योंकि 
दुर्वेल शत्रुओं से युद्ध करना सफल और यशस्वी योद्धा भधर्म समते हैं ।.... 
श्रीकृष्ण ने महादेव के कोपरानल से दग्व अनंग की-अपने वेणुनाद द्वारा अपनी 
अधर-सुधा सिंचन से तुष्ट पुष्टांग शक्ति संवर्धव की ।...-अमना होते हुए 
भी (आप) स्वयं ने भी सन स्वीकार किया, ताकि वह यह न कह सक्रे कि प्रति- 
मगवान कृष्ण पर उसका एक भी वार सफल न हो सक्रा ।...श्रीकष्ण ने स्वयं 
ब्रजांगनाओं के वक्षोज, गण्डस्थल और उरु आदि-आदि अद्धों में ढूढ़-ढूढ कर 
अनज्ु को जजेरांग, वेपषथांग और विकलांग कर दिया। इस प्रकार यह 
रासलीला कामलीला नहीं, काम-विजय लीला हैं । काम-दहन लीला के 
पश्चात्‌ भी काम पराजित नहीं हुआ था : वह सूक्ष्म शक्तियों से युक्त होगया | 





१. तामाँ कमस्य सम्पू्ति निष्कासेति तास्तथा । (सुबोधिनी) 
२. ह॒द्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः । (भागवत्तपुराण १०।३३॥४० ) 
रे. भारती, कृष्णलीला विशेषांक, पृ० ८३ । 


१४६ सूरसाहित्य : नव मुल्यांकन 


पर रासलोला में वह पूर्णतः पराजित हुआ । यहाँ पद्धति वकारात्मक नहीं थी : 
इसी प्रसंग में श्रीकृष्ण को योगेश्वर कहा गया है । 

शुद्ध भक्ति की अपेक्षा भय, क्रोध, वर, स्तरेह और काम आदि भावों 
में प्राकति शक्ति अधिक है। इन भावों में तीत्रता भौर तनन्‍्मयता अधिक है। 
इस तीक़ता और तनन्‍्मयता को साधना की ओर उनन्‍्मुख करके भगवान या 
परमलक्ष्य की श्राप्ति सहज-सरल है । जिस प्रकार से क्रोध, भय, वर आदि 
भावों से परमतत्त्व की प्राप्ति हो जाती है, उसीं प्रकार कामभाव से भी उसे 
प्राप्त किया जा सकता है | पर काम ऊरध्वंगामी हो । इसी अभिप्राय को प्रकट 
करने के लिए रासलीला की योजना हुई | इसके नायक योगीश्वर, कामजयी 
भगवान कृष्ण है और नायिकाए' अहं का पूर्ण विसर्जेग करने वाली उत्सगेमयी 
गोपियाँ । 

इस लीला की लोकप्रियता भी सबसे अधिक हुई | ब्रज, बंगाल, गुज- 
रात आदि प्रदेशों में तो इसके प्रचार के सम्बन्ध में कुछ कहना ही नहीं है । 
दक्षिण में इस लीला का प्रवेश कम हुआ । तेलुगु क्षेत्र में कृष्ण-प्रेम की लीलाओं 
में नायिकाएं सत्यमामा और रुक्मिणी ही मिलती है । राधा और गोपियों का 
उल्लेख भत्यल्प है। लीलाशुक और जयदेव की लीला-भावना का प्रभाव तो 
है, पर कम । तमिलक्षेत्रीय प्रबन्धबम साहित्य में रास का रूप अवश्य मिल 
जाता है । तमिल साहित्य के पुरातन ग्रथ 'अयच्चियर कुरवई”', और “निलप्पा- 
धिकारम्‌” में अन्य लीलाओं--वाँसुरी, बाल तथा गोपाल का तो वर्णन पर्याप्त 
मिलता है, पर रासलीला नहीं है । राधा का नाम तो नहीं मिलता, पर कृष्ण 
की एक प्रिय-सहचरि नप्पिनतई' हमारा घ्वान अवश्य आकरपित करती है। 
'राधा' की प्रकृति से यह अधिक निन्‍न नहीं है । कष्ण की पटरानियों में इसका 
नाम ही नहीं है । नप्पिनई जाति की ग्वालिनि बतलाई गई है । इसके साथ 
जो प्र म-लीला हुई है, उसको तमिल में 'कुरवई कुन्तु' कहा गया है। सम्भवत:ः 
इसी लीला से रास ही सूचित है | द्वितीय छाती की रचना 'शिउ्प्याधिकारम्‌' 
है | इसमें इस क्रीड़ा में ७ या € गोपियाँ भाग लेती हैं | इसमें रासलीला का 
रूप स्पष्ट हो जाता है। 'मणिमेरवलम' में भी कृष्ण-गोपी केलि-क्रीड़ा की चर्चा 
है । मव्यकालीन तमिल साहित्य में रासलीला का कुछ अधिक वर्णन मिलता है । 
इस प्रकार रास की लोकप्रियता अखिल भारतीय हो गई | इसका अभिप्राय 
मानव जीदन के मूल संघर्ष में संवन्धित है । 

विविध ज्ञान क्षेत्रों में इस लीला के प्रतीक के स हारे अपने-अपने 
मंतव्यों की प्रकट किया यया है। ब्रह्मविद्या परक प्रतीकार्थ इस प्रकार है: 


सुर के कृष्ण : १४७ 


तत्‌्--कृष्ण + त्वं“-जीव (गोपियाँ), इन दोनों का महामिलच--तत्त्वमसि । 
योग शास्त्र के अनुसार प्रतीकार्थ यह होगा : वंशीध्वनि---अनाहत नाद, 
गोपियाँ -नाड़ियाँ, राधा--कुलकु डलिनी, वृन्दाबन--सहस्रदल कमल, जीव- 
ब्रह्म मिलन--राम । यहाँ जीवात्मा की शक्तियाँ ईश्वरीय विभूतियों के साथ 
रास-नृत्य करती हैं । इसी प्रकार वेदपरक प्रतीक भी घटित हो जाता है : 
गोपियाँ--ऋचाए +-$ष्ण--वेदाथं--रास । जिस प्रकार शब्द और अथे का 
नित्य संबन्ध है, उसी प्रकार रास गोपियों और कृष्ण के नित्य रास से नित्य 
संबन्ध प्रकट होता है । ज्योतिष का रूपक वनता है: कृष्ण--सूर्य, गोपियाँ--- 
किरणें, किरणें सूर्य से अभिन्‍न हैं, उसी में रहती हैं, उसी से निकलती हैं 
और उसी में लौट जाती हैं । सूर्य गोलकार है। यह “रासलीला की मूल 
क्रिया है । अन्ततः इस लीला का काव्यपरक अथथे भी हुआ : “जिस दिव्य 
क़रीड़ा में एक ही रस अनेक रसों के रूप में होकर अनन्त-अनन्त इसका समा- 
स्वादन करे, एक रस ही रस-समृूह के रूप में प्रकट होकर स्वयं ही आस्वाद्य 
आस्वादक लीला, धाम और विभिन्‍न आलंबन और उद्दीपन के रूप में क़ीड़ा 
करे, उसका नाम रास हैं ।” 


उपयु क्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि रासलीला भूलत: कामोन्नयन 

की कथा हैं : इसमें श्रीकृषण की काम-विजय ही घोषित है। अन्य प्रकार से 
भी इसके प्रतीकार्थ सिद्ध किये गये हैं | ज्ञान, कमे, उपासना--तीनों के मन्तव्य 
इस प्रतीक से प्रकट हो सकते हैं । कृष्ण की लीलाओं में इस लीला की व्याप्ति 
सर्वाधिक है। अष्टछाप के कवियों में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ मिलती हैं । एक तो 
यह कि गोपियाँ आरम्म में काम प्रेरित होकर रास में प्रवृत्त हुई । धीरे-धीरे 
काम का उन्नयन प्रेम के रूप में हो गया। नन्ददास में यही क्रम 
मिलता है-- 

तेसेई गोपी प्रथल काम, अभिराम रसी रस । 

पुप्न पाछे निःसीम भ्रम, जिंहि ऋृष्ण भए बच्च ॥ 

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तसेई ब्रज की बाम, काम रस उत्फकद करि के : 

सुद्ध प्रम सय भहें, लई गिरिघर उर धरि के ॥* 





१. हृष्टव्य, बलदेवप्रसाद मिश्र, रासलींला का आध्यात्मिक तत्त्व, कल्याण, 
वर्ष ६, ( अगस्त, १६३१ ) । 
२. सिद्धान्त पंचाध्यायी, पु० १६३ ॥। 


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सूर के कृष्ण १४६ 


वज्चयान एवं तंत्रयान या मंत्रयान में परिणत होने लगा । शाक्तों और तंत्रों 
के मिलन वाममार्गी काचार-अ_भिचार भी चलने लगे । नाथपंथियों और सिंद्धों ने 
अभिनव झैवमतों का प्रचार नी किया | इस प्रकार सावताओं के कई रूपों का 
बंगाल में सहअस्वित्व मिलता है । इनमें परस्पर प्रमाव स्वाभाविक हो गया । 
स्वयं वेष्मम मत भी अप्रमावित नहीं रहा । 'परकीय्रा एवं रागात्मक 


उपासदा इसा प्रभाव परि रदणश मे पृनचपा | 


मतत-मंतातरों के दलदल में फंसे पूर्वी मारत को मुसलमानों ने भी जीत 
लिया | उनके साथ सूफी मत मी आया । सूफीमत स्वर्य॑ मध्य एशिया में 
प्रचलित महाबान पंथ से प्रभाव ग्रहण कर चुका था | सूफी साथना की ओर 
आ। इस प्रकार बंगाल का समस्त वातावरण मादुर्य 


से संसिक्त हो गया। विधि-निपेव के प्रति इस वातावरण में घोर प्रति- 
क्रिया थी । 


हा आग कल प 
ऊहो जनता का आक्रपण 


इसी मावभूमि पर माधुय से अभिमंत्रित चैतन्य का व्यवितत्व उदय 
हुआ | समस्त गोपियों, गायों जबौर वन-उपवन से भरान्यूरा वृन्दावन नवीन 
वसन्त की सुरभि में, और नदीन बोवन की त्तरंगों में जून उठा | वृन्दावन, के 
रसावतार की सारी छवियाँ जयदेव, विद्यापति और चंडीदास के गीतों में 


(| 


उतरने लगीं | सभी संप्रदायों का जो मचुर रूप्र बंगाल में घटित हुआ वह 
मवुकर निकल करम्वित कोकिल कूजित कुज छुटीरें को पुलकित करने लगा। 
रछूप्ण के रसेशवर रूप को उद्घाटित करने में शिष्ठ साहित्य, प्रचलित उपासना 
पद्धतियों एवं लोकजीवन और साहित्य ने योगदान दिवा। चंतन्य से पूर्व 
अद्वत सन्‍्यासी माथवेन्द्रपुरी ने 


कृष्णोपासना की झास्त्रीय विधि स्थापित की 
थी। सुनते हैं 


थे चंदन की लकड़ी लाने के लिए प्रतिवर्य राढ्, पुरी 
एवं महावलेनश्वर होते हुए दक्षिण की बात्रा को जाते वे 


वे। चंतन्य के 
परिवार में इनकी गुरु रूप में मान्यता थी । चंतन्‍्व भी इनके साथ सम्भवत: 


दक्षिण की यात्रा को गये । आल्वार संतों, उनके साहित्य एदं नवोदित भक्ति 


* !| 


प्रदायों से उनका संपर्क होना संभावित है। साथ ही उन दिनों वृन्दावन 


समस्त भारत के वेप्त्तव संप्रदायों का संगम-स्थल वन रहा था। ब्रज और 


बंगाल के वैष्णवों का भी सम्मिलन वृन्दावन में हुआ । इस प्रकार चंतन्य ने 
ते 


प्णव उपासना के भारतव्यापी परिवेश को देखा ॥ स्थानीय उपासना पद्धत्तियों 
तत्त्वग्रहण किया । काव्य के मंबुर भागों से भावना को पुष्ठट किया और 


रखब्यर हि अप ुछ-५ परम कृप्प 
हे 


ब्यर कृप्पू का चंदाद रूप से अंवबत 


|! 


रण जे अन्ल्अकत 2 चंदन्य लक मच्त 
रण किया। समव: चंतठन्च ने समस्त 


१५० सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


देश की वैष्णव भावना में माधुय का मूल स्पन्दर पाया और उसी को अपनी 
उपासना में प्रमुख स्थान दिया ! 


५.९ सौन्दर्य प्रेम और कला के अधीश्व र-- 


कृष्ण-चरित्र से सौन्दर्य की एकान्‍्त प्रतिष्ठा हैं। अन्य जीनन मूल्यों 
की उपेक्षा नहीं, सभी का सौन्दय में समावेश है। मगवान और सौन्दर्य का 
यह तादात्म्य भारतीय संस्कृति में पहली बार ही घटित हुआ । कृष्ण ने अपनी 
निजी शैली में यह घोषणा की : संसार में जो कुछ भी सुन्दर या श्रीमान है 
वह मेरे ही एक भश का विकाश है।* उन्होंने सौन्दर्य के त्ताथ शक्ति का भी 
उल्लेख किया है | सोन्द्य और सत्य में विरोध नहीं । जीवन की एक विशेष 
अभिव्यक्ति जिसे 'कला' कहते हैं, सत्य को सौन्दर्य में ढाल कर ही अपना 
उपजीव्य पातीं है। सत्य या सौन्दर्य जीवन के स्थिर मूल्य नहीं हैं : इनमें 
गल्यात्मकता है १ युग और परिदेश इनके तदीत रूपों की योजना करते हैं जो 
युग विशेष की चेतना को अक्रित कर सकें। कला सौन्दर्य का संमूर्तन है : 
उसकी जीवन्त व्याख्या है। जिस व्यक्तित्व की केन्द्रीय घुरीं ही सौन्दर्य को हो 
वह कला को अनुप्राणित करने की द्वक्ति रखता है । ऐसी व्यक्तित्व कला को 
मर्मान्तक स्फूर्तियाँ प्रदान करती है भौर कलाओं की अभिव्यक्तियाँ ऐसे व्यक्तित्व 
पर बरस पड़ती हैं । अध्यात्म और ,तत्त्व विज्ञान भी सौन्दर्य में इतना घुल- 
मिल गया है कि दोनों धन्य और समृद्ध हो उठे हैं। आनन्दवादी “मधुविद्या' 
में सौन्दर्य का सर्वाधिक मूल्य है। महान्‌ व्यक्तित्व, महान दर्शन भौर आछ्- 
त्मिकता का परिपालन करते हुए भी कष्णश्रयी कलाकार सृजन के प्रति, 
अपने आपके प्रति पूरा ईमानदार रह सक्रता हैं। ययार्थ का ऐसा विपरिणाम 
हुआ है कि ,आदर्श से बच कर भी स्थूल ककंशता की दूर फेंक सका है। 
'मर्यादा' के संदर्भ में कृष्ण की सीन्दयं-चेशयें यथार्थ है, आदर्श नहीं और 
यथार्थ अपनी प्रकृति में बंधकर भी उन्‍तयन के सीमातीत त्रणों में संक्रमित 
हो गया है । (दिव्य सौन्द्य_ को वंदिक हृष्टा देख सका और मानवीय सौन्दर्य 
को भी । दोनों का धोल-मेल कृष्ण के व्यक्तित्व में ही ही सका और खंड, 
अखंड बन गया । 'भखंड' में भी खंड' के सीन्द्य का तिरस्कार नहीं हुआ । 
ईश्वरीय ज्ञान और माहात्म्य को संत्वार को कोई भी संस्कृति इतना सौन्‍्दर्या- 
त्मक नहीं वना सकी । साधना और कला में कोई अन्तर नहीं : कलाकार और 





१. यदयहद्विनुतिमत्सत्त्वं श्रीमएरजितमेव वा । 
तत्तदेवावगच्छ त्व॑ मम तेजों5शसंभवम्‌ ॥। ( गीता १०४९१ ) 


२०१ 


सुर के कृष्ण 
































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मॉनतकला 
भनतिकेल व्द्ध 


श्र पाया 
बज 


१५२ स्रसाहित्य : नव मूल्यांकन 


भावना ही इनमें अभिव्यक्त हुईें। इस कल्पना में वेद के पुरुष-सूक्त ( (05- 
प्रांट प्र॥ ) की छाया स्पष्ट है। कृष्ण के द्वारा समर्थिक भागवतवाद में 
कमंकांड और धामिक ज्ञानवाद को यथावत्‌ स्वीकृत नहीं किया गया। इसमें 
इष्ट की पुजा-अचना, सेवा आराधना, औपनिषदिक मोक्ष और ब्रह्मानन्द के 
समकक्ष मानती गई हैं | ब्राह्मणों ने इस विधान को अवश्य ही देर से स्वीकार 
किया होगा, क्‍योंकि इसमें कर्मकाण्ड परक पाखंडों के उच्छेद के अभिप्राय 
निहित थे। यव, आभीर आदि का शास्त्रीय्र-दर्शन में प्रवेश नहीं था। 
इन्होंने भागवत पद्धति को स्वीकार कर लिया । सभी अपने को भागवत या 
वासुदेवक कहने लगे । संक्रषण मत का उदय और प्रचार भी हुआ । संक्रषेण 
को कृष्ण के भाई के रूप में मान्यता मिली : दो लोकप्रिय धामिक पद्धतियों 
का समन्वय हुआ । 


शु गकाल से ही क्षष्ण की मूर्ति की पूजा के चिन्ह मिलते हैं। कटियस 
( 0ए्रा00५ ) के कथन से स्पष्ट होता है पोरस की सेना हेराक्लीज ( ०७- 
०७5 ) की मूति को आगे करके सिकंदर की सेना के सम्मुख बढ़ी । यह 
हेरावलीज क्रृष्ण ही है। मेगास्थनीज ( ३२० ई० पू० ) ने भी कहा है : 
हेराकलीज शुरसेनों द्वारा पूजित एक देबता था । इस प्रदेश में दो बड़े नगर थे : 
मथुरा और कष्णपुर । यह देव अपनी शारीरिक और भौतिक शक्ति में सबसे 
आगे था । उसने प्रथ्वी और समुद्र के समस्त दोषों का परिस्कार किया था । 
वौद्ध धर्म के ग्रथ निहुं स ( चौथीशती ई० पू० ) में वासुदेव और बलदेव के 
उपासकों का उल्लेख मिलता है। 'हेलिओडोरस' (ग्रीक भागवत) ने बीसनगर 
शिला ( १८० ई० पू० ) में वासुदेव को 'देवदेव” कहा हैं। शिलालेख में 
अन्य देवों के साथ वासुदेव का भी उल्लेख है। बौद्ध धर्म के अन्य ग्रथ में 
राधा, यश्ञोदा, ननन्‍्द आदि कष्णवार्ता से सबद्ध प्रमुख पात्रों का परिचय मिलता 
है । शकसन्रप सोदास के शिलालेख ( ८५१ ई० पू० ) में मगवती वासुदे (ब) 
के महास्थान का उल्लेख है। इस प्रकार कृष्ण और बल्देव की मूर्ति-पूजा 
बहुत पहले से होने लगी थी । इस युग में देशी-विदेशी कला-तत्त्वों का मिश्रण 
भी हुआ । इस मिली जुली कला-पद्धति कृष्ण का स्थान बन गया । 


मधुरा में प्राप्त चतुभु ज कृष्ण की खड़ी मूर्तियाँ, सम्भवत: सबसे प्राचीन 
प्राप्त मूर्तियाँ हैं। इनका निर्माण कुपाण-युग में हुआ था । मथुरा में दो और 
प्रसंग-मूतियाँ है--एक में वसुवेव नवजात कृष्ण को यपुना के पार ले जा रहे 
हैं, दूसरी में गोवद्ध न चारण लीला का अभिप्राय है । 


सूर के कृष्ण १५३ 


गुप्तकाल में महामारत के कृष्ण के अभिप्नाय मिलते हैं । बहिछत्र का 
भित्ति-शिल्प इसका साक्षी है। इसमें युधिष्ठिर और जयद्रथ की लड़ाई का हृदय 
हैं। गढ़वा से कृप्णाजु न की उपस्थिति में मीम और जरासंध के युद्ध का हृश्य 
प्राप्त हुआ है । होवसलेश्वर मन्दिर में महाभारत के सशक्त दृश्य शिल्पगत हैं । 
इस शिल्प में पार्थला रथि और गांडीववारी अजु न प्रमुद्व हैं । 

इस विश्लेषण से यह प्रकट होता है कि इतिहाम् के आरम्मिक युग में 
कृष्ण की चतुमु ज मृति होती थी और गीता से संबन्वित कृष्ण की लीलाए 
लोकप्रिय थीं | ब्नजः साहित्य में केवल गोवद्धन लीला मिलती है। उसकी 
लोकप्रियता भी सम्मवतः इन्द्र-दमन के अभिश्राय के कारण है। उसके साथ 
भावात्मकता संबद्ध नहीं है । 


कृष्ण ग्वाल भी है: गोविंद भी है। वह ग्वालों और कृषकों का भी 
देव है । वह उन्हें अनेक संक्रदों से बचाता है। इनका संदेश है : गाय, वनभूमि, 
पहाड़ियाँ हमारे यवाय् देव हैं। इन्द्र के स्थान पर इनकी पूजा कराई गई है। 
इस प्रकार इंद्र की प्रतिष्ठा गोपाल के रूप में होती है। कृष्ण ने दलदली 
भूमि को कृषि योग्य वनाया। कालियदमन की लीला इसी का प्रतीक है । 
गोवद्ध नचारण लीला जहाँ वैदिक देव के पराजय का रूपक प्रस्तुप करती है, 
वहाँ इस लीला में वर्षाजन्य प्लावनों से नब्नज की रक्षा का प्रतिनिधित्व भी है । 
इसलिए पीछे की मूर्तिकला में गोवरुन घारण और कालियदमन की लीलाए 
विशज्येप रूप से मिलती हैं । योवर्धत-लीला का शिल्प-चित्र कंवोडिया में अंगकोर- 
वट में भी है। श्यामवर्ण, पीतांवर-लसित, मोरपंखवारी कृष्ण जननेता के रूप 
में प्रकट है । यह कृष्ण बनेक पौराणिक कथानों का नायक है । ब्रज में अनेक 
लीलाए संपन्न हुई : ग्वाल और न्वालिनें सहायक बनीं । लीलाओं के तीन 
वर्ग हैं : श्रवण-मं गलम, ध्यान-मंगलम्‌ तथा विर्व-मंगलम्‌ । आज के भावात्मक 
विकास में राधा-कृष्ण बुगल हैं। 

इन भावात्मक लीलाओं से संवन्बित मूर्तियाँ सबसे पहले पूर्वी भारत 
में मिलती हूँ । राधा-कृष्ण की सबसे पुरानी मूर्ति पहाड़पुर ( ८ वीं शती ) की 
हैं। यह बंगाल में है। इसमें तरल-शिल्प, सृक्ष्म-अ गमंग्ियों ताथ लबात्मक 
गति को उमार मिला है | इसके बाद भोज-वर्म्मंग ( ११०० ई० के लगभग ) 
का शिलालेख है । इसमें श्रीकृष्ण और घत योपियों के विहार का उल्लेख है । 
इस प्रकार का शिल्प-प्रामाण्य पूर्वी भारत में मिलता है । इससे कुछ विद्वान 

हू अनुमान लगाते हूँ कि राघा की मधुमयी कल्पना बंगाल की देन है । 


१४ सूरसाहित्य : नव मल्यांकन 


ब्रज व राजस्थान में भी क॒ष्ण की भावात्मकलीला से प्रस्तर खंड सजीव 
हैं । गोवर्धनलीला और दानलीला का हृश्य सुरतगढ़ ( बीकानेर ) में मिलता 
है । अनुमान है कि ये शिल्प अन्तिम कुषाणकाल या आरम्मिक गुप्त युग के 
हैं । मगदौर (जोधपुर) में भी वृन्दाबनलीला तथा गोवर्धनवलीला शिल्पांकित है 
(चौथी-पाँचवी शतती ई०) पाथरी (ग्वालियर) में क्ृष्ण के जन्म का हृश्य है। 
इससे प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र में 'निकुजा का अभिप्राय विकसित 
हुआ । 


इस प्रकार गुप्तकालीन शिल्प में गीताकार कृष्ण के गाँमीय्य और. संयम 
वी छटा है। मध्यकालीन मूर्ति-विधान में कोमलता, भावुकेता और तरलता 
अधिक है | आगे मूर्तिकला में गंभीर और तरल अभिप्राय उतरते चले गये । 
पर माधुय के आतिशय्य को प्रस्तर-शिल्प अधिक न सम्हाल सका, मानसी 
भावनाएं प्रबल होती गईं, जिन्होंने कला के माध्यम ग्रहण किए । 


५.३ चित्रकला में--- 


पांचरात्र दर्शन रसाश्रयी साधना, पौराणिक साहित्य और लोकमाषा 
काव्य के प्रभाव से रसिकों का हृदय वृन्दावन बन गया | राधा मानवीय भात्मा 
है--कष्ण के नादात्मक आह्वान से बविकल | राजस्थानी, हिर्मांचलीय और 
गुजरात कला के चित्रों में कृष्णलीला के भावात्मक अभिप्राय उद्मु दित हैं । 
काव्य और चित्रकला का समम हुआ । श्रीकृष्ण का लीलांकन गुजरात में 
सबसे पहले मिलता है। इन चित्रों की पृष्ठभूमि में गीतगोविन्द के गीत लिखे 
हैं। राजपूत शैली के चित्रों में लीलांकन अपने चरम पर है। इन चित्रों में 
वात्सल्य, सख्य, करुण, शृद्धार, माधुयें और वीर--सभी भावों को स्थान मिला 
है। पर सबसे अधिक लोकप्रिय गोपी-लीलाए हैं । जयपुर शैली ने मुख-मंडल, 
किशनगढ़ शली ने मंजन-नयन आदि विषयों में वेशिष्ट य प्राप्त किया । संयोग 
भी चित्रांकित हुआ और वियोग भी । राजपूत शैली का वाहद्यांकन से मनो- 
वृत्तियों के भअकन की ओर विकास हुआ । बंगाल में मी कृष्ण-विपयक चित्रकला 
में अपूर्व उन्नति हुई । इन चित्रों में मागवत, गीतगोविन्द या अन्य भक्त कवियों 
की कविताएं रेखांकित है । जहाँ .मूर्तिकला में उदात्तता प्रमुख रूप से मिलती 
है वहाँ कृष्ण संवन्धी चित्रों में लालित्य और गीतितत्त्व का प्राधान्य है | काव्य 
में अन्य भावात्मक लीलाएँ तो रही हीं, कृष्ण का मधुर र्‌प विशेष रुप से 
विकसित हुआ । 


सुर के कृष्ण १५५ 


५. ४ साहित्य में कृष्ण -- 

५.४१ बालकृष्ण : सखाक्ृष्ण 

जुद्धार रस के आलंबन के रूप में तो कणष्ण की प्रतिष्ठा है ही, 
वात्सल्य और सख्यमावों के आलंत्रन के रूप में भी सूर ने कृष्ण का बहुत 
अधिक विस्तार किया है । कृष्ण के अवतार का एक कारण इन भावों की तृप्ति 
ने थी। देवकी और यशोदा दोनों ही इन वरदानों को पा चुक्री थीं, संप्रदाय 
के प्रभाव से मी इन भावों का अधिक विस्तार सूर में मिलता है। वात्सल्य के 
क्षेत्र में सूर का कृष्ण एक साधारण वालक है। उसकी अलौकिकता के प्रसंग 
भी मिलते हैं, पर उनके हृष्टा ऋषि, मुनि या सूर' हैं। कभी-कभी वलदेव 
भी उनकी अलौकिक शक्तियों का स्मरण कर लेते हैं । पर वात्सल्य के आश्रयों 
के संदर्भ में कष्ण अपने माहात्म्य को सायास छिप्रा लेते हैं । इस प्रकार वात्सल्य 
का आलंवन माहात्म्य से अविकत ही रहता।है | इसी प्रकार सखाओं के सम्तुख 
सूर के कृष्ण यथाथंतः सखा है। उनका माहात्म्य प्रकट होता है, पर सखा 
उससे प्रमावित नहीं होते, यदि होते हैं तो यह ॒प्रमाव अत्यल्प-कालीन होता 
है। शज्ार के क्षेत्र में सूर के कष्ण कई रूपों में मित॒ते हैं । इन पर पृथक रूप 
से विचार किया गया है। 
५.४२ राधा के प्रिय कृष्ण-- 

साहित्य में कृष्ण का यह रूप विशेष आकर्षक रहा । बंगाली साहित्य 
में कृष्ण-विरह में राधा उनन्‍्मादिनी हो जाती है । वह रासेश्वरी है भौर कृष्ण 
रसेश्वर । वह माननी भी है। यह झाँफ़ी अन्य कवियों की कल्पना में भी 
उतरी है । कृष्ण का प्राधान्य बंगाल के काव्य में वना रहा। ब्रज में कृष्ण का 
एक विशेष रूप मिलता है। ब्रज के रसवादी संप्रदायों में कृष्ण के स्थान 
से राधा का स्थान ऊँचा हो जाता है| कृष्ण राधा के वशीभूत मिलते है । 
'सूर' में राधा के संदर्म में कृष्ण के समी रूप मिलते हैं । 

राधावललम सवत्रदाय में कष्ण का दार्शनिक रूप से महत्त्व नहीं है । 
“इस संप्रदाय में श्रीकृष्ण को दाशंनिक रूप से महत्त्व चहीं दिया गया, 
बरव्‌ प्रेम का आधार मातकर उनका वह रूप वणित किया गया है, जो राधा 
के कृपाकटाक्ष की आकांक्षा रखकर नित्य विहार में लीन रहता है ।...:श्रीकृष्ण 
को इस संप्रदाय में उपास्यदेव तो माना गया है किन्तु राबा के अनुसंग से ही 
उसकी उपासना है। प्रधान पद राधा का है।*” पर वल्लमभ संप्रदाय में 


१. डा० विजपेद्बरस्तातक, राबावल्‍लभ संप्रदाय: सिद्धान्त और साहित्य । 
'पृ० २१६ । 


(श्इ सूरसाहित्य : बव मूल्यांकनत 














अममामममाइण्मपसाम्कमाक. "--क दाशंपिक मकान. धधनन्‍्म्याक्गा, (०4७० 4० ह 4 +> “पह अरमान (जज जी, 2-23 
कंपय का दाशादिक रूप भा मान्य हू । सूद का छेप्य परनन्नद्ध हूं ह्स्याह दे 
२०० प्रणद है जज सजरज> जञ ला न के स्तर फ्ट्य साझा हे 
यह जयद् प्रगद है, हरि में लव क्वू जावे । छृप्प, वारायय, विय्सु एक हो 
हे जौर विण्य लौर के परे नो ड् वंज्ञीदादनर को नम 
हैं, आर वष्यु जार दारावयण के पर सांइंण्य हूं | वद्यादादद की सुबचकर 
--3..... दि क्र थक अजफिल्मञओ अथ 
चाराब्यण जार दिप्यू दावा हा चाकृतध हु--+- 
चद्ड 

यह बपार रस रात्त उपायों, छुन्धयों न देल्यों नंन । 

नारायण घुनि छुनि ललचाने स्थान अवधर सुद्धि दंद ॥ 

कहत रमा सो चुचि रो प्यारो दिहरत हैँ दन क्याम ॥ 

4 चर द्द्हाँ हुमा ० 8. सच्ख है ६: 9“ अ्वि,.....क>॑ सान-०सुंडशुक- चु-सॉ 

पर कहा हमक्ता दचा सुर जो दिलसत द्वलदाम ॥7 
०० मन नम क्न पिकनम्म्बऊ आम, ड्ड 

ज्रह्मा, दिप्यु, महेश नी कृष्ण के ही रूप हैं--- 

झ्ै जद + सेद हैं 

कर जो सेद तुम्हारी, तो मम सेद हैं । 

विष्णु शिव द्रह्म मम रूप सात्तोंगशा 

हि “जज >थ टन दी ज्जकनणा.. हु /.) 
| * विनय पद्ा 


कृण्य बदन्चच्ध हु--- श्र्‌ ।द5द5 चय कार कुछ्या, उच्र छनाहु द 


इनसस्तच जबपद अपच कृष्ण उ "रहदय दे हैं | इस धअ्रकार दाहमनिक हां च छू 


हमर जरा बदन... क्‍मकन- हनन. निल्पण 5 22“ लक संग्रदाय बट बतनननत.. जज पक रस ्चद्सा उमा ० 5-7 जि, 42: नीजब 
तेकप्य करा चिरूपण क्या संप्रदाय क्र वे का अचुचार हा अद्धान्द्क 
उाक्ते4ा चद्ू साहित्य ह्त्य ने उपलब्च हातठा हू | जाय चूरु सा राघा का आधान्य 


! 


/0॥! 


32 «पक बे मिलता ० राखल 2280 ला आरमन्स ०4 4%--मम का बूछ*गयन, गराहन्म्पक "- #ज पं माइक राय 2०० पति उजमटज्मकाक 
ता मिलता हैे। साचलाला के आरम्न मे कृप्य राझा के पति बन 








अोलाल गिरिघर नदल दुलह, दुलहिदी श्लों राधिक्ता ।* 
यह विवाह गंघरदे सेति से हुआ-- 


जाक्ो व्यास दरनत रात ॥ 
हैँ गंधर्व चित्त दें, सुनो दिविघ दिलास ॥४ 
कार 























ड्झो र॒क्प्य को इलह लूप मे सर ने चिंद्धित्त किया कौर 
+-क पक जा 4 दे दुघाहु छत कक्‍थ « डर (नाता 4दूचा दर राधा 
आन व्ड््ायों ददा या आकलन दितचा ्् जा २० हनी 7०» थ०७ हक] 
को स्वक्तीया दना दिया। भावना ही हाथ से राधा के वन्ाय्ृत कृप्प सुर के 
विद्यद दब हउाध हादादां का लधथद भा च्र का कल्पना सदाता हट 
राघा ने इतने जे “मर पल न ० 
काप्य राघा न इतन जलचुरक्त हूं, कि काधा के दछना एक क्षण क्ाउना नी च्न्ह 
>> 
ड्श्क्पस पा । 2 कम, 
ता (प्र 
सी >--+०७७»»»+»&«+++७००+++++++++++++++++++++++++.+ अपना. 





« सूरसायर, १०॥६१०७८! 


३२. वहीं, १०१०७१। 





सूर के कृष्ण १५७ 


पुनि पुनि कहत ब्नजनारि। 
धन्य बड़भागिनी राधा तेरे वश गिरधारि ॥। 
6 24 2५ 
एक छिन बिनु तुर्माह देखे, स्थाम धरत न धोर ॥" 
वेसे कृष्ण दक्षिण नायक हैं, पर सूर ने राधा-कृष्ण के दम्पति-बिहार 

का विस्तृत वर्णन किया है। काव्यशास्त्रीय प्रणाली से कृष्ण का दक्षिण 
नायकत्व भी प्रकट किया गया है। इसी संदर्भ में राघा कृष्ण से मान करती 
है। मान इसलिए था कि राधा को ज्ञात हो गया कि कृष्ण, अन्यों में भी 
अनुरक्त हैं। राधा की दृष्टि से कृष्ण का अन्तिम रूप निष्ठुर है: वे अनन्य 
प्रेमवती राधा को छोड़ कर चले जाते हैं। बसे, उनके मन में राधा-प्रेम सदा 
तरंगित रहा । 


५.४३ बहुप्रिया वल्‍लभ-- 


भागवतकार ने क्ृष्ण को बहुप्रिया बललभ कहा है। इस कथन का 
भाध्यात्मिक प्रतीकत्व भी है। गोपियाँ जीवात्माए हैं ( गा: इंद्रियाणि पाति 
रक्षति इति गोपी )। उनके पति श्रीकृष्ण हैं। जो स्वयं भगवान हैं--एते 
चांशकला: पुन्सः कृष्णस्तु भगवान्‌ स्वयम्‌, (भागवत )। क्ृष्ण-प्रियाओं के दो 
वर्ग हैं : ब्रज-प्रियागण तथा द्वारका-प्रियागण । इन दोनों में अन्तर यह है कि 
ह्वारका की प्रियाए कष्ण में माहात्म्य ज्ञान रखती थीं। ब्रेज की प्रियाएँं, इस 
ज्ञान से शून्य थीं। 'सूर' की गोपियाँ इसलिए स्पष्ट कहती हैं-- 
'बहाँ बने जदुबंध महाकुल, हर्माह न लगत बड़े ।' 
इसीलिए कृष्ण वृन्दाबन छोड़ कर कहीं नहीं जाते । शरीरतः नहीं तो 
मनतः यहां निवास करते हैं--धृन्दाबनं परित्यज्य पादमेक॑ न गच्छुति ।” अष्ट- 
दल कमल पर स्थित वृन्दाबन में कृष्ण अपनी आह लादिनी शक्ति राधा एवं 
अन्य शक्तियों के साथ चिहद्चिलास करते हैं । यही बहुप्रिया वल्‍लभत्व का रहस्य 
है| 'सूर ने वैदिक रूपक के अनुसार वेदिक ऋचाओं के स्वामी कृष्ण को 
बहुप्रिया-वल्लभ माना है। शक्तियों के पति रूप में भी सुर को कृष्ण 
स्वीकार्य है । 
साथ ही गोवत्सापहरण काल में श्रीकृष्ण के साथ सखियों का विवाह 
हो गया था । यह लीला भागवत में है। 'सूर में भी इस प्रकार के स्वकीया- 
श्रित बहुप्रिया-वल्लभत्व की झलक मिलती है। कृष्ण ने अपने को ग्वालों के 


२. सरसागर, २४६० | 


१५८ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


हूप में परिवर्तित कर लिया | यह रूप वे एक वर्ष तक धारण करते रहे । इस 
बीच जिनका विवाह हुआ, वह वस्तुत: कृष्ण के साथ ही हुआ | चीरहरण 
लीला के प्रसंग में कहा गया है कि ब्रज-कुमारिकाएँ कृष्ण को पति के रूप में 
वरण करने के लिए तप करती थी | इसी के परिणामस्वरूप उन सबकी कृष्ण 
पति रूप में मिलि-- 


गोरी पति पूर्जात ब्रजनारि । 
2५ 2५ 4 
यहै कहति पति देहु उमापति गिरिघर नन्दकुमार ।* 


इसी प्रकार की कामना सूर्य से मी की गई कृष्ण ने चौरहरण के पश्चात 
उनको पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वचन दिया--- 


हृढ़ त्रत कियो मेरे हेत । 
>< >< >९ 
करों पुरत काम तुम्हरों सरद रास रमाइ ॥* 


रास के पूर्व यह विवाह संपन्‍त किया गया -- 


जाकों व्यास बरनत रास । 

हैं गंधव विवाह चित दे, सुनो विविध बिलास | 
कियो प्रथम कुमारिकन ब्रत, घरि हृदय विस्वास ॥ 
नंद सुत पति देह देवी, पुजि मन की आस | 
दियोौ तब परसाद सब को, भयोौ सबनि हुलास ।४ 


आगे सूर ने राधा-कृष्ण विवाह का विस्तार किया है। पर 'रास' में 
एक सामूहिक विवाह का उपक्रम अवश्य हैं। आगे रास-प्रश्नंग में कहा गया है 
कि कृष्ण ने सोलह सहस्न गोपियों के साथ रास किया-- 
'सोलह सहस नारि संग मोहन, कीन्हो छुख अवगाधि ।* 
इसी प्रकार परकीया भाव से भी अनेकों गोफपांगनाएँ कृष्ण में 
अनुरक्त थीं। 


सूरसागर, १०११०७१ ४ 
वही, १०१११५६ ५+ 


१. सूरसागर, १०७६६ १? 
२. वही, १०७५६ ॥ 

३. वही, १०७६६ । 

ड, 

५. 


सर के कृष्ण १५६ 








मु में ही सोलह सहस एक जऊ शातलिया वह 
मरागवदक्रार दे द्ारक्ता म भा चाह धघहस जएुक तो आउ रानियों कौर 


कट । 


पटरानियों की बात कहीं हैं। नौमासुर के द्वारा १६, १५० कन्याओं का वारी 


किया जा रहा था। उस आततायी का हकृष्य वे वध किया कौर इस नारी 





उन अप मनक 5. हि 
सन्‍ूृह का उद्धार का । सम्ाद्ध द्वारा ति्स्स्क्चिता इंच कृच्याझा के घाथ कंष्य 








ऋण न प्रकार सारा नमी अवणकमंनाक सम्पान समय, का सरदक्षित ॥+मदुड,..आायन्म्यान्परम गढ़ शिया बांधगा को 
से च्चय ददाह क्या । इस अकार चार के सम्मान का सुरक्षद्र रद्धा। उन 
“० नरक कब द्ात्मसम्‌पंणय करने >्ण्ण्क्ण्ण घ्पः 42 तक लिए न्क किया 0० "क०्न्फक कक. पा कस जुटी हम 2“) 
चर्सा ऋच्यादहा न हात्मस्तमपण कृष्य के दिए काया? र इस पधदग को सूरच सा 


कुछ विस्तार दिया है--- 

“दष्ठ दस सहस कन्या असुर-धंदि में, नोंद अर मुख अहनिसि बिसारी। 
सीति सतितक्लो चुमिरि, भए अनुकूल हरि, सत्यनामा हृदय यह उपाई ॥॥ 
>< 4 >< ञ< 
वहुरि गए ठहाँ कन्या हुतोीं सच जहाँ, निरखि हुरि रूप सो सब लुनाई। 
चरन रहें लागि, बड़भाग लखि आपने, कृपाकरि हरिसु निजपुर पठाई ॥ 


>< >< >< 
वहारि बह रूप धार हरि गए सवनि घर, व्याह करे सबनि को बात पूरी 


च्क्जा के 
सदनि के भनदन हरि रहुत सदर रनि-दिन सदने सा न च्छु नहि होत द्रा 0 न 
इस प्रकार छूर के कृप्प का दक्षिणयायकत्व, वहुजिया-वल्लमत्व प्रकट 


व एच कुचल दाक्दायक्त क्वा रात सभा का हाझ्या कार इच्छा 








7] हे नभ्र्त ह। फचतचा व क्‌ष्प छपून भ लात मि लत हूं | रुसका पृष्ठभूमि 
में कृष्प का डलोौछिकृत्व भी है [इस अच्यार का ऋइल्पदांदा न वंदऋचाआा, 
्क्, ब्क कल ० जा ७ है ही] 








पं, सिझकीदों वालाओं घतक्तियों ज्ादि की भावना 
दकन्यादं, घछद्धकांदा, मुनि बालाहंों, अंतरंगा झक्तियों जादि की भावन 














हू। रसालहू सहझह का सख्या हड हू । वाद पुराण म ता यहा सस्या हू ! 
मी च्ती श्षिस्रे पकद्चिराएँ दि 























अर ्् द्र्म पुराण का रन ++०ज न जम पल 
यानक््चर हूं । पएदुम पुराण ज्ञष रा सख्या सहत्तलाएद बतलादा भइ हू । धृठणु पह्द्म- 
&धटूुकत+ 8 च--*; घएरः जी +% | द्वियि ४८ ८, सिने नल हुक] घक्तियाँ १५७ <५ ९३ 
च्घ्ल्ह प्रकृत्ति, थे जलय सच कण्य वल्‍लनाए नन्‍्य बददाइ ग्रह ह। इस प्रकार 

















दब दार्णाए अं अर. 4पयमममपाक, पन्क 4 2 ० मसाधघय साद 
झदक दछातरू-ए इस चसदबन्ध दे चलता हू | राथधय भाव क्या चायक्राए दइज- 
वि 
चबस्लाभाए हूं । उद्क साथ जाना सादे विक्नसित हाद् यचएू, उचत काह्य- 





डा 
इास्त्राय रूप रा खंड होते गए। एकाप्त्क, दाव्यात्मिक झार सामाजिक्त 
3 दर 8 0 सन्न प्रिया ह 5 प्राद लि जा पपाज्य गत. >> >> - 3 >न- 











पृ. सचागदद पृणदप्धासप॥ 
द्. सुरसागर १०४१६४॥ 


ख््न्य च्छ्तो र्ध्यवा 


खंजन नेन रुूप-रस-मात्ते ॥ 
अतिसे चार चपल अनियारे, पल पिजरा न समाते ४ 
चलि चलि जात निकट खस्रवनन के, उलटि पलटि ताटंक फेंदाते । 


सूरदास अंजन ग्रुगन अठके, नतरु अर्वाहि उड़े जाते ॥ 


---सूर का अन्तिम क्षण 


सुर की राधा 


अप्तावत्ता-- 

कष्ण साहित्य में दो परम्पराए' मिलती हैं : एक में कृष्ण की एक प्रिय 
सहचरी का उल्लेख तो है, पर राधा नाम नहीं लिया गया। दूसरी परम्परा 
में 'राधा' का स्पष्ट नाम लिया गया है। प्रथम परम्परा में भागवत आती है 
और दूसरी में गीत गोविन्द! जैसी रचनाएं | “राधा की सबसे पहली मूर्ति 
पहाड़पुर बंगाल यें मिलती है : वहीं शक्ति की रसाश्रयी उपासना चलती रही : 
वहीं चंडीदास भौर जयदेव की वाणी राधा के माधुय से संतिक्त हुई | यह सव 
देखकर कुछ विद्वानों के मतानुसार 'राधा' की कल्पना बंगाल की देन है।' 
तमिल के कुछ प्राचीन ग्रथों (अयच्चियर कुरवई और निलप्पाधिकारम्‌) में 
“राधा नाम तो नहीं मिलता पर कृष्ण की एक प्रधान सहचरी का नाम 
'तप्पिन्नई! दिया हुआ है । इसके आधार पर एक आश्चयय मिश्चित प्रश्त उठ खड़ा 
होता है--आश्चय नहीं कि वह “नप्पिननई” राधा हो | कुछ ने आमीर।दि 
विदेशी जातियों के साहित्य से “राधा! का भारोहण माना है। वास्तव में 
'राधा' के निर्माण में उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पच्छिम सभी भागों की प्रतिभाओं 
मे योगदान दिया । आये और आर्येतर, निगम और आगम, सभी परम्पराओं ने 


१, फ्लू इउचलला 379 00०0०6९० #8फ076 ० ०१॥४, $९[५०७४005 4॥ 
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सूर की राधा १६३ 


राधा का प्रतीकत्व स्वीकार किया। इस माघुयें की अधिष्ठात्री पर समस्त 
मारतवर्ष गये कर सकता है। राधा अब एक व्यक्ति नहीं, जो देश-काल की 
सीमाओं में वंधकर रह सके : वह तो एक असीम व्यक्तित्व है; वह तो एक 
तत्त्व है जो प्रीति, भक्ति, अनुरक्ति और श्री-शान्ति का पर्याय है । 

राधा के संयोग से कष्ण गीति-तत्त्व के प्रतीक बन सके | कृष्ण इससे 
पूर्व महाकाव्य के पात्र तो हो सकते थे, पर महाकाव्योचित किसी नायिका के 
साथ उनका संबन्ध नहीं जोड़ा जा सक्रा । अक्रेले कृष्ण 'महामारत' में महान 
तो हैं, पर महाभारत के नायक नहीं | पौराणिक साहित्य ने उनको रुक्मिणी 
दी । इससे उनको प्रबन्धों का वायक बनने में सहायता दी। तेलगु क्षेत्र में 
कृष्ण और उनकी पटरातियों को लेकर कई प्रसिद्ध महाकाव्यों की रचना हुई । 
जिस दिन कृष्ण के वामपाशर्व में राधा अधिड़ित होगई, उस दिन गीत की 
वह विद्य त्तरड्भ जो महाकाव्यों के घटाटोप में खो सी गई थी, दमक उठी | 
गीतों की एक्र परम्परा बन गई : संस्कृत, प्राकुत और देशी भाषाएं इस गीत 
से गज उठीं। गीत-साहित्य में राधा के रूप की जो प्रतिष्ठा हुई, वह 
अद्वितीय है । 


स्र-साहित्य में राधा का जो स्वरूप मित्रता है, उस पर कोई भी 
साहित्य गवे कर सकता है । परम्परा में राधा का रूप विकसित हो चुका था । 
बंगाली वेष्णव आचार्यो और कवियों ने उसका विशेष संस्कार किया था । 
सूर की प्रतिमा, कल्पना और मौलिक उद्मभावना की किरणों ने नवेली राधा 
को और भी 'अलबेली बता दिया । जिस प्रकार सूर वात्सल्यभाव के प्रकरणों 
को समस्त अलौकिकता से आविष्ट रखते हुए भी मानवीय धरातल पर रख 
सक्रे, उप्ती प्रकार राधा और राधा पर केन्द्रित लीलाओं को स्वाभाविक और 
शुद्ध मानवीय संस्पर्शों से सनल रख सके । बंगाली वेष्णव कवियों ने, पूर्व राग, 
सहेट-भिलन, मान, रास और विरहोन्माद को काव्यशास्त्रीय और कामशास्त्रीय 
उभार देकर, राधा को एक श्वृद्धारिक रहस्यवादी स्वर्णामा प्रदान की। 
पर, सूर ने इन सब का निर्वाह करते हुए भी, अपने निजी स्रोतों से राधा को 
काव्यजश्ञास्त्रीय प्रणाली से मुक्त भी किया है। उसको लोकसाहित्य रूप भी 
प्रदात किया है। राधा और कृष्ण के प्रेम का क्रमक और प्रबन्धात्मक विकास 
चित्नित किया है। इसी में सूर' की प्रतिभा-साधना की सफलता है । 


१. राधा : सूर पूर्व विकास--राधा के विकाश पर ज्योतिष, त्र, त्रिपुर- 
सुन्दरी सिद्धान्त, शेवदर्शश और आगशीरों के प्रेमदर्शन का प्रभाव माना जाता 


१६४ सूर साहित्य : नव मूल्यांकन 


है । पर इन सभी प्रमाव स्रोतों के विश्लेषण और राघा के रूप विकास पर 
उनके प्रभाव का आलेखन विषय का मात्र दाशंनिक विस्तार कर सकेगा, 
साहित्यिक नहीं | यहाँ संक्षेप में राधा के विकास का सर्वेक्षण कर लेना पर्याप्त 
ओर समीचीन होगा । 


राधा का बीज वेद में भी खोजने का प्रयत्त किया गया। स्तोत्र 
राधानां पते: * में आए 'राघानां शब्द से राधा का सम्बन्ध जोड़ा गया । 
पर यहाँ केवल बाह्यघ्वन्यात्मक का साम्य मात्र है । वेद में राधा शब्द घन, 
अन्न, समृद्धि, पूजा, नक्षत्र अर्थो में प्रयुक्त है, इनकी देवी के रूप में नहीं है । 
वेसे तो दूरान्वय प्रतीत होता है, पर हो सकता है कि आज इनकी देवी के अर्थ 
में यह शब्द प्रयुक्त होने लगा हो । अधिकांश विद्वान यह मानते हैं कि राघा 
का भंजुल रूप-विन्यास आमीरों के लोक-साहित्य के अमाथिक वातावरण में 
हुआ ।* डा० द्विवेदी ने इस मत का समर्थव करते हुए लिखा है: “राधा 
आभीर जाति की प्रेम-देवी रही होगी,जिनका सम्बन्ध बालकृष्ण से रहा होगा । 
आरम्म में वालकष्ण का वासुदेव कृष्ण से एकीकरण हुआ होगा इसलिए 
आभ् ग्रन्थों में राधा का नामोल्लेख नहीं है ।* ” आगे उन्होंने यह मी अनुमान 
किया कि राधा आर्यो की ही प्रेम-देवी रही होगी, जिसे आगे चलकर कणष्ण 
वार्ता में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हो गया । कुच विद्वानों ने सांख्व की 'प्रकृति' 
का ही रूपांन्तर और नामांतर राधा में देखा ॥7 तंत्रवादियों ने तंत्रों में वणित 
'शुक्वि' का वेष्णवीक त विकास राघा के रूप में माना । जेयदेव आदि बंगाली 
वंष्णवों के साहित्य में चित्रित राधा के पीछे सहजिया और ज्ञाक्‍त प्रभाव माना 
जाता है ।* इस दृष्टि से राधा का क़मिक रूप-विलास भी सिद्ध हो जाता है। 
कुछ विद्वानों ने कृष्ण को सूर्य माना है। राधा उसी प्रपंच में है। गोप-गण 
तारे हैं । इस प्रकार ज्योतिष शास्त्रीय पद्धति से राधा के उदमव की बात 
सोची गई ।* रास-लीला नक्षत्र मंडल की संपूर्ण चृत्ताकार गति है। राधा 


ऋग्वेद; १४२०१२६ । 
75. फ्ाशातत्वादवा, #शा5ि828ए599, ीव्वरशं5एर, 200 0॥6० 7२९॥- 


पं बे 


९005 $595675, #. 33 

सूर साहित्य, पृ० १६-१७ (संशोधित्त संस्करण) । 

डा० मुशीराम शर्मा-सूरसौरभ पृ० १७५। 

डा० शशिमृषपणदास--राधा का विकास प्र० ३--४। 
भारतवर्ष (पत्र) माघ १३४०, <बंगाव्द', योगेशचन्द्र राय । 


कक 2 


सूर की राधा १६५ 


4», 


विश्ञाखा नक्षत्र है, या यह अनुराधा नक्षत्र का प्रतीक है। कातिकी पूणिमा 
को सूर्य (कप्ण) विशाखा (रावा) में स्थित होता है । ह 

आलवार साहित्य में मी राघा संवन्धी संकेत मिलते हैं । इनके साहित्य 
में कृष्ण के साथ एक प्रमुख गोपी की कल्पना मिलती है | इस प्रमुख गोपी का 
साम “नप्पिव्नइ है। यह शब्द पुप्पवाचक है। इस लीला में “कुरवेंकुट्ट' 
नामक एक तमिल नृत्य का भी उल्लेख है। नप्पिनतइ का रावा से पूर्ण साम्य 
है पर नाम ताम्य नहीं है । 

प्राचीन जिला लेखों में मी राधा का उल्लेख मिलता है। वंयाल में 
पहाडइपुर की खुदाई में एक मूर्ति मिली हैं । उसमें राधा-कृष्ण लीला को परि- 
लक्षित बतलाया जाता है ॥- घारा के अमोघवर्ष के ६८० ई० के शिलालेख 

सर 


में कृप्ण-प्रिया के रूप में राघा का उल्लेख है ।* मालवा के एृथ्वी-वललन मुज 


4९) | | 





बिक. 


के सन्‌ €७४ ई० तथा ६७६ ई० के ताम्र-पर्राँकित लेखों में मंगलाचरण 


ज््री 


८>>>ल रे पे ३ इससे राघा के विरऋ भें आतर कृष्ण बोर २० <. 
राधा चसचनन्‍्धा हू ।7 इस्स राचा क दर न तुर छू की ओर संकेत हृ। 
इसमें प्रतीत होता है कि ईश की चौवी-पाँचवी जझती से € वीं-१० वीं शत्ती 
तक राधा की पूजा, उसकी प्रेम-लीला ठथा उसमें विरह लोक़प्रिय हो 


शाय थ | 


पुरातात्विक परम्परा के साथ-साथ साहित्यिक परम्परा भी क्रमिक्र है। 





संस्क्रत और प्राकृत साहित्य में राघा संबन्धी उल्लेख मिलते हैं। “गाह्मा 
सखतसई (गाया सत्तझ्रर्ती) के अनेक पत्र गोपी-राधा-छृप्ण प्रेमाम्ृत से शराबोर 
हैं । सतसईकार ते कह्ा : कृष्ण ने अपने नुख-श्वास द्वारा राधिका के कपोल 
पर लगे बुलिकरणों का निवारण कर दिया हैं । इससे अन्य गोपियों का महत्त्व 





| अडुरन-मम्यकन प्द्र जन खलंफकलो एम सम श् व्यस्जनाएूण डे >ड रावबा बगल जज 
न्यून हा गया हू | ४ इस पद्च से ख्ुज्थारिकता ता व्यज्जनापृण हे हां, रावा की 


है. 


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| कत्रे दाया ६-4 >> अर कक सामाललस का मांद्र -# है ला 
जाया शब्द पं्रतत्र मे भा छादा ६ | इसम चामाल्लख मात्र ह] मद 








॥<भ 
थक #. रा संत्रार डे अ॑०ह०-+पकृ- सकम्कमग कप च्कि जा ० घबक्ता का 
साराबग झत दसानसह्ार मे अासपराव्ण इज्जन्वथानका शाधक्ा का स्पएटट 


अ+ मा ॥. दाकर न्‍अशवपम८ना८-“फिकमममपपक-पमढए-पछा त्याग हलवा 


..] | घट तट बटामिज बमना अरपृनिननामनतान्‍ पर स्द्रो्प पिन ली ्ल्मः लकरलाकतन्‍न्‍न्‍क था क्र आह 
उक्त हढू £ इसक इलाक भ बमुना छंद पर छूस्य से छावत टद्वाकर क्राड्ा-त्यात 





१. गंगा पुरातत्चांक : पहाछपुर की खुदाई : के० एन० दोलित । 


२. के० एम० मझी, ग्रुत॒रात और उत्तका साहित्य, पु० (२६-२७ । 
३. प्राचीन लेख माला, प्रथम भाग, सं० १॥ 


४. गाहा चत्तसई, शारदा 
५. वयी-संहार, ६१! 


हर 


१९६ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


करके राधा जाती है और कृष्ण उसका अनुसरण करते हैं । मुज के दरबारी 
कवि घनंजय ने दो इलोकों में श्वृद्भारमयी राधा का उल्लेख किया है ।* काव्य- 
शास्त्र में भी राधा का श्र ज्भारी रूप प्रतिष्ठित रहा । आनंदवरद्ध न ते (५५०ई०) 
राधा का चित्रण किया । कृष्ण उद्धव से राधा की कुशल-भेम पूछते हैं । इसके 
साथ वे यमुना-तीर के लतावेश्यम की ओर संकेत करते है ।* नमि साधु ने 
रुद्रट्‌ के काव्यालंकार की टीका में (१०६८ ई०) राधा विषयक एक श्लोक 
दिया है | मुज के पश्चात मालवा के राजा भोज (१००४ से १०४४५ ई०) ने 
सरस्वती क ठाभरण' में राथा सम्बन्धी आठ प्राचीन श्लोक उद्घृत किये हैं । 
इनमें से अन्तिम श्लोक लीलामुक के क्ृण्णकर्णाम्ृत से लिया गया है । वक़ोक्ति- 
कार कु तक ने ध्वन्यालोक से एक इलोक उद्घृत किया है। इसका भाव इस 
प्रकार है : राधा कृष्ण के वस्त्र पहनकर यमुना से पुलिन पर गदु-गदु कठ से 
कृष्ण के विरह में गात करती है । इससे जलचर भी व्याकुल हो जाते हैं । 
त्रिविक्रम भट्ट के 'नलजम्पू” (दशवीं सती) में कला-कुशल राधा का उल्लेख 
है । क्षेमेन्द्र( !१ ०६५ ई० के आस-पास)ने अपने 'दशावतार चरित' में चार श्लोक 
दिए हैं | इनमें भी प्रेम-श्र ज्भरार स्पष्ट है । हेमचन्द्र के 'काव्यानुशासन” में राधा- 
विषयक दो श्र ज्भारी श्लोक मिलते हैं। हेमचन्द्र के शिष्प रामचन्द्र ने नाट्य- 
दपंण' में भेज्जल कविक्ृत नाट्यपरक ग्रन्थ राधा-विप्रलम्भ का उल्लेख 
किया है| शारदा तनय ने 'भावविलास' में 'रामा-राधा' नामक नाटक का 
उल्लेख किया है | कवि कर्णपूर ने अपने अलंकार कौस्तुन में कंदपं-मंजरी 
नाटिका का वर्णन किया है | यह राधा से सम्बद्ध मानी जाती है। अपभ्र श 
साहित्य-में भी राधा सम्बन्धी उल्लेख मिलते हूँ | प्राकृत पैंगलम में कृष्ण का 
वर्णन राधा के प्रेमी के रूप में मिलता है। इस प्रकार ईसा की आरम्मिक 
शताव्दियों से लेकर १२ वीं शती तक के साहित्यिक, काव्यशास्त्रीय और 
पुरातात्त्विक साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि राधा प्रेम, श्र द्भार, संयोग-वियोग, 
केलि-क़रीड़ा आदि की देवी वन गई थी । उसका सम्बन्ध कृष्ण से हो गया था । 
उसके रूप-विकास में ज्योतिष, तंत्र आदि ने योगदान दिया । 


२. विशदीकरण - जयदेव ने राधा को सर्वप्रथम विशद रूप प्रदान 
किया । यद्यपि राधा को दाशंनिक या आध्यात्मिक रूप सर्वप्रथम निम्बाक ने 
दिया प्रतीत होता है । (११५० ई०), पर काव्य के माध्यम से भक्त के क्षेत्र में 


१. दशरूपक, परिच्छेद ४ । 


२.  ध्वन्यालोक ॥ 


सूर की राबा १६७ 


राघा को प्रतिष्ठित करने का श्रेय पीयूषवर्पी जयदेव को है। राधा-केलि वर्णन 
को हरि स्मरण और काव्यानन्द दोनों के लिए उन्होंने माना । 


“यदि हरिस्मरणोे सरस मनो, याद बिलासकलालु कुतू हलम््‌ । 

मधुर कोमलकान्तपदावलों, श्वृणू तथा जयदेवसरस्वतीम्‌ ।। 
राधा का रूप-सौन्दर्य यहीं अपने चरम पर पहुँचा। राधा-कृष्ण की मधुरा 
मक्ति का उत्कृष्ट रूप खड़ा हुआ। काव्यज्ञास्त्रीय दृष्टि से जयदेव ने राधा को 
एक प्रेमिका, परकीया नायिका के रूप में चित्रित किया । राधा ने लोक-लाज 
का उल्लंघन कर दिया है। विरह में सुलगती मी है और संयोग में पुलकित 
मी होती है । राधा को अनुभूतियों की मांसलता सूक्ष्म, आध्यात्मिक अनुभूतियों 
से दव नहीं गई है | वैसे राधा का भक्तिपरक रूप भी व्यंजित हैं। कु ज- 
निकुञ्ज अपूर्व शोमा से झूम रहे हैं। इन्ही में पूव॑रागाकुल, मानिनी और 
विलासिनी राधा कहीं छिपी हैं । उसका प्रेमोन्माद भी अद्वितीय है। सम्मवतः 
जयदेव सुदूर-प्रवास-विरह की कल्पना मात्र से काँप उठे । 

चण्डीदास वंगाल के सूरदास हैं ।'* इन्होंने सहजिया वेष्णवों की 
भावना का समावेश करके राधा-प्रेम को अत्यन्त द्रत और कमनीय बना 
दिया । चण्डीदाप्त की राधा भी परकीया है। उसे भी अपने उत्तकट प्रेम और 
सामाजिक मर्यादा के संघ के क्षणों का कटु अनुभव करना पड़ता है| जयदेव 
की राधा साहित्य-शास्त्रीय. और कामशास्त्रीय. उपकरणों से सुसज्जित है और 
मक्ति-व्यंजना की किरणों से आलोकित है । चण्डीदास अपनी राधा को लोक- 
साहित्यिक उपकरणों से स्वाभाविकरता देते हैं । परकीया होते हुए भी वह कृष्ण 
में पतिमाव रखती है: 'तुम मोर पति, तुम मोर पति, मन नाहि आन सय ।' 
राघा किसी गहन दाशेनिक भाव से भी वोझिल नहीं है । उसमें अशेष समर्पण 
आकर्षक है । विरहासक्ति का संयोग चण्डीदास ने योगिनी राधा में किया है । 
यह ब्रज वलि साहित्य का श्वृद्भार है। चण्डीदास ने शारीरिक सौन्दर्य के भीतर 
अन्तहित मानसिक सौन्दययं की किरणों का मधुर संयोजना की है । 


विद्यापति में राधा का मांसल सौन्दर्य अपने चरम पर है। असल 
वात यह है कि राधिका की सारी शरीर-चेष्टाओं के भीतर भगवान्‌ को संतुष्ट 
करने की भावना है ।* विद्यापति की राधा वय संधि पर स्थित है। कभी-कभी 
इसके पश्चात्‌ ऐसा प्रतीत होता है कि राधा में प्रेम की प्रखरता न्‍्यून और 





१. डॉ० हजारोप्रसाद द्विवेदी : मध्यकालीन घर्मंसाधना, पृ० १८४ ॥ 
र्‌. है 7 77 4॥ पु० १८३ । 


१६८ सर साहित्य : नव मूल्यांकन 
विलास की मात्रा अधिक है| विद्यापति सम्मवतः यह भी भूले हुए हैं कि राघा 
को भक्ति के अनुकूल बनना है। वह काव्यशास्त्रीय नायिका भी है। मान, 
अभिसार, दूत्ती, मिलन आदि कामशास्त्रीय विधान भी सुचारुरूप से व्यवस्थित 
है। विद्यापति की राधा में जयदेव की राधा की भाँति अधिक मांसल सौन्दर्य 
और चण्डीदास की राघा का उनन्‍्माद भी है। 

इन तीनों का साहित्य चत्तन्य सम्प्रदाय की भी भक्ति-मावना के साथ 
एकाकार होता गया । सहजिया तथा तांत्रिक स्रोतों से आगत परकीया भाव 
प्रगाढ़ होता यया । साथ ही मक्ति राधापरक होती गई । 

पौराणिक साहित्य में राघा तत्त्व का सर्वाधिक निरूपण ब्रह्मवंवर्ते 

पुराण में मिलता है।' निम्बार्क साहित्य में राधा को कृष्ण की स्वामिनी लिखा 

गया है ।* ब्रह्मववर्तं में राधा का माहात्म्य प्रतिपादित किया है । राधा शब्द 
की भावात्मक व्युत्पत्तियाँ सी यहाँ उपलब्ध होती हैं ।* पद्मयुराण में राघा- 
पूजन का माहात्म्य विस्तार से दिया गया हैं ।४ वृन्दावन का माहात्म्य कयन 
भी इस पुराण में मिलता है ।* इस प्रकार राधा का वहुविध शाद्धार-संस्कार 
भारतीय साहित्य में होता रहा । 


३. ब्रज में राधा-- 

काश्मीरी शवागमों से लेकर दक्षिण में आलवार-साहित्य तक, बंगाल 
से लेकर गुजरात मालवा त्तक, राधा साहित्य की लुप्त-प्रकट घाराएं प्रवाहित 
ग्रैती रहीं । ब्रज में बंगाली कवियों की प्रतिभा से सस्‍्नात राघा ने प्रवेश किया 
हैं। रूप और सनातन ने वृन्दावन की क़ीड़ास्थलियों की खोज की । निम्बार्कीय 
राघा तत्त्व का विस्तार भी वृन्दाबन के कु ज-निकुजों में हुआ । दुन्दावन में 
राधावललमन सम्प्रदाय और हरिदासी सम्प्रदाय में राधा का महत्त्व कृप्ण से भी 
वढ़ गया । इनके आचार्यों ने मी रास-मण्डलों की स्थापनाएं कीं और केलि- 
स्थलों का निरूपण किया । इस प्रकार दृन्दावन राधामय हो गया । 





१... पत्र. प्ष, श्य]5079, प्रागतणए0 एशाहशा0एा, ४9. 443. 

२... थ०गांध जएण5, छ९ाट्राण0पड परश्मोी०पथ्ा। शात [छ ४ [709, 
एशथ 4, ?. 446. 

३. ब्रह्मवंवर्त कृप्णजन्म खण्ड, अध्याय १३ ॥ 

४. पदुमपुराण, उत्तराखण्ड : राघाष्टसी द्वत प्रसंग । 

५. वही पातालखण्ड । 


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साचायद 3।५<4 


'शचुलान-गाक" 


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१७० सर साहित्य : नव मूल्यांकन 


नहीं दिया, जितना उनके श्ज्भार-निरूपण में मिलता है | हो सकता हैं कि यह 
वृन्दावन के निकुज-लीलावादी भक्ति संप्रदायों का प्रभाव हो । सभी गोपियाँ 
राधा के भड़ांज्ध हैं। वल्लभाचायें जी ने कृष्ण की ह लादिनीशक्त के रूप में 
राधा को मान कर उन्हें कृष्ण से अभिन्‍न कहा है। सूर ने कृष्ण को राधा के 
वशवर्ती भी कह दिया है-- 

पुत्ति पुनि कह॒ति ब्नजनारि । 

धन्य बड़भागिनी राधा तेरे वश गिरधारि | 

>< >< ओर 
हम विमृख तुम करुण संग्रिनि प्राण एक ह्वं देह । 
एक मन एक बुद्धि एक चित दुहि न एक सनेह्‌ ।* 


इस प्रकार राधा के तात्त्विक रूप का आभास सूर ने यहाँ-वहाँ दिया है । 
राधा तो कृष्ण के रूप को जानती है, पर उसके मांता पिता नहीं जानते ।* 
५.१ प्रेम का विकास--सूर ने राधा को न वय:सन्धि की स्थिति में 
ही देखा और न पूर्ण प्रगल्भा के रूप में ही । उनको राधा-कृष्ण के प्रेम का 
स्वाभाविक विकास अभीष्ट है। अतः: उनकी बाल्यावस्था से ही वर्णन का 
आरम्भ होता है। कृष्ण माखनचोरी, गोचारण, दुष्ट-दलन के द्वारा अन्य 
गोपियों के मन में पैठ चुके थे । उनकी लोक-लाज टूटती जा रही थी। सभी 
कृष्ण की ओर आकर्षित थीं | कृष्ण ने एक दिन उड़ती हुई हृष्टि से देखा और 
देखते हुए निकल गए । राधा ने उनकी दृष्टि को भाँप लिया । उसने सखी को 
बतलाया--- 
ज्नज लरिकन संग खेलत डोलत, हाथ लिए चक डोरि। 
'सुर' स्थास चितवत गए सो तन, सन लियो अजोरि ॥ 
वैसे राधा का कृष्ण की ओर आक्ंण कृष्ण के पश्चात्‌ हुआ, पर अन्तर कुछ 
क्षणों का ही था। राधा सौन्दयंनिधि थी। स्वर्णाम वर्ण था। आँखें आकर्ण 
विज्ञाल थीं । माथे पर रोली “का टीका और नीलबस्त्रों से आवृता राघा ! 
किसका मन न मोह लेगी यह अनिद्य सुन्दरी | --- 
ओऔचक ही देखीं तहँ राधा: नंन बिसाल भाल दिए रोरी । 
नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनी पीढि रुरलात झकझोरी ॥॥ 


१. स्रसागर ( ना. प्र. सभा ) पद २४६० । 
२. राधा विनय करति मन हो मन, सुनहु स्थाम अंतर के यामी । 
मातु पिता कुल कानिहि मानत, तुम्हहि न जानत हैं जगस्वामी ॥ 


सूर की रावा १७१ 


संग लरिक्तिनी चले इत आवति, दिन थोरी छुदि तन गोरी । 


# 


सुर स्थाम देखत हीं रीजे, नेन नेन मिलि परी ठयोरीतव॥! 


७३ 


2... सकल अब. पर तक जल) ल्टॉिएि लक 2.2 “नमक ज गए बयान, गा णांभंगायाऋ छरख्सा दाल छा 
इस ऊदुदम छसानन्‍दय पर रासक दारांष्ताण राधप्ध गए। इज की सभी दाल- 





प्द़्् 
को तो ये पारदी परख चुके हैं। बह मणि कहाँ. छिपी रही । दे घीरे 


<3व5॥54<-4॥ 

फिक्स, 

छः ब्ब ४. । बिक 

हरा रादध ्प-नन्_्घन्छस अभेनाम्पाओि-अमनणनन्‍बक .. शा पारी लणा३+... आओ ज्वाााक- मय ऋदडां 


से रादा के पास ग्रए : ठम कोन हो ? कहां रहती हा ? आदि प्रश्नों से परि- 

















हि“ 
डर सवा म्कछा नमक. जोरि इपशनयूह---एनमनक ४ चेलद संग 
ठुम्हर कह रुहमल न्तिः खेलन संग चलो समिलि जोरी ॥ 
चक््दात कक जे 5 अब सिसमनि  आाो खालेन पर ता का धार #०९, है 4 
सूरदास प्रश्ु रप्तिक सिरोमनि, द रइ राधिका भौरों । 
! ने ० ब्छ ० अलतनन पल पाक व्प्पियणी न मसला पिन दिया . गा मिलदधि जोरी' हे 
र॒ से अपनी टिप्पणी से सारा मामला स्पष्ट कर दिया | संग मिलि जारा से 
गाए... भाहू आह, कक सचना ऋष्ण जे झपना परिचय जो उस 
इंच दादा के युन्‍म का सूचना मिलती हू झछैष्ण न अपना पारचथ दा दिया 
2 आह यने 


कि +- नमक राघा स्जक घर कक व कर कि. को निमंत्रण के 33 दिया 
दार राद्ा का डपच घर खलद आंद का दसदबण जा दया--+ 
'देलन जावह, रन्द-चदच, दइजच्ध गाउ का 


खेलन कवहु हमारें 
द्वारे जाइ देरि मोहि लीजो, कान्ह हमारों नाउ ॥॥ 





4 


दा पम:माआ-मममकक अंश घड़ी मल कर >> वात नहीं 53. तम्ह्नारा जन 
कृष्ण दे उच्द न यहां कहा कि हर कोई बात न हा हू, एभ्ह्ार 





सिशकप5मपन- -अतामबमी. 


मालापन दलसकर मन ठुम्दहार साथ चहन का करता हू + चूवा नियट देखि 


.औ। 


लकी सन्‍ू >> “जी ८7२८४ न ज कक > ऋ्शातण्ण्ययाल रादा "-प्ानम्ममा नया. बन). अयून्माुक--#>पकनपाककी 22 सोया: -- सुना, एणजद. निमंद्रण फ का _विशमकवनलामन्मंशर०-कुक. 
तूमका, दात कार्यद साथ | राधा के भचंच भ भाइहइससबभ्रणव॒-ंदमनह्ण सं केस 








सदाजुदा चहाँ हुई । पृर श्रम का दात याहा चहा कह दा जाता। सछियों दे 














रु यद्ट । कझंण्ण थे उप्चका 





परिचय नवीन दिया व “५ 30 हे 2 2 चीन्डति घारम्वार बताई रू 
।येथ -ः। दया : हऊया रा तू इनका चान्हात, चारम्वयार दत्ाहई (हों) कु 








(९५४१ 
वद्यादा व का दावा का रूप रज्चू देखा आर नगद हा बह३-- 


१७२ सरसाहित्य : नव मल्यांकन 


धन्य कोखि जेहि तोको राख्यौ, धन्य घरोी द जिंहि त्‌ अवतारी । 
धनि पितु मातु घन्य तेरी छबि, निरदति यों हरि की मह॒तारो ।॥' 


यश्योदा के मन में उसके सौन्दर्य ने न जाने कितनी कामनाओं की वर्षा करदी । 
उसने राघा का श्र,ज्भार किया : 'जसुमति राधा कुवरि सँवारति ।' श्ज्भार 
क्या किया, उसे तो नवेली दुलहहिन ही बना दिया । और अन्त में तिल-चाँवरी 
से उसको गोद भी भर दी । यशोदा ने अनजान में ही स्वकीया की भूमिका 
बना दी । राधा का दुलहिन के रूप में श्द्भार करा के सूर ने बड़े कौशल से 
राधा को स्वकीया बना दिया । जब निश्चित होकर यज्योदा ने राधा से कृष्ण 
के साथ खेलने के लिये कह दिया : 


खेलो जाइ इयाम सेंग राधा । 
यह सुनि कुवरि हरख मन कोन्‍्हों, समिट गई अन्तर बाधा । 


इस प्रकार बाल-काल से ही प्रेम विधि-विधान के साथ विकसित होने लगा । 
दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति उत्सुकता और अमभिलाषा जाग्रत हो गई । 


अब यह प्र॑ म-प्रसंग ब्रज में चर्चा का विषय बनने लगा । दोनों किसी 
न किसी बहाने एक दूसरे से मिलने लगे | सखियाँ सव समझने लगीं । सखियाँ 
प्रंम के संबन्ध में राधा को ताने देने लगीं : 'राघा ये संग हैं री तेरे ।” वे कहने 
लगीं : अब तो घर से बन-ठन के निकलती हो ! घर में ही क्‍यों नहीं बैठी 
रहती ! कक बंठी रहि भवन आपने, काहे कौं बनि आवी !! यह तुम्हारा बचपन 
तो कहा नहीं जा सकता | तुम इतनी छोटी भी अब नहीं हो : 'लरिकाई 
तबही लौं नीकी, चारि बरष क॑ पाँच । पर प्रेम नहीं रुकता है। राधा अनजान 
में ही धीरे-धीरे सवेस्व समर्पित कर चुकी । राधा ने यशोदा की वात अपनी 
माँ से जाकर भी कह दी थी । उसकी मां भी सजग रहने लगी। एक दिन 
राधा ने साँप के काँटने का बहाना किया और गाएड़ी कृष्ण को बुला लिया |" 
राधा की माँ ने उसे रोकना चाहा । इस पर राधा ने अपने अन्तर्यामी कृष्ण 
से कहा--- 

राधा विनय कर्रात मन हों मन, सुनहु श्याम अन्तर के यामी । 

सातु पिता कुल का निहि मानत, तुमहि न जानत हैं जगस्वामी ॥ 

इस प्रकार राधा का प्रम सघन से सघनन्तर होता गया । 





१. हरि मारुड़ी तहाँ त्तव आए। 
यह वानी वृषभानुसुता सुनि सन-सन हरप बढ़ाए । 


५७३ 





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१७४ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


हो जाता हैं। ब्रह्मवेबर्त पुराण में राधा के विवाह का वर्णन मिलता है | सूर 
की राघा का भी आज विवाह होगा | कुज ही उसके लिए मण्डप है और 
प्रम की ग्रेथि ही विवाह का बन्धन है ।* रास ही गंधर्व विदाह है--- 

जाकों व्यास बरनत रास | 

है गन्धर्व विचाह चित्त दे, सुना विविध बिलास । 


'एक प्रान हं देह' तो पहले से ही हो चुके थे। यशोदा ने राघा को दुलहिन 
उस दिन बनाया था। विवाह आज संपन्न हुआ | 

राधा को कृष्ण के प्रम पर पूर्ण विश्वास हो गया । एक सखी ने यह 
भी कहा कि यह प्रेम एकांड्भी है। अर्थात्‌ कृष्ण के प्रेम पर विश्वास नहीं 
किया जा सकता--- 

सजनी स्थाम सदाई ऐसे । 

एक अंग को प्रीति हमारी, वे जंसे के तंसे ॥॥ 
राघा ने सखी को डॉट दिया । उनके हृदय का अखण्ड विश्वास तिलमिला 
उठा। अब भला ग्रा बुरा कहने से कोई लाभ नहीं अब तो वे अपने हो 
चुके हैं-- 

स्थाम हि दोष देहु जनि साई । 

वे जो भले-बुरे तो अपने ... १ 
यदि हम भले है तो सब भले है : 'आपु भलाई सबब भलरेरी ।” कृष्ण मुझे भूल 
नहीं सकते । राधा अपने कृष्ण पर अधिकार के प्रति पूर्ण विश्वासमयी है । 
वास्तव में कृष्ण राधा के इशारे पर नाचते थे : 'मोहन कौ मोहिनी लगाई 
संगहि चले डगरिके ।' वात बढ़ती ही गई । राधा के सबन्ध में फिर इधर-उधर 
चर्चा होने लगी । सभी की विवाह का भेद ज्ञात नही था । राधा ने एक दिल 
पयाम से एकान्त में कहा--- 

स्यार्माह बोलि लियो ढिंग प्यारी । 

ऐसी बात प्रगठ कह कहिय, सखिनि माँझ कत्त लाजनि मारी ॥ 

इक ऐसेहि उपहास करत सब, तापर तुम यह बाल पसारी । 

जाति पाँति के लोग हसहिगे, प्रगट जानि है स्थाम मतारी ॥ 
कृष्ण तो थौड़ी देर चुप रहे, पर स्थाम के सखाभों ने कह दिया --- 

'सुर स्पाम-स्पामा तुम एक, कह हंसि है संसार ।! 
१. तब देत भाँवरि कुड्ज मण्डप, प्रीति ग्रन्थ हिये परी। 


१७६ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


कुजविहार लीला | इन समस्त लीलाओं में झुद्भारिक मावना तो ओतप्रोत हैं 
पर ख्यूगरार पूर्ण परिपक्व होकर संपन्‍त संसोग का रूप घारण नहं 
कर पाता । 
उक्त लीलाओं का उपक्रम प्र म को घनीभूत करने के लिए आगे सूर ने 

कुछ ऐसी लीलाओं का वर्णन किया है, जहाँ संमोग अपने पूर्ण संपन्‍न रूप में 
है । राधा के मन में खीझ के स्थान पर उल्लास झौर उत्साह आ जाता है । 
आनन्द इन लीलाओं में चरम का स्पदं कर लेता है। सम्पन्न संमोग को 
लीलाए थे मानी जा सकती हैं : वसनन्‍्तलीला, होलीलीला, डोललीला, झूलव- 
लीला, निद्रा और घूर्तेता। होलीलीला में राधा कृष्ण अपनी सखियों कौर 
सखाओं के साथ पूर्ण आनन्द लेते हैं। श्यामा-श्याम की जोड़ी आज हिंडोरे में 
शोभित है--- 

झूलत अति आनन्द भरे । 

इत श्यामा उत्त लाल लाड़िलो, वंयाँ कण्ठ घरे ॥ 

बोलत मोर, क्रोकिला, अलिकुल गरजत हैं घनघोर । 

गात राग मल्हार भामिनी, दामिनि की झकझोर ॥ 

छल या घूर्तेता से मिलन की स्थितियों का भी सूर ने स्वाभाविक 

चित्रण किया है । राघा अब पूर्ण चतुर हो गई है । विना कृष्ण से मिले कल 
नहीं पड़ती, पर मिले कंसे ? सूर की राघा अपनी माला खो जाने का वहाना 
करती है । माता ने जब यह सुना तो उसने बड़ा रोष किया-- 

जननी अतिहीं भई रिसहाई ॥ 

वार-वार कहे कुवरि राधिका, मोदतिसरि कहाँ गंदाई । 
राघा ने उत्तर दिया-- 

सुनि रो मंया काल्हि हीं, मोतिर्सार गेंवाई। 

सखिनि मिले जप्ुनता गई, धो उनहिं चुराई ॥ 

कीधों जल हो में गई, यह सुधि नहिं मेरे । 

तब तें में पदछितात हों, कहति न डर तोरं ॥ 
राधा कहती है, जायगी कहाँ मेरी माला । अब मुल्ले याद आई कि किसने मेरी 
माला ली है। मैं अभी एक क्षण में ले आती हूँ । मेरे साथ किसी के आने की 
आवश्यकता नहीं--- 

जहेँ कहाँ मोतिसरि मेरी । 

अब सुधि भई लईं वाही नें, हंसति चली वृषभानु किसोरोी ॥ 

अबहों में लोन्हे आवति हों, मेरे संग आवे जनि कोरी । 


सुर की राधा १७७ 


कोई यद्दि साथ आता तो भेद खुल जाता । राधा के कृष्ण को इशारा दिया। 
कृष्ण ने भी गाय के व्याने का बहाना किया और वोनों का संभोग हुआ--- 

सेन दे नागरी गई. बन को। 

>९ >< 2५ 

चले अकुलाइ वन धाइ, व्याइ गाइ देखिहो जाई, मन हरष कीन्हो । 
इस प्रकार सूर ने राधा को परम लीलावती और कलावती के रूप में चित्रित 
किया है। उसका भमोलापन भी इतना मनोरम था कि कृष्ण जेसे रसिकशिरो- 
मणि विमोहित हो गये और उसका चातुर्य भी ऐसा है कि दर्शक चकित हैं । 

राधा ने प्रेम-वैचित्रय के क्षणों का भी अनुभव किया है । “प्रिय के 

अति निकट रहने पर भी प्रेमोत्कष॑ं के कारण प्रेमी को वियोग कथा की जो 
अनुभूति होती है, उसे प्रेम-वेचित्र्य करते हैं ।”* राधा ने अपने इन द्ुरंगे 
क्षणों के अनुभव को इस प्रकार अपनी सखी से कहा--- 

श्याम सखि नीके देखे नाहीं । 

चितवत ही लोचन भरि आए, वारबार पछिताहँीं । 

कंसे हु करि इकठक राखति, नकहि में अकुलाहीं । 

निमिष सनो छवि पर रखवारे, ताते अतिहि डराहीं । 
प्रेम-वचित्र्य के क्षणों में प्रेम का चरमोत्कर्प रहता है।एक और उदाहरण 
राधा के प्र म-वेचित्रय की लीजिए--- 

राधेहि मिलेहु प्रतीत न जावति । 

यदपि नाथ विधुवदन विलोकति, दरसन को सुख पावति । 

भरि भरि लोचन रूप परमनिधि, उर सें आन दुराबति । 

विरह बिकल मति दृष्टि दुहु दिसि, सचि सरधा ज्यों धावति । 

चितवन चकित रहुति चित अन्तर, नन निर्मेष न लावति । 

सपनों आहि कि सत्य ईश बुद्धि, बितर्क बनाबति । 

कबहुक जरति बविचारि कौन हों, को हरि केहि यह भावति । 

सर प्रेम की बात अठ्पठी, सन तरंग उपजावति । 
ऐसे ही कई पदों में सूर ने संगोग कालीन मधुर बेदना को चित्रित किया है। 


५.४. विराहणी राधा--संयोगिनी राधा अपने में जितनी प्रगल्म है, 
उससे भी अधिक विरहिणी राधा है। एक दिन कृष्ण को मथुरा ले जाने के 


१. डॉ० हिवेदी, मध्यकालीन धर्म साधना, प्ृ० २०३१ 


श्छ८ सुरसाहित्य : नव मुल्यांकन 


लिए अक्रर आ गये । समस्त ब्रज आकुल-व्याकुल हो गया । कृष्ण ने मथुरा 
जाने का समाचार राधा को भी सुनाया । राधा अवाक्‌ रह गई--- 

हरि मोसों यौन की बात कहीं । 

मन गह्नर मोहि उतर न आयो, हों सुनि सोच रही ॥। 


बिना पूणिमा के ही ज॑से चन्द्रमा को राहु ने ग्रस लिया हो : बिनु परवर्हि 
उपराग आजु हरि, तुम है चलन कह्मयौँ कृष्ण को रोकना सम्मव नही था| वे 
चले गये । पर कया राधा रोकने का कुछ प्रयत्त भी नहीं कर सकती थी ? 
जब अक्र र के रथ की धूल भी अहृश्य हो गई, तब उसे इसका पदचात्ताप 
हुआ । उस समय क्‍या लज्जा करनी थी : इस निष्क्रियता के स्थान पर तो 
मृत्यु आ जातो-- 


तब न बिचारी यह बात । 

चलत न फेंट गही मोहन कीं, अब ठाढ़ी पछतात ॥। 
निर्राख निरखि मुख रही मौन हवे, थकित भई जलपात । 
जब रथ भयो अदृष्ट अगोचर, लोचन अति अकुलात । 


जब क्रृष्ण जा रहे थे तब राधा यह समझ नही सकी कि क्‍या हो रहा है। पर 
उनके विदा होते ही, राधा का हृदय सौ-सौ बिच्छूओं के दंश का अनुभव करने 
लगा । अब सारी रात तारे गिनते बीतती है । उसके ध्यान से रथ में बंठते 
हुए कृष्ण की झाँकी नहीं हटती-- 

आजु रेत नहिं नींद परी । 

जागत गगन गगन के तारे, रसना रठत गोविंद हरी ॥। 

वह चितवनि वह रथ कीं बंठनि, जब अक्रर की बाँह गहीं । 

चितवति रही ठगीं सी ठाढ़ी, कह न सकत कछु काम-दहीं ।॥ 

इतने मन व्याकुल भयी सजनी, आरज पन्थहु तें विडरी । 

सूरदास प्रभु जहाँ सिधारे, किती दूर मथुरा नगरी ॥। 
आश्चर्थ तो यह है कि उस समय हृदय नहीं फट गया--- 

हरि बिछुरत फादयों न हियो । 

भयो कठोर बज्ञ तें भारो, रहि के पापी कहा कियोौ ॥ 


कृष्ण को पहुँचाकर ननन्‍्द आदि लौट आए। उन्होंने मथुरा की सारी घटनाएँ 
सुनाई । राधा से किसी ने यह भी कह दिया कि वे कुब्जा से प्रेम करने लगे 
हैं । राधा ने कहा--- 


सूर की राधा १७६ 


कैसी री यह हरि करिहे ? ः 
राधा को तजि हैं मनमोहन, कहा कंत्त दासी घरिहें ? 


अब सारे ब्रज की दृष्टि विरह संतप्ता राधा पर है। उसी को लक्ष्य करके सभी 
कृष्ण को दोष देते हैं: क्‍या राधा के प्रेम का यही मूल्य है ? कोई कहता है: 
करि गए थोरे दिन की प्रीति । कोई कहता है : प्रीति करि दीन्ही गरे 
छुरी ।' कोई-कोई तो यहाँ तक कह देता है कि उनको प्रेम का निर्वाह करना 
ही नहीं आता : 'प्रेम निर्वाह कहा वे जानें। इस प्रकार ब्रज में तरह-तरह 
की वातें चलती रहीं । परदेशी के प्रेम का क्या विश्वास ? राधा को यह सब 

अच्छा नहीं लगता था। उसे इन आरोपों से खीझ ही होती थी | उसे तो कष्ण 
मिलन की युव्ति चाहिए-- 


बातनि सव कोइ जिय समुझावे । 

जिहि बिधि सिलनि मिले वे माहओे, सो बिधि कोउ न बतावे।। 
राधा सबसे कहती है : णेण्ण के प्रेम में कमी नहीं । उनको दोष नेना ठीक 
नहीं । सम्मवत: मेरा प्र म ही कपटीला था-- 

सखी री हर्रिहि दोष जि देहु । 

तातें मन इतनो दुख पावत, मेरोइ कपट सनेहु ॥ 


इससे बड़ा विश्वास दुलेम है । अब राधा को लगता है कि सारा जीवन विरह 
में जलते-जलते ही बीतेगा। प्रिय मिलन के कुछ भी लक्षण नहीं हैं । इसी 
प्रकार राधा का दीन जीवन व्यत्तीन होने लगा । 
एक दिन राधा ने सुना कृष्ण का संदेश लेकर उसके एक अन्तरग 

सखा उद्धव आये हैं । यह एक नई घटना थी । इससे पहले कृष्ण को पथिक के 
द्वारा राघा सन्देश भिजवा चुको थी। सन्देश यह था : माधव, यह कच्चे जीवन 
का कुछ ठिकाना नहीं है । क्या आप इतनी कृपा करेंगे कि एक बार दशेन दे 
जायें--- 

बारक जाइबो मिलि माने । 

को जाने तने फूटि जाइगो, सूल रहो जिय साथीे ।। 

पहुनेहु नन्‍्द बधा के आवहु, देखि लेड पल आफ्ो । 
एक दिन विरहाकुल राधा ने माधव का एक चित्र बनाया था । चित्र बड़ा 


सजीव ओर यथार्थ उतरा । इतना कि राधा सोचने लगी, यह बोलेगा । पर 
शब्द कहाँ ? और फिर वही असीम-अभतल विरह-बारधि -- 


१८० स्रसाहित्य : नव मूल्यांकन 


में सब लिखि सोभा ज्रु बनाई । 
सजल जलद तन बसन कनक रुचि, उर बहुदाय सुहाई ॥। 
7५ 2५ र् 2५ 


स्रदास मृदु बचन स्रवन लगि, अति आतुर अकुलाई ॥। 


पर कृष्ण तो आये नहीं, उद्धव आये | राधा उनका स्वागत करने आगे बढ़ी 
पर पर डगमगा गए । वह गिर पड़ी--- 

चलत चरन गहि रह गई, गिरि स्वेद सलिल रस भीतों। 

छूटी लट, भुज फूटी बलया, टूटी लर, फटी कंचुक झीनी ॥। 
राघा आँसुओं में जैसे डूबती जा रही थी। उद्धव का समस्त ज्ञानयोग उस 
अश्र्‌ पारावार के किनारे अवाक्‌ और किकत्त व्य-विमूढ़ खड़ा था। पर राधा 
की यह दशा उद्धव मन की गहराइयों में उतरती जा रहीं थी। उसका चेतन 
मन तो ज्ञान के समर्थन में लीन था, पर अचेतन विह्लल हो गया | अचेतन मन 
के उदगार तब निकले, जब उन्होंने लौटकर कृष्ण से राधा की दशा का 
वर्णन क्रिया--- 

उमगि चले दोउ तयन विद्याल | 

सुनि-सुनि यह संदेश श्यामघन, सुमिरि तुम्हारे ग्रुन गोपाल ॥। 

आनन वपु उरजनि के अन्तर, जलधारा बाढ़ों तेहि काल । 

मनु जुग जलज सुमेर श्जूग तें, जाइ सिले सम दशिहि सनाल ॥। 
आँसुओों की चदी ही उमड़ रही थी--- 

तुम्हरे बिरह न्नजराज राधिका नेननि नदी बढ़ी । 
लीने जात निमेष कूल दोडठ, एते यान चढ़ी।॥।! 

जिन विशाल नयनों ने कभी नटनागर को उलझा लिया था, आज आँसुओों 
में डूब उतरा रहे हैं। इन्हीं में रूप और रस का अबतल पारावार कभी उमड़ता 
था । जो आँखें कभी सौन्दर्य की मदिरा की वर्षा करती थीं, आज 'नननु होड़ 
वदी बरखा सों ।' 

राधा के मन में दुहरी पीड़ा है | प्रेम असफल होना चाहता है भौर 
लोक का उपहास भी सहना पड़ता है। राधा को मिलन के विगत क्षणों की 
याद विह्लल कर रही है । मिलकर बिछुड़ने की पीड़ा को कौन समझता है। 
वही समझ सकता है, जिसको अनुभव हुआ हो: “मिलि बिछूरे की पीर 
सखीरी, त्रिछुरुयो होय सो जानें ।” कृष्ण जन्म लेकर ब्रज की ओर भाए ही 
क्यों ई न आते और शा मेल होता : “बरु माघव मधुवन ही रहते / केत जसुदा 
के आग्रे ।” राघा के लिए 'विनु गुपाल बेरिन भई कुज्जें ।”” वर्षा आती थी 


सर की राधा १८१ 


और राघा की काँखों में समा जाती थी : “कारी घटा देखि बादर की, सेव 
नीर मरि आए ।' इस प्रकार राधा का जीवन भीतर ही भीतर वताशे सा 
चुलने लगा। इस प्रकार दिन-दिन छीजवने से क्‍या लाभ ह्‌ [;॒ यह उसके लिए 
अचचह्य हा गया ६ 
दुसह बिरह मायौं के, को दिन ही दिच छोज 
सर स्पाम प्रीतम बिनु राधे, सोचि सोचि कर सोजें ॥। 

' राघा उद्धव से न जाने क्या-क्या कहना चाहती थी। हृदय की पीर 
की बमिव्यक्ति से उसका मन हल्का हो जाता : विन ही कहे आपने मन में, 
कव लगि सूल सहौं । पर समस्त तरल अभिव्यव्यिक्तियाँ जम कर रह गई । 
गया रुघ गया और आँखों में पादी उमड़ आया । जिस भाषा का प्रयोग राधा 
करना चाहती थी, उसने आाँसुओं की भाषा का रूप धारण किया--- 

कंठ बचन न चोलि मबावे, हृदय परिहृत भींन । 

मेन जलि भरि रोइ दोीनी, ग्रसित आपद दीन ॥ 
राघा जब न बोल सकी, तव उसकी ओर से सखस्ियों ने उद्धव से वातचीत कीं । 
हमले एक निर्मोही से प्रेम किया : प्रीति करि निरमोहि हरि सों, काहि नहिं 
दुख होइ ।' हमें ज्ञात नही था कि वह कपटी वाहर से प्र म दिखाकर भीतर के 
कपट को इस प्रकार छुपाए रहेंगा । यह तो बोछे आदमियों की प्रीति है-- 

ऊची अति ओछे की प्रीति । 


बाहर मिलत, कपठ भीतर यों, ज्यों खौरा की रोति ॥ 
पर जव कहने से क्या लाम ? हमारे सारे स्वप्त मन में ही तड़प कर रह गये : 
मन की मन ही माँझ रही । अन्त में यही कह दिया कि यदि हो सके तो एक 
वार उनके दशन करा दो उद्धव जी । 
पहले तो कृष्ण ने राघा के प्रम को यों ही समझा था | पर बन्ततः 
कृष्ण को उस प्रेम के छूट जाने का पश्चाताप हुआ। राघा का सुल्य उन्हें 
अपने समस्त वेमव से भी ऊंचा दिखलाई देने लगा। उनका बन्तर्मत्त राघा के 
प्रेम की मधघुरिमा की स्मृति से आप्लावित रहता है। एक दिन उन्होंने उद्धव 
से कह ही दिया : 'सूर चित तें दरत चाहीं, राधिका की प्रीति ।' 
अब राधिका की अन्तिम झाँकी शेष है । उसके मन की पुकार को 
निष्ठुर श्याम ने सुना : पुनमिलन की स्थिति लाई गई । कृष्ण ने प्रज को संदेश 
भेजा : प्रभास क्षेत्र में मु_से मिलो। कृष्ण न जाने क्यों ब्रज में आकर प्रेमियों 
से भेंट करना नहीं चाहते | उनके आते ही जो करुणा मौर प्रेम की घारा 
उमड़ती, वहाँ जाते ही उसकी समस्त चेतना विगत स्मृतियों की जो घटाएँ 


रैर सूरसाहित्य : नव सुल्याकत 


घिर जातीं, सम्भवत कृष्ण उनसे फिर निकल नहीं पाते । इसलिए पुनरमिलन 
प्रभास क्षेत्र में होगा । राधा को पुनमिलन की आशा ने विह्नल कर दिया : 
अचल उड़त, मन होत गहगही, फरकत नेन खये।” पर अभी राधा से 
भेंट नहीं हुई | कृष्ण वैसे आ तो गए हैं। पर मानिनी राधा क्‍यों दोड़ कर 
जायगी । मन में वेसे भारी विकलता भी हो रही है-- 

राधा नेन नोर भरि आये । 

कब धों सिले श्याम सुन्दर सखि, यदपि निकट हैं आये ॥) 


पर कृष्ण बदले हुए है । समस्त साज-सज्जा, भीड़-भाड़, ऐश्वर्य-वभव राज- 
कुलोचित है। कहाँ ब्रज का साँवला और उसकी निश्छल लीलाएं और कहाँ 

यह सब कृष्ण के साथ बिविध वेशभूषा में नागरियाँ और कहाँ ब्रज की 

गेवारिन नवेलियाँ । आने की सूचना पाकर सभी अभ्यर्थना के लिए खड़ी थीं । 
राधा भी एक ओर चुप खड़ी थी । रुक्मिणी की जिज्ञासा शान्त न रह सकी । 
पूछ उठी : प्रिय इनमें को वृषभानु किसोरी ।! जिसकी याद आपको कभी 
नहीं मूलती : जाके गुन-गनि ग्रुथति माल, कबहूँ उर में नहिं छोरी ।* कृष्ण 
कुछ देर चुप रहें | तब रुक्मिणी ने फिर पूछा : 'नेंक हमें दिखरावहु, अपने 
बालापन की जोरी ।' तब कृष्ण ने दूर से दिखला दिया : “वह देखो जुवतिन 
में ठाढ़ी नील बसन तन गोरी ।” इसी 'नील वसन' में राधा उस दिन थीं, जब 
इयाम ने उसे पहली बार देखा था । पर कृष्ण इस रूप में उस दिन नही थे । 
राधा को सब कुछ अजनबी लग रहा था । कृष्ण के ऐश्वर्य को देख कर वह 
रुद्धवाक्‌ थी : “सूर देखि वा प्रमुता उनकी, कहि नहिं आबे बात ॥” रुक्मिणी 
और क्ृष्ण राधा की विवशता को समझ गए । रुक्मिणी राधा को अपने घर 
ले गई | राधा और रुक्मिणी एक स्थान पर बैठी थीं, प्रेमपुर्वेक । कसा 

"अद्भुत संयोग था । सूर ने यहाँ दोनों को ठकुरानी कहा : अ्रमु॒तहाँ पधारे 
जहाँ दोऊ ठकुरानी । 

ह वह क्षण आ गया । अब मिलन होगा । राधा-माधव भेंट कोई साधारण 
घटना नहीं है । माधव जिस राधा की मनोरम स्मृतियों को लेकर अब तक का 
समय काट सके और राधा जिस कृष्ण की आत्मगत मूति पर नीराजन समपित 
करती रही; आज एक दूसरे के पास है। यदि आज भी अन्तर रह गया, तो 
अभेद कब होगा ? आज दोनों ही एकमेक हो जायेंगे । आज दोनों में से किसी 
ने चूक नहीं की-- 

'. राधा माधव भेंट भई । 
राधा-माघव, सावव-राघा, कीट भूंग ग्रति हव ज्ु गई ॥ 


सर की राघा पृथरे 


मायव राघा के रंग राते, राघा माघव रोग रई।॥ 
माधव रावा प्रीति निरन्तर, रसदा कह न गई ॥ 





अच सूर की वाणी रुद्ध हो गई । पर जो कह दिया वह भी सर की अद्वितीय 
सफलता है । अन्यथा, इन क्षणों को वाणी देना किसके बस की बात है ? 


पर राया चुप थी । बाज राघा कुछ वोल न सकी । आनन्द का समुद्र 
ग्म्भीरततम था | उतस्तको समस्त हलचल द्धत्तम रा हां गदह था। वाह्म अभिव्यक्ति 


उनुमावों में न हो सक्की । रावा को यह हो क्या गया ? उसने समझा जैसे 
ज्यूज्ारक् अनुभादमर्या सादाय तो उपक्रम थीं, इस अशेषय मिलन की । उनकी 





स्मृति से तो जब लाज आती है । फिर भी वह सब कुछ भी उपेक्षा की वस्तु 
तो नहीं थी । जाज यदि राघा अनुमावती हो जातो कृष्ण से सांग मिलन 
करती, तो कौन रोकता ? पर इस गलती के भाग्य में तो पछताना ही लिखा 
है । तमी तो मनन की कर न सकी और मन ही मर पश्चाताप में सुलग 
च्ही हैं-- 

करत कहछु नाहों आज्ु बनी । 

हरि जाये, हों रही ठगी सी, जेसे चित्त घनों ॥ 

आसन हरपि हृदय नह दींनी, कमलकुटी अपनों । 

नन्‍्यचछावर उर अरघ न अंचल, जलघारा ज्ु वनी ४ 

कंचुकी ते कुच-कलझ प्रकट हैं; टूटि न त्रकतनी 

अब उपजी अति लाज मर्नाह मन, समनुझ्नत निज करनी 
६. उपसंहार-- के 

सर को राधा की यही अन्तिम साँकी है। चिर-विरह की ज्वाला से 

विदग्धय । अब इसका मिलन कमी नहीं होगा। मिलन होना शेष भी नहीं 
रहा । इससे अधिक मिलन होगा भी क्या ? यह तो तदुरूपता है: कीट भृग 
यति हू जु गई । राघा का तक्ष्य कृष्ण को पाना नहीं है। उनकी तृप्ति 
उसका साध्य है। छूर न राधा को यह झांकी अस्तुत कंरक हिन्दी-गीति- 
काव्य को सदा के लिए सदल कर दिया । यदि तुलसी ने सीता को महाकाव्य 
की नायिका के रूप में सेजोया और उसके व्यक्तित्व को सती के पवित्र आदर्शों 
से अभिमंडित कर दिया, ठो सूर ने समस्त झुद्भार, माधुूरय, सौन्दर्य, सोकुमार्य 
त्तरलता अनुभूति ओझओऔर विकलता से विभूषित करके एक गीत-काव्योचित 
साथिका प्रतिष्ठा की। बाब तक यह रासश्च री, पति हु जेश्वरी, सोन्दर्या- 
घिष्ठादी राघा उतनी सरस, सरल औजौर सच्च दनी हुई है । 


सात गा 
मरा स्व» म्वरँ मत 


भाव-भूमि 
हट । 5 


प्रास्ताविक--- 


भर्णि साधना मनुष्य की रागात्मक वृत्ति से संबद्ध है। राभात्मिका 
वृत्ति अपने चरमोन्नत क्षणों में किसी भी अन्य मूल्य को 


स्वीकार नहीं करती | इसकी अपनी अभिव्यक्तियाँ होती हैं । इसकी अपनी 
विधियाँ हैं। बाह्य प्रमावों और वर्जन-अंकुशों को यह वृत्ति निरस्त 
कर देती है। लौकिक-अलौकिक भावात्मक स्तरों का भेद कुछ समय तक 
रहता है: फिर, ये स्‍तर भी तिरोहित हो जाते हैं । एक दूसरे के 
प्रक बनकर दोनों स्तर समन्वित हो जाते हैं। एक स्तर यदि ऊष्व दिशाओं 
की खोज करता है, तो दूसरा भावात्मक उड़ानों को जीवन-मूमि से असम्बद्ध 
नहीं होने देता : उसे उत्तेजना, तीत्रता और गति देता रहता है । इस समन्वित 
स्थिति में प्र म॒ सिद्धावस्था को प्राप्त होता है | दमन, वर्जन, जैसी रागकेन्द्रों को 
घोंट देने वाली विधियाँ फिर पीड़ा नहीं पहुँचा सकतीं । भक्ति का यही दर्शन 
है, जिसका प्रतिपादन भक्तिसूत्रों और भागवत ने प्रिया है। भाव मूलक सेवा 
और चर्या का मार्ग पांचरात्र संहिताओं ने निश्चित किया है। नवधा-भक्ति में 
भक्ति भावनाओं और तत्संबन्धी क्रियाओं का समावेश है । 


भावनाएँ मानवीय संवन्धों के मूल में रहती हैं | इन्हीं भावों के उदात्त 
रूप आध्यात्मिक संवन्धों की योजना करते हैं। प्रेम एक मूल भाव है, जो 
विविध रूपों से प्रस्फुटित होकर विविध संबन्धों को संभव बनाता है | इसके 
वात्सल्य, सख्य, दास्य, माधुये आदि रूप हैं। इनकी मान्यता भक्ति संप्रदायों 
में रही । इनकी विभाजन माहात्म्य ज्ञान के आधार पर किया जाता है। 
भगवान के विराट, विभूतिमय स्वरूप की कल्पना 'दास्य! से संबद्ध है । प्रेम 
का आधार माहात्म्य ज्ञान रहता है और साधना विधि-मर्यादा के मूल्यों को 


भाव-भुमि १८७ 


लेकर चलती है। वात्सल्य, सख्य में माहात्य-जञान क्रमण: छूटता जाता है 
और भागवत समता स्थापित होती जाती है । रागात्तमिका वृत्ति इन स्तरों पर 
विशेष रमती है । सामाजिक हृष्टि से भाव अधिक निरापद हैं: विक्वति की 
संभावना नहीं है। 'माधुये' भाव विकास की चरमकोटि है। इष्ट का माहात्म्य 
ज्ञान इस स्तर पर तिरोहित हो जाता है: उनके साथ विशुद्ध प्र म-संबन्ध, 
कान्ताभाव, स्थापित हो जाता है । दूसरी ओर वेद-विधि, शास्त्र-अनुशासन, 
लोक-मर्यादा या कुल-कानि, किसी भी बाधा को माधुयें की अविरल धारा 
स्वीकार नहीं करती । इन मावस्तरों को भावासक्ति के सोपानों के रूप में भी 
स्वीकृत किया जाता है : एक भावस्तर की पूर्णता दूसरे स्तर पर आरोहण की 
गक्ति और योग्यता प्रदान करती है । इस दृष्टि को लेकर चलने वाले संप्रदायों 
में भावों का वविध्य स्वीकृत रहता है। सभी भाषों की क्रियात्मक और मानसी 
सेवाएं चलती रहती हैं। इन संप्रदायों में सामाजिक दृष्टि भी रहती है और 
परम गुह्म एकान्तिक दृष्टि भी | संमवतः: इसी प्रकार का संजदाय वल्लभ 
संत्रदाय है। इसमें वात्सल्य, सख्य और माधुये विशेष रूप से और दास्य, एवं 
शान्‍्त सामान्य रूप से मान्य रहे | इन सभी भावों की सेवा-विधियाँ मी इस 


संप्रदाय में प्रचलित रहीं और सभी भावों से प्रांजल साहित्य भी संप्रदाय के 
कवियों ने रचा । 


दूसरी और वे संप्रदाय हैं जो मात्र दास्य और मर्थादावाद को लेकर 
चलते हैं या मात्र माधुर्य को, जो किसी भी रूप में “मर्यादागत' मूल्यों को 
स्वीकृत नहीं करता । एक में यदि छुद्ध सामाजिक दृष्टि है, तो दूसरे में शुद्ध 
एकान्तिका । पहली विचार धारा का प्रतिनिधित्व तुलसी करते हैं, तो दूसरी 
श्रणी में चेतन्य, हितहरिवंश और हरिदास जैसे आचार आते हैं। इन दोनों 
की स्थिति ध्र वीय है । 


परिस्थिति ऐसी हुई क्रि मव्यकराल में माधवुयंगत अभिप्राय अधिक 
आकषेक्र और लोकत्िय हुए । इन अभिप्रायों ने “मर्यादा पुरुषोत्तम को भी 
रसिकर शिरोमणि बनाकर छोड़ा ओर सीता और उनकी सखियों में मी कान्‍्ता- 
भाव की छ॒बियों का निदर्शन क्रिया--रामभक्ति का रपसिक संप्रदाय प्रबल हो 
उठा। लीला पुरुषोत्तम की भी मधुर लीलाएँ अधिक त्रिय होती गई । फलतः 
वल्लभ संप्रदाय जैसे समी भावों को लेकर चलने वाले संप्रदायों में भी धीरे- 
धीरे माधुयं-भाव और गोपीभाव की प्रतिष्ठा सर्वाधिक हो गई । सूर' जैसे सिद्ध 
क्रवि जो वात्सल्य, सख्य और माधुर्थ्र के साथ समान न्याय कर सके, वे भी 

5 की 


श्य८ स्रसाहित्य : नव मूल्यांकन 


अंतिम क्षणों में माधुय॑ भाव में निमग्न मिले। कृष्णोपासना के भीतर मूलत 
राधा की उपासना ही मिली । इस प्रकार प्रायः सभी भक्ति संप्रदाय साधुये- 
भाव में प्रविष्ट हो गये । यहाँ भी स्वकीयां भौर परकोया का द्वन्द्द रहा । 
स्वकीया के साथ जो शास्त्रीय या सामाजिक मूल्य चिपके रह गये थे, वे भी 
परकीया के उपेक्षामथ भावावेश के सामने निस्तेज होकर रहे । इस प्रकार 
माघुयें भाव की स्वीकृति एक समय में सभी सांप्रदायिक स्तरों पर हुई | इस 
स्वीकृति ने समग्र भारत की काव्यं साधना को पूुष्ट किया । चाहे सामाजिक 
हृष्टि से इस भाव पर कुछ विकृत छायाएं दिखलाई पड़े, पर भावोत्कर्प की 
दृष्टि से समस्त संसार की साधना पद्धतियों और संसार के 'मावमूलक रहस्यों- 
स्मुखी काव्य में इस कोटि का मावोत्कर्ष नहीं मिल सकता । इन पर वुंछ 
विस्तार के साथ आगे विचार किया है । 

9. भक्ति-निरूपण-- 


(१) भक्षित तत्त्व 
सभी धर्म-कर्मो से भक्ति की भावना को उच्चतर घोषित करना, सभी 


भक्त कवि और आचार्यो ने अपना कतेंव्य समझा । भक्त की प्रशस्ति के साथ- 
साथ भक्तिमावना का झास्त्र भी प्रस्तुत किया । हिन्दी क्षेत्र में तुलसी ने 
भक्ति तत्त्व पर विशेष लिखा | अन्य भक्त कवियों ने जेसे सूर ने मक्ति को 
ज्ञानयोग से श्रेष्ठ कहा । बंगाली आचार्यो ने भक्ति के शास्त्र के निर्माण में बहुत 
योगदान दिया ।" इन आचायों ने भक्ति को एक स्वतन्त्र रस घोषित किया, 
और उसको एक सुनिश्चित शास्त्र भी प्रदान किया | हिन्दी क्षेत्र में 'मक्ति- 
रस' का ज्ञास्त्रीय तत्त्वाख्यान कम हुआ है, फिर भी सूर की 'साहित्य लहरी' 
तथा नन्‍्ददास की “रसमंजरी', सिद्धान्त पचाध्यायी' जैसी कृतियाँ उल्लेखनीय 
है ) चाहे मक्ति का लंक्षण साहित्य हिन्दी में न्यून हो, पर मक्तिपरक लक्ष्य 
साहित्य प्रचूर मात्रा में रचा गया | सिद्धान्तोक्तियों का समावेश भी कहीं-कहीं 
इस लक्ष्य साहित्य में मिल जाता है। उदाहरण के लिए 'सूर' ने गोपोभाव 
की भक्ति को परम फलदायक् माना * कृष्ण भक्त कवियों ने अनेक भावों से 





१. इस संवन्ध में कृुष्णदास कविराज' की चंतन्प चरितामृत” कृति विशेष 
उल्लेखनीय हे । 


२. इस क्षत्र में रूप गोस्वामी की “भक्ति रसात्मक सिघ्! तया उज्ज्वल 
नोलमणि' कृतियों का योगदान सर्वमान्य है। 


२. जो कोउ भरता-भाव हृदय धारि हरि-पद घ्यावे । 
सारि-पुरुष कोई होइ, श्र्‌ तिरिया गति को पावे ॥ 
( सू. सा. वेंकरेश्वर प्रेस, प्र० ३६४ ) 


साव-भूमि श्प६ 


मक्तति सा ह्त्यि को विभूषित किया हे | सर देसे दास्य-विनय की दृष्टि से 
बपने विक्नासकाल में प्रभावित नहीं थे, फिर रही 'श्याम के गुलाम दंग सावना 
उनके झारम्मिक विकास में मिल जाती है।' सूर किसी नाव की भक्ति को 
स्पूहणीय कहते हैं-- ऊन तें प्रभु वरतत, जाकी जेसी श्रीति हिये । इस दृष्टि 


ट््रणएा “कृष्पकक ्> 


कोण के झनसार सभी प्रकार के भाव ते युक्त मे क्ति वरेण्य हूं। चाह मधुर 





भक्ति वह भावात्मक ज्ञाधार है, जिस पर भक्त और भगवान का 
संदन्ध स्थिर होता है । इसीलिए 'सूर॑ भक्ति क्री याचना करता है।* नाता 
एक नहा : माह तोहि नाते अनेक ४ इसीलिए मक्ति की महिमा याई गईं हे । 
हरिस्मरण और मक्तिचर्या भगवत्पाप्ति का एक अमोघ उपाय है ।* भगवान 
की माया समस्त संसार को संत्रस्त करती है. पर भक्ष्त उनक्ने प्रमाव में नहीं 


] ४ 





आता ४ मन का अहमजाल भी कट जाता है :* इस प्रकार सर ने भक्तित उसके 
प्रभाव बौर फल को लेकर कुछ प्रशस्ति परक उक्तयाँ की रहे । मत्ति प्रेममय 
है। भक्ति को निष्काम होना चाहिये । पर सकाममक्ति भी क्रमशः उन्‍्दत होकर 
निष्काम वन सकती है ।* भक्ति का चरम रूप जअहैत॒की ही है ।४ देसे भक्त 
को ज्ञान या कर्म की पद्धति के बनुसरण की आवश्यकता नहीं, फिर भी 
लारम्मिक स्थितियों से अष्ठांग योगागि क्रियाएं साधक्त ही होती हैं ।* जागे 
ये साधन स्वयंमेव छूट जात ह्‌ । ज्ञान, कस 3 ))र उपासना के अनसार भक्ति 
तीन प्रकार की हों सकती है। पहली में सबको ब्रह्म समझ कर, सभी का 





१. सब कोउ कहत गुलाम स्थाम को, सुनत सिरात हियो ॥' 


( सू० सा० १॥१७१ ) 
अपनी प्रच्चु भक्ति देहु, जासों तुम नाता । ( सृ० स्ा० १॥१२३ ) 
- 'सूर हरि को सुजस गावत, जाहि मिदि भवमार। ( सू० सा० शाड़े ) 
जाइ समाइ “सूर' वा निधि में. बहुरि ज़यत नहि नाँचे। (वही, १८१) 

४. हरिसाया सब जग संतापे । ु 

ताकों साया सोह न व्याप ॥ (वही, ३॥१३) 
+४- जब भगत भगवंत चीन्हे भरम मन तें जाइ । (सृ० सा० १॥७०) 
६- भकक्‍त सकामो हु जो होइ। 

क्रम क्रम करिके उधर सोइ ३ (वहीं, ३४१३) 
७. निष्कामी देकुठ सिधावे | (वहो) 
८. भक्त पंथ कौ जी अनुसरे । सौं अष्टांग जोग कों (वही, २।२१) 


ल्ट। है, | । 


१६० स्रसाहित्य : नव मुल्यांकन 


कल्याण लक्ष्य होता है) दूसरी में वर्णाश्रम धर्म का निर्वाह होता है, तथा 
तीसरी में हरि स्मरण और प्रीति के अतिरिक्त कुछ नहीं होता ।* गीता में भी 
ज्ञानी भक्त को प्रिय कहा गया है। तुलसी ने भी 'सियाराममय सब जग 
जानी' की उक्ति की है। एक स्थान पर उन्होंने 'श्र्‌ ति संगत हरि मगति पथ 
संजुत बिरति बिबेक' भी कहा है। सूर भी विरक्ति की बात कहते हैं--'सुत 
कलत्र सों हित परिहरे । वास्तव में ज्ञान का काय॑ इतना है कि मन में 
भगवान का सत्य स्वरूप स्थापित करदे । "जो लों सत्य स्वरूप न सुझत” वाली 
स्थिति नहीं रहनी चाहिए । विरक्ति भी भावजन्य हो सकती है। मभावजन्य 
विरक्ति गोपियों में मिलती है। यह विरक्ति 'सर्वंसमर्पण' से भिन्‍न नहीं है । 
सच्चा भक्त मुक्ति की कामना नहीं करता । वह तो “भक्ति” की ही याचना 
करता है।* भक्ति की प्राप्ति ही पूर्ण पुरुषार्थ है। इससे बड़ा कोई अन्य 
जीवन मूल्य नहीं । 


जसे भक्ति के अन्य पक्षों के शास्त्रीय तत्त्व निरूपण में 'सूर' की वृत्ति 
नहीं रमी, उसी प्रकार भक्ति के प्रकार-भेद पर भी उन्होंने विशेष विचार 
नही किया । आनुषंग्रिक रूप से कुछ सिद्धान्तोक्तियाँ अवश्य मिल जाती हैं । 
उन्होंने सत्तोगरणी, रजोगुणी, तमोगुणी और शुद्धा नामक चार भवित-प्रकार माने 
हैं ।* मूलतः: भक्ति एक ही तत्त्व है, वह उसके चार रूपांतर हैं--“भक्ति एक 
पुनि बहुबिध होई ।” इन चारों का लक्षण भी दिया गया है |४ छुद्धा भक्ति 
में मुक्ति की भी उपेक्षा रहती है, भगवान की सेवा में भक्त रत रहता है-- 
'मन-क़म-वचमय सेवा करे ।/ बंगालीं वेष्णवों ने रति-भेद के आधार पर 
वात्सल्य, सख्य, मचुर दास्य और शान्त पाँच प्रकार की मवितर्याँ स्वीकार की 
हैं।” सूर-साहित्य में सभी प्रकार की भक्तियों की माव-स्फीति तो मिलती है, 
पर प्रकार-कथन सूर ने इस रूप में नहीं किया । सूरदास ने इन आचार्यो की 


१. सूरसागर, २।१३ । 
२. अब मो प॑ प्र्तु कृपा करीज । 
भक्ति अनन्य आपुनी दीज ॥ ( सू० सा० ३॥१३ ) 
३. सू० सा० ३॥१३। 
४. वही । 
५. चतन्य चरितामृत, परि० १६ ॥। 


भाव-भुमि १६१ 


भाँति यह अवश्य माना हैं कि पमी प्रकारों में 'प्रमामकिति' श्रेष्ठ है ।' “वेधी' 
और 'रागानुगा' भक्ति-रूपों का भी सूर ने स्पष्ट उल्लेख नहीं किया | पर ऊपर 
की उक्तियों में इन भेदों की व्यंजना अवश्य आ गई है। 'स्वकीया' और 'पर- 
कोया' दोनों भावों की स्वीकृति में भी इस भेद की स्वीकृति है। शास्त्रोक्‍्त 
विधि के उल्लंघन की वात अनेक वार कही गई है। साधन-भेद से नवधा-भक्ति 
की परम्परा चली आ रही है। 'सूर तथा 'परमानंद' दास ने दशधा भक्ति 
की चर्चा की है : ६-+-प्रे म--१० ।* इस दशधा विभाजन का उल्लेख बंगाली 
साहित्य में मी मिलता है ।* यह वस्तुत: वंधी भक्ति का ही विस्तार हैं । 
रागानुगा भक्ति गोपी-माव से युक्त होती है | इसमें अपने सुख की आकांक्षा 
नहीं रहती : प्रियसुख की ही अनवरत कामना वनी रहती है । इसीलिए व्यभि- 
चार का प्रश्न नहीं उठता ।7 'तत्सुखी' भाव की प्रतिष्ठा राधावललम संप्रदाय 
में सर्वाधिक है । 

भगवान के माहात्म्य ज्ञान के आधार पर महात्म्य परक और 
माहात्म्य-निरपेक्ष दो प्रकार की भक्तियाँ हो जाती हैं | द्वारिका और मथुरा के 
कृष्ण में माहात्म्य का निवास है | उग्रसेन, अक्रर, रुक्मिणी आदि की भक्ति 
इसी कोटि में आती है| ऐश्वय ज्ञान से मुक्त भक्ति केवला भक्ति है। इसमें 
प्र मभाव की पूर्ण विस्तृति रहती है । मय, मावना से यह बाधित नहीं होती । 
दास्य और झ्ानन्‍्त भाव को तो ऐड्वर्य ज्ञान और भावना उदीप्त कर सकती 


है, पर अन्य भांव इससे बाधित होते हैं। इसीलिए वात्सल्य, सख्य और माधुर्य 
भक्ति को लेकर चलने वाले भक्तों के जोड़े हो जाते हैं : 


वात्सलथ -- देवकी-वसुदेव. यशोदा-नंद 
सख्य +- भअभजुन ब्रज के सखा 
प्रंम॑ -- रुक्मिणी राधा 


केवलाभकित ब्रज की भक्ति है: अन्यत्र इसका मिलना कठिन है । 





१. प्रंम्रर्भाक्‍त विनु मुक्ति न होई। 
नाथ कृपा करि दीजे सोई ॥ ( सू० सा० ) 
श्रवण, कोन, स्मरण, पादरत,अरचन, बंदन, दास । 
सख्य और आत्मनिवेदन प्रेम लक्षणा जास ॥ (सूर सारावलीं) 
२. चंतन्य चरितामृत, मध्यलोला, परि० २४। 
४. कृषुन तुष्टि करि कर्म कर जो आन प्रकारा । 
फल विभिचार न होइ, होइ सुख परम अपारा ॥ 


( नन्ददास. सिद्धान्त पंचाध्यायों ) 


हर 


१६२ सूरसाहित्य : नव .मूल्यांकन 


सूर साहित्य में भक्तित के सभी प्रकार मिल जाते हैं ! पर, उनकी दृत्ति 
का विक्रास भी वात्सल्य, सख्य, गीपीमाव में होता हुआ राधा-भाव तक पहुँचता 
है | सूर-साहित्य में दास्य और श्ञान्त तो आनुषंगिक हैं। इनका निरूपण 
भागवत प्रसंग के निर्वाह के फल स्वरूप ही हुआ है । कड्लिल ने भक्तित्त्व का 
उपदेश दिया है। सूर ने उसका विवरण दिया है। अन्यथा, सूर में तो 
वात्सल्य, सख्य और माघुये की भावत्रयी ही पुज्य है। मक्ति का सामान्य 
निरूपण का तो नारद कपिल, विदुर आदि के -संवादों के रूय में हुआ है। 
सांप्रदायिक भक्ति का निरूपण सूर सारावली' में किया गया हैं। समस्त 
साहित्य माधुये, सख्य और वात्सल्य का साख्य ही प्रस्तुत करता है। बंगाली 
वैष्णवों ने “मक्त-रस का शास्त्र प्रस्तुत किया। सूर| का मन इस वौदििंक 
प्रयत्न में विशेष रमा नहीं। यों “रस' के शास्त्रीय पक्ष से संवन्धित भी कुछ 
उक्तियाँ मिल जाती हैं । 
१.२ भक्ति-रस-- 

भक्ति आन्दोलन ने काव्यशास्त् को मी एक नवीन दिया दी। एक 
स्वतंत्र मक्तिरस काव्यज्ञास्त्र को मिला | यदि इस रस की थोड़ी बहुत चर्चा 
पहले से मी मानी जाये, तव मी भक्तिकरालीन कवियों और आाचार्यो ने उसके 
लक्ष्य और लक्षण साहित्य को बहुत अधिक उन्नत किया । 'सूर' ने इस शास्त्रीय 
पक्ष पर बहुत कम कहा । बंगाल ने इस क्षेत्र में अद्वितीय देव दी । रस के समी 
अज्भों का गंमीर विवेचन बंगाली आचार्यों ने किया । हिन्दी मकत कवियों का 
योगदान लक्ष्य-साहित्य प्रस्तुत करने में हैं, जो लक्षण-शास्त्र का उपजीव्य और 
पोषक होता है । बंगाली वंप्णवों को मी “माचुयय का विस्तार ही अधिक जिय 
रहा हैं | शेष भावों का समानन्‍्य परिचय दिया गया है । 

मक्तिरस की शास्त्रीय रूपरेखा की संक्षिप्ति इत प्रकार है: क्ृप्ण- 
भक्ति के स्थायीमाव ये हैं : स्तेह, मान, प्रगय, राग, अनु दाग, भाव और महा- 
भाव | उपयुक्त सामग्री मिलने पर इनका परियाक्त भक्तिरस में होता है। 
उद्दवीपन विभाव में वंजी, नादादि और बालंबवन में कृप्णदि हैं | इसी प्रकार 
अनुमाव भो सात्विक है। मितिरस के पांव प्रकार हैं: ज्ांत, दास्य, 
सख्य, वात्सल्य और मथुर (श्वगर)। सख्य और वात्सल्य के अनेक भेद हैं। 
मधुर के दो भेद हैं : रूड़ (महिपीगग का माव) तया “अधिल्ड़' (गोपियों का 


१- आधार, “१६ वीं शती के हिन्दी और बंगाली वैध्गव काँव,' डॉ० रत्न- 
कुमारी, अव्याय ६ । 


. भाव-सूर्मि १६३ 


भाव) | अधिरूढ़ भी संयोग (मादन”) तथा वियोग (मोहन) दो रूपों में 
विभकत है । मोहन के भी दो रूप हैं : चित्रजल्प ओऔर,.उद्घूर्णा | चित्रजल्प के 
प्रजल्पादि दस अज्भ हैं। उद्घूर्णा के दो अज्भ विरह-चेष्टा भौर दिव्योन्माद 
हैं। विरह में अपने को कृष्ण समझ लेते हैं । 'सूर की राधा और गोपियाँ 
कृष्ण के रूप में अपने को भावित करती हैं। संमोग के भी अनन्त भंग हैं। 


इस प्रकार 'प्रम' स्थायी भाव मक्तिरस में परिणत होता है । भालंवन, कृष्ण 
और राधिका हैं । 


कृष्ण धीर ललित नायक हैं । राधा की काम-क्रीड़ा ही इनकी चर्या है। 
गोपवेश, वेणुधारण और नवकिशोर इनका मधुर रूप है। 'सूर' ने इन सभी 
रूपों का अत्यधिक भाव विस्तार किया है। कृष्ण भक्त के मन में उमड़ने वाले 
सभी रसों के आश्रय हैं। सभी को आकर्षित करने वाली माधुरी इनमें है । 
कृष्ण में ६४ गुण हैं। इनकी कांता के तीन प्रकार हैं : लक्ष्मीगण ( नारायण 
रूप की सहचरी ), महिपी, तथा ब्ल॒जांगनागण । लक्ष्मीगण को भी ब्रज- 
लीला का सुक्ष नहीं मिलता, यद्यपि उन्हे इसकी कामना रहती है ।' महिपी- 
गण द्वारिकावासी रूप की सहचरी हैं । ये विम्ब-प्रतिविम्बरूपा हैं 
ब्रजांगतागण से राधा और गोपियाँ सम्मिलित हैं। कांताए बहुत हैं मधुर 
रस स्वक्रीया और परकीया रूप में है। परकीय भाव श्रेष्ठ है। ब्रज के 
अतिरिक्त परकीया कहीं नहीं है। राधा इस भाव की अवधि है। राधा कृष्ण 
को वांछा पूरी करती है ! ललितादिक उनका कायब्यूह हैं। इसी माधुयं भाव 
को 'सूर' ने महत्व दिया है। चाहे 'सूर' ने राधा का क्ृष्ण के साथ गंधर्व 
विवाह कराके उसे स्वक्रीयरा वना दिया हो, प्रकीया भावा का अमाव सूर- 
साहित्य में नहीं है । वंशीवादन को सुनकर गोपियाँ रतियों को छोड़कर भी 
कृष्ण को ओर चल पड़ती है ।* इस प्रकार सूर की अधिकांश माधुये भावापत्त 
उक्तियाँ भक्ति-रस के शास्त्रीय निरूपण से पूर्णतः संगति रखती हैं । 

जब माधुये रस का निरूपण शास्त्रीय पद्धति से हुआ, तो नायिका भेद 





का भी समावेश होना स्वाभाविक था। नायिका-मभेद का प्रकरण 'सूर' में भी 
१, कहुत रम्ा सों सुनि री प्यारी, विहरत हैं बन स्पथाम । 
'सूर' कहाँ हमको वेसो सुख, जो बिलसत ब्रजधाम ।। 
" ( सूर पंचरत्न, पृ० १३ ) 
२. गई सोरह सहस हरि प॑ छांडि सुत-पति-नेह । 
एक राखी रोक पति, सो गई तजि निज देह ॥ (वही, पृ० ११ ) 


१६४ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


मिलता है । इसी के निरूपण में सूर ने कूट शैली का प्रयोग किया है । घीरा, 
अधीरा, धीराधीरा, भुग्धा, मध्या, प्रौढ़ा- आदि भेद-प्रभेदों का समावेश शास्त्र 
को पूर्ण कर देता है। चाहे सूर ने लक्षण-निरूपण न किया हो, सभी के रूप 
तो अवश्य ही प्रस्तुत किये हैं । माधुये के आलंबन के र्‌प में इनका विवेचन 
हुआ । 'सूर ने लक्षण-निरुपण की उपेक्षा की है। सूर' में परकीया नायिका 
की अपेक्षा स्वकीया के रूप ही अधिक मिलते हैं। गविता, मानवती, आदि 
दशानुसार नायिका-भेद के प्रगल्म चित्र 'सूर ने अंकित किए है। प्रोषित- 
पतिका, अभिसारिका, खंडिता आदि अवस्थानुसार नाविका-भेद भी कम नहीं 
हैं। 'प्रौढ़ा' का एक चित्र यह है--- 

नवल किसोर नवल नागरिया । 

अपनी भुजा स्थाम भुज ऊपर, रयास भूजा अपने उर धरिया ॥ 
अधीरा' की चमक इन पैक्तियों में है--- 

मोहि छुवोी जिनि दूरि रहो जू । 

जाकों हृदय लगाइ लई है, ताकी बांह गहो जू ॥ 
राधा वासक सज्जा' के र्‌॒प में सेज सम्हाल रही है-- 

राधा रचि-पचि सेज संमारति । 

भवन गमन करिहें, हरि मेरे, हरषि दुखह निरबारति |! 
चंद्रावलि उत्कंठिता है--+ 

चन्द्रावली स्थाम-सग जोबति । 

कबहु सेज कर झारि संवारति, कबहु मलय-रज मोर्वात । 

इस प्रकार काव्यशास्त्रीय नायिका भेद के प्रायः सभी र्‌प सूर में मिल 

जाते हैं। बंगाली साहित्य में लक्षण चाहे अधिक विस्तार से दिये गये हों, पर 
'सूर' जैसा नायिका भेद संबन्धी लक्ष्य साहित्य वहाँ भी दुलंभ है। भक्तिरस 
की स्थापना में लक्षण साहित्य का जितना महत्त्व है, उतना ही महत्त्व लक्ष्य 
साहित्य का है । 


२ माघुय भाव-- 


अन्य रसोपासक भक्ति संप्रदायों की भांति बल्लभ-संप्रदाय में भी 
माधुर्य भाव की प्रतिष्ठा हुई। वल्लमाचार्या जी ने मधराष्टक, परिवृद्ष्टक और 
सुवोधिनी में इस माव का निरपण और प्रतिपादन किया है । राघा के साथ 


१६० 





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१६६ सूर साहित्य : नव मल्यांकन 


विशेष रूप से था | इससे पुर्व 'बाल-भावना को ही क्रियात्मक सेवा का रूप 
प्राप्त था : माधुयें मानसी सेवा के रूप में ही मान्य भाव था। एक प्रकार से 
आचार्य जी ने सिद्धान्त रूप में या साधना के अंग के रूप में जिस माधुयेभाव 
का कथन किया था, उसी को गो० बिट्नुलनाथ जी ने क्रियात्मक रूप से 
संप्रदाय में प्रचलित किया । यह संप्रदाय में निकुज-मावना का क्रियात्मक 
प्रवेश कहा जा सकता हैं। गोस्वामी जी ने इस भावना के क्रियात्मक रूप को 
सेद्धान्तिक रूप देने के लिए “श्वृद्धार रसामंडन' ज॑से ग्रंथ का प्रणयन किया । 
उनका 'निकुजविलास' अन्य सिद्धान्त को भाव-रस में सस्‍्नात कर रहा है। 
सारावली' का संद्धान्तिक पक्षे भी इससे अछता नहीं है। कु ज-बिहार से 
स्तिर्ध 'सारावली' की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं--- 


इ दा, बृ दा ओर राधिका चंद्रावलि सुकुमारि । 

निसल-बिमल दि खात सवन को करत बहुत मनुहारि ।। 
गहि बहियाँ ले चले स्याम घन सघन कुज के द्वार । 
पहले सखी . सबे रचि राखी, कुस्ृमन सेज संवार ॥ 
नाना केलि सखिन सेंग बिहरत नागर नंद कुमार । 
गोवर्धत की सघन कंदरा, कोीनों रेत निवास ॥। 
भोर भये निज धाम चले अति आनंद बिलास॥' 


रसिकेन्द्र की सुरतांत झाँकी इस प्रकार चित्रित की गई है-- 
जागे प्रात निपट अलासाने भूषन सब उलटाने । 
करत सिग्तर परस्पर दोड अति आलस सिथिलाने ॥* 


'निकुज भावना' की उच्चता प्रकट करते हुए सूर ने कहा है कि इसका रहस्य 
वेद को भी अज्ञात है ।* इस प्रकार 'सारावली' में सूर ने माधुयें भाव का 
सैद्धान्तिक और भावात्मक विकास किया है। इस विस्तार में कामशास्त्रीय 
और काव्य शास्त्रीय पद्धतियों को भी अपनाया गया है। साधना के इस रूप 
का सिद्धान्त-बोध सूर को विद्ुलनाथ जी की छुपा से ही हुआ था । 

इस प्रकार वल्‍लमभ संप्रदाय दक्षिण के एक महान्र भाचार्य के द्वारा 
प्रवतित होने पर भी माधुयन्मुख हुआ । थोड़ा बहुत माधुयभाव तो श्रीसंप्रदाय, 





१, सारावलीं, €०१। 
२. सूरसारावली, १०१६। 
३. यह निकुज को वर्णन करिके वेद रहे पचिहार । 
नेति नेति कहेउ, सहस वेद बिधि तऊ न पायौ पार ॥ (वही १६०६) 


भाव-भूमि . १६७ 


साथ्व संप्रदाय एवं निम्बाक संप्रदाय में भी मिलती है, पर पुष्टिमार्ग में 
इसका महत्त्व एन संप्रदायों सर्वाधिक घोषित किया गया। चैतन्य संप्रदाय, 
राधावललम संप्रदाय, हरिदासी संप्रदाय जसे संप्रदायों में तो माघुय्य के भतिरिवत 
अन्य सभी भाव गौण हैं । इत दृष्टि से दक्षिण के आचार्यों द्वारा प्रवतित और 
चतन्यादि संप्रदायों के बीच पुष्टिमार्गे एक कड़ी है। पुष्टिमार्ग में वात्सल्य की 
घारा भी प्रबल रूप से प्रवाहित रही । श्ली रामानुजाचाय जी ने दास्पय भाव 
को महत्त्व दिया था ! अन्य पुराने भक्ितिमार्गों में भी दास्य का प्राधान्य था । 
अन्ततः विमृतिवाद के स्थान पर प्रपत्तिवाद को प्रतिष्ठा हुई। प्रेमपुूलक भवित 
पद्धति को भागवत और भक्त सूत्रों ने अनुप्राणित्त-बक्रिया/था । भागवत भक्ति 
के समान ही अलवारों में भी प्रपत्तिपरकु:”मं जिन गीश छिज्लानी मिलता. है ।" 
रामानुजाचायय जी ने आलवारों के /#साहित्य को-भी->अपनाया-था | फिह्न सी 
दास्य का उनके संप्रदाय में प्राधान्य बा हैहा। आचाये जुक्षिक्षि.मी आलेवारों 
की माधुयें भावना का उल्लेख करते 
परशुराम चतुवेदी ने शाकत-तंत्नों और रों की सृपुस्नीक कब्यन नसे इस 
भाधय भाव की खोज की है ।* अवतार की फपना से दाम्पत्य 
भावना का प्रवेश अवततारों रर आधारित भक्तित संप्रदायों "में ' प्रविष्ट हो ग 

मध्यकालीन धर्म साधना पर बहुविध ताँनभिक प्रभाव को डा० हजारीप्रसाद 
द्विवेदी ने भी स्वीकार किया है । सधुरोपासना भी इससे प्रभावित हो, यह 
आएचये की बात नहीं है । कापालिकों में स्त्री प्रधान साधना प्रचलित थी।* 
आरंभिक मध्यक्राल में वहाँ अनेक शव और शावत तत्त्वों का वेष्बवीकरण 
हुआ, वहाँ नारी-परक साधना का भी वैष्णव संस्कार संपन्‍न हुआ । देवताओं 
की पत्नियों की कल्पना का तत्त्व भी प्राचीन है । वेदों में इस कल्पना का बीज 
मिल जाता है ।६ दिव्य शक्तियों के रूप में कल्पित प्राइंतिक शक्तियों के जहाँ 
अनेक रूपक वेदिक साहित्य में मिल जाते हैं, वहां उनकी पत्नियों की कल्पना 
करके भी रूपकों की सृष्टि हुई | इस पत्नी-कल्पना पर आश्रित विधान यह है: 






अण-पसभण+प कया. 


१. ज. $. श, फा00००७, एज एा 6ैश्वा$, ?ितव80 8, 


“१7 


« हिन्दी साहित्य का इतिहास, संशोधित संस्करण, पृ० १७८। 
मध्यकालीन घर्म साधता, पु० १७४ । 

'सध्यकालीस धर्म साधता' । 

कपू र संजरी, ११२२-२४। 

'. ऋग्वेद, ३६६। 


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१६८ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


अग्नि की पृथ्वी, वात की वाक पूषन की पथ्या, वसु की गायत्री, रुद्र की 
त्रिप्ठुमू आादित्य की जगती, मित्र की अनुय्टुम, वरुण की विराज, विष्णु की 
पंक्ति और सोम की दीक्षा पत्नियाँ हैं ।* तांजिकर शक्ति-कल्यना भी इस प्रकार 
की युग्म-कल्पना से प्रमावित हुई होगी । अवत्तारवाद में भी इस तत्त्व का 
प्रवेश हुआ । 

वोद्धमत के सहजयान में साधना-परक कामकेलि के प्रचुर रूपक 
प्रचलित रहे" और इनका आकर्षण इतना अधिक था कि साधना के अन्य 
संप्रदाय बहुत अधिक प्रमावित हुए। चंत्तन्य संप्रदाय पर ऐसा प्रमाव बहुत 
सघन प्रतीत होता है । एक प्रकार से माहात्मतज्ञान युक्त विभूनिमुनक्त भक्ति 
इस दीघे परम्परा से पुष्ट माघुय भावना की तीत्र गति के कारण क्ष्‌ व्य होगई ! 
उसी क्षेत्र में चंतन्य महाप्रमु ने इस माघुयें भाव की सर्वश्रेष्ठ घोषित की । 
डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी ने चंतन्य महाप्रभु के जीवन की एक घटना को 
उद्ध त किया है ।* महाप्रमु की दक्षिग में भक्त राय रामानन्द से मेंट हुई । 
उनके पूछने पर राय रामनंद जी ने मकित में मान्य स्व्रधर्माचरण, समस्त 
कर्मो को कृष्णापंण करने, सर्वधर्म परित्याग पूर्वक भगवान की शरणागत्ति 
परम प्रेम, दास्य, सल्य भौर कान्ताभाव को क्रमश: भक्ति के भावों के रूप में 
कथन किया । पर श्री चतन्य को सन्‍्तोपष नहीं हुआ । उन्होंने सर्वोच्च मावना 
के संबन्ध में प्रश्न किया । तव रामानन्द ने कहा कि राधा-भाव ही सर्वोत्तम 
है और श्री चेतन्य संतुष्ट हो गये । पर उन्होंने इसका परिणाम माँगा। इस 
_महाभाव से पूर्वक्रथित भावों क्री विवृत्ति तो गीता या भागवत में मिल जाती 
है, पर वह राघामाव नहीं मिलता । राय रामानंद जी ने गीत गोविन्द की ओर 
संकेत करके राधामाव की श्र पता बतलाई ।४ कान्तामाव से भी यह भाव श्रे४ 
कहा गया है। इसका निष्कर्प देते हुए आचाय॑ टिवेदी ने लिखा है :--“मेरा 
अनुमान है कि मामवत्त महापुराण में श्रीकृष्ण लीला की जो परम्परा अमिव्यक्त 
हुई है, उससे मिन्‍न एक और भी परम्परा थी, जिसका प्रक्राण जयदेव के गीत 


१. वंतान सूत्र, १५-३। 

२. बौद्ध सहजयान वस्तुतः वज्चयान का ही एक विकसित खूप था। बजच्च- 
यान के 'गुह्म समाज तंत्र नामक पग्रथ में नियम-मर्यादाओं का उल्लंघन 
कर, कामनाओों के उपभोग का हों विधाव किया गया है । 

३. मध्यकालीन धर्म साधना, प० १४८, १४२ | 

४. गीत गोविंद, ३॥१। 


भाव-भुमि १६६ 


गोविन्द में हुआ है। मागवत-परम्परा की रासलीला शरत्‌ पूर्णिमा को हुई 
थी, गीत गोविन्द परम्परा का रास वसन्तकाल में। प्रथम में राधा का नाम 
भी नहीं है, दूसरी में राधिका ही प्रमुख गोपी है।“” 'सूर में दोनों ही 
परम्पराओं का समन्वय है | राघा की मान्यता सूर में सर्वाधिक हैं । गोपीभाव 
को जितनी विस्तृति सूर ने दी है, उससे भी अधिक तन्मय अभिव्यक्ति राधा- 
भाव की मिलती हैं। भक्तों के लिए कान्‍तामाव की आसक्ति अनुकरणीय है 
पर क्ृष्ण और राधा का माधुर्य माव अपने आप में एक महान रसार्णव है । 
भक्तों के मन को सबसे अधिक यही लीला-माव आप्लाबित करता है। राघा- 
भाव की आत्चु वी कल्पना और उसकी उत्कृष्ट अभिव्यक्ति का श्रेय निश्चित 
रूप से चैतन्य संप्रदाय के आचार्यो और भवत कवियों को दिया जाना चाहिए । 
अन्य भक्ति-संप्रदाय भी इस माव की अन्विति में कुछ सीमा तक अवश्य 
चले । पर, माधुयें माव को शास्त्रीय या सेद्धान्तिक रूप प्रदान करने का श्रेय 
बंगाली वष्णवों को ही दिया जाना चाहिये : 


न 


भक्ति रस माघुयें रस केजो शास्त्र ग्रथ बंगाली वेप्णवों ने रचे, 
उनसे संप्रदाय का माधुर्य भात्र हृढ़ से हड़तर होता गया भक्ति रसाम्ृत 
सिन्‍्च्‌ के अनुसार भक्ति का विभाजन इस प्रकार है: 


भक्ति 


गौणी [साधन दद्षा परा [| सिद्ध दशा] 
वैघी [झास्त्रानुमोदित ] रागानुगा 
कामानुगा संवन्धानुगा 
यह विभाजन किस्ती न किसी प्रकार प्राचीन विभाजनों के समकक्ष ही 
है| 'रागानुगा' मक्ति ही मघुर भाव का पोषण करती हैं। इसका संचालन 
'राग' से होता है। उक्त ग्रथ में 'राग! की वध्याख्या इस प्रकार की गई है : 
सामान्य विययी व्यक्तियों का ऐन्द्रिय विपयों के प्रति जो आकर्षण होता है, 














२. मध्यकालीन धर्म साधना, पु० १४३ 


२०० स्रसाहित्य : नव मूल्यांकन 


/ 


उसी प्रकार का आकर्षण भगवद्विषयक हो जाय तो उसे “राग कहा जायेगा । 
इसीलिए भकतों ने लौकिक आकपंण का प्रतीक स्वीकार किया है। तुलसी 
ने भी इस प्रतीक को ग्रहण किया ।* जिस भव्तित में राग का प्राधान्य हो 
जाता है, वही रागानुगा है। यही भत्रित का उत्तम रूप स्वीकार किया गया 
है। इसी का विशद वर्णव 'भक्तिरसामृत सिंधु और उज्ज्वल नीलमणि' में है । 
काव्य शास्त्रीय पद्धति से इसका निरूपण इन ग्रथों में हुआ है। “सांप्रदायिक 
भक्‍्ित में माधु्य भाव का समावेश गौड़ीय ग्रथों के द्वारा सर्वाधिक हुआ और 
शास्त्रीय दृष्टि से इस संप्रदाय के संस्कृत ग्रथों का प्रश्माव वल्‍लभ, राधा- 
वललभ तथा हरिदासी संप्रदायों पर भी पड़ा ।*” 

माधूयं भाव को प्रतीकवाद के रूप में स्वीकार करते की परम्परा भी 
दीघ है। इस प्रेम प्रतीक में लौकिक प्रेम उपमान और अलौकिक प्रेम उपमेय के 
रूप में रहता है । इसके अतिरिक्त भी इसमें कुछ और अर्थ रहता है । लौकिक 
प्रेम के उन्‍्तयन और अलौकिक सं म को तीज वनाने में लौकिक प्रेम की विधिय 
के योगदान की ध्वनि भी इस प्रतीकवाद से मिलती है । इन्हीं संधारणाओं के 
आधार पर जीवात्मा और परमात्मा के संबन्ध का निरूपण किया जाता है। 
उपमान को अधिक यथार्थे और प्रभात्रयुव॑त बनाने के लिये इसकी सूक्ष्म से सूक्ष्म 
छायाओं को मी चित्रित किया जाता है। लोकिक प्रेम संबन्ध का निरूपण 
विस्तार के साथ होते हुए भी अलौकिक प्रस्तुत भाच्छनन नहीं हो जाता । 
एक प्रकार से लौकिक प्रेम-व्यापार का देवीकरण ही हो जाता है । इस प्रतीक- 
वाद का प्रयोग उपनिषद जैसे चिन्तन और ज्ञान प्रधान साहित्य में भी मिलता 
है ।* निगु ण-निराकार पद्धति या इसको पृष्टभूमि में इस प्रतीकवाद का अधिक 
त्रिकास हुआ । मध्यकालीन वौद्ध तत्र या शंव-शाकत तत्र इसके प्रमाण है। 
अकथनीय 'महासुख' के निरूपण में लौकिक यौन सबन्ध के प्रतीक का प्रयोग 
किया गया है। प्रज्ञा-उपाय, संज्ञा-क्लणा, शिवशक्ित के संग्रोग से तथा युगनद्ध 


१. कामिहि नारि पियारि जिमि लोभिहि प्रिय ज्यों दाम | 
त्यों रघुनाथ निरंतर, प्रिय लागहु मोहि राम ॥ 
द ( मानस : उत्तरकांड ) 
' २. डॉ० विजयेशद्र स्तातक, हिन्दी अनुशीलन' धीरेर््र धर्मा विशेषांक, 
५ पृु० ४६€६-४००॥ 
: ३. तथा प्रियया स्त्रिता सम्परिण्वक्तो न वह्मम्र किचन बेद नान्तरम्‌ । 
एवमेवायम्‌ पुरुष: प्राज्ञ नोत्कना सम्परिप्वक्तो न ब्रह्मम्‌ किचग बेद- 
नान्तरम्‌ ॥। [ बृहदारण्यक, ४॥३।२१ | 


भाव-सूत्रि २०१ 


सहजावस्था तक पहुँच जाने से ही 'महासुख की सिद्धि होती है। इन साध- 
नात्मक यग्मों के मैथुन का प्रतीक मान्य रहा। उसमें बाह्य दृष्टि से पर्याप्त 
अश्लीलता भी लक्षित है। यह ध्वनित किया गया है कि महासुख स्वयं 
मंथुन परक आनन्द की चरम परिणति है। इस मंथुन पर लौकिक अभ्रस्तुत 
का विधान करते हुए भी, इसके लौकिक या सामाजिक रूप से नियन्रित 
विवाहादि संदर्मों का तिरस्कार भी कभी-कभी किया जाता है। इसी भूमिका 
में 'परकीया' भाव की स्वीकृति होती है । वसे स्वकीयापरक प्रतीक-योजना ही 
मुख्य रूप से सिद्ध-संत साहित्य में मिलती है, फिर भी परकीय भाव का 
अभाव नहीं है । कवीर आदि निगु णियाँ संतों में 'तती' का आदर्श स्वीकृत 
हैं। बतः स्वकीया 'दुलहिन' रूप में ही प्रतीक नियोजित है। कबीर के कुछ 
गीतों में प्र म की विद्चलता बहुत अबिक तीक्र है: विवाह-संदर्भीय प्रेम प्रतीक 
में इतनी तीब्नता अन्यत्र दुर्लभ है-- 
नेहरवा हमकाँ न भाव । 
साँई की नगरी परम अति सुन्दर, जहाँ कोई जाइ न आवे ॥ 
चाँद-सुरुज जहाँ पवन न पानी, को संदेस पहुंचावे । 
दरद यह साई को सुनावे ॥ 
आगे चलों पंथ नहिं सूझे पीछे दोष लगाव । 
केहि विधि ससुरे जॉब मोरी सजनी, बिरहा जोर जनावे ॥। 
विदषेरस नाच नवाब ॥। 


बिन सतगुरु अपनो मनाँह कोई जो यह राह बतावे। 
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सपने न प्रीतस पा्वे ॥ 
तपत्त यह जिसको बुझाव ॥| 


इसी प्रकार प्रेम प्रतीकवाद में भावना की तीब्नता संचरित होती रही । 
यही प्रतीकत्व दक्षिण में आंदाल और उत्तर भारत की मीरा की साधना में 
चरितार्थ हुआ है। उनके जीवन की साधना इससे एकाकार हो गई है। 
आंदाल ने श्रीरंगम्‌ में प्रतिष्ठित विष्णु (तिरुपल) के प्रति अपनी तीज भावना 
को प्रकट किया और अपने को उनकी पत्नी के र॒प में भावित किया। उसके 
आवेश के क्षणों में अपना तादात्म्य गोपियों से किया है। मीरा ने भी भावा- 
वेश में कृष्ण को पति र्‌प में स्वीकार किया। इस प्रकार यह प्रतीकवाद 


उपनिषद्‌ से लेकर निगु ण-समुण भकक्‍तों तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक 
व्याप्त रहा : 


२०२ सुर साहित्य : नव मूल्यांकन 


यह माधुब भक्ति भी अपने में समन्वय की शक्ति को लिए हुए थी । 
इसमें वेदिक और अवेदिक तत्त्वों का समन्वय था। शकराचार्या और अप्पय 
दीक्षित ने पांचरात्र संहिताओों को अवदिक कहा था जो माचुर्य साव की मवित 
के प्रमुख च्नीत कहे जा सकते हैं। भाव की तीब्रता इस साहित्य में इतनी 
मिलती है कि रामातठुज जेसे आचाय भी उसकी उपेक्षा न कर सके । हो सकता 
कि इसमें कथित सेवा-चर्या भाव बौद्ध वर्म में प्रचलित चर्या से प्रभावित हो 
या उसी की पद्धति पर वेप्णव पूजा का विधान खड़ा किया गया हो ' क्रिया 
और चर्या के साथ प्रेम और माघु् का संयोग होने से विधान सजीव हो गया : 
यांत्रिक होने से बच गया । त्रखानस संहिताएं माधुय की इतनी कोटियाँ नहीं 
सकी थीं | थे केवल मर्यादादादी मूल्यों को महत्त्व देती रहीं। बन्नपरक 
कमेकाण्ड भी इन संहिताओं को मान्य रहा । मब्ययुग में बढ़ते हुए शव और 
याक्त वर्म ने भी माधुय को तींत्र बताने वाले तत्त्व दिये । अनेक विद्वानों ने 
मावुर्य के केन्द्रस्थ व्यक्तित्व राधा को रस-संरचना में तांत्रिक तत्त्वों की 
अवस्थिति मानी है : तंत्र में कृष्ण को कामवीजात्मक कहा गया है भौर राधा 
को रति वीजात्मिका । यगलोपासना में युगनद्ध का प्रमव स्वीकार किया जाता 
है । दौद्ध तांतिक साधना, सहजयानी साधना तथा वैष्णव सहजिया मार्ग में 
युगल-र॒प मान्य है । तंत्र से परकीया भाव कामुक्र वर्णन में मिलता है । 
अन्तत: मावर्य का भी चरम विकास परकीया भाव में माना गया हैं| इस 
प्रकार वोौद्ध सावना का माथुय के विधान, विकास और उद्दपन में हाथ रहा। 
जिस प्रकार वद्भयात में कर्म काण्ड, नियमन या मर्यादा की कोई स्वान प्राप्त 
नहीं था, उसी प्रकार मावुर्या भाव का साधक भी इनकी अवहेलना 
करता हैं । 


/ण॥४ 


| 


सूफी संप्रदाय में मी माधुय-सावों को स्वीकृत किया गया है । सूफियों 
में राविया की भावात्मक स्थिति वही बतलाई जाती है, जो बांदाल या मीरा 
की थी | वह भी मंगवान का अ्ियतम दूय में आह्वान करती थी और लौकिक 
प्रेम की सी विरह पीड़ा का अनुमत करती थी । जायसी के प्रेम-विधान में 
भी लौकिक प्रेम ही उन्‍नत होकर दिव्य प्रेम वनता है । जैसा कि ऊपर लिखा 
जा चुका है, निमुण संतों की प्रेमाभिव्यक्तियाँ भी माधवर्य से लवालव हैं । 
दाम्पत्य-रपकों की रसपरक अभिन्यक्ति मात्र आलंकारिक आयोजना नहीं मानी 
जा सकती । परक्ीया भाव का इनमें अवश्य ही जअसाव मिलता है। सूफियों 
में भी परकीया प्रेम नहीं मिलता । मसूफियों के द्वारा यृहीत प्रेमन्याथाओं में 


भाव-भूमि २०३ 


'विवाह हुआ है । पूर्व प्रेम की स्थिति अवश्य है, जिसमें परकीया की कुछ 
झलक है । पर इसका चरम वंबाहिक प्रेम में ही है । 

भक्ति शास्त्रों में इस भाव को पांचरात्र ग्रन्थों, भागवत, नारद और 
शांडिल्य के भक्ति-मृत्रों ने शक्ति प्रदान की । बंगाली वेष्णवों ने उसकी योजना 
को पूर्ण बनाया और उसकी योजना विधि ओर क्रमणिका को पूर्ण रूप दिया । 
इस प्रकार माधुयें भाव की भक्ति अपने में अनेक स्रोतों से संगूडीत तत्त्व सहेजे 
हुए है । समस्त भारत के भक्तों की मधुरिमा ने इसे व्यापक्रता प्रदान की | 
इसकी रूपरेखा इतनी पूर्ण और आकर्षक हो गई कि न्यूनावथिक रूप से समी 
संप्रदाय इसकी ओर झुक्रे : इसमें लौकिक और वेदिक मर्यादा या नियमों से 
मुक्ति मिल जाती है। इसमें लौकिक जीवन की भाव-भूमि का तिरस्कार भी 
नहीं है । वासनाओं के उन्तयन का मार्ग मनोवेज्ञानिक दृष्टि से भी उपयुक्त 
हो गया । मनुष्य अपने जीवन के मूल में स्थित काम-भाव का पूर्ण उच्छेंद 
नहीं कर सकता : उसके दमन के प्रयत्न में अनेक्र भाव-संक्रट और ग्र थियाँ 
उत्पन्त हो सकते हैं : अतः उन्तयन का मार्ग ही सर्वश्रष्ठ है । 

इस भाव के रूप-निर्णय में स्वकीया का प्रश्न भी उठाया गया है । 
बंगाली वेष्णवों ने परकीया भाव को माधुय॑-साधना में अनिवार्य माना है । 
संभवत: इसका कारण यह है कि परकीया भाव में विधि-निषेव, वेदिक मर्यादा 
और कर्मंकाण्ड के बन्धनों का तिरस्कार अत्यधिक होता है। निम्बाक संत्रदाय 
और वल्लभ संप्रदाय में स्वक्रीया पद्धति मान्य रही । राधा-वल्लभ संप्रदाय में 
स्वक्रीया-परकीया भेद से विवर्जित राधा की प्रतिष्ठा है। सभी ने लौकिक और 
आध्यात्मिक अनुभूतियों को अविभाज्य रूप से मिलाकर साधवा-पद्धति को 
अपनाया । लौकिक प्रेम और अलौकिक प्रेम को एक आधार पर पृथक किया 
गया है : वासनाजन्य प्रेम में स्वसुछ्त की कामना रहती है! भ्रियतम के सुख 
से सुखी होने की भावना उसमें नहीं हैं।' इसके विपरीत आध्यात्मिक प्र म॑ 
में तत्सुखलमाव रहता है | गोपियों में तत्धुख भाव की प्र म-प्राधना ही मिलती 
है। इस दृष्टि से चैतन्य संजदाय और राधा-बल्जम संप्रदाय में पर्याप्त 
साम्य है । 

इस भाव की भक्ति के लिए ब्जश्नेत्र को उपयुक्त समझा गया। ब्रज 


में इस भाव को लेकर चलने वाले चार संप्रदाय एक ही समय में स्थापित 
और विकसित हुए । पर सबकी माधुये-सावना और इस भाव से आपन्न सेवा 





१. नास्त्येव तस्मिस्तत्सुख सुखित्वमु | (नारद, भक्तिमृत्र, २४) 


२०४ सूरसाहित्य : नव घुल्यांकन 


पद्धति में थोड़ा-थोड़ा भेद भी पाया जाता है। वल्लभ-संप्रदाय का भावात्मक 
विकास वात्सल्य से माधुयं की ओर हुआ । या यह मानना चाहिए क्ि दोनों ही 
भावनाओं का सहअस्तित्व था। वात्सल्य' भाव लोक के लिये सामान्य रूप 
से स्वीकृत था। माधुय अधिकारियों या उन्नत कोटि के भक्तों के लिए मान्य 
था । स्वयं वलल्‍लभाचाये जी ने माधुयें का निरूपण किया है। गोस्वामी विदुल- 
नाथ जी ने श्द्भार मंडन नामक ग्रन्थ सें इस पद्धति को केवल उच्चकी टे के 
रसिक जनों के लिए उपयुक्त कहा है : सभी इसके अधिकारी नहीं हैं ।' बंसे 
संप्रदाय में कई भाव प्रचलित थे । इस बात को सूर ने कहा है ।* प्रमलक्षणा 
भविति का भी इसमें स्थान था । इसको जोड़कर नवधा भक्ति 'दसथा' हो जाती 
है । परमानंददास जी ने 'ताते दसथा भक्ति मली कहा है । इन भावभक्षित के 
रूपों के आदर्श भी माने गये हैं | प्रे मामक्ति का आदर्श गोपीरूप है--'अविरल 
प्रेम भयौं गोपिव कौ बलि परमानेद दास । जहाँ संत्रदाय के अन्य स्वरूपों के 
साथ वात्सल्यासक्ति का प्राधान्य है, वहाँ 'श्रीनाथ जी के मन्दिर में निकुज 
सेवा की भावना का भी योग है | संभवत: संप्रदाय में यह सिद्धान्त मान्य था 
कि जिस किसी भी भाव से हो, भगवान में मन लगना चाहिए ।* इसीलिए 
किसी भी भाव का तिरस्कार इस संप्रदाय में नहीं था। सूरादि अष्टछापी 
कवियों के काव्य में समी भावों की लीलाओं का अभिनिवेण मिलता है। 


वैसे माधुर्य की स्थापना इस संप्रदाय में थी । ऐसा प्रतीत होता है कि 
आरम्भ में गोपी के माध्यम से इस भावना की स्थापना थी : 'राधा' तत्त्व 
का इतना प्राधान्य नहीं हो पाया था ।४ वास्तव में गोपी भाव की उपासना 
दक्षिण के आलवारों में थी और राधामाव उत्तर में प्रधान था ।* कहा जाता 
है कि दक्षिण के आचार्यों में सर्वप्रथर निम्बार्काचार्यजी ने कृष्ण के वाम-माग में 





१. प्रार्थये रसिका स्वरं पश्थन्त्व्दमहनिशम्‌ । 
एतद्गसानिभिज्ञ: साद्राक्षीदपि वेंष्णवः ॥ (श्युगार समंडन 
२. श्रवण कीर्तन स्मरण पादरत, अचरज दंदन दास 
सख्य और आत्स-निवेदन, प्रे मलक्षणा साय ॥। 
तस्मात्केनाप्यूपायेन सनः कृप्णे निवेशयेत । भागवत ७॥१३१। 
डा० दींनदयालु गुप्त : अप्टदाप ओर चल्‍लस संप्रदाय, 9० ५२६-२७ । 
डा० रामनरेश वर्मा, हिन्दी सप्रुण काव्य की सांस्कृतिक भूमिका, 
पृु० १४६॥ 


७९ ९0० 
का ॥ 


का 


भाव-सूसि २०५ 


राया की भावना ज्ञी। 'रावा तत्त्व का समावेदञ्य वललचसंप्रदाय में कुछ देर 
से हुआ प्रतीत होता है । इस तत्त्व के आ जाने पर हरिराय जी ने भक्ति के 
दो रूपों की कल्पना की--पदाम्भोज-मक्ति और वदनांवुज भक्तित। पहली 
शीतल-सुलम है : दूसरी उप्प-दुर्लम है । यह दूसरा प्रकार ही 'मादुर्य है।* 

साधु भाव की | गी अपनी कुछ विशेषताएं भी हैं। इसमें 
वृद्धि स्तब्च हो जाती है । विधि-निपेध की मर्बादा टूट जाती है । अन्त:करण 
दिव्य रस के क्षरण से पुलकित हो उठता हैं । भक्‍त को परपति सने शयने स्वप्ने 
सतत करवि लेहा' का अविक्रार नी मिल जाता है। साधक का भाव समस्त 


6 


समष्टि ने सप्रेपित हो जाता है 'बही “महाभाव की उपलब्धि का उपक्रम है। 


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समस्त जड़-चेतन महाभाव' से अभिभत हो जाते हैं। यही महाभाव राधा 
भाव हैं। सराधामाव' से उपासना में प्रविष्ट होता ही रसाश्रयी साधता है 
उपासक्न अपने माथिक स्वरूप को भूलकर राधा-भःव प्रें स्थित हों 
जात ह्‌ 

३. गोपी : सखी : सहृवरी 


पुष्टिमार्ग में गोपियों को मुद के रूप में माना गया है ।* गोपीमाव 
को ही मुख्य साधन के रूप में सत्र कृत क्रिया गया है । पुरुष हृदय मी भावोद्रक 
की अवस्था में स्त्रीमाव या गोपीमाव से संयुक्त हो जाता है।* स्त्रीमभाव के 
१. भवितिदिया पदाम्भोज वदनाम्बुजभेदत:ः । 
प्रथमा शीचला भक्ति बतः श्रवण कॉतेवात ॥ 
तत्व छुड्य संबद्ध: सुखझभो  वनारदादिष। 
'दतीया दुलभा यस्‍च्मादवर मृत्त-सेवनात ॥। 


गोपिका: प्रोक्ता भुरवः साधने च तत (संन्यास निर्णय 
«. भज सछि भाव भाविछ देव। 

कोटि सावन करो कोऊ, तौऊ न साने देव ॥॥ 

धुमकेतु कुमार सॉँग्यों कौब मारग रोत 

पुरुष दें तिय भाव उपज्यों सब उलदी रीत 

वसन भुपत्र पलदि पहरे भाव सो संजोय ॥ 

उलटदि मुद्रा दई अकग बरन सूबे होय। 


न 
4००७०७--ककरनी, 


वेद विधि को नेम नाहि जहाँ, प्रीति की पहचान । 
नत्रजदय वस किए मोहन, 'सूर्रा चतुर छुजान ॥ 


२०६ सूरसाहित्य : नव मृल्यांकन 


उदय होने की बात परमानन्ददास जी ने भी कड़ी है ।'* संप्रदाय के प्रायः 
सभी भक्त और कवि भावों भावनया सिद्ध: साधन नान्‍्य दीप्यते' सिद्धान्त को 
लेकर चले । पद्मपुराण में एक उल्लेख है: 'सोलह हजार ऋषियों ने राम के 
दर्शन किये और भावातिरेक में उनके मन में स्त्रीमाव का उदय हुआ । इसकी 
विस्तृत भावना महाप्रभु वल्‍लभाचार्य जी के 'चीरहरण' प्रसंग की 'सुबोधिनी' 
टीका में मिलती है। इस प्रकार पुरुषों में भी गोरीमाव उत्पन्त हो 


जाता है । 
दार्शनिक दृष्टि से गोपियाँ वास्तव में पुरुषोत्तम की शर्क्तियों का ही 


प्राकट्य है। उनकी श्रिय।, पुष्टि, गिरा और कात्या आदि द्वादश शक्तियाँ 
चन्द्रावली, राधा आदि के रूप में अवतरित होती है| ये ही अवतरित होकर 
पुरुषोत्तम की लीला में स्थित होती हैं | इन शक्तियों में जो भावश्रतिक्षण 
तरंग्ित होते रहते हैं, वे स्वयं अनेक सखी-पहुचरियों के रूप में प्रकट होते है । 
इस प्रकार मानसिक रूपों के अवतरण की ही भूमिका प्रस्तुत हो जाती है । 
दूसरी कल्पना के अनुसार, वैदिक ऋचाओं ने ही गोपियों के रूप में 

भवतार ग्रहण किया है। वेद की श्रृतियों ने भगवान पुरुषोत्तम से 
लीलागत आनन्द की प्राप्ति का वरदान माँगा : वह मिला । इस वरदान 
को सिद्ध करने के लिए पुरुषोत्तम ने ब्रज में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार 
लिया और स्वयं श्र्‌तियाँ गोपियों के रूपों में आविभू त हुई ।* 'सूर ने इसी 
पुराण-प्रसंग को इस प्रकार दिया है : 

गोपी-पद-रज महिमा विधि सों कही ।... 

ब्रज-स दरि नहिं नरि, रिचा श्रृति की आहीं । 

>< 2५ >< 

श्रतिन विभय करि कह्नो, सब तुमहि देवा । 


दर नारंतर तुर्माह, जानत निज सेवा ।॥। 
या विधि बहुरि अस्तुति करी, भई गिरा आकास ! 
मांगों वर ॒सनभावतो, पूरो सो तुम आस ॥। 
श्र्‌ तिन कहयों कर जोरि सच्चिदानंद देव तुम । 
जो नारायन आदि रूप; तुमरो सु लख्यों हम ॥ 
निरगुन रहत ज्ु निज स्वरूप, लण्पौ न ताकी एवं । 

१. लगे जो छृुन्दावन को रंग । 

स्त्रीभाव सहज में उपजे, पुरुष भाव होय भंग |। 
२. विस्तार के लिए हृष्टव्य गो० बिट्ुुलमाथ कृत 'विद्वन्मंडल' । 


भाव-भूमि २०७ 


भन वानी तें अगस अगोचर, दिखराबहु सो देव ॥। 


रख 2५ 5 2५ 
श्रतिन फहयो हां गोपिका केलि करें तुब संग । 
2५ ५ 44 ५ 


भार भयथौ जब भूमि पर तब हरि लियो अवतार ॥ 
वे रिचा क्व गोपिका हरि सों कियो बिहार ॥। 


आगे यह भी उल्लेख है कि इसी प्रकार का वरदाव ऋषियों ने राम 
से माँगा था | उसकी पूत्ति कृष्णावतार में हुई :-- 
पुुि ऋषि रूप राम वर पायो हरि से प्रीतम पाय । 
चरन प्रसाद राधिका देवी उन हरि कठ लगाय ॥। 
यही गोपियों की महिमा है । 'भूर्ताभाव की भक्ति-साधना एक प्रकार 
से श्र्‌ति-समत ही है | गोपियों की पद-श्रूलि की प्राप्ति के बिना यह श्र्‌ ति- 
गति अप्राप्य ही रहती है :--- 
जों कोउ भरता-ढभाव धरि हरि-पद गाबे । 
नारि-पुरुष कोउ होय स्लोई, श्र तिर-रचा गति पावे ॥ 
तिनकी पद-रज जो कोड बुन्दावन श्रुव माँहीं । 
परस सोड ग्रोपिका-गति लहै संशय नोॉंहीं ॥ 
भुगु तातें सें चरन रज गोपिन की चाहत । 
अश्रतिसत बारंबार हृदय अपने अवगाहत ॥। 


संप्रदाय की मान्यता के अनुसार, प्रेम (>-भाव) मक्ति साधना क 
केन्द्रीय मुल्य है। इसकी सिद्धि गोपी-भावना से ही संभव है । इसीलिये आचारये 
जी ने गोपीमाव से संसिक्त सेवा को प्रकट किया है। गोपी-मावना की भी 
कोटियाँ है । ये कोटियाँ ही साधना की क्रमशः सरणियाँ भी है। इन कोटियों 
के अनुसार गोपीमाव तीन प्रकार से प्रकट होता है : वात्सल्य-माव, स्वकीय- 
भाव तथा परकीय-भाव । 'ब्रजांगनाएँ वात्सल्य-माव की आसक्ति से मगरवान 
की साधना करती है । इनका रूप पुष्टि-प्रवाह! ।ना गया है। दूसरी श्रेणी 
गोपी या 'कुमारिकाओं' की है । ये परोक्ष रूप से कृष्ण को पतिरूप में वरण 
करना चाहती है | देवी-देवताओं से अपना अ चल पसार कर वे क्ृष्ण को पति 
रूप में प्राप्त करने की याचना करती हैं। इनकी भावना तो सघन हो जाती 
है, पर शास्त्रोक्त विवाह की मर्यादा का ध्यान बना रहता हैं। अतः इनको 
पुष्टि मर्यादा की कोटि में रखा गया है। भावना में माहात्म्य-ज्ञान का संस्पश 


र्ण्८ स्रसाहित्य : तव मूल्यांकन 


ज्् 





मी रहता है। इसमें स्वकीया स्नेह सान्‍्य है। इनकी कामना हासलीला में 


फलदती हई गोपांगनाएं - न कोटि को के 
लदता हुई गोपायनाए तोसरो कोटे को साव-माधघना मे रत रहता हैं 


| गोपांगनाओं की 'पृष्टि पृष्ठ कहा गया हैँ। उत्कट परक्ोय- 


१5 | / 


₹१4८। द्ध८ जादहछ 


साव घनचाचूत होकर बन्तबाह्म छा जाता है। इस प्रकार सावन्साघना का 
अल, 8० मल साइबर पहफम्पका.. पाकुम्मए-गामाकयाक प्रभ दल्लभाचाये से संदीएश न अर कल्कनक कप पद किया 
सचछा(च्तक स्वहप चहाअन दल्‍लचाचा जीने संत्रदाय में स्थापित किया।* 


संप्रदाय के कवियों ने इन्हीं भावनाओं के लिए चाहित्व-तृजन किया। चूर की 




















दृत्ति इन्हीं कोटियों के झनुसार विकतित् होती गई है । 
इस प्रकार संप्रदाय मे गोवियों क्री स्थिति दाशंविक दृष्टि से और 
साधना के क्रम की दृष्टि से प्रत्तीकात्मक औौर महत्त्वपुर्ग है। इस स्थिति को 
संज्ेप में इस प्रकार स्पष्ट किया जा है-- 
१. गोपियाँ लदतरित हु३ नस ध 
क--भनगवान की शक्तियों का अवतार; 
ख--श्र्‌ तियों झार हचाओं के झवतार: 
अपषियों के अवतार; 
घ-भावों के क्षवत्तार । 
२. सभदाद के झवतारों के कारयों में गोपीमाव को चरितार्थ करना 


भी एक कारण है ! 

३. त्रिविध गोपियाँ : ब्रजांगनाएं (ज"वात्सल्यातक्ति); गोपियाँ 
(+5ऊुमारिकाएं, क्वकीयातसतक्ति) एवं गोपांगनाएँ (-->परक्रीया- 
सक्त्ि) । 





१. गोपांगना सु पुष्टि: । गोपीयु सर्यादा । ब्रजांगना सुप्रवाहु: ।...गोपांगनास्तु 
भक्तमुक्ता: भक्त गह उसुझदध मुक्त दानस्ता क्ित्रा नाज्ञातों लोकपेदमययक्तो 
यानमित्ता चुकता छुटुन्च मायापत्ववेनद ग्रेह्धिपतिघनवपः पत्यादिक 
सकल सर्यादार्या छुक्‍तताया मित्ता तर्वात्‌ घर्मान्लिह्वत्यक्षेदल क्री पुरषोत्तम- 
इंच भजति  तस्मात्ताता पुष्टिप्दम । 

क्षव गोपोरना बद्रजकुमारियां गोपोत्नन वल्लभनजमेतर भजन 
जातम्‌ । किचतद्भुजनोपायेडपि कात्यायनीनजनं कृदसम्‌ ! ...सतएव तातां 
मर्यादा सक्ष्ति: 
ठंथां हज दनानांमत्ुनावेनेद संग्रह: । तासार 
ग़दो दर्ते ॥ तस्मात्तासां प्रदाहत्दम । इति त्रिविय्या गोप्य: 
(नागदत्पीठिक्ता) 


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भाव-नुति : २०६ 


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४. भक्तिमार्गीय सन्‍्यासत का पर्यवसानः रासलीला में है और इसकी 
अधिकारिणी गोपियाँ 

४. स्वामिनी जी : और उनका परिकर--- 

वार्ता साहित्य में स्वामिनी जी की चर्चा मिलती है । सामान्य रूप से 
संप्रदाव में चन्द्रावली जी को स्वामिनी जी कहा जाता है ।* कुछ उद्धरण 
. ऐसे भी हैं जिनसे उनका राबा होना भी सिद्ध होता है ।* परम्परा से इनका 
, चन्द्रावली होता ही माना जाता है। परम्परागत मान्यता इस उद्धरण से 
: स्पष्ट हो जाती है : ४ हा 





“जो श्री ठाकर जी तें श्री स्वामिनी जी प्रकटी हैं। कौर स्वामिनी जी 
के मखचन्द्र तें श्री चन्द्रावली प्रकर्टी | श्री चन्द्रावली जी तें सगरी स्वामिनी 
सखी प्रक्रटी हैं | ता सो श्रीठाकृर॒जी के दक्षिण माग श्री चन्द्रावली जी विराजतद 
हैँ । याते जो--सगरी सखीन के स्वामिनी रूप, श्रीचन्द्रावली जॉं (जो संक में) 
श्प्ठ हैं 7 ,..7 3, 288 


इस उद्धरण से यह स्पष्ट होता हैं क्रि सखलियों का नेतृत्त्व चन्द्रावली जी 


ही करती हैं। समस्त सखी उन्हीं से उद्दभूत हुई हैँ । साथ ही चन्द्रावली समस्त 
सखियों में श्रे ठत्म हैं । वार्ता साहित्य से यह मी प्रकट होता है कि श्रीवल्ल मा- 


चार्य जी में ठाकुर जी और स्वामिनी जो दोनों का समावेश था -ठकुर जी 
गोवद्ध नघर, स्वामिनी जी, आचार्य जी ये दोतदों महाजन में समीक्षत हैं । इस 
प्रकार वल्‍्लन संप्रदाय में श्री रावा के साव-साव चन्द्रावली का भी अत्यन्त 

महत्वपूर्ण स्थान, था । इनका जआवेश आचार्य जी में अवतरित हुआ है। जिम्र 


१. भक्तिणार्गीय संन्यासस्तु साक्षात्पुष्दि पृष्ठि श्रूति रूपाणां रासमंडल 
मंडनावाम्‌ । स्वमेवोद्त संत्वज्य सर्वविषर्यास्तव पादमूलं प्राप्ता 
इत्यादि चतुर्याष्याये ता: प्रति पगवता ॥! ( गायत्री नाष्य ) 

२. आठ्मां श्री जन्पयाययों जी ने स्वामितोत्व छे, अन्य सात ने सतीत्व 
छे । ( प्राचीन वार्ता रहस्य, प्रथम भाग, समस्त लीला प्रकरण ) 

३. सो ब्रज में श्री स्वामिनी जी कौर श्रीठाकुर जी आपुये दोड एक रूप 
हैं, परन्तु ब्रजलाला प्रकद करिवे के लिये श्रीठाकुर जी श्री नन्‍्दराय के 

घर प्रगठ बोर श्रो स्वामिन्री जी श्री वृषनाव जो के घर प्रकट होय के 
अनेक उपाय मिलिदे को राज दिन किये ! 
प्रा. वा. र. द्वि० भा० ) महानुभाव सूर'! । भावप्रकाश । 
४. प्राचीन वार्ता रहत्व, द्वि० -भा० प्रृ० २२२ । 


२१० सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 

प्रकार आचाय॑ जी में मी दोनोंरुप (पुरुष स्त्री )मावित है उसी प्रकार उनके समस्त 
परिवार में भी दोनोंमावों की स्थिति मानी ग्यीहैं। हरिराय जी ने 
भाव प्रकाश में स्पष्ट कहा है : 

“कुज में सीजन हैं सो तिनक्रे दोय स्वरूप हैं, सो कहता पुभाव के 
सखा ओर स्त्री भाव की सखी | सो दिन में सखा द्वारा अनुभव और राति कों 
सखी द्वारा अनुभव है | सो काहे तें ? जो वेद की ऋचा हैं सो गोपी हैं । ओर 
वेद के जो मंत्र हैं सो सखा है ।...तो यहाँ तो: रसरूप लीला सदा सर्वेदा एक 
रस है। सो तैसे ही अतरंगी सखा श्री ठाकुर॒जी के अंग रूप हैं। सो सखीरूप, 
सखारूप दोऊ रूप सों रात्र दिन लीला रस करत हैं । 

इस प्रकार परिकर के सभी व्यक्ति उभय भावासिक्त माने जाते हैं। इस 
उभय भावासिक्त विधान की रूपरेखा संप्रदाय में इस प्रकार बनी : 


भक्‍त सखा सखी लींलार्साक्त 

सूरदास कृष्णसखा चम्पकलता . निकु जलीला 
परमानदन्ददास॒ तोकसखा चन्द्रमाला मानलीला 
कु भनदास अजु न विशाखा बाललीला 
कृष्णदास ऋषमभ श्रीललिता रासलीला 
छीतस्वामी सुबल पदुमा , आँखमिचौनी 
गोविन्दस्वामी श्रीदामा भामा जन्मलीला 
चतुभु जदास विशाल विमला अन्नक्टलीला 
नन्‍्ददास भोज चन्द्ररेखा किशोरलीला 


वल्लमाचार्य जी स्वयं कृष्ण के रूप में भावित थे। गरुसांई जी के 
अनुसार-- वस्तुतः कृष्ण एव ।! जब वल्लभ का अवतरण हुआ तो उनके समस्त 
परिकर के भवतरण की कल्पना होने लगी। अनुद्धत दैँवी जीवों के उद्धार के 
लिए श्रीवललभ का प्राकदूय हुआ । इसी कल्पना के आधार पर सांप्रदायिक 
पुराण विकसित होने लगा । गो० विदठलनाथ जी, गोकुलनाथ जी तथा श्री 
हरिराय जी ने अपने लेखों के द्वारा इस पुराण को पृष्ट किया । आचार्य जी के 
पश्चात्‌ गो० विठ्ठलनाथ जी में पुरुषोत्तम की भावना की गईं ।* इसी कल्पना 


१... जो प्रमुख की यह रीति है, जो जब बेकुण्ठ सों भूसि पर प्रकग होयवे 
की इच्छा करत हैं, तब बंक्रुठवासी जो भक्‍त हैं, सो पहले भूमि पर 
प्रकट करत हैं सो तंसे हीं श्री आचाय॑ जी गोसाँई जी, श्री पूर्ण 
पुरुषोत्तम को प्राकदय है ।' 
ह ( वार्ता प्रसंग, १० : सूरदास, हरिराय जी कृत भावप्रकाद ) 


-भाव-भूमि २११ 


के विकास में गोस्वामी जी की समस्त भक्‍तमंडली का भावात्मक रूप स्थिर 
हुआ । इसको सम्पूर्ण रूप हरिराय जी ने अपने भावप्रकाश में दिया | कल्पना 
यहीं नहीं रुकी । सखियों की अवस्था, उनके रंग, -रूप, वस्त्र आदि की भी 
कल्पना होने लगी । इस कल्पना के द्वारा सभी की सखी और सखा भाव की 
साधना की ओर भी संकेत किया । वस्तुतः क्रियात्मक साधना और मानसी 
भाव-साधना का समन्वय ही इस परिकल्पना में परिलक्षित होता है । हरिराय 
जी ने इसकी ओर संकेत किया है-- 


“तहाँ कहत हैं जो श्री भागवत में कहै जो--जब श्रीठाकुर जी आप 
बन में गोचारन लीला में सखान के संग पधारत हैं, सो सगरी गोपीजन लीला 
कौ अनुमव करत हैं। सो घर में सगरी वन की लीला गान करत हैं ता पाछें 
जव श्रीठाकुर जी संध्या समय वन ते घर कू' आवत हैं, सो तब पाछें रात्रि 
कों गोपीजन सो निकुज में लीला करत हैं । सो सब अतरंगी सखान को विरह 
होत है, तब वे निकुज लीला कौ गान करत है, अनुभव करत हैं। सो काहें 
तें? कुज में सखीजन हैं सो तिनके दोय स्वर्‌प हैं, सो कहत हैं--पु भाव के 
सखा और स्त्री भाव की सखि। सो दिन में सखा द्वारा अनुभव तथा रात्रि 
कों सखि द्वारा अनुभव है ।” 


इस प्रकार अहनिश भावात्मक साधना का क्रम चलता रहता था। 


एक विशेष बात वहाँ दृष्टव्य है। इसी प्रकार की सांप्रदायिक कल्पना 
चैतन्य संप्रदाय में भी मिलती है। इस समानता को देखकर कुछ विद्वानों ने 
वल्‍लम संप्रदाय की इस कल्पना का मुलस्रोत चंतन्य संप्रदाय में ही माता है । 
इसमें संदेह नहीं कि इस संप्रदाय का सम्पर्क-संबन्द्ध बल्‍लभ संप्रदाय से था । 
संप्रदाय प्रदीष” में गदाधरदास जी की इस उक्ति---'विष्णुस्वामिन उप- 
संप्रदायश्चेतन्य:---से यह संबन्ध अवश्य प्रकट होता है। साथ ही यह भी 
अनुश्र्‌ति है कि वलल्‍लमभाचाये जी कृष्ण चेतन्य से मिले थे। वृन्दावन में उसी 
समय र्‌प-सनातन गोस्वामी माधुय-रस की साधना पद्धति का विस्तार कर 
रहे थे । यह भी कहा जाता है कि श्रीनाथ जी की सेवा भी पहले बंगाली 
वेष्णव ही करते थे ।'* इस प्रकार परस्पर प्रभाव ज्ञात-अज्ञात र्॒‌प से माना 
जा सकता है । एक बात यह भी कही जा सकती है कि बौद्ध संप्रदायों में 
सांप्रदायिक पुराण का विकास हो चुका था। बुद्ध के अवतार की कल्पना इस 
संप्रदायों में अनेक र॒पों में चलती थी | पीछे के विकसित निगुण संप्रदायों में 


खाए जप मम पाक उराशक 7 पधक्पहाइत् दा कक. 


१. चौरासी वेष्णवन की वार्ता में अष्ट सखान की वार्ता' पृ० १०४, १०५। 


२१२ सूरसाहित्य : नव मूल्यौकन 


भी अवतारवाद की कल्पना की सांप्रदायिक रूप खड़ा हुआ । 'कबीर' को भी 
अवतार के र॒प में किया गया। ““"'आख्यान ग्रथों की रचना में अलौकिक 
और चमत्कारपूर्ण कथाओं के द्वारा कबीर के व्यक्तित्व में परम शक्ति और 
ईदवरी प्रतिभा की स्थापना और मठ, महंत तथा अनेक कमंकांडों की 
अवतारणा ।*” अन्तर केवल अभिप्रायगत है। इन निगुण संप्रदायों में इस 
कल्पना के द्वारा चमत्कार का वातावरण उत्पन्न किया जाता था। बलल्‍लम 
और चैतन्य संप्रदायों में समस्त अभिप्राय भावात्मक है। इस प्रकार इन 
सप्रदायों में मूल परम्परा का मावात्मक विकास ही लक्षित है। 

तो, चेतन्य संप्रदाय में भी सखी भाव का का भारोप श्री चैतन्य के परि- 
कर पर भी किया गया चैतन्य महाप्रभु भी श्रीकृष्ण के र॒प में भावित हुए । 
उन्होंने राधा के प्रेम-साव के रूप में अवतार धारण किया। इस प्रकार चैतन्य 
में राधा-कृष्ण भाव का सम्मिलित आवेश अवतरित मात्रा गया । उन्होंने 
राधा-रूप में इसलिये प्राकट्य किया किया कि राधा के कृष्ण के प्रति प्रेम का 
आस्वाद ले सकें | राधा रूप में प्रकट हुए बिना यह रसास्वाद संभव नहीं 
है ।* यह भावना वैसी ही है, ज॑से आचार्या वल्‍लभ के प्रति मिलती हैं। अन्य 
परिकरीय भक्तों की कल्पना इस प्रकार हैं-- 
संप्रदाय के भक्त सखी का नाम रंग. बस्त्रों का रंग अवस्था सेवा 


१. रूप गोस्वामी विशाखा सोौदामिनी न १४ वर्ष वस्त्रलंकार 
२ मास लाना 

१५ दिन 
२. राय रामभानंद ललिता ग्रोरोचन मोरपंख. १४ वर्ष पान 
का हे मास निवेदित 


१२दिन करना 


१. डा० मीतीसिह, निगुण साहित्य : सांस्कृतिक पृष्टभूमि । 
( ना. प्र. प्र. वाराणसी, प्रथम संस्करण ) पृ० ३१४ । 
२. श्री राघाया: प्रणण महिमा की हशो वानयेवा। 
स्वाद्यों येनोद्धुत समधुरिसा कीहशो वा मदीयः । 
सोख्य चास्यामदनुभवतः कीहशं रेति लोभा । 
उद्भवास्य: समजनि शची गर्भ सिन्धो हरीद्ध: ॥। 
है ह ( कृष्णदास कविराज : चंतन्य चरितामृत ) 


भाव-भूसि २१३ 


३. वनमाली. चित्रा कश्मीरा काँच के. (४ वर्ष व्यक्तित्व 
कविराज समान १ मास श्यज्भार 
१९ दिन करना 
४, कृष्णदास इन्धलेखा हलका . वेंगनी . १४ वर्ष अमृतरस 
(ब्रह्मचारी) पीला... .. २ मास देना 
ह १२१दित , 
५. राघव गोस्वामी चंपकलता श्वेत-पीत--- १४ वर्ष चेंवर करन 
२ मास 
१४ दिन 
६, गदाधर सट्ट रगदेवी पीला-अरुण गहरा १४ वर्ष चंदन-चर्चन 
लाल २ मास 
८ दिन 
७. प्रबोधानन्द तु गविद्या केशरिया हलका १४ वर्ष संगीत द्वारा 
पीला २ सास रंजन 
२० दित 
८, अनंताचाय सुदेवी पीला-अभरुण गहरा १४ वर्ष जल पिलाना 
(गोस्वामी) लाल २ मास 
८ दित 


चैतन्य मत की सखियों के नाम ब्रज में मान्य सखियों के नामों से 
भिन्‍न हैं । केवल विद्ञाखा, चम्कलता, और ललिता ही समान हैं । इस आधार 
पर भी प्रभाव पूर्णछप से सिद्ध नहीं होता। इन सखियों के साथ चैतन्य 
संप्रदाय में आठ गाँव भी दिये हुए हैं। ये गाँव न्नज के ठेठ गाँव हैं जो बरसाने 
के आस-पास स्थित हैं । इससे यह प्रतीत होता है कि इस कल्पना के विधायकों 
का ब्रज से घनिष्ठ संवन्ध था । इन सखियों का कार्य लीला-युगल की सेवा 
में संलग्न रहना है । यही इन सखियों का राधा-कृष्ण बिहार में योगदान है। 
इससे यह भी प्रकट होता है कि सखियों का कृष्ण के साथ बिहार करना 
संप्रदाय में मान्य नहीं था | पर वल्लभ संप्रदाय में इस प्रकार की स्पष्ट मान्यता 
नहीं मिलती । वहाँ विभिन्‍न लीलाओं के प्रति सखियों की मानसिक भासक्ति 
का ही उल्लेख किया है । जिन सखियों की कृष्ण की रसात्मक लीलाओं 
में आर्सोक्ति है, वे चेतन्य संप्रदाय में भी मान्य हैं: विशाखा- निकुन्ज-लीला, 
चंपकलता --मावलीला; ललिता-रासलीला । शेप लीलाओं में माधुर्येतर भाव- 
नाओं का विधान है। अतः शेष पाँच सखियाँ वल्‍लम संप्रेदाय से भिन्‍न हैं । 


२१४ सूरसा'हत्य : नव मूल्यांकन 


चतन्यमत में लीलाओं का आसक्तिमय वर्गीकरण तो नहीं मिलता, पर लीला 
में किस-किस सखी का क्या-क्या कार्यक्रम रहेगा, इप्त सबका विवरण है। 
सखियों के अतिरिक्त मंजरियों की अतिरिक्त कल्पना भी चेतन्यमत में मिलती 
है। मंजरियों का भी इसी प्रकार का विवरण दिया गया है ।' इन सखियों 
ओर मंजरियों का कृष्ण में निस्‍्वार्थ-प्र म था : वे क्ृष्णतीला या बिहार का 
अपने लिये सुख नहीं चाहतीं । वे तो श्रीकृष्ण-राधा के सन्‍तोष और सुख के 
प्रयत्तशील रहती हैं ।* यही तत्सुख-मावना का आदर्श है.। इस प्रकार 
ब्रज में सखी संबन्धी भावना बललम संप्रदाय और चैतन्य संप्रदाय में समान 
रूप से चलती मिलती हैं । 


तत्सुखी भाव की एक और परिणति राघावल्लम संत्रदाय में हो रही 
थी | यह चेतन्य संप्रदाय के अधिक समीप प्रतीत होती है । 'मंजरी आदि का 
विशिष्ट विधान इस संप्रदाय में प्राप्त नहीं होता है। इन सखियों का उपास्य 
युगल-लीला दर्शन है। यह 'सहचरी” भावना है । राधा-कृष्ण विहार की समस्त 
सामग्री एकत्र कर देना, दोनो की प्रयत्न करके मिला देना और लीला-विह।र 
की “स्थिति में लाना, उनकी विविध प्रकार से सेवा करना और निकुज रु्रों 
से लीला-दर्शन करना ही सहचरी साधना के अग हैं। इनके साहित्य से ही 
रास संपन्‍न होता है । अतः कृष्ण भी राधा को रास में प्रवृत्त करने के लिए 
इनकी ओर देखते हैं। इस प्रकार अन्य संप्रदायों में वणित ग्रोपीमाव से इस 
संप्रदाय का सहचरीभाव सर्वथा भिन्‍न है।* रस की दृष्टि से इस संप्रदाय का 
साहित्य भी अद्भुत है । सहचरी को स्त्री-पुरुप-रूप-लिग-भेद- विवर्जित माना 
गया है । इल प्रकार अन्य संप्रदाय की गोपियों और सखियों से इनका तात्विक 
भेद हो जाता है | गोपी-प्रेम का उन्नयन नारद भौर शॉडिल्य के भक्तिसृत्रों 
में मिलता है । सहचरी भाव इन सूत्रों में वणित भाव से भी विचित्र और 





१. हृष्टव्य मेरा लेख चितन्यमत में सर्खी और मंजरी' आश्वन - अगहन 
सं० २००६ । 
२. आत्मेन्द्रिय प्रीति वांछा तारे वलि फाम । 
कृष्णन्द्रिय प्रीति इच्छा भरे प्रम नाम ॥॥ 
(चैतन्य चरितामृत, १॥४१०१) 
३. हदृष्टव्य, डा० विजयेद्ध स्नातक, राधावललभ संप्रदाय; पिद्धान्चत और 
साहित्य, 9० २२३-२२६ । 


अस+- 


भाव-प्रूमि २१५ 


उच्चतर है ।" कुछ कवियों ने इनके नाम भी गिनाए हैं : ललिता, विशाखा, 
चित्रा, चम्पकलता, सुदेवी, इन्दुलेखा, तुगविद्या और रंग्देवी ।* यह सूची 
वललमभ संप्रदाय की सूची से साम्य नहीं रखती । चैतन्य मत और राधावल्लभ 
संउदाय की सूचियाँ समान हैं। गोपियों के भाव और सहचरी भाव को 
समानता के अप्धार पर भिन्‍न किया गया है। प्र वदास जी के शब्दों में--- 


गोपिन के सम भक्त न आहीं | उद्धव विधि तिनकी रज चाही ॥ 
तिन सन कछू सकामता आई | ताते बिच अंतर परयो भाई ॥। 


इस प्रकार वल्‍लम संप्रदाय, चैतन्य संप्रदाय और राधावललभ संप्रदाय 
में गोपी, सखी और सहचरी भावना का चरमोत्कर्प हुआ । वल्लभ संप्रदाय में 
एक सुनिश्चित रूप गोपीभाव का नहीं मिलता है। गोपी, गोपांगना और 
त्रजांगनाओं के रूप में इनका वर्गीकरण किया गया है । वे भी गोपी मानी गई 
हैं, जो वात्सल्य माव रखती हैं । स्वकीया और परकीया भेद भी हैं । गोपियों 
को कभी वेदिक ऋचाए' कहा गया, कभी उनको भगवान की आनन्द प्रसारिणी 
शक्तियों के रूप में स्वीकृत किया गया है। गोपियों और भक्तों को भी रास- 
लीला के संदर्भ में समान कहा गया है । गोपियों को जीवात्मा और कृष्ण को 
परमात्मा भी बतलाया गया हैं। कहीं-कहीं राधा भी गोपी हैं। इससे यह 
प्रतीत होता है कि गोपीमावना वललभ संप्रदाय में विभिन्‍न स्रोतों से आई है। 
भागवत का प्रभाव तो है ही, अन्य संप्रदायों की भावना का प्रभाव भी प्रतीत 
होता है | ऐसा प्रतीत होता है कि भागवतोक्त गोपीरूप पहले संप्रदाय में 
मान्य हुआ । फिर जीवात्मा परमात्मा न्याय पर आधारित रूपक भी इस भाव 
में समाविष्ट हो गया । अन्तत. संप्रदाय के आचार्यो और भक्‍षत कवियों का 
झुकाव माधवुय मिश्रित गोपीशाव की ओर होता ग्या। स्वकीया भाव भी 
धीरे-धीरे परकीया भाव में परिवर्तित होने लगा। राधा परक स्वकीयाभाव 
चन्द्रावली के परकीया भाव की ओर उन्मुख हो गया । ऊपर का सखी विधान 
एक प्रकार से चन्द्रावली को केन्द्र मान कर ही संयन्‍्त हुआ प्रदीत होता है । 





१. नारदादि सनकादि सब उद्धव ओर ब्रह्मादि । 
गोपिसु को सुख देखि किय भजनु आपनो वादि ॥। 
तिन गोपिन ते दुर्लल नाई । नित्य बिहार सहज सुखदाई ॥ 


(प्र बदास, व्यालीस लीला, पु० २०३) 
२. वही पृ० ६०-८४ । 


२१६, सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


गोपी-सखी भावना कभी राधा केन्द्रीय हो जाती है और कभी चन्द्रावली 
केन्द्रीय । कभी भागवत की भाँति केवल गोपी भाव ही मिलता है । 

चंतन्य संप्रदाय में गोपीभाव,, को दार्शनिक भूमिका और रसझ्ञास्त्रीय 
पद्धति की अभिव्यक्ति दी गई | कान्‍्ताभाव से, गोपियाँ , राधा के ही अंनेक 
भावात्मक रूप हैं । गोपी को कृष्ण की मात्र सखी, सहचरी या -अनुचरी कहा 
गया : वह उसकी प्रेयसली भी है। श्रीकृष्ण गोपियों के साथ कान्‍्ता भावमयी 
लीलाए करते हैं। गोपी-कृष्ण-रमण भी मिलता है | स्वरूपत: इनको जीवतत्त्व 
भी कहा गया | सखी और मंजरी का विधान भी इस संप्रदाय का अपना है । 
सखियाँ श्री राधा की समजातीय सेवा से श्रीकृष्ण की प्रीति का विधान 
करती हैं- ललिता, विशाखा आदि । मंजरी राधा-माधव के मिलन एवं सेवा 
का आनुकल्य ही सम्पादन करता अपना धर्म मानती है। थे राधा की किंकरी 
और उसकी अतरंग सेवा की अधिकारिणी हैं । 

निम्बाक संप्रदाय में भी सखी-भाव की झलक मिलती है । दशइश्लोकी 
में सहख्नश: सखियों से परिवेष्टित राधा का ध्यान किया गया है ।* इस संप्रदाय 
में सखियों को स्वकीया ही कहा गया है। उसी “रूप में वे श्रीकृष्ण कें साथ 
बिहार-रमण भी करती हैं। सखीभाव का उपयु क्‍तः विधान इस सप्रदाय में 
नहीं है। है... हे के. “३ 0 

चलल्‍लभ संप्रदाय के कवियों की वाणी में सखियों के सभी प्रकार के भाव 
मिलते हैं । संप्रदाय का सखी के रूपों का वेविध्य सांप्रदायिक साहित्य में भी 
प्रतिबिबित है । स्वकीया-परकीया की धूप-छाँह से रसपरक देष्णव रहस्यवादी 
लोक तरंग्रित है । 
५, परकीया : स्वकोया-- 

चैतन्य सम्प्रदाय में परकीया माव के अतिरिक्त और किसी भाव को 
स्थान नहीं है । परकीया-माव की स्थिति ब्रज में ही हो सकती है ।* परकीया 
भाव में वेद, लोक, शास्त्र आदि के विधि-निपेधमय अनुशासन के प्रति एक 





१. भअगे तु वामे दृषभानुजा छुदा, 
वराजमानामनुरूपसोभगाम्‌ । 
सखी सहर्ख़न: परिसेवितां सदा, 
स्मरेम देवीं सकलेष्टकामदाम्‌ ॥ 
२. परकीया भावे रसेर उल्लास । 
श्रज बिना इहार अन्यत्र नाहि बास॥ (चंतन्य चरितामृत्र, १॥४॥३७६) 


भाव-भूमि । २१७ 


क्रान्ति दिखलाई पड़ता है। यह क्रान्ति श्री चैतन्य के मस्तिष्क में उत्पन्न हुई 
और इसकी अभिव्यक्ति रूप ग्रोस्वामी ने की । चैतन्य मत के आचार्यो ने ब्रज 
की यात्रा की : यहाँ पर इस भाव के भक्ति केन्द्र बने । 


इस मत्त में परकीयाभाव की भक्ति को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया । 
गोधषियों का त्रिविध वर्गीकरण इस संप्रदाय में मिलता है। इनमें ब्रजांगना का 
स्थान सर्वोच्च है, जो परकोया पद्धति से भक्ति साधवा करती हैं ।' इसी प्रकार 
का वर्गीकर वल्लम संप्रदाय में मिलता है। इनमें गोपांगना को इसीलिये 
सर्वेश्र छ़ कहा गया है कि वह परक्रीया शावावलंबन करती हैं! परकोय 
भाव में आत्म-विस्मृति और आत्मोसर्ग अपने चरम पर रहते हैं। आत्म-निवेदन 
की यह अन्तिम अवस्था है ।। छुद्ध प्र मप्नाव ही एक मात्र जीवन मूल्य बन जाता 
है : शेप मूल्य निरर्थक हो जाते हैं। इसकीं महत्ता इस वात से प्रकट है कि 
स्वयं वेद ओर उपनिश्रद्‌ इस रूप में अवतरित होकर प्रेमाभक्ति का रसास्वादन 
करते हैं । कृष्ण न्रज की प्राप्ति का एकमात्र उपाय परकीया भाव है। विना 
सखी की स्थिति में आये क्रृष्ण की लीला में ही प्रवेश नहीं मिलता ।* स्वयं 
लक्ष्मी भी श्र्‌तिपणय का अनुगमन करके इस रस से वंचित रह जाती है।र 
सखी या मंजरी की देह को सिद्धेझेह माना जाता है। यह देह लिंग-वेह या 
सूक्ष्देह से भी परे है। इसी परकीया भाव की पृष्टि के लिए चँतन्य 
संम्प्रदाय में राधा तथा सखियों के गोप-पतियों का नाम भी लिया जाता है । 
वे अपने लौकिक पतियों से प्र म न करके कृष्ण से ही प्रेम करती हैं । इसप्रकार 
कृष्ण उनका उपपत्ति ही है। उस प्रेम व्यापार में सर्वाधिक आनन्द की प्राप्ति 


होती है, जिशमें अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है : उनको सदर्प 
कुचलकर प्र॑म की विजय घोषित की जाती है। 





२१. कृष्णकान्ता गण देखि त्रिविधि प्रकार । 

एक लक्ष्मी गण प्ररे, सहिषी गण आर ४ 

ब्रजांगनागण रूप आर कान्तागण सार।॥ 

श्री राधिका हैं ते कान्‍ता गपेर विस्तार ॥ 

( चतन्य चरितायृत, १४८३ ) 

२. सी बिनु एइ लीलाय अन्यर नाहे गति । 

सखी भाव्रे ये इ ताँरे करे अनुगति ॥ ( वही २८२३२ ) 
३. ताहाते इष्टान्त लक्ष्मी करिला भजन । 

तथापि ना पाइल बजे ब्जेन्द्र नंदन ॥ ( वही २।८।२४४ ) 


२१८ सूरसाहित्य : नव मूल्यांकन 


चैतन्य मत में स्वकीया और परकीया में एक संघर्ष भी रहा। 
रूप गोस्वामी (१६ वीं शती) ने अपने “ललिता माधव में राधा और कृष्ण 
का विवाह संपन्‍न कराया है । साथ ही जीव ग्रोस्वामी ने उज्ज्वल नीलम